pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

गेपरनाथ, भोलेनाथ का एक और रूप

मंदिर के अंदर जगह इतनी कम और संकरी है कि बमुश्किल दो लोग ही झुक कर अंदर बैठ सकते हैं। वहीँ से कुछ नीचे, पहाड़ी से गिरी हुई छोटी-बड़ी शिलाओं से घिरा, एक ताल है, जिसमें पहाड़ों से आ-आ कर पानी एकत्र होता रहता है। हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं। जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है

देव स्थान जितना दुर्गम होता है उसकी प्रमाणिकता उतनी ही बढ़ जाती है। खासकर पहाड़ों के दुर्गम रास्तों के बाद अपने गंतव्य पर जा अपने इष्ट के दर्शन मिलने पर आस्था और विश्वास दोगुना हो जाता है। कष्ट सह कर पहुँचने पर जिस अलौकिक आनंद की अनुभूति मिलती है वह वर्णनातीत होती है। पहाड़ों के अलावा भी हमारे देश में कई ऐसे स्थान हैं, जहां पहुँचना कुछ कष्ट-साध्य ही माना जाएगा। ऐसा ही एक  स्थान है, कोटा बूंदी मार्ग
घाटी के विहंगम दृश्य में दूर नीचे दिखता मंदिर
पर शिव जी का एक मंदिर जिसे स्थानीय लोग बाबा गेपरनाथ के रूप में पूजते हैं। ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि के आस-पास शिव जी अपने पूरे परिवार के साथ कुछ समय यहां गुजारते हैं। इस जगह को करीब पांच सौ साल पुराना बतलाया जाता है।    
गहरी घाटी 

 सीढियाँ 

झरता पानी 
कोटा शहर से करीब 24-25 कि.मी. की दूरी पर एक सड़क दायीं ओर मुड़ती है, जो दो किमी बाद चम्बल की घाटी और उस पर बने प्राकृतिक पहाड़ी संकरे दर्रे पर जा कर ख़त्म होती है। ऊपर से घाटी गहराई 800 से 1000 फिट तक की है। वहीँ से पहाड़ी की एक दिवार से जुडी हुई सीढ़ियों की श्रृंखला नीचे तक चली गयी है। करीब चार सौ सीढ़ियां उतरने के बाद, भूतल से करीब 100 फिट पहले एक चबूतरे पर खोह नुमा जगह पर शिव जी का छोटा सा लिंग स्थापित है जिस पर पहाड़ी के अंदर से लगातार पानी आ कर अभिषेक करता रहता है। जगह इतनी कम और संकरी है कि बमुश्किल दो लोग ही झुक कर अंदर बैठ सकते हैं।
मंदिर 
सीढ़ियों से नज़र आता मंदिर 

शिवलिंग और अभिषेक करती जल-धारा 
वहीँ से कुछ नीचे, पहाड़ी से गिरी हुई छोटी-बड़ी शिलाओं से घिरा, एक ताल है, जिसमें पहाड़ों से आ-आ कर पानी एकत्र होता रहता है। हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं ।जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है।
ताल और दूसरे सिरे पर कंदराएँ 
दर्रे की दूसरी दिवार पर भी कुछ कुटियानुमा कंदराएँ नज़र आती हैं जिनके बारे में बताया जाता है कि पहुंचे हुए साधू-संत वहाँ रह कर अपनी साधना पूरी किया करते थे। देख सुन कर आश्चर्य होता है कि इतने दुर्गम, निर्जन, सुनसान, दुरूह इलाके की खोज कैसे हुई होगी। आज तो दस तरह की सहूलियतें उपलब्ध हैं। नीचे जाने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कर दिया गया है।

पहाड़ी से गिरे शिलाखंड
 बिजली तो खैर आज भी नहीं है, पर सैकड़ों साल पहले जब इलाका जनशून्य होता होगा, जंगली जानवरों की बहुतायद होगी,   तब कैसे   कोई   यहां आकर    साधना में लीन होता होगा।  इस जगह के रात के अँधेरे में की कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है।
वापस चढ़ते समय रुकना तो पड़ता ही है भाई  
वैसे दिन की रौशनी में प्रकृति की अपूर्व छटा साल भर लोगों को लुभा कर प्रभू के दर्शन के अलावा युवाओं को पिकनिक के लिए भी आमंत्रित करती रहती है। पर अभी भी लोगों की आमद ज्यादा नहीं है, बमुश्किल डेढ़-दो सौ लोग ही रोज आते होंगे। फिर भी कभी मौका मिले तो ऐसी अद्भुत जगह के दर्शन करने का सुयोग छोड़ना नहीं चाहिए।  

