शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

एक और राष्ट्रीय दिवस "निपटा" सब लौट गए छुट्टी मनाने

एक और राष्ट्रीय दिवस निपटा घर लौट गये सब छुट्टी मनाने। जिस संस्था से जुडा हूं, वहां और किसी दिन जाओ न जाओ आज जाना बहुत जरूरी होता है। अपने को देश-भक्त सिद्ध करने के लिए। मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, एक तरफ साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन ने आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य किया और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। कमोबेश यही हाल सब जगह हैं।

आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और प्रेरक देशभक्ति की भावना सारे लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के ड़र से या और किसी मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। ऐसे दिन, वे चाहे गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं।
क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है।

2 टिप्‍पणियां:

: केवल राम : ने कहा…

यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता।

अब अगर उत्साह दीखता है तो राजनीति की रोटियां सेंकने में ...बाकि किसी भी काम के लिए यहाँ पर जोश और उत्साह की कमी है ...क्या कहें ...बहुत सार्थक ढंग से विचार किया है आपने ...आपका आभार

राज भाटिय़ा ने कहा…

सही लिखा, गॊण इस लिये हो रही हे कि अब लोगो को समझ मै आ गया कि हमे आजादी तो मिली ही नही, पहले अग्रेज हरमी थे हमारे आका आज उन की भाषा बोलने वाले वेगेरत यह कमीने नेता हे, जो भीख मांग पर वोटो की हमारे ही राजा बन बेठते हे, इस लिये कोन मनाये आजादी ओर केसी आजादी जिन को मार मार कर भगाया उन्ही की भाषा मे इस आजादी का भाषाण सुनाया ओर बोला जाता हे...