मां, बेटा और बहू तीन जनों का छोटा सा परिवार। पर सास बहू में रोज जूतम पैजार। दोनों यही समझतीं कि लड़का उसे ही ज्यादा चाहता है। एक दिन शाम को लड़का घर आया तो दोनो सास बहू उसके सामने आ खड़ी हुईं। मां ने बेटे से पूछा कि आज एक बात साफ कर दे, तू किसकी ज्यादा फिकर करता है ? मेरी या अपनी बीवी की ? मान ले हम दोनों नदी में ड़ूबने लगें तो तू किसे पहले बचायेगा?लड़का बेचारा पेशोपेश में। एक तरफ कूंआ दूसरी तरफ खाई। समझ नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दे। उसके उतरे चेहरे को देख उसकी बीवी को दया आगयी। वह बोली, तुम तो अपनी मां को बचा लेना। मुझे बचाने वाले बहुत मिल जायेंगे।
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शादी के 25-30 साल बाद। करवा चौथ की सुबह रसोई की खट-पट से पति की नींद में बाधा पड़ी तो वह चिल्लाया, मुंह अंधेरे यह क्या कर रही हो ?बीवी वहीं से गुर्राई, तेरा स्यापा ही करने में लगी हूं।
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एक बूढी माई ने एक सोने का कंगन बनवा कर अपनी वर्षों की हसरत पूरी की। अब उसकी इच्छा थी कि उस जेवर की लोग प्रशंसा करें। वह दिन भर इधर उधर घूमती रही। लोगों को आकर्षित करने के उसने सारे उपाय कर लिये पर दैवयोग से किसी का भी ध्यान कंगन की ओर नहीं गया। वह रुआंसी तो हो ही गयी साथ ही साथ गुस्से से भी भर गयी। गुस्से में उसने अपनी झोंपड़ी में आग लगा दी। और हाथ उठा जोर-जोर से चिल्लाने लगी, लोगो दौड़ो, बचाओ। इसी बीच एक लड़के की नज़र उसके चमकते कंगन पर पड़ी। उसने पूछा, क्यों नानी नया गहना बनवाया है क्या ?वृद्धा यह सुनते ही फट पड़ी, अरे नासपीटे सबेरे ही इसे देख लेता तो मेरा घर तो बच जाता।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
मंगलवार, 30 जून 2009
रविवार, 28 जून 2009
उनके लिए जो शादी शुदा हैं या शादी करने जा रहे हैं.
हमारी छोटी सी जिंदगी में अपने जीवन साथी के प्रति जुड़ाव, एक दूसरे की खुशियों की हिफाजत, एक दूसरे का ख्याल, समर्पण ही जीवन को सुगम व सुखमय बनाता है ! जीवन में बड़ा घर, गाड़ी या भारी-भरकम बैंक बैंलेंस भी वह खुशी प्रदान नहीं कर सकते जो एक दूसरे को देखते ही चेहरे पर आई मुस्कान कर सकती है ! जीवन में कितनी भी व्यस्तता हो, कुछ ना कुछ समय अपने साथी के लिये जरूर निकालें, अपने सुखी, दीर्घ व संतुष्ट विवाहित जीवन के लिये...........!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
नरेश और सीमा पति-पत्नी। दस साल हो गए थे शादी को। एक आठ साल का बच्चा विवेक। बस यही छोटा सा परिवार। नरेश का अच्छा खासा, जमा-जमाया व्यवसाय था। हर सुख-सुविधा उपलब्ध थी। घर-बार, गाड़ी, समर्पित पत्नी, सुंदर सा मेधावी बच्चा। पर उसका मन कहीं और सकून की तलाश में भटकता रहता था। इसी भटकन को थाम लिया था रंजना ने। यह संबंध इतने प्रगाढ़ हो गए थे कि उनकी मदहोशी में नरेश ने छोटे बच्चे के भविष्य को भी दरकिनार कर अपने बसे-बसाए परिवार को छिन्न-भिन्न करने का निर्णय ले लिया था !
