शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

एक पाव भर की रजाई, ठण्ड दूर रखने का हल्का-फुल्का साधन

सर्दी की दस्तक के साथ-साथ गर्म कपड़े, कंबल और रजाईयां भी आल्मारियों से बाहर आने को आतुर हो रहे हैं। रजाई का नाम सुनते ही एक रूई से भरे एक भारी-भरकम कपड़े का ख्याल आ जाता है, जो जाड़ों में ठंड रोकने का आम जरिया होता है। पहाड़ों में तो चार-चार किलो की रजाईयां आम हैं ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। अब सोचिये इतना भार शरीर पर हो तो नींद में हिलना ड़ुलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो अजीब सा लगेगा। पर पुराने समय में राजा-महाराजाओं के वक्त में राज परिवार के लोग कैसे ठंड से बचाव करते होंगे। ठीक है सर्दी दूर करने के और भी उपाय हैं या थे, पर ओढने के लिये कभी न कभी, कुछ-न कुछ तो चाहिये ही होता होगा। अवध के नवाबों की नजाकत और नफासत तो जमाने भर में मशहूर रही है। उन्हीं के लिये हल्की-फुल्की रजाईयों की ईजाद की गयी। ये खास तरह की रजाईयां, खास तरीकों से, खास कारीगरों द्वारा सिर्फ खास लोगों के लिये बनाई जाती थी। जिनका वजन होता था, सिर्फ एक पाव या उससे भी कम। जी हां एक पाव की रजाई पर कारगर इतनी कि ठंड छू भी ना जाये। धीरे-धीरे इसके फनकारों को जयपुर में आश्रय मिला और आज राजस्थान की ये राजस्थानी रजाईयां दुनिया भर में मशहूर हैं।

इन हल्की रजाईयों को पहले हाथों से बनाया जाता था। जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत, समय और लागत आती थी। समय के साथ-साथ बदलाव भी आया। अब इसको बनाने में मशीनों की सहायता ली जाती है। सबसे पहले रुई को बहुत बारीकी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। फिर एक खास अंदाज से उसकी धुनाई की जाती है, जिससे रूई का एक-एक रेशा अलग हो जाता है। इसके बाद उन रेशों को व्यव्स्थित किया जाता है फिर उसको बराबर बिछा कर कपड़े में इस तरह भरा जाता है कि उसमें से हवा बिल्कुल भी ना गुजर सके। फिर उसकी सधे हुए हाथों से सिलाई कर दी जाती है। सारा कमाल रूई के रेशों को व्यवस्थित करने और कपड़े में भराई का है जो कुशल करीगरों के ही बस की बात है। रूई जितनी कम होगी रजाई बनाने में उतनी ही मेहनत, समय और लागत बढ जाती है। क्योंकि रूई के रेशों को जमाने में उतना ही वक्त बढ जाता है।
छपाई वाले सूती कपड़े की रजाई सबसे गर्म होती है क्योंकि मलमल के सूती कपड़े से रूई बिल्कुल चिपक जाती है। सिल्क वगैरह की रजाईयां देखने में सुंदर जरूर होती हैं पर उनमें उतनी गर्माहट नही होती। वैसे भी ये कपड़े थोड़े भारी होते हैं जिससे रजाई का भार बढ जाता है।

तो अब जब भी राजस्थान जाना हो तो पाव भर की रजाई की खोजखबर जरूर लिजिएगा।

11 टिप्‍पणियां:

शरद कोकास ने कहा…

हम लोग भारी भरकम रज़ाई के आदि हैं .. लेकिन इस रज़ाई की बात ही कुछ और है ।

राज भाटिय़ा ने कहा…

शर्मा जी बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने, अगर इन की कीमत भी बता देते तो अच्छा था

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत बढ़िया जानकारी!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

कहाँ पर मिलती हैं ये रजाइयाँ!

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

भाटिया जी।
इनकी कीमत रुई पर निर्भर करती है, जितनी कम रूई होगी उतनी ही कीमत बढ जाती है।
काफी पहले एक ऐसी रजाई लाने का मौका मिला था। तब 300 की आई थी। मेरे ख्याल से 500-700 में अच्छी चीज मिल जानी चाहिये।

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

मयंक जी,
जयपुर तो इनका घर है। वैसे राजस्थानी एम्पोरियम में भी कभी-कभार मिल जाती हैं।

अजय कुमार झा ने कहा…

लिफ़ाफ़ा में आ जाएगा न ...एक ठो भिजवाईयो तो गगन जी ....अरे नहीं नहीं ठंडा नहीं है ओतना....बस एक पाव का मजा लेना चाहते हैं ..

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

शर्मा जी, हम तो इनका पिछली दो तीन सर्दियों से प्रयोग कर रहे हैं....वैसे बढिया चीज है!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

बहुत ही उपयोगी हैं यह रजाइयाँ । बेहतर प्रविष्टि । आभार ।

anuradha srivastav ने कहा…

राजस्थान की खासियत और खसूसियत है यह.

Neha ने कहा…

mujhe bhi bhari bharkam kambal mein atyant asuvidha hoti hai...yeh rajai to mere jasie logo ke liye vardaan hai.