शनिवार, 5 सितंबर 2009

हिंदी लिखने के लिये hindikalam.com आजमा कर देखें।

बहुत बार देखा है कि किसी-किसी पोस्ट पर अनेक वर्तनी की गल्तियां होती हैं। जो लिखने वाले वाले से नहीं लिखवाए जाने वाले माध्यम की सिमितताओं  का नतीजा होती हैं। आज पाबला जी की पोस्ट पर अच्छी जानकारी थी। पर hindikalam.com का जिक्र मैंने कहीं नहीं पाया। मैं इसी माध्यम का उपयोग करता हूं, और मुझे लगता है कि इस पर लिखने से हिंदी के एक-दो शब्दों को छोड़ सारे कलिष्ट शब्द भी लिखे जा सकते हैं। । साथ ही यह है भी बहुत आसान। एक बार तो आजमाया ही जा सकता है।
हाँ, कापी-पेस्ट की जहमत तो उठानी पड़ेगी।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

जमजम का पानी, रेगिस्तान में कुदरत का करिश्मा

प्रकृति के अनगिनत चमत्कारों में से एक है सऊदी अरब के शहर मक्का का एक कुआं। यह पवित्र धर्मस्थल काबा के पास स्थित है। जैसे हर हिंदु की अभिलाषा रहती है कि उसके घर में सदा गंगाजल रहे वैसे ही हर मुसलमान की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि इस कुएं का पानी उसके घर में हो।
इस कुएं का नाम है जमजम। घोर आश्चर्य की बात है कि मीलों फैले रेगिस्तान में जहां सिर्फ रेत ही रेत है वहीं यह कुआं लाखों लोगों की पानी की जरुरतों को पूरा करता है। मक्का और मदीना के लोग तो इसका पानी लेते ही हैं, हज के समय हर वर्ष वहां लाखों की तादाद में जाने वाले यात्रियों की जल की आवश्यकता को भी यही कुआं पूरा करता है। इसके अलावा लौटते वक्त भी सभी हाजियों की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि वे अपने साथ इस कुएं का ज्यादा से ज्यादा पानी ले जा सकें। जिससे इसको अपने सगे-संबंधियों और मित्रों में बांटा जा सके। इसके वितरण से पुण्य का लाभ मिलता है। ऐसी धारणा है।
इस 14x18x6 फिट के आकार वाले कुएं के पानी की खासियत है कि वह कभी खराब नहीं होता। और यह कुदरत का चमत्कार ही है कि इसमें से चाहे कितना भी पानी निकल जाये पर यह ना तो सूखता है नाही खाली होता है। मरुस्थल में यह कुआं इंसानों के लिये एक वरदान ही तो है।

बुधवार, 2 सितंबर 2009

संगीतकार नौशाद को अपनी शादी दर्जी बन कर करनी पडी थी

कल्पना कीजिए की जिसने अपने संगीत से सारे भारत में धूम मचा रखी थी , उसे ही अपनी शादी दर्जी बन कर करनी पड़ रही थी।

आज के समय में गीत-संगीत, नाच-गाना प्रतिभा की पहचान के रूप में देखे जाते हैं। किसी का भी बच्चा जरा ठुमक कर क्या चल लिया या किसी फिल्मी गाने की नकल कर भर ली तो उसके मां-बाप उसे किसी मंच पर पहुंचाने के लिये आतुर हो उठते हैं। फिर चाहे बच्चे को सरगम का 'सा' या नाच का 'ना' का पता भी ना हो। पर कुछ ही सालों पहले की बात है जब इन कलाओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। मां-बाप इन विधाओं के सख्त खिलाफ हुआ करते थे। इसी सब के चलते संगीतकार नौशाद को कैसी-कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, सुनिये उन्हीं की जुबानी :-