एक शाम घर लौटने के बाद खाने की टेबल पर बिना किसी लाग लपेट के उसने सीमा से कह दिया कि उसे तलाक चाहिये। उसे लगा था कि उसकी इस बात पर सीमा आसमान सर पर उठा लेगी, रोएगी, चिल्लाएगी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ उल्टे उसने नम्रता से सिर्फ इतना पूछा, क्यूं ? इसका कोई जवाब ना देकर नरेश अपने कमरे में चला गया। वह रात दोनों पर भारी गुजरी सीमा की रोते हुए और नरेश की तनाव में।
दूसरे दिन शाम को जान बूझ कर नरेश देर से घर आया और सीमा के सामने तलाक नामा रख अपने कमरे में चला गया। कागज़ में घर, गाड़ी तथा व्यवसाय में तीस प्रतिशत का हिस्सा सीमा के नाम करने की बात लिखी गयी थी। सीमा ने कागज़ पढ़ा और उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। अगली सुबह नरेश दफ्तर जाने लगा तभी कमरे में सीमा आयी उसके हाथ में एक लिफाफा था जो उसने नरेश को थमा दिया। उसमें लिखा था कि उसको नरेश की धन संपत्ति कुछ नहीं चाहिये। पर तलाक के लिये उसकी दो शर्तें हैं, पहली कि यह तलाक विवेक के आसन्न इम्तिहानों को देखते हुए एक महिने बाद लिया जाय। इस बीच उनका व्यवहार बिल्कुल सामान्य रहेगा। दुसरे नरेश रोज उसे उसी तरह कमरे में ले जाएगा जैसे उसे पहली रात ले कर गया था।
नरेश को इसमें कोई आपत्ती नहीं थी। उसने जब यह दोनों शर्तें रंजना को बताईं तो वह जोर से हंस पड़ी और बोली, वह बेवकूफ औरत समझती है कि क्या वह ऐसे अपनी शादी बचा लेगी ?
पहली रात जब नरेश सीमा को अपनी बाहों में उठा कमरे की ओर बढा तो नन्हा विवेक उनके पीछे तालियां बजा-बजा कर खुश हो बोलने लगा कि देखो पापा ने कैसे मेरी तरह मम्मी को उठाया हुआ है। सीमा आंखें बंद किये सिर्फ इतना बोली कि इसे हमारे अलगाव का पता नहीं लगना चाहिए। नरेश ने अपना सर सहमति में हिला दिया। इसी बीच उसका ध्यान सीमा के चेहरे की तरफ गया जहां उम्र ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था बालों में भी चांदी के तार नजर आने लगे थे।
इसी तरह एक दिन सीमा को उठा कर ले जाते हुए उसे लगा कि जिस औरत ने उसकी सुख-सुविधा के लिये अपने दिन रात एक कर दिये थे उसकी ओर उसने कभी रत्ती भर भी ध्यान नहीं दिया है। सीमा के प्रति उसे फिर जुड़ाव सा महसूस होने लगा। यह बात उसने रंजना को नहीं बताई !
महीना खत्म होने में कुछ ही दिन रह गए थे। नरेश को सीमा की हर बात अब बारीकी से नजर आने लगी थी। आज रात को जब वह सीमा को उठाए कमरे की ओर बढ़ रहा था तो उसके ध्यान में आया कि उसके कपड़े नाप के ना हो कर ढीले से हैं। गौर करने पर उसे सीमा काफी दुबली नजर आई ! नरेश को लगा कि इस औरत को वह पिछले सालों की बनिस्पत अब ज्यादा समझने लगा है।
उसे ग्यारह सालों के अपने दुख-सुख के लम्हे याद आने लगे। वह कठिन परिस्थितियां जब वह हार कर हताश हो जाता था तब इसी औरत के संबल, साहस, हौसले से वह उबर पाया था ! इसी औरत की सहनशीलता, समझदारी से आज यह मुकाम हासिल हुआ है। इस बीच कभी भी उसका ध्यान दिन प्रति दिन क्षीण होती उसकी काया की तरफ नहीं गया था। अपने लिये समर्पित उस औरत का एक पल भी वह ध्यान नहीं रख पाया था। उसकी बाहों में सिमटी उस औरत ने कभी भी कोई शिकायत नहीं की थी उससे ! आज की रात अंतिम रात थी जब वह सीमा को उठाए कमरे की ओर जा रहा था। रोज की तरह सीमा अपनी आंखें बंद किए उसकी बाहों में निश्चल पड़ी थी।
सबेरा होते ही इसके पहले कि मन बदल जाए नरेश घर से निकल गया। सीधा रंजना के पास जा बोला कि मैं सीमा को तलाक नहीं दे सकता। जिसने मेरे लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया हो मैं उसे धोखा नहीं दे सकता। इतना सुनते ही रंजना आपे से बाहर हो गयी उसने नरेश को एक जोर का धक्का दे कर कहा कि क्या तुम पागल हो गये हो ? नरेश ने कहा हां ! और वहां से निकल गया। दूसरे दिन सीमा के सिरहाने एक कागज पड़ा था जिस पर लिखा था, मैं अपनी मृत्यु प्रयंत तुम्हें संभाले रहुंगा।
इस रचना को मेरी तरह ही अपने और साथियों के साथ साझा करें ! हो सकता है कि इससे आप को कोई फर्क ना पड़े पर यह भी हो सकता है कि इससे किसी का परिवार टूटने से बच जाए !
