मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

क्या होलिका किसी षडयंत्र का शिकार थी. होली पर विशेष.

वर्षों से यह धारणा चली आ रही है कि, होलिका ने अपने भतीजे प्रह्लाद को मारने की नाकाम चेष्टा की थी। ऐसा उसने क्यूं किया? क्या मजबूरी थी जो एक निर्दोष बालक के अहित में उसने अन्याय का साथ दिया? क्या वह किसी षड़यंत्र की शिकार थी ?

असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पडोसी राज्य के राजकुमार इलोजी एक दूसरे को दिलोजान से चाहते थे। इलोजी के रूप-रंग के सामने देवता भी शर्माते थे। सुंदर, स्वस्थ, सर्वगुण संपन्न साक्षात कामदेव का प्रतिरूप थे वे। इधर होलिका भी अत्यंत सुंदर रूपवती युवती थी। लोग इनकी जोडी की बलाएं लिया करते थे। । उभय पक्ष की सहमति से दोनों का विवाह होना भी तय हो चुका था। परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र के प्रभू प्रेम से व्यथित रहा करता था। उसके लाख समझाने-मनाने पर भी प्रह्लाद की भक्ती मे कोई कमी नहीं आ पा रही थी। धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप की नाराजगी क्रोध मे बदलती चली गयी और फिर एक समय ऐसा भी आ गया कि उसने अपने पुत्र को सदा के लिये अपने रास्ते से हटाने का दृढसंकल्प कर लिया। परन्तु लाख कोशिशों के बावजूद वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नही कर पा रहा था। राजकुमार का प्रभाव जनमानस पर बहुत गहरा था। राज्य की जनता हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से तंग आ चुकी थी। प्रह्लाद के साधू स्वभाव के कारण सारे लोगों की आशाएं उससे जुडी हुई थीं। हिरणयकश्यप ये बात जानता था। इसीलिये वह प्रह्लाद के वध को एक दुर्घटना का रूप देना चाहता था और यही हो नहीं पा रहा था। इसी बीच उसे अपनी बहन होलिका को मिले वरदान की याद हो आई। जिसके अनुसार होलिका पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पडता था। उसने होलिका को अपनी योजना बताई कि उसे प्रह्लाद को अपनी गोद मे लेकर अग्नि प्रवेश करना होगा। यह सुन होलिका पर तो मानो वज्रपात हो गया। वह अपने भतीजे को अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहती थी। बचपन से ही प्रह्लाद अपनी बुआ के करीब रहा था। बुआ ने ही उसे पाल-पोस कर बडा किया था। जिसकी जरा सी चोट से होलिका परेशान हो जाती थी, उसीकी हत्या की तो वह कल्पना भी नही कर सकती थी। उसने भाई के षडयन्त्र मे भागीदार होने से साफ़ मना कर दिया। पर हिरण्यकश्यप भी होलिका की कमजोरी जानता था। उसने भी होलिका को धमकी दी कि यदि उसने उसका कहा नही माना तो वह भी उसका विवाह इलोजी से नहीं होने देगा। होलिका गंभीर धर्मसंकट मे पड गयी थी वह अपना खाना-पीना-सोना सब भूल गयी। एक तरफ़ दिल का टुकडा, मासूम भतीजा था तो दूसरी तरफ प्यार, जिसके बिना जिंदा रहने की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। आखिरकार उसने एक अत्यन्त कठिन फ़ैसला कर लिया और भाई की बात मान ली, क्योंकि उसे डर था कि कहीं हिरण्यकश्यप इलोजी को कोई नुक्सान ना पहुंचा दे। निश्चित दिन, उसने अपने वरदान का सहारा प्रह्लाद को दे, उसे अपनी गोद मे लेकर, अग्नि प्रवेश कर अपना बलिदान दे दिया, पर उसके इस त्याग का किसी को भी पता नहीं चल पाया।

यही दिन होलिका और इलोजी के विवाह के लिए भी तय किया गया था।
इलोजी इन सब बातों से अंजान अपनी बारात ले नियत समय पर राजमहल आ पहुंचे। वहां आने पर जब उन्हें सारी बातें पता चलीं तो उन पर तो मानो पहाड टूट पडा, दिमाग कुछ सोचने समझने के काबिल न रहा। पागलपन का एक तूफ़ान उठ खडा हुआ और इसी झंझावात मे उन्होंने अपने कपडे फाड डाले और होलिका-होलिका की मर्म भेदी पुकार से धरती-आकाश को गुंजायमान करते हुए होलिका की चिता पर लोटने लगे। गर्म चिता पर निढाल पडे अपने आंसुओं से ही जैसे चिता को ठंडा कर अपनी प्रेयसी को ढूंढ रहे हों। उसके बाद उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। वन-प्रातों मे भटकते-भटकते सारी जिंदगी गुजार दी।

पर इतिहास ने दोनों को भुला दिया। इलोजी की बात करें तो उनका नाम सिर्फ राजस्थान तक सिमट कर रह गया और रही होलिका, तो उसके साथ तो घोर अन्याय हुआ, उसके बलिदान को भुला कर उसे प्रह्लाद की हत्या के षड़यंत्र में शामिल एक अपराधी मान कर बदनाम कर दिया गया।

पर सोचने की बात है कि यदि होलिका अपराधिनी थी तो इस मंगलमय त्यौहार का नाम उसके नाम पर क्यूं रखा गया?