रविवार, 31 जनवरी 2016

रामायण की उप-कथा से जुड़ा कोटा का हनुमान जी का मंदिर

 रंगबाड़ी इलाके में विराजमान हनुमान जी 
चिर-काल से ही हमारे यहां कथा-कहानियों का चलन रहा है। धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, काल्पनिक, यथार्थवादी हर तरह के किस्से चलन में रहे हैं। समय के साथ-साथ परिवेश के अनुसार उनमें थोड़े बहुत फेर-बदल होते रहते हैं, उनमें उपकथाएं, उप-उप कथाएं जुड़ती रहती हैं। कभी-कभी तो इस जोड़-घटाव के कारण मूल कथा का स्वरूप ही बदल जाता था। एकाधिक बार  आख्यानों में आध्यात्मिक सत्य को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए काल्पनिक कथाओं का सहारा भी  लिया जाता  रहा है, जिसे कथा की रोचकता या कथानक पर अटूट आस्था के कारण पाठक अनदेखा कर देता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार तो कहानियाँ बनीं ही, धार्मिक और काल्पनिक गल्पों को सच्चाई के करीब लाने के लिए साक्ष्य खोजे और गढ़े गए। ऐसे अनोखे स्मारक देश भर में दिख जाते हैं।  पिछले दिनों महाकाव्य रामायण की एक उपकथा से जुड़े अवशेष राजस्थान के कोटा शहर में देखने का मौका मिला। कथा के अनुसार श्री राम के राज्याभिषेक पर भगवान शिव और हनुमान जी की भारत दर्शन की इच्छा को पूरा करने का जिम्मा लंका नरेश विभीषण ने लिया और उन्हें वृहदाकार कांवड़ में बैठा यात्रा शुरू तो कर दी पर शिव जी की शर्त के अनुसार कांवड़ के कहीं भी जमीन से छू जाने से यात्रा समाप्त हो जाएगी, के चलते उन्हें कोटा में अपना प्रयाण खत्म करना पड़ा था।  

कांवड़ के जिस हिस्से के धरा को छूने से शिव जी उतरे वह जगह थी चौमा गांव, वहीँ उनके मंदिर का निर्माण हुआ। उसी तरह कांवड़ का दूसरा सिरा जिस पर हनुमान जी बैठे थे वह रंगबाड़ी नामक जगह पर टिका वहीँ उनका मंदिर बना। पिछले दिनों कोटा प्रवास पर यहां बालाजी के दर्शन करने का सुयोग मिला था।      

बुधवार, 27 जनवरी 2016

फ्रांस के राष्ट्रपति के भोज में ऐश्वर्या ही क्यों ?

इसमें अमिताभ बच्चन की दखल या रसूख की कोई भूमिका नहीं थी। ऐश्वर्या की फांस में उसकी छवि और पहचान ने ही यह सम्मान जुटाया था।

कल काफी दिनों बाद 26 जनवरी की छुट्टी पर ठाकुर जी मेरे यहां आए। कुशल-क्षेम की जानकारी तो फोन पर हासिल हो जाती थी पर आमने-सामने बैठ वार्तालाप हुए एक अरसा हो गया था। इधर-उधर की बातचीत के बाद अपनी आदत के अनुसार उन्होंने एक सवाल दाग ही दिया कि, शर्मा जी ये बताइये कि इतनी नामचीन, कुशल, अभिनय-प्रवीण अन्य अभिनेत्रियों के होते हुए भी कल फ्रांस के राष्ट्रपति के भोज में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को ही क्यों आमंत्रित किया गया ? क्या अमिताभ बच्चन की पहुँच के कारण ?