@ई-मेल पर प्राप्त एक रचना पर आधारित 🙏
शनिवार, 27 जून 2009
बेचारे नारद जी ने तो भला ही चाहा था, पर...........
सर्दियों की एक सुबह एक गिद्ध एक पहाड़ की चोटी पर बैठा धूप का आनंद ले रहा था। उसी समय उधर से यमराज का गुजरना हुआ। गिद्ध को वहां बैठा देख यमराज की भृकुटी में बल पड़ गये पर वे बिना कुछ कहे अपने रास्ते चले गये। पर उनकी वक्र दृष्टि से गिद्ध का अंतरमन तक हिल गया। मारे डर के उसके कंपकपी छूटने लगी। तभी उधर कहीं से घूमते-घूमते नारदमुनि भी आ पहुंचे। गिद्ध की दशा देख उन्होंने उससे पूछा, क्यों गिद्धराज क्या बात है ? बहुत घबड़ाये से लग रहे हो। इस पर गिद्ध ने उन्हें पूरी बात बता दी कि इधर से यमराज निकले तो मेरी ओर उन्होंने घूर कर देखा। तभी से मैं परेशान हूं। पता नहीं मैंने कौन सी भूल कर दी है। तनिक सोच कर नारद जी ने गिद्ध से कहा कि एक काम करो। यहां से सौ योजन दूर मंदार नामक पर्वत है। उसमें एक गुफा है। तुम उसी में जा कर छिप जाओ। वहां कोई आता-जाता नहीं है। तब तक मैं यमराज जी से बात करता हूं। इतना कह नारद जी गिद्ध को भेज खुद नारायण-नारायण जपते यमराज के दरबार में जा पहुंचे। यमराज ने उनका स्वागत कर पूछा कि महाराज इधर कैसे आना हुआ ? नारद जी बोले आज सुबह आपने अपनी कोप दृष्टि एक निरीह गिद्ध पर डाली थी जिससे वह बहुत सहमा हुआ था। उसने कौन सी भूल कर दी है यही पूछने आया हूं। यह सुन यमराज बोले, अरे वह! कुछ नहीं। मैंने उससे ना कुछ पूछा ना कहा। मैं तो उसे वहां बैठा देख यह सोच रहा था कि यह यहां क्या कर रहा है। इसकी मौत तो आज सौ योजन दूर मंदार पर्वत की गुफा में लिखी है।
शुक्रवार, 26 जून 2009
एक झंडा जिसे सलामी नहीं मिलती
दुनिया के हर देश में अपने झंड़े के प्रति विशेष लगाव होता है। यह छोटा सा कपड़े का टुकड़ा आत्मसम्मान, आत्म गौरव का प्रतीक होता है। इसको चढाने, उतारने के नियमों का कड़ाई के साथ पालन किया जाता है। पर एक जगह एक झंड़ा ऐसा भी है जो सदा टंगा रहता है, जिसे कभी चढाया नहीं जाता ना उतारा जाता है ना कभी उसे सलामी मिलती है। वह झंड़ा अमेरिका का है और उसे नील आर्मस्ट्रांग ने अपने अभियान के दौरान चांद पर लगाया था।
1969 से 1972 के बीच 12 अंतरिक्ष यात्रियों ने मिल कर करीब 170 घंटे चांद पर बिताये हैं। इस दौरान उन्होंने वहां करीब 100 कि.मी. चहलकदमी की है। वे चांद से लगभग 400 के.जी. मिट्टी तथा चट्टानों के टुकड़े तथा करीब 30000 फोटोग्राफ अपने साथ धरती पर लाने में सफल रहे हैं।