13 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

नई जानकारी.

musingswidmustardsauce ने कहा…

बंधु, इस कथा का स्रोत क्या है?

sanjay swadesh ने कहा…

kahta rochak lagi.
nayee bat janane ko mili.

sanjay swadesh
nagpur

बी एस पाबला ने कहा…

अनोखी जानकारी!

बी एस पाबला

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस जानकारी के लिए धन्यवाद!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

राज भाटिय़ा ने कहा…

इस सुंदर जानकारी के लिये धन्यवाद, लेकिन यह कही पहले भी पढी है

HIMANSHU ने कहा…

यह कथा मैंने बचपन में अपनी दादी से सुनी थी। उसमें मात्र इतना स्पष्टीकरण जोड़ने को शेष है कि होलिका का वरदान एक 'ओढ़नी' के रूप में था जिसे ओढ़ने वाले को अग्निदेव जलाएँगे नहीं ऐसा चमत्कार उस ओढ़नी में निहित था। होलिका ने अपनी ममता पर अपने प्राणों को न्यौछावर किया इसीलिए होलिकादहन के पूर्वापर पाँच दिनों में 'सूतक' लागू माना जाता है जिसे अन्य शब्दों में 'पंचक' भी कहते हैं। 'सूतक' उस अवधि को कहते हैं जिस दौरान कुल में किसी मृत्यु या जन्म आदि के कारण 'अशौच' या अशुद्धि/अपवित्रता का लागू होना समझा जाता है। इस अवधि में किसी भी मांगलिक कार्य का निषेध होता है, मंत्रजप और मूर्ति-स्पर्श का भी। होलिका को यह सम्मान मिला कि उनके दहन की वर्षगाँठ को सभी के कुल में सूतक लागू माना जाता है। होलिका की प्रथम लपटों को सधवा स्त्रियों द्वारा देखे जाने का भी निषेध है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय होगा कि हमारी प्राचीन हिन्दू संस्कृति में किसी के दुर्गुणों मात्र के कारण उसका पूरी तरह तिरस्कार न करके उसके अच्छे गुणों का सम्मान करते रहने का चलन था - बापू के शब्दों में "पाप से घृणा करो, पापी से नहीं" वाली बात। उसी तरह अच्छे गुणों के बावजूद दुर्गुणों का तिरस्कार भी लागू रहता था।
इसीलिए दशहरे पर, रावण के वध को एक ज्ञानी पण्डित की हत्या भी मानते हुए, ब्रह्महत्या का सूतक जहाँ एक ओर लागू होता है, वहीं दूसरी ओर होलिका और इलोजी का संबन्ध परिणय में तब्दील न हो पाने के कारण उसे सामाजिक मान्यता नहीं प्राप्त थी - और यही कारण था उनके सीमित तिरस्कार का भी।
यह मैंने दादी दे सुना था, सो आप सबकी जिज्ञासा देखकर शेअर कर लिया। अब आगे जिज्ञासाओं के निदान हेतु अपनी मति के आधार पर मेरा कोई स्पष्टीकरण देना मर्यादा का उल्लंघन होगा।

नीरज मुसाफिर जाट ने कहा…

मेरे लिये तो यह एकदम नयी जानकारी है.

shyam jagota ने कहा…

कहानी चाहे कैसे भी बांची जाय पर उपदेश तो वही है बुराई पर अच्छाई की जीत
पर विडंबना है कि आज हम इससे दूर होते जा रहे हैं

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

भाटिया जी,
पिछले साल भी होली पर यह सोच पोस्ट की थी। ईलोजी तथा होलिका के आपसी प्रेम की कथा पढने के बाद ऐसा लगा था कि हो सकता है मजबूरी में होलिका को यह कदम उठाना पड़ा हो। आज हिमांशु जी की टिप्पणी पढ कर विश्वास और पुख्ता हो गया।

Kartikeya ने कहा…

Kahani bahut hi rochak aur gyanprad hai lekin kahani fir bhi baki hai dost.... HOLIKA kisi shadyantra ki shikar thi!!!! pooore kahani se ye to nahi laga, lekin ye jaroor laga ki swarth ki khatir usne apne pran se pyare bhatije ko marne ke shadyantra mein shamil ho gayi......... vartman samaj mein aise hadse hote hai.. kya we sabhi daya/ samman ke haqdar hai..... nahi...
Ye kahani sambandho ki maryada tatha ussme nihit pyar aur sneh ki nai vyakha karta hai......... "apne rishtedaro ke swabhao ki bhi parakh rakkhe, agar aisi waisi bat lage to sawdhan rahe aur ghar ke bujurgo ko suchit kare'
Prahalad ke case mein to ghar ke buzug hi shadyantra mein shamil the. Balak Prahlad ki taraf se soche aur shdyantra ki vyakhya ko review kare.
Fir kahoonga kahano achhi thi, kai nai jankari mili par katil Holika kisi sadvawna ke kabil nahi thi..
Kumar Kartikeya
Delhi

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुमार कार्तिकेयजी, यह कहानी एक अपनी सोच है। होलिका कातिल कैसे हो गयी? उसने तो भाई के अत्याचार के सामने बचाव का कोई रास्ता ना देख अपनी जान न्योछावर कर दी। देवताओं द्वारा दिया गया वरदान खाली तो नहीं जाता उसने अपने वरदान का लाभ अपने भतीजे को दे स्वंय को मौत के घाट उतार दिया। यह तो उसका बलिदान ही हुआ न?