सवाल जायज था, समीचीन भी और प्रासंगिक भी। यह बात बहुत से लोगों के जेहन में उठी भी होगी। पर आम-जन के हित-अहित से कोई सरोकार ना होने के कारण कोई ख़ास तवज्जो नहीं मिल पायी और आम खबर की तरह आई-गयी हो गयी थी। पर सवाल तो सवाल था जिसका सही उत्तर भी होना चाहिए ! तो जहां तक मेरा अंदाज था और मुझे समझ में आया, इसमें अमिताभ बच्चन की दखल या रसूख की कोई भूमिका नहीं थी। ऐश्वर्या की फांस में उसकी छवि और पहचान ने ही यह सम्मान जुटाया था। पहली बात तो यह कि वहाँ की सरकार द्वारा उसे वहाँ के सबसे बड़े नागरिक सम्मान "Knight of the Order of Arts and Letters" से नवाजा जा चुका है। दूसरे वह वहाँ, दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म समारोह, "केन्स फिल्म फेस्टिवल" की तकरीबन नियमित मेहमान रही है। वहीँ उसकी दूसरी पारी की फिल्म "जज्बा" सबसे पहले फ्रांस में ही दर्शकों के सामने पेश की गयी थी। तीसरे वह फ़्रांस की मशहूर कॉस्मेटिक कंपनी "L’Oral Paris" की भी ब्रांड एबेंस्डर है। फिर पेरिस में उसने कई फिल्मों की फिल्मांकन में भाग लेकर वहाँ अपनी पहचान बना रखी है। वैसे भी एक सौम्य, गरिमामय, बुद्धिजीवी, विवादहीन, प्रतिष्ठित परिवार का सदस्य होने का फायदा तो होता ही है। 

यही सब वे वजहें हैं जो उसे दूसरी अभिनेत्रियों की बनिस्पत तरजीह दी गयी होगी। 

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

पंद्रह किलो सोने के साथ बाबागिरी !

वैसे तो "बाबा" शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे दादा, बुजुर्ग व्यक्ति और कहीं बालक भी। पर वृहद रूप में इस शब्द को ऐसे इंसान के लिए प्रयोग किया जाता है जिसने मोह-माया त्याग दी हो, सन्यास ले लिया हो, योगी हो। खुद को अनुशासित कर हर तरह की कुटेव से दूर रहता हो।  हमारे ग्रंथों और ज्ञानी-जनों के अनुसार ऐसा इंसान दुनिया की मोह-माया को त्याग प्रभू से लौ लगा लेता है, उसका किसी भी भौतिक चीज से व्यक्तिगत लगाव नहीं रहता, उसके मन में सिर्फ प्रेम बसता है, भक्ति बचती है, सर्वहारा के लिए करुणा शेष रह जाती है वह अपने-आप को परम-सत्ता को समर्पित कर देता है।

पर आजकल सारी मान्यताएं, धारणाएं बदली-बदली सी नजर आने लगी हैं। सन्यास लेने के बाद, बाबा कहलाने के बावजूद भी लोग मोह-माया नहीं त्याग पाते।  गुरु बन जाते हैं। शिष्यों की फौज खड़ी हो जाती है।  सैंकड़ों एकड़ में आश्रम खुल जाते हैं। ऐसे गुरु स्वयं ही भौतिक जगत से मुक्त नहीं हो पाते तो शिष्य को क्या मुक्ति दिला पाएंगे। यहाँ भी घृणा, द्वेष, शोषण, भय, प्रसिद्धि पाने की ललक, अपने-आप को श्रेष्ठ साबित करने की हवस, सब स्थाई भाव हैं। यहाँ भी जिसके साथ जन-बल होता है, सत्ता होती है, वह अराजक बन जाता है। यहां भी वह सब कुछ होता है, जो बाकी भौतिक जगत में होता है, अंतर होता है तो केवल वस्त्रों के रंग का | अपने-आप को औरों से अलग दिखाने की चाहत, समाज में अपने नाम की चर्चा की ललक, किसी भी तरह प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा के लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। जिसका नाम भी कभी नहीं सुना गया हो, वह भी अपने क्रिया-कलापों से रातों-रात मशहूरी पा लेता है। समाज में चर्चा का विषय बन जाता है। जैसा कि अभी पिछले दिनों एक तथाकथित बाबा की, अपने स्वर्ण-प्रेम के चलते, बहुत चर्चा थी मीडिया में। अक्सर हरिद्वार से कांवड़ ले दिल्ली आने वाले इस शिव-भक्त के शरीर पर पंद्रह किलो (इनके शिष्यों के अनुसार आठ किलो) सोना, जिसकी कीमत तकरीबन तीन करोड़ के ऊपर होगी सदा शोभायमान रहता है। किसी समय के व्यापारी ने अपने ताम-झाम से लोगों को आकृष्ट करवा अब "गोल्डन बाबा" की उपाधि हासिल कर ली है।       