अपोलो 17 का अभियान चांद पर अमेरिका का अंतिम प्रयास था। उसके यात्री अपने पीछे एक धातु के टुकड़े पर खुदा संदेश छोड़ कर आये थे जिस पर खुदा हुआ था कि, दिसम्बर 1972 एडी मे मनुष्य ने अपना पहला चांद की खोज का अभियान पूरा किया। हमारा आशय था कि मनुष्य जाति का शांति संदेश चारों ओर फैले।
नील आर्मस्ट्रांग पहला इंसान था धरती के बाहर किसी आकाशीय पिंड पर अपना पैर रखने वाला। और उस समय उसके कहे शब्द दुनिया जानती है। पर चांद पर किसी मनुष्य के अबतक के अंतिम कदम और शब्द कमाण्डर सरमन के थे जो उन्होंने 11 दिसम्बर 1972 को कहे थे - "America's challenge of today has forged man's destiny of tomorrow"
1969 से 1972 के बीच 12 अंतरिक्ष यात्रियों ने मिल कर करीब 170 घंटे चांद पर बिताये हैं। इस दौरान उन्होंने वहां करीब 100 कि.मी. चहलकदमी की है। वे चांद से लगभग 400 के.जी. मिट्टी तथा चट्टानों के टुकड़े तथा करीब 30000 फोटोग्राफ अपने साथ धरती पर लाने में सफल रहे हैं।
अपोलो 17 का अभियान चांद पर अमेरिका का अंतिम प्रयास था। उसके यात्री अपने पीछे एक धातु के टुकड़े पर खुदा संदेश छोड़ कर आये थे जिस पर खुदा हुआ था कि, दिसम्बर 1972 एडी मे मनुष्य ने अपना पहला चांद की खोज का अभियान पूरा किया। हमारा आशय था कि मनुष्य जाति का शांति संदेश चारों ओर फैले।
नील आर्मस्ट्रांग पहला इंसान था धरती के बाहर किसी आकाशीय पिंड पर अपना पैर रखने वाला। और उस समय उसके कहे शब्द दुनिया जानती है। पर चांद पर किसी मनुष्य के अबतक के अंतिम कदम और शब्द कमाण्डर सरमन के थे जो उन्होंने 11 दिसम्बर 1972 को कहे थे - "America's challenge of today has forged man's destiny of tomorrow"
गुरुवार, 25 जून 2009
ब्लाग जगत लौंडे-लफाड़ियों तथा चाटुकारों का जमावडा है - बकलम बेनामी।
कभी-कभी कोई बात, कोई खबर मन को भा जाती है तो इच्छा जोर मारने लगती है कि उस बात को औरों तक भी पहुंचाया जाय। पर इस जोरा-जोरी में यह शाश्वत सत्य दब जाता है कि सब चीजें सब को अच्छी नहीं लग सकतीं। एक-दो दिन पहले दो-तीन चुटकुले अच्छे लगे तो मुस्कुराहट बिखेरने के लिये उन्हें पोस्ट कर दिया। नेट पर उस दिन आना ना हो सका। दूसरे दिन देखा तो वहां एक बेनाम व्यक्ति के विरुद्ध अविनाश जी मेरी तरफ से मोर्चा संभाले हुए हैं। अपने ही बीच के किसी ‘यार’ को चुटकुलों पर आपत्ती थी और उस भाई ने बेनामी की नकाब पहन अपनी नाराजगी इन शब्दों मे जाहिर की थी कि “आपका नाम अखबार में आया है और आप यहां चुटकुले सुना रहे हैं।” मेरी समझ में यह बात