"मां ने मेरी शादी पक्की कर लखनऊ बुलवा लिया। तैयारियों के बीच एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा, बेटा ससुराल में किसी को पता नहीं चलना चाहिये कि तुम गाने बजाने का काम करते हो। मैं आश्चर्य में पड़ गया और पूछा, ऐसा क्यों अम्मी? तो अम्मी ने कहा कि मैंने सब को कह रखा है कि मेरा बेटा बंबई में दर्जी का काम करता है। अगर मैं बता देती कि तू गाने बजाने का काम करता है तो तेरी शादी ही तय नहीं होनी थी। तेरी ससुराल वाले सूफी किस्म के लोग हैं। मैं मां की बात मानने को मजबूर था। पर मन में एक प्रश्न घुमड़ रहा था कि क्या संगीत का काम इतना घटिया है कि एक दर्जी उस पर भारी पड़ रहा है। फिर उसके बाद जो हुआ उसका आप अंदाज लगा मेरी हालत समझ सकते हैं। 

उन्हीं दिनों फिल्म "रतन" रिलीज हुई थी और उसके मेरे द्वारा निर्देशित गाने सारे हिंदुस्तान में धूम मचा रहे थे। तो जब मेरी बारात चली तो बैंड वालों ने उसी फिल्म के गाने बजाने शुरु कर दिये। लड़की वालों के यहां भी शहनाई पर "रतन" के गानों की बहार थी और मैं दर्जी बना निकाह की रस्में पूरी कर रहा था।"
बाद में जब नौशाद साहब की श्रीमतीजी बंबई आयीं तो उन्हें पता चला कि उनके शौहर मशहूर संगीतकार हैं।

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

बाप रे !!! इतना झगडालू चिडिया परिवार

इनकी करतूतों से सभी भर पाए हैं और इनके जाने का इंतजार कर रहे हैं। जिससे फिर साफ-सफाई कर इस नर्सिंग होम को बंद किया जा सके। पर इस सबसे एक बात तो साफ हो गयी कि चिड़ियों में भी इंसानों जैसी आदतें होती हैं। कोई शांत स्वभाव का होता है, कोई सफाई पसंद और कोई गुस्सैल, चिड़चिड़ा और झगड़ालू............!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग
मेरे कार्यालय में बीम और मीटर बाक्स के कारण बनी एक संकरी सी जगह में चिड़ियों के घोंसले के लिये बेहतरीन जगह बन गयी है। इसी कारण पिछले तीन साल से वहां कयी परिवार पलते आ रहे हैं। बना बनाया नीड़ है, नर्सिंग होम की तरह जोड़े आते हैं, शिशु पलते हैं और फिर उड़न छू।

पहली बार जो जोड़ा आया उसने जगह देखी-भाली और तिनका-तिनका जोड़ अपना ठौर बना लिया। सफाई कर्मचारी बनते हुए घर को साफ कर देते पर यह "Encroachment" दो दिनों की छुट्टियों के बीच हुआ था, जिसे हटाने की किसी की इच्छा नहीं हुई। उस पहले जोड़े ने आम चिड़ियों की तरह अपना परिवार बढाया और चले गये। उनके रहने के दौरान एक बार उनका नवजात नीचे गिर गया था जिसे बहुत संभाल कर वापस उसके मां-बाप के पास रख दिया गया था। वैसे रोज कुछ तिनके बिखरते थे पर उनसे किसी को कोई तकलीफ नहीं थी साफ-सफाई हो जाती थी। दूसरी बार तो पता ही नहीं चला कि कार्यालय में मनुष्यों के अलावा भी किसी का अस्तित्व है। लगता था वह परिवार बेहद सफाई पसंद है, न कोई गंदगी, ना शोर-शराबा। सिर्फ बच्चे की चीं-चीं तथा उसके अभिभावकों की हल्की सी चहल-पहल। कब आये कब चले गये पता ही नहीं चला। तीसरा जोड़ा नार्मल था। मां-बाप दिन भर अपने बच्चे की मांगपूर्ती करते रहते। तिनके वगैरह जरूर बिखरते थे पर इन छोटी-छोटी बातों पर हमारा ध्यान नहीं जाता था। पर एक आश्चर्य की बात थी कि और किसी तरह की गंदगी उन्होंने नहीं फैलाई। शायद उन्हें एहसास था कि वैसा होने से उसका प्रतिफल बुरा हो सकता है।