अनगिनत नकारात्मक खबरों के बावजूद रोजमर्रा की परेशानियों से जूझते, किसी अलौकिक चमत्कार की आशा में अभी भी लोगों की आस्था, विश्वास, श्रद्धा साधू-सन्यासियों के प्रति कम नहीं हुई है। पर उनसे आशा रखते हैं मार्ग-दर्शन की। अपेक्षा रखते हैं सात्विकता की। उन्हें लगता है कि ऐसे लोग आध्यात्म को गहराई से समझते हैं, प्रभू के ज्यादा करीब हैं इसलिए उनकी मुश्किलों का उनके कष्टों का, उनकी परेशानियों का निवारण कर सकते हैं। उनके दिमाग में ऐसे लोगों की छवि प्रभू के दूत की बन जाती है इसीलिए उनकी बेजा हरकतें भी उन्हें नागवार नहीं गुजरतीं। 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

युद्ध-रत, कर्ण-घटोत्कच की अद्भुत प्रतिमा

राजस्थान के कुशल कारीगर तो सदा पाषाण में प्राण फूँकते रहे हैं।  उनके द्वारा निर्मित एक से एक उत्कृष्ट कलाकृतियां देश-विदेश में सराहना पाती रही हैं। ऐसी ही एक 2013 में निर्मित एक शानदार, विलक्षण, अद्भुत, वृहदाकार प्रतिमा राजस्थान के कोटा शहर के महावीर नगर 3 और रंगबाड़ी इलाके के एक चौराहे पर स्थित है। जिसमें महाभारत के उस पल को अतीत की गहराइयों से निकाल यादगार बना दिया गया है, जब कर्ण ने घटोत्कच के युद्ध-तांडव से कौरव सेना को बचाने के लिए, अर्जुन के वध के लिए संभाल कर रखे "शक्ति बाण" का प्रयोग कर वीर घटोत्कच का वध किया था।
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पूरी की पूरी मूर्ति ही अद्भुत है। जिसके एक-एक इंच पर कारीगरों की कला सजीव हो उठी है। इसकी भव्यता तो सिर्फ देख कर ही महसूस की जा सकती है उसका वर्णन करना मुश्किल है। ऎसी ही एक प्रतिमा बाली, इंडोनेशिया में भी स्थापित की गयी है।      

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

मकर सक्रांति, सूर्य के उत्तरायण के अलावा भी महत्वपूर्ण है

बाप-बेटे में कितनी भी अनबन क्यों ना हो रिश्ते तो रिश्ते ही रहते हैं। अपने फर्ज को निभाने और दुनियां को यह 
समझाने के लिए मकर सक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश कर उनका भंडार भरते हैं। इससे उनका मान घटता नहीं बल्कि और भी बढ़ जाता है। इसीलिए इस दिन को पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है   
   