नहीं आयी कि अखबार में ब्लाग या नाम का जिक्र होने के बाद किसी को चुटकुले सुनाने क्यूं बंद कर देने चाहिये। क्या अखबार में छपाऊ होने के पश्चात आदमी को हरदम टेंशनाया हुआ बोर टाइप का मनहूस चेहरे वाला बुद्धिजीवी दिखते हुए ऐसे भारी-भरकम विषयों पर ही अपनी कलम चलानी चाहिये जो ना खुद को समझ आयें न दूसरे को। अखबारों में तो कयी बार ब्लाग का जिक्र हुआ है पर पहले तो किसी ने मुझे सुधारने की पहल नहीं की। वैसे भी मैंने कौन सा नवरात्रों में मदिरापान कर लिया या वकील बन कानून का उल्लंघन कर दिया जो किसी को नागवार गुजरा। और कर दिया तो कर दिया। खैर,
इधर अविनाश जी ढाल बने खड़े थे उधर वह महाशय अपना तरकश खाली करते-करते कटुता की सीमा पार कर कह गये कि “ब्लाग जगत लौंड़े-लफाड़ियों तथा चाटुकारों का जमावड़ा है” इस पर जहां अविनाश जी ने उन महाशय जी को उनकी उम्र का अंदाज लगवा दिया वहीं मुझे उनकी सेहत को मद्देनजर रख उन्हें चेताना पड़ा कि महाशय जब आप को यहां की आबो-हवा रास नहीं आती हमारा हंसना खुश होना आपको नहीं सुहाता तो क्यूं बार-बार इधर ताका-झांकी करने आ जाते हैं ? अरे भाई उस जगह जाना ही क्यूं जहां जाते ही रक्त चाप बढ कर सेहत के लिये खतरे की घंटी बजाना शुरु कर देता हो।
हो सकता है, कयी बार किसी विषय पर सहमत ना होने के कारण मन करता हो कि अपनी बात भी रखी जाय, पर झिझक के कारण कि अगले को शायद बुरा लगेगा, ऐसा कर पाना संभव न लगता हो तो लोग नकाब का उपयोग कर लेते हों। ठीक है अपनी राय रखने को सब स्वतंत्र हैं पर मेरी एक ही गुजारिश है कि कृपया शालीनता के साथ अपनी बात रखें। अपने गुस्से के कारण शब्दों में कटुता ना आने दें। ऐसे में तो वैमनस्य ही बढेगा।
एक बार फिर अविनाश वाचस्पति जी का आभारी हूं जिन्होंने मेरी और ब्लाग परिवार की तरफ से शालीनता को ना छोड़ते हुए मोर्चा संभाले रखा। जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि बहुत बार ऐसी परिस्थितियां आने पर हम खुद विवादाग्रस्त होने के ड़र से सच्चाई का साथ ना दे किनारे खड़े हो जाते हैं।
इधर अविनाश जी ढाल बने खड़े थे उधर वह महाशय अपना तरकश खाली करते-करते कटुता की सीमा पार कर कह गये कि “ब्लाग जगत लौंड़े-लफाड़ियों तथा चाटुकारों का जमावड़ा है” इस पर जहां अविनाश जी ने उन महाशय जी को उनकी उम्र का अंदाज लगवा दिया वहीं मुझे उनकी सेहत को मद्देनजर रख उन्हें चेताना पड़ा कि महाशय जब आप को यहां की आबो-हवा रास नहीं आती हमारा हंसना खुश होना आपको नहीं सुहाता तो क्यूं बार-बार इधर ताका-झांकी करने आ जाते हैं ? अरे भाई उस जगह जाना ही क्यूं जहां जाते ही रक्त चाप बढ कर सेहत के लिये खतरे की घंटी बजाना शुरु कर देता हो।
