pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 30 नवंबर 2009

आयोडीन नमक जरूरी है क्या ?

सवाल बहुत देर से उठ रहा है। पर है सोचने लायक। सदियों से साधारण नमक खाते-खाते, क्या सचमुच ही हमें अब आयोडीन की जरूरत आन पड़ी थी?
या यह सब एक सोची समझी साजिश के तहत ही हुआ था और रुपये का दो किलो मिलने वाला नमक आज दस रुपये किलो में लोग लेने को मजबूर कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले आप सब को याद होगा, ऐसा ही एक षड्यंत्र सरसों के तेल को लेकर भी रचा गया था। उसी सरसों के तेल को जिसका उपयोग हमारे यहाँ पता नहीं कब से होता आया है और बहुत से परिवारों में तो बना इस तेल के भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

मनुष्य के शरीर को आयोडीन चाहिए, पर कितना? आप सब के विचार जानना चाहता हूँ। असलियत कल।

रविवार, 29 नवंबर 2009

पढ़ कर देखिए आनन्द आयेगा

एक धर्मोपदेशक घूम-घूम कर लोगों को उपदेश दिया करते थे। ऐसे ही एक दिन वह एक गांव में जा पहुंचे। सारे गांव वाले अपने-अपने खेतों पर काम करने जा चुके थे। सिर्फ एक जना उनको मिला जो उन्हें गांव के पंचायत भवन में ले गया। उन्हें वहां ठहरा कर उस गांव वाले ने उनका परिचय और आने का कारण जाना। संत महोदय कुछ उलझन में थे, वह वहां ज्यादा रुक भी नहीं सकते थे और बिना उपदेश दिये आगे जाना भी उन्हें गवारा नहीं था। उन्हें सोच में पड़ा देख गांव वाले ने उनकी परेशानी का कारण जानना चाहा तो संतजी ने बताया कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप यहां अकेले हो तो मुझे प्रवचन देना चाहिये या नहीं। यह सुन गांव वाला बोला, महाराज मैं तो निपट गंवार आदमी हूं फिर भी इतना जानता हूं कि यदि मैं अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां सिर्फ एक जानवर के सिवा सारे पशु भाग गये हैं तो भी मैं उस जानवर को चारा जरूर दूंगा? संतजी की दुविधा दूर हो गयी और वे पूरे तीन घंटे तक अपना उपदेश देते रहे। फिर अपनी बात खत्म कर उन्होंने अपने एक मात्र श्रोता से पूछा, हां भाई कैसा रहा आज का प्रवचन?
गांव वाले ने तुरंत जवाब दिया, महाराज मैने तो पहले ही आप से कहा था कि मैं तो निपट गंवार इंसान हूं इतनी ज्ञान की बातें मुझे कहां पता। फिर भी इतना तो मुझे पता है कि अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां एक को छोड़ सारे जानवर भाग गये हैं तो उसे मैं उसी का चारा दूंगा, सारे जानवरों की घास उसी अकेले को ही नहीं खिला दूंगा।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

सुमधुर ध्वनि बिखेरती अद्भुत चट्टाने

राजस्थान की सुप्रसिद्ध पर्वत माला अरावली।
बांसवाड़ा जिले से करीब बीस कि.मी. की दूरी पर इसी पर्वतमाला के उपर स्थित है माता नन्दिनी देवी का मंदिर। इसी मंदिर की पिछली तरफ हैं चार चट्टानें। जो प्रकृति का एक अद्भुत करिश्मा हैं।
पर्वत शिखर पर च्ट्टानें तो बहुत सारी बिखरी पड़ी हैं। पर यह चार शिलाखंड़ अपने आप में अद्भुत विलक्षणता समेटे हैं। इसे प्रकृति का अनोखा करिश्मा समझें या कुछ और क्योंकि ये चट्टाने अपने आस-पास की चट्टानों से बिल्कुल अलग हैं। इनकी खासियत है कि यदि इन पर किसी चीज से प्रहार किया जाय तो इनमें से अलग-अलग तरह की खनकने की ध्वनि निकलती है। ऐसा लगता है जैसे किसी धातु के बने पिंड़ पर चोट की जा रही हो। एक तरफ जहां इनमें से एक चट्टान के स्वरुप ने वर्षों से तरह-तरह के मौसमों के कारण एक गोलाकार शिवलिंग का आकार ले लिया है, जिस पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं ने इसको दैविय प्रतीक मान पूजा-अर्चना करनी शुरु कर दी है, तो वहीं दूसरी तरफ यहां आने वाले लोगों को घंटों इन चट्टनों को वाद्य यंत्रों की तरह प्रयोग कर भजन, गीत गाते देखा सुना जा सकता है। इन चट्टानों को लेकर तरह-तरह के मत हैं। कुछ कहते हैं कि इनमें किसी धातु की अत्यधिक मात्रा मिली हुई है जिस कारण यह खनक भरी ध्वनि उत्पन्न करती हैं तो किसी की राय में इनका खोखला होना इस तरह की मधुर ध्वनि उत्पन्न करने का कारण है। कुछ इन्हें उल्का पिंड़ मानते हैं क्योंकि सिर्फ यह चार चट्टानों से ही मधुर ध्वनि नकलती है आसपास की बाकि चट्टानें आम शिलापिंडों जैसी ही हैं।

