मंगलवार, 17 नवंबर 2009

दादा जी, अब भाग लो (:

बहुत बार ऐसा हुआ है कि अकेले बैठे यादों की जुगाली करते अचानक कोई बात याद आ जाती है और बरबस हंसी फूट पड़ती है। ऐसा ही एक वाक्या है जो याद आते ही हंसी ला देता है चेहरे पर। सारा खेल उसमें भाषा का है, हिंदी और बंगला का घालमेल। बहुत बार इच्छा हुई उसे आपस में बांटने की पर उसका मजा थोड़ी बहुत बंगला जानने वाले ले सकते हैं नहीं तो भाषा अमर्यादित सी लगती है। इसी से संकोचवश निर्मल हास्य से वंचित रह जाना पड़ता है। आज भी पूरा लिख ड़ाला था पर फिर आने वाले दिनों पर टाल दिया। उसके बदले यह खानापूर्ती सही -


एक छोटा सा बच्चा एक घर के दरवाजे की घंटी बजाने की काफी देर से कोशिश कर रहा था, पर उसका हाथ घंटी तक नहीं पहुंच पा रहा था। एक बुजुर्ग उधर से निकले और यह सोच कि शायद उसे अंदर जाना है, उसकी सहयता करने के लिये उन्होंने घंटी बजा दी, और बच्चे की तरफ देख बोले, अब ठीक है?
बच्चा बोला, हां, पर अब भाग लो !

8 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत बडिया शुभकामनायें

Udan Tashtari ने कहा…

दादा जी बुरा फंसे!!

Anil Pusadkar ने कहा…

हा हा हा हा।मज़ा आ गया।

राज भाटिय़ा ने कहा…

यह बच्चा जरुर ताऊ का ही होगा:)

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

:)

Harshad Jangla ने कहा…

Gaganji
I visit yr blog since a couple of months very regularly.They are very useful, informative and also entertaing sometime.
Your letters used to be big and bold but now I find them pretty small creating difficulty to read them.
Hope you will do something.
Agreem Dhanyavaad.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

AlbelaKhatri.com ने कहा…

ha ha ha

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आज छोटी ही टिप्पणी करेंगे!
NICE.

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