वैसे तो हमारे सभी त्योहार अपना विशेष महत्व रखते हैं।  लेकिन मकर सक्रांति का धर्म, दर्शन तथा खगोलीय दृष्ट‌ि से विशेष महत्व है।   ज्योत‌िष और शास्‍त्रों में हर  महीने को दो  भागो में बांटा गया है, कृष्ण पक्ष और शुक्ल 
पक्ष। जो चन्‍द्रमा की गत‌ि पर न‌िर्भर होता है। इसी तरह वर्ष को भी दो भागो में बांटा गया है, जो उत्तरायण और दक्षिणायन कहलाता है और यह सूर्य की गत‌ि पर न‌िर्भर होता है। मकर सक्रांति के दिन से सूर्य धनु राशि से मकर राश‌ि में प्रवेश कर उत्तर की ओर आने लगता है। धनु राश‌ि में सूर्य का आगमन मलमास के तौर पर जाना जाता है।  इस राश‌ि में सूर्य के आने से मलमास समाप्‍त हो जाता है। यह एकमात्र पर्व है जिसे समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। 
बाप-बेटे में कितनी भी अनबन क्यों ना हो रिश्ते तो रिश्ते ही रहते हैं। अपने फर्ज को निभाने और दुनियां को यह 
समझाने के लिए मकर सक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश कर उनका भंडार भरते हैं। इससे उनका मान घटता नहीं बल्कि और भी बढ़ जाता है। इसीलिए इस दिन को पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है।  इस अवधि को विशेष शुभ माना जाता है और सम्पूर्ण भारत में मकर सक्रांति का पर्व सूर्य उपासना के रूप में मनाया जाता है। मकर सक्रांति के दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्री तथा उतरायन को उनका दिन माना गया है इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रिया-कलापों का विशेष महत्व माना गया है |   
सूर्य के उत्तरायण होने के अलावा और भी कई कारणों से यह दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। भगवान कृष्ण ने गीता में भी सूर्य के उत्तरायण में आने का महत्व बताते हुए कहा है कि इस काल में देह त्याग करने से पुर्नजन्म नहीं लेना पड़ता और इसीलिए महाभारत काल में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण में आने पर ही देह त्याग किया था। ऐसा माना जाता है कि सूर्य के उत्तरायण में आने पर सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पूरी तरह से पड़ती है और यह धरा प्रकाशमय हो जाती है। इस दिन लोग सागर, पवित्र नदियों और सरोवरों में सूर्योदय
गंगा सागर 
से पहले स्नान करते हैं और दान इत्यादि कर पुण्य-लाभ प्राप्त करते हैं। 
पुराणों के अनुसार भगवान राम के पूर्वज व गंगा को धरती पर लाने वाले राजा भगीरथ ने इसी दिन अपने पूर्वजों का तिल से तर्पण किया था। तर्पण के बाद गंगा इसी दिन सागर में समा गई थी, इसीलिए इस दिन गंगासागर में मकर सक्रांति के दिन मेला लगता है।

इसी दिन भगवान विष्णु और मधु-कैटभ युद्ध समाप्त हुआ था और प्रभू मधुसूदन कहलाने लगे थे। 

माता दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर वध करने के लिए धरती पर अवतार लिया था। 
मकर सक्रांति तब ही मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य का प्रति वर्ष धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश बीस मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद यह क्रिया एक घण्टे की देर यानी बहत्तर साल में एक दिन की देरी से संपन्न होती है।  इस तरह देखा जाए तो लगभग एक हजार साल पहले मकर सक्रांति 31 दिसम्बर को मनाई गई होगी। पिछले एक हजार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने से यह 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा हे कि पाॅंच हजार साल बाद मकर सक्रांति फरवरी महीने के अंत में जा कर हो पाएगी। 

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

धार्मिक स्थल और दर्शनार्थियों का पहनावा (ड्रेस कोड)

 मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ  और ऐसे ही धार्मिक - स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए         


जब से तिरुवंतपुरम के पद्मनाभ मंदिर के न्यास ने मंदिर में प्रवेश करने वालों के लिए खास पहनावा निर्धारित किया है तब से ही एक अनावश्यक बहस छिड़ गयी है। विडंबना है कि बाहर से आने वाले विदेशियों को इससे कोई शिकायत नहीं है वे जैसे भी हो इस नियम का भरसक पालन करते हैं, क्योंकि उनके आचरण में, उनकी आदत में अनुशासन शामिल होता है, वे दूसरे की भावनाओं का आदर करते हैं। मिर्ची हमें ही लगती है। हमारी आदत हो चुकी है नियम तोडना, कानून का उल्ल्ंघन करना, मान्यताओं का मजाक उड़ाना। दुर्भाग्यवश इसे आधुनिकता का पर्याय मान लिया गया है और इसके लिए लिए आड़ ली जाती है व्यक्तिगत स्वतंत्रता की। 
         