हो सकता है, कयी बार किसी विषय पर सहमत ना होने के कारण मन करता हो कि अपनी बात भी रखी जाय, पर झिझक के कारण कि अगले को शायद बुरा लगेगा, ऐसा कर पाना संभव न लगता हो तो लोग नकाब का उपयोग कर लेते हों। ठीक है अपनी राय रखने को सब स्वतंत्र हैं पर मेरी एक ही गुजारिश है कि कृपया शालीनता के साथ अपनी बात रखें। अपने गुस्से के कारण शब्दों में कटुता ना आने दें। ऐसे में तो वैमनस्य ही बढेगा।
एक बार फिर अविनाश वाचस्पति जी का आभारी हूं जिन्होंने मेरी और ब्लाग परिवार की तरफ से शालीनता को ना छोड़ते हुए मोर्चा संभाले रखा। जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि बहुत बार ऐसी परिस्थितियां आने पर हम खुद विवादाग्रस्त होने के ड़र से सच्चाई का साथ ना दे किनारे खड़े हो जाते हैं।
बुधवार, 24 जून 2009
वृक्ष सिखाता जीवन-दर्शन
वर्षों पहले एक छोटे से बीज ने धरती में पनाह ली। धरा ने भी उसे अपनी ममतामयी गोद में समेट लिया। उपयुक्त माहौल पाकर बीज ने अपनी जड़ें जमीन में फैला कर अपनी पकड़ मजबूत कर एक दिन अपना सर जमीन के बाहर निकाला। उसके सामने विशाल संसार अपनी हजारों अच्छाईयों और बुराईयों के साथ पसरा पड़ा था। उस छोटे से कोमल, नाजुक, हरे पौधे ने चारों ओर नज़र घुमा कर देखा फिर सर उठा कर आसमान की उंचाईयों की तरफ अपनी नज़र फिराई और मन ही मन उस उंचाई को नापने का दृढ निश्चय कर लिया।
समय बीतता गया। धरती के देश आपस में लड़ते-भिड़ते रहे। उनकी आपसी दुश्मनी से वातावरण विषाक्त होता रहा। एक दूसरे को नीचा दिखाने में हजारों लाखों जाने जाती रहीं। पर पौधे ने अपना सफर जारी रखा। विज्ञान तरक्की की राह दिखाता रहा। इंसान अंतरिक्ष की सीमायें लांघने लगा। पौधा भी धीरे धीरे जमीन में अपनी पकड़ और अच्छी तरह जमाते हुए संसार के अच्छे-बुरे बदलाव देखते हुए अपनी मंजिल की ओर अग्रसर होता रहा।
पौधा शुरुआती खतरों से बच कर बड़ा होता गया। अब उसकी छाया में पशु आ कर अपनी थकान मिटाने लगे थे। पक्षियों ने उसकी ड़ालियों की सुरक्षा में अपने नीड़ों को स्थान दे दिया था। कभी-कभी थके हारे स्त्री-पुरुष भी उसकी छांव में गर्मी से राहत पाने आ बैठते थे और सर उठा कर उसकी विशालता उसकी उपादेयता को मुग्ध भाव से देख प्रकृति के शुक्रगुजार हो जाते थे। कभी-कभी इस वृक्ष को देख उन्हें प्रेरणा भी मिलती थी। ऐसा होता भी क्यूं ना?