पर अब पिछले दिनों जो परिवार आया है, जिसके कारण ये पोस्ट अस्तित्व में आई, वह तो अति विचित्र है। सबेरे कार्यालय खुलते ही ऐसे चिल्लाते हैं जैसे हम उनके घर में अनाधिकार प्रवेश कर रहे हों। आवाज भी इतनी तीखी कि कानों में चुभती हुई सी प्रतीत होती है। बार-बार काम करते लोगों के सर पर चक्कर लगा-लगा कर चीखते रहते हैं दोनो मियां बीवी। इतना ही नहीं कयी बार उड़ते-उड़ते निवृत हो स्टाफ के सिरों और कागजों पर अपने हस्ताक्षर कर जाते हैं। उनके घोंसले के ठीक नीचे फोटो-कापियर और टाइप मशीनें पड़ी हैं। जिन्हें रोज गंदगी से दो-चार होना पड़ता है। अब जैसा जोड़ा है वैसा ही उनका नौनीहाल या नौनीहालिनी जो भी है। साहबजादे/दी रोज ही घूमने निकले होते हैं। दो दिन पहले टाइप मशीन में फंसे बैठे थे, किसी तरह हटा कर उपर रखा। कल पता नहीं कैसे फोटो-कापियर में घुस गये, वह तो अच्छा हुआ कि चलाने वाले ने गंदगी साफ करते उनकी झलक पा ली, नहीं तो वहीं 'बोलो हरि' हो गयी होती। बड़ी मुश्किल से आधे घंटे में उन्हें बाहर निकाला जा सका।

इनकी करतूतों से सभी भर पाए हैं और इनके जाने का इंतजार कर रहे हैं। जिससे फिर साफ-सफाई कर इस नर्सिंग होम को बंद किया जा सके। पर इस सबसे एक बात तो साफ हो गयी कि चिड़ियों में भी इंसानों जैसी आदतें होती हैं। कोई शांत स्वभाव का होता है, कोई सफाई पसंद और कोई गुस्सैल, चिड़चिड़ा और झगड़ालू।
आपका क्या एक्सपीरीयेंस है ? (-:

शनिवार, 29 अगस्त 2009

पानी बरसाने का ऐसा जादू न कभी देखा न सुना

अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :-

काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है?  क्या वे लोग भी जादू-टोना जानते हैं ? क्या हमारे काले जादू से उनका सफेद जादू ज्यादा शक्तिशाली है ? ऐसी ही जिज्ञासाओं का उत्तर पाने के लिये सुदूर अफ़्रिका का एक ओझा इंगलैंड जा पहुंचा। उसके स्वदेश लौटने पर लोगों ने उसे घेर कर उसकी यात्रा का परिणाम जानना चाहा। उसने सबकी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिये सबको अपने घर बुलाया और अपनी दास्तान सुनानी शुरु की, वह बोला, निश्चित रूप से उनका सफेद जादू हमारे काले जादू से बेहतर है। यह मैने अपनी आंखों से देखा है। सारे लोगों की आँखें भी कान बन गयीं। सभी ने सिमट कर उसे घेर लिया।   