एक दो दिन पहले राजधानी के एक अग्रणी समाचार पत्र में "Who says god likes topless men but not jeans "? शीर्षक के साथ एक लेख छपा था। उसमें विद्वान लेखक ने बताया था कि कैसे ढीले कपड़ों में लोग असुविधा महसूस करते हैं। कैसे दौड़ते-भागते पास की दुकानों से कपडे ख़रीदते हैं।  कैसे उनका ध्यान पूजा में नहीं अपने  कपड़ों को संभालने में लगा रहता है ! ऐसे लोगों को क्या उत्तर दिया जाए ? इनको तो मालुम ही होगा कि चर्च में भी घुटनों और कंधों को ढक कर ही अंदर जाया जाता है।  लोग खुद ही आदर की भावना के तहत इस बात का ध्यान रखते हैं कि बिना आस्तीन के, बहुत तंग, टी शर्ट, मिनी स्कर्ट, या अधोवस्त्र दिखें ऐसे कपडे पहन कर प्रार्थना करने ना जाया जाए। कई जगह तो भले ही घंटों कतार में खड़े होने के बाद अंदर जाने का नंबर आया हो, यदि आगंतुक ने ढंग के कपडे न पहने हों तो उसे बाहर कर दिया जाता है। वहां तो कभी भी कोई हो-हल्ला नहीं करता ! कभी कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता का डंडा घुमाता अंदर जाने की जिद नहीं करता। 

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ और ऐसे ही धार्मिक स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। क्या कभी किसी ने मस्जिद में चलताऊ वस्त्र पहने किसी को देखा है ? वहां का चलन है कि शरीर का जितना ज्यादा से ज्यादा भाग ढका जा सके, ढक कर ही सजदा किया जाए। क्या गुरुद्वारों में बिना सर और शरीर ढके कोई जाता है ? वहां भी यदि किसी के पास उचित वस्त्र नहीं हैं तो वे उपलब्ध करवाए जाते हैं। नियम सबको मानना ही है। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए।   

वैसे तो अधिकांश पर्यटक अपने गंतव्य की पूरी जानकारी ले कर ही घूमने निकलते हैं, उन्हें हर जगह के नियम-
कानूनों की जानकारी होती है। कभी-कभी किसी गाइड की लापरवाही से हो सकता है कि किसी परेशानी का सामना करना पड़ जाता हो। पर वे अपनी असुविधा को भी खेल भावना से ही लेते हैं। उनके उलट हम जैसे ज्यादातर स्थानीय घुमक्कड़ पैसा बचाने के लिए कभी गाइड का सहारा नहीं लेते, ना ही हम अपने देश में कहीं जाते हुए उस जगह की जानकारी लेने की आवश्यकता समझते हैं। हमारा ज्यादातर प्रवास लोगों की बातों और "देखा जाएगा" कि भावना पर आधारित होता है। इसीलिए कहीं जब कोई बात हमें अपने मन-मुताबिक नहीं मिलती तो हम आक्रोशित हो जाते हैं। अधकचरे ज्ञान, अपूर्ण जानकारी और विदेशी सभ्यता के अंधानुकरण से धीरे-धीरे जैसा माहौल बनता जा रहा है, या बनाया जा रहा है उसके चलते अपनी संस्कृति, अपने रस्मो-रिवाज, अपनी मान्यताओं का मजाक उड़ाना या विरोध करना आजकल आधुनिकता और फैशन का प्रतीक बन गया है। उदहारण स्वरूप जैसे शिंगणापुर के शनिदेव के चबूतरे पर महिलाओं के चढने पर प्रतिबंध की बात है, तो हो सकता है कि उस समय के महिलाओं के वस्त्रों को ध्यान में रखते हुए तेल के कारण रपटीली सतह पर उनकी सुरक्षा को ध्यान में रख कर ही वैसा नियम बनाया गया हो !  इसलिए जरुरत है कि पुराने तौर-तरीकों का सही और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद ही उसकी आवश्यकता या अनुपयोगिता का निर्धारण किया जाए। न की जोश में किसी के दवाब में आ कोई भी फेर बदल कर दिया जाए। 

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भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...