प्रकृति की इस अद्भुत देन के अनबूझे रहस्य से फिलहाल तो पर्दा नहीं उठा है पर प्रयास जारी हैं।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

"ताजमहल" नाम है स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का. इसीलिए ठीक एक साल पहले......

"ताज महल" सिर्फ एक होटल ही नहीं है, अब वह स्वाभिमान, गौरव तथा आस्था का प्रतीक बन चुका है। शायद इसीलिए ठीक एक साल पहले...................................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान।

उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबई में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा।

विदेशों में आज भारत के दो ताजमहलों की अपनी पहचान है। एक नारी के सम्मान का प्रतीक है तो दूसरा शहर के गौरव का प्रतीक।

आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

बंबई , रात धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। ऐसे में दो भद्र पुरुष बातें करते करते रात के भोजन के लिये पर्क के अपोलो होटल की ओर बढ रहे थे। जब वे होटल के प्रवेश द्वार पर पहुंचे तो द्वारपाल ने उनमें से एक को इंगित करते हुए कहा, महोदय आपके मित्र का स्वागत है, पर मुझे खेद है कि आप अंदर नहीं जा सकते। जिसे मना किया गया था वह थे जमशेदजी टाटा और उन्हें रोकने का कारण था उस होटल में युरोपियन के सिवा और किसी को प्रवेश नहीं देने का प्रावधान। उसी क्षण जमशेदजी ने निर्णय लिया कि वह अपने इसी शहर में एक ऐसा होटल बनायेंगे जो संसार के सर्वश्रेष्ठ होटलों में से एक होगा। जिसमें किसी तरह की रोक-टोक नहीं होगी। जिसमें आम इंसान भी बिना विदेश गये विदेशी भव्यता का अनुभव कर सकेगा। हालांकि उन्हें इस व्यवसाय का कोई अनुभव नहीं था। पर जो ठान लिया सो ठान लिया। उन्होंने अपोलो बंदर के पास जमीन खरीद कर होटल, जिसका नाम उन्होंने ताजमहल रखा था, का निर्माण शुरु करवा दिया। उन्होंने सोच रखा था कि इस इमारत की हर बात अनोखी होगी। अनोखा रंग, अनोखा ढंग, अनोखी साज-सज्जा, अनोखा कला संग्रह। शुरुआत भी हुई 40 फिट की नींव से, जो उस जमाने में हैरत की बात थी। अंतत: 1903 में सत्रह मेहमानों के साथ होटल "ताजमहल" का विधिवत उद्घाटन संम्पन्न हुआ।
जमशेद जी ने अपने इंजीनियरों को हिदायत दे रखी थी कि होटल का शिल्प ऐसा होना चाहिये कि उसके हर कमरे में समुद्री वायु आराम से परवाज कर सके। साथ ही हर कमरे में रहने वाले को समुद्र के बिल्कुल करीब होने का एहसास हो। सचमुच ताज की खिड़की में खड़े होने पर यही एहसास होता है जैसे हाथ बढा कर सागर को छुआ जा सकता हो। हर कमरे से समुद्र अपनी भव्यता के साथ नज़र आता है। जमशेदजी की दूरदर्शिता इसी से जानी जा सकती है कि उन्होंने भविष्य में सागर की ओर होने वाली भीड़-भाड़ को ध्यान में रख ताज का मुख्य द्वार पीछे की ओर बनवाया था। उनके लिये यह पैसा कमाने का जरिया ना होकर देश की धरोहर का ख्याल ज्यादा था। जहां हर देश वासी बेरोकटोक आ सके। वे जब भी विदेश जाते वहां ताज को ही ध्यान में रख खरीदारी करते। उन्होंने पैसे की परवाह किये बगैर ऐसी-ऐसी चीजें वहां से भारत भेजीं जिनका नाम भी यहां ना सुना गया था। जिनमें एक बिजली का जेनेरेटर भी था। उस समय बंबैइ में बिजली की रौशनी वाली यह पहली इमारत थी। इसको बाहर से देखने के लिये ही दूर-दूर से लोग आते थे। इसके बनने और शुरु होने के बाद भी बहुत सारी अड़चनों का सामना जमशेद जी को करना पड़ा था। बहुतेरी बार इसकी आमदनी बिल्कुल ना के बराबर हो गयी थी। और कोई होता तो वह इसे बेचने का फैसला कर चुका होता पर यह जमशेदजी ही थे जो इसे भारत का ताज बनाना चाहते थे इसे बेचने का ख्याल उन्हें सपने में भी नहीं आया। उस समय जब संचार व्यवस्था ना के बराबर थी उन्होंने विदेशों के यात्रा एजेंटों से संपर्क बनाये रखा, फिर एक समय ऐसा आया कि विदेश से आने वाले पर्यटक की लिस्ट में यहां ठहरने का कार्यक्रम वरीयता सूची में होने लगा। आज सौ से ज्यादा उपन्यासों, यात्रा विवरणों आदि में ताज का उल्लेख मिलता है। विश्व की जानी-मानी हस्तियां यहां आकर भारतीय सत्कार का आनंद ले चुकी हैं। सातवें दशक में इसी का एक और नया भाग ‘ताज इंटकांटिनेंटल’ भी बन कर तैयार हो गया था। अब तो ताज की श्रृंखला पूरे देश में फैलती जा रही है।
ये सिर्फ होटल नहीं इंसान की आस्था, स्वाभिमान और देश के गौरव का प्रतीक है। शायद इसीलिये ठीक एक साल पहले.................