ओझा ने कहना शुरू किया, घूमते-घूमते मैं गोरों के देश इंग्लैण्ड जा पहुंचा। वहीँ एक दिन देखा कि लोग एक मैदान की ओर जा रहे हैं।  मैं भी उत्सुकतावश वहाँ चला गया, देखा कि मैदान के चारों ओर सैंकड़ों लोग गोल घेरा बना कर बैठे हुए थे। आकाश बिल्कुल साफ था, बादलों का नामोनिशान नहीं था। नीचे सुंदर हरी घास बिछी हुई थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इतने लोग किसका इंतजार कर रहे हैं। तभी कहीं से एक आदमी ने आकर मैदान के बीचो-बीच तीन लकड़ियां गाड़ दीं।  फिर उसने कुछ कदम नाप कर उन लकड़ियों के सामने तीन और लकड़ियां गाड़ दीं। इसके तुरंत बाद एक तरफ से दो आदमी जिन्होंने टोपी और सफ़ेद कोट पहन रखे थे, आये और झुक कर उन गड़ी हुई लकड़ियों पर दो-दो छोटे टुकड़े रख दिये। इसके बाद जिधर से कोट वाले आये
थे उधर से ही कुछ और लोग मैदान में आ जगह-जगह बिखर कर खड़े हो गये। मैने गिना वह ग्यारह की संख्या में थे। तभी उसी दिशा से दो और आदमी अजीब सी चीजों को शरीर पर धारण कर, एक-एक लकड़ी का चौड़ा सा डंडा हाथ में लिए आए और मैदान के बीचो-बीच पहले से दो जगह गड़े ड़ंड़ों के पास एक-एक कर खड़े हो गये।  फिर उन्होंने इधर-उधर, उपर-नीचे देखा और उनमें से एक हाथ की लकड़ी के सहारे झुक कर खड़ा हो गया। अब एक आदमी ने एक लाल गेंद निकाली और अपनी सफेद पैंट पर रगड़ने लगा। फिर उसने दौड़ते हुए आकाश की ओर हाथ उठा अजीबोगरीब तरीके से वह गेंद डंडा ले झुके हुए आदमी की ओर फेंक दी। लकड़ीवाले आदमी ने जोर से अपनी लकड़ी से गेंद को उपर आकाश में उछाल दिया और उसी समय ऐसा पानी बरसना शुरु हुआ जो घंटों बरसता रहा। पानी बरसाने का ऐसा जादू ना कभी मैने देखा था ना सुना था। इसीलिये कहता हूं कि हमारे काले जादू से उनका सफेद जादू ज्यादा बेहतर है। इसी की बदौलत वे संसार पर राज करते हैं। 

