pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 7 जून 2021

श्रीकृष्ण जी की लीला का अंतिम दिन , 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व

कुरुक्षेत् युद्ध के 35 साल बीत चुके थे। समय निर्बाध गति से चलता रहा। समृद्धि, सम्पदा और वैभव के साथ-साथ धीरे-धीरे यदुवंशी युवाओं में उच्श्रृंखलता, बेअदबी, निरंकुशता भी घर करने लगी थी ! वे सभी सुरा-भोग-विलास में लिप्त रहने लगे थे। चारों ओर अपराध, अमानवीयता और पाप का साया गहराने लगा था। बुजुर्गों और गुरुओं का अपमान, असम्मान, आपसी निंदा, द्वेष जैसी भावनाओं की दिन-रात बढ़ोत्तरी होने लगी थी। क्या ऐसा प्रभु ने  ही गांधारी और ऋषियों के वचन को पूरा करने के लिए किया था या फिर लीला रूपी माया को समेटने का समय आ गया था...............!! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

श्रीकृष्ण को मालुम था कि वे जहां जा रहे हैं वहां क्या होने वाला है ! उनका सामना अपने पूरे कुल और सारे पुत्रों की मृत्यु के शोक में डूबी, रौद्र रूपेण उस माँ से होने जा रहा था, जो श्रीकृष्ण को ही इन सब घटनाओं और युद्ध का उत्तरदाई मानती रहीं ! वह कुछ भी कर सकती थी ! पर फिर भी वे सांत्वना देने के लिए गांधारी के कक्ष की ओर निर्विकार रूप से बढे जा रहे थे ! फिर जो होना था वही हुआ ! क्योंकि विधि के विधान में पक्षपात नहीं होता ! उसमें सब बराबर होते हैं ! आप कितने बड़े महापुरुष, धर्मात्मा, राजाधिराज, प्रभु के अंश या अवतार ही क्यों ना हों ! अपने कर्मों का फल सभी को भोगना पड़ता है ! 

भगवान श्रीकृष्ण जब गांधारी के सामने पहुंचे, तो गांधारी का अपने क्रोध पर वश नहीं रहा ! बिना कुछ सोचे-समझे उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दे डाला ! “अगर मैंने प्रभु की सच्चे मन से पूजा तथा निस्वार्थ भाव से अपने पति की सेवा की है, तो जैसे मेरे सामने मेरे कुल का हश्र हुआ है, उसी तरह तुम्हारे वंश का भी नाश हो जाएगा !'' सब सुन कर भी कृष्ण शांत रहे ! फिर बड़ी ही विनम्रता से बोले, मैं आपके दुःख को समझता हूँ ! यदि मेरे वंश के नाश से आपको शांति मिलती है, तो ऐसा ही होगा ! पर आपने व्यर्थ मुझे श्राप दे कर अपना तपोबल नष्ट किया ! विधि के विधानानुसार ऐसा होना तो पहले से ही निश्चित था ! तब कुछ क्रोध शांत होने पर गांधारी को भी पछतावा हुआ और श्री कृष्ण से उन्होंने क्षमा याचना की ! पर जो होना था वह तो हो ही चुका था !  

पांडवों और राज्य की व्यवस्था करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण द्वारका आकर रहने लगे। द्वारका नगरी बहुत शांत और खुशहाल थी। कुरुक्षेत् युद्ध के 35 साल बीत चुके थे। समय निर्बाध गति से चलता रहा।समृद्धि, सम्पदा और वैभव के साथ-साथ धीरे-धीरे यदुवंशी युवाओं में उच्श्रृंखलता, बेअदबी, निरंकुशता भी घर करने लगी थी ! वे सभी सुरा-भोग-विलास में लिप्त रहने लगे थे। चारों ओर अपराध, अमानवीयता और पाप का साया गहराने लगा था। बुजुर्गों और गुरुओं का अपमान, असम्मान, आपसी निंदा, द्वेष जैसी भावनाओं की दिन-रात बढ़ोत्तरी होने लगी थी। ऐसा क्या प्रभु ने गांधारी और ऋषियों के वचन को पूरा करने के लिए किया था ! या फिर लीला रूपी माया को समेटने का समय आ गया था !  

ऐसे में ही एक बार ऋषि विश्वामित्र, दुर्वासा, वशिष्ठ और नारद भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका आए थे। उनको देख यदु किशोरों को शरारत सूझी और उन्होंने कृष्ण के पुत्र सांब को एक स्त्री का वेष धारण करवा, ऋषियों के पास ले जा कर कहा कि ये युवती गर्भवती है, कृपया बताएं कि उसके गर्भ से बालक जन्म लेगा या बालिका ! ऋषियों ने तत्काल सब समझ लिया और क्रोधित होकर सांब को श्राप दिया कि वह लोहे के मूसल को जन्म देगा और उसी मूसल से यादव कुल और साम्राज्य का नाश हो जाएगा। 

श्राप सुन सांब अत्यंत भयभीत हो गया ! उसने ऋषियों से क्षमा मांगी पर कोई लाभ नहीं हुआ ! तब सांब ने यह सारी घटना जा कर अपने नाना उग्रसेन को बताई ! वे भी चिंता में पड़ गए, फिर भी उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो उस मूसल को पीस कर चूर्ण बनाकर प्रभास नदी में प्रवाहित कर दो ! शायद इस तरह उस श्राप से छुटकारा मिल जाए। इसके साथ ही सुरा और नशीली वस्तुओं का इस्तेमाल तुरंत बंद करो ! सांब ने सब कुछ उग्रसेन के कहे अनुसार ही किया। परन्तु होनी को कहां टाला जा सकता है ! सागर की लहरों ने उस लोहे के चूर्ण को वापस किनारे पर फेंक दिया, जिससे कुछ समय पश्चात तलवार की तरह की तेज झाड़ियाँ उग उग आईं ! इस घटना के बाद से ही द्वारका के लोगों को विभिन्न अशुभ संकेतों का अनुभव भी होने लगा !

ये सब देख-सुन कर भगवान कृष्ण परेशान रहने लगे थे ! इसीलिए उन्होंने अपनी प्रजा से प्रभास क्षेत्र तीर्थ यात्रा कर अपने पापों से मुक्ति पाने को कहