शनिवार, 23 जनवरी 2010

हमीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते

कभी-कभी बातचीत के दौरान हम आधे-अधूरे शेर या मिसरे मसाले के रूप में जोड़ देते हैं। पर पूरा मिसरा या शेर याद नहीं होता या पता ही नहीं होता। ऐसी ही कुछ लोकप्रिय पंक्तियां हाज़िर हैं पर खेद है कि सब के रचनाकारों का नाम नहीं खोज पाया हूं।
जान है तो जहान है। यह मीर साहब की रचना इस प्रकार है :-
'मीर' अम्दन भी कोई मरता है,
"जान है तो जहान है प्यारे।"

चल साथ कि हसरत दिले-मरहूम से निकले,
"आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले"

गालिब साहब के तो ढेरों आधे-अधुरे मिसरे हमारी जबान पर वर्षों से चढे हुए हैं :-
इशरते कतरा है दरिया में फना हो जाना,
"दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।"

हमको मालुम है जन्नत की हकीकत लेकिन
"दिल के खुश रखने को ख्याल अच्छा है।"

गमे हस्ती का असद जुज मर्ग इलाज,
"शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक"

उनको देखने से आ जाती है मुंह पर रौनक,
"वो समझते हैं कि बिमार का हाल अच्छा है"

बुलबुल के कारोबार पे हैं खंदाहाए गुल,
कहते हैं जिसको इश्क खलल है दिमाग का।
ऐसे और भी हैं :-
"हजरते 'दाग' जहां बैठ गये बैठ गये"
और होंगे तेरी महफिल से उभरनेवाले।

मरीजे इश्क पे रहमत खुदा की।
"मर्ज बढता गया ज्यूं-ज्यूं दवा की"

हम तालिबे शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम,
"बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम ना होगा"

रिंदे खराब हाल को जाहिद ना छेड़ तू,
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू।
और
अब इत्र भी मलो तो मुहब्बत की बू नहीं,
"वो दिन हवा हुए कि जब पसीना गुलाब था" :)

जमाना बड़े शौक से सुन रहा था,
हमीं सो गये दास्तां कहते-कहते।

खुदा हाफिज़

6 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

कुछ उम्दा शेर पढ़वाने के लिये धन्यवाद.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बड़े शौक से सुन रहा था जमाना.
"हमीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते"

बहुत सही पकड़ा है जी!

राज भाटिय़ा ने कहा…

हम बड़े शौक से टिपियाते रहे,
आप ही सो गये टिपण्णियां पढते पढते।
बहुत सुंदर जी
खुदा हाफ़िज

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह बहुत बढिया.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

इस पोस्‍ट को तो मैं बुकमार्क करके रख रहा हूं। पता नहीं कब काम आ जाए।

आभार्...

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

बेहतरीन शेर । हरदिल अजीज़ हैं ये शेर ।

आभार ।

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