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

ये भी खूब रही :) :) :)

एक कबीले के मुखिया के मर जाने पर उसके शहर से आये बेटे को मुखिया बना दिया गया। ठंड आने के पहले कबीले वाले उसके पास गये और पूछा कि इस बार कैसी ठंड पड़ेगी? कबीले के मुखियों को पीढी दर पीढी से चले आ रहे तजुर्बों से आने वाले मौसम इत्यादि की जानकारी होना आम बात थी। अब जवान मुखिया को इतना तजुर्बा तो था नहीं ना ही उसने इस तरह की बातें अपने बुजुर्गों से सीखी थीं। उसने ऐसे ही कह दिया कि ठीक-ठाक सर्दी पड़ेगी। आप लोग लकड़ियां इकठ्ठी कर लो। कह तो दिया पर फिर भी कुछ अंदाज लेने के लिये वह मौसम विभाग चला गया, वहां उसने पूछा कि इस बार सर्दी कैसी होगी? उन्होंने कहा ठीक-ठाक ही पड़ेगी। लौट कर उसने अपने लोगों से और लकड़यां एकत्र करने को कह दिया। हफ्ते दस दिन बाद फिर अपनी बात सुनिश्चित करने के लिये मुखिया मौसम विभाग गया और पूछा, क्या कहते हैं आप लोग ठंड पड़ेगी ना? वहां से जवाब मिला एकदम पक्की पड़ेगी। लड़के ने वापस आ अपने लोगों को और लकड़ियां एकत्र करने को कह दिया। पर मन ही मन वह अपनी अनभिज्ञता से घबड़ाया हुआ भी था कि कहीं मेरी बात गलत हो गयी तो लोग क्या कहेंगे। सो एक बार फिर वह मौसम विभाग पहुंच गया और बोला, आपकी खबर सर्दी के बारे में पक्की है ना? वहां के अफसर ने जवाब दिया, पक्की? अरे, इस बार रेकार्ड़ तोड़ सर्दी पड़ेगी। युवा मुखिया ने चकित हो पूछा, आप इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहे हैं?क्योंकि कबीले वाले पागलों की तरह अंधाधुन लकड़ियां इकठ्ठी किये जा रहे हैं भाई, इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिये।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

बिना इन्टरनेट के हिंदी लिखने में सहायता करें

आज मुझसे सुश्री नेहा जी, जो अपना ब्लाग शुरु करना चाहती हैं, ने ई मेल द्वारा, बिना इंनटरनेट हिंदी लिख सकने की जानकारी चाही है। मेरी आप सब से गुजारिश है कि ऐसा सबसे सरल तरीका बताने का कष्ट करें, जिसमें सारे के सारे हिंदी के शब्द (संयुक्ताक्षर वगैरह) आसानी से लिखे जा सकें। जिससे हिंदी ब्लाग परिवार में एक और नया सदस्य शामिल हो सके।

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