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

स्वर्ग की आत्माओं के क्रैश कोर्स के लिए पृथ्वी का निर्माण हुआ

धीरे-धीरे स्वर्ग में रहनेवाले वहां के "मनटनस" जिंदगी और दिनचर्या से ऊबने लग गये थे। वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना चुस्ती। समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन। फिर वही हुआ जो होना था। सुख का आंनद भी तभी महसूस होता है जब कोई दुख: से गुजर चुका होता है।
अब स्वर्ग में निवास करने वाली आत्माएं जो परब्रह्म में लीन रह कर उन्मुक्त विचरण करती रहती थीं, उन्हें क्या पता था कि बिमारी क्या है, दुख: क्या है, क्लेश क्या है, आंसू क्यों बहते हैं, बिछोह क्या होता है, वात्सल्य क्या चीज है ममता क्या है। भगवान भी वहां के वाशिंदों की मन:स्थिति से वाकिफ थे। वैसे भी वहां की बढती भीड़ ने उनके काम-काज में रुकावट डालनी शुरु कर दी थी। सो उन्होंने इन सब ऊबे हुओं को सबक सिखाने के लिये एक "क्रैश कोर्स" की रूपरेखा बनाई। इसके तहत सारी आत्माओं को स्वर्ग से बाहर जा कर तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे। इसके लिये एक रंगमंच की आवश्यकता थी सो पृथ्वी का निर्माण किया गया। वहां के वातावरण को रहने लायक तथा मन लगने लायक बनाने के लिये मेहनत की गयी। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रख उसे अंतिम रूप दे दिया गया। पर आत्माओं पर तो कोई गति नहीं व्यापति इसलिये उन्हें संवेदनशील बनाने के लिये एक माध्यम की जरूरत महसूस हुई इस के लिये शरीर की रचना की गयी जिसमें स्वर्ग के एक क्षणांश की अवधि में रह कर हरेक को तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे।
अब हर आत्मा का अपना नाम था, अस्तित्व था, पहचान थी। उसके सामने ढेरों जिम्मेदारियां थीं। समय कम था काम ज्यादा था। पर यहां पहुंच कर भी बहुतों ने अपनी औकात नहीं भूली। वे पहले की तरह ही प्रभू को याद करती रहीं। कुछ इस नयी जगह पर बने पारिवारिक संबंधों में उलझ कर रह गयीं। पर कुछ ऐसी भी निकलीं जो यहां आ अपने आप को ही भगवान समझने लग गयीं।
अब इन सब के कर्मों के अनुसार भगवान ने फल देने थे। तो अपनी औकात ना भूला कर भग्वद भजन करने वालों को तो जन्म चक्र से छुटकारा मिल फिर से स्वर्ग की सीट मिल गयी। गृहस्थी के माया-जाल में फसी आत्माओं को चोला बदल-बदल कर बार-बार इस धरा धाम पर आने का हुक्म हो गया। और उन स्वयंभू भगवानों ने, जिन्होंने पृथ्वी पर तरह-तरह के आतंकों का निर्माण किया था, दूसरों का जीना मुहाल कर दिया था, उनके लिये एक अलग विभाग बनाया गया जिसे नरक का नाम दिया गया।
अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ काफी कम हो गयी है। वहां के वाशिंदों को अपने-अपने अनुभव बता-बता कर अपना टाइम पास करने का जरिया मिल गया है।
प्रभू आराम से अपनी निर्माण क्रिया में व्यस्त हैं।

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

एक महान संगीतकार की उपेक्षित समाधि

बैजू, जिसके संगीत में पत्थर को भी पिघला देने की क्षमता थी, जिसका गायन सुन लोग जड़वत खड़े रह जाते थे, जिसने अपने समय के महान संगीतकार तानसेन को भी पराजय का मुख देखने को विवश कर दिया था। (कुछ इतिहासकारों के अनुसार दोनों का समय अलग-अलग था) आज उसकी समाधि की खोज-खबर लेने वाला भी कोई नहीं है। उसी ग्वालियर शहर में जहां हर साल तानसेन समारोह बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है वहीं के घोरपोड़े बाड़े में स्थित एक हद तक गुमनाम सी बैजू की समाधि अपनी उपेक्षा का दर्द झेल रही है। यहां तक की बहुतेरे ग्वालियर वासियों को भी इस जगह का पता नहीं है। इस बाड़े में दो समाधियां हैं। आजकल यहां की देख-रेख करने वाले एक धोबी परिवार के अनुसार दूसरी समाधि बैजू की पत्नी की है। समाधि पर होने वाली चूने की पोताई के कारण उस पर लिखे आलेख को अपठनीय बना दिया है।

कहते हैं वर्षों पहले यहां काफी रौनक हुआ करती थी। हर नया गाना सीखने वाला यहां आकर अपनी सफलता की मन्नौति मांगता था। इन्हीं समाधियों के पास एक नीम का पेड़ हुआ करता था, जिसकी दो-तीन पत्तियां खाने से गाने के कारण बैठा हुआ गला बिल्कुल ठीक हो जाता था। पर रोज-रोज की बढती भीड़-भाड़ से तंग आ कर यहां के तत्कालीन मालिक घोरपोड़े ने उस पेड़ को जड़ से ही उखड़वा दिया था।

आज जो धोबी परिवार इन समाधियों की सार-संभार कर रहा है, उसका गीत-संगीत से दूर-दूर का रिश्ता नहीं है पर पूरा परिवार बैजू को अपना कुलदेवता मानता है और जितना बन पड़ता है उतना रख-रखाव कर रहा है।

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यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...