यह पेड़ ही तो था जो वक्त के अनगिनत थपेड़े खा कर भी अपना सर ऊंचा किये खड़ा था। तूफानों के सामने बहुत बार उसे झुकना जरूर पड़ा पर मुसीबत जाते ही वह दुगनी उम्मीद से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता रहा। उसके पैर अपनी जमीन में गहरे तक उतरे रहे पर उसने सदा अपना सर रोशनी और ऊंचाईयों की तरफ बनाये रखा। अति विषम परिस्थितियों में भी उसके अस्तित्व पर शायद इसीलिये आंच नहीं आयी, क्योंकि उसका जन्म ही हुआ था दूसरों की भलाई के लिये, दूसरों को जीवन प्रदान करने के लिये, दूसरों को आश्रय देने के लिये, दूसरों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये। जिसका जीवन ही औरों की भलाई के लिये बना हो उसकी रक्षा करने के लिये तो कायनात भी अपनी पूरी ताकत लगा देती है।
मंगलवार, 23 जून 2009
एक बार फिर बेचारे संता की खिंचाई (-:
संता डाक्टर के पास इलाज के लिये गया। कफी जांच पड़ताल के बाद डाक्टर बोला कि मैं फिलहाल आपकी बिमारी का कारण नहीं समझ पा रहा हूं लगता है यह शराब का नतीजा है। संता उठते हुए बोला, कोई बात नहीं डाक्टर साहब मैं बाद में जब आप का नशा उतर जायेगा तब आ जाऊंगा।
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संता रात में सड़क किनारे लैंप-पोस्ट के नीचे कुछ खोज रहा था। तभी उनका पड़ोसी उधर से निकला। वहां संता को देख उसने पूछा, संता साहब क्या ढूंढ रहे हो ?संता, मेरा पांच का सिक्का गिर गया है।पड़ोसी ने पूछा, कहां गिरा था ?संता ने एक तरफ हाथ से इशारा कर कहा, उधर।अरे जब गिरा उधर है तो आप यहां क्यों खोज रहे हैं ?संता, यार उधर अंधेरा है।
************************************
संता के बचपन का एक किस्सा :-
संता और उसके दो दोस्त जंगल में घूमते-घूमते भटक कर रास्ता भूल गये। रात होने वाली हो गयी। डर के मारे तीनों की हालत पतली होती जा रही थी। तभी उनमें से एक ने अपने इष्ट को याद किया। आकाशवानी हुई बोलो क्या चाहते हो? बच्चे ने कहा प्रभू मन घबड़ा रहा है, मुझे घर पहुंचा दीजिये। पलक झपकते ही वह वहां से गायब हो घर पहुंच गया। ऐसा देख दूसरे ने भी अपने आराध्य को याद किया। उसके साथ भी वैसा ही हुआ, वह भी घर पहुंच गया। अब जंगल में संता अकेला। अंधेरा घिर आया था। ड़र के मारे इसके हाथ-पैर फूल रहे थे। पर थोड़ी हिम्मत कर इसने भी अपने इष्ट को याद किया। आकाशवाणी हुई, बोल बालक क्या चाहता है? संता बोला, प्रभू अकेले अंधेरे में बहुत ड़र लग रहा है। मेरे दोनों साथियों को मेरे पास ला दो। अगले ही क्षण दोनों (: (: (:
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संता रात में सड़क किनारे लैंप-पोस्ट के नीचे कुछ खोज रहा था। तभी उनका पड़ोसी उधर से निकला। वहां संता को देख उसने पूछा, संता साहब क्या ढूंढ रहे हो ?संता, मेरा पांच का सिक्का गिर गया है।पड़ोसी ने पूछा, कहां गिरा था ?संता ने एक तरफ हाथ से इशारा कर कहा, उधर।अरे जब गिरा उधर है तो आप यहां क्यों खोज रहे हैं ?संता, यार उधर अंधेरा है।
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संता के बचपन का एक किस्सा :-
संता और उसके दो दोस्त जंगल में घूमते-घूमते भटक कर रास्ता भूल गये। रात होने वाली हो गयी। डर के मारे तीनों की हालत पतली होती जा रही थी। तभी उनमें से एक ने अपने इष्ट को याद किया। आकाशवानी हुई बोलो क्या चाहते हो? बच्चे ने कहा प्रभू मन घबड़ा रहा है, मुझे घर पहुंचा दीजिये। पलक झपकते ही वह वहां से गायब हो घर पहुंच गया। ऐसा देख दूसरे ने भी अपने आराध्य को याद किया। उसके साथ भी वैसा ही हुआ, वह भी घर पहुंच गया। अब जंगल में संता अकेला। अंधेरा घिर आया था। ड़र के मारे इसके हाथ-पैर फूल रहे थे। पर थोड़ी हिम्मत कर इसने भी अपने इष्ट को याद किया। आकाशवाणी हुई, बोल बालक क्या चाहता है? संता बोला, प्रभू अकेले अंधेरे में बहुत ड़र लग रहा है। मेरे दोनों साथियों को मेरे पास ला दो। अगले ही क्षण दोनों (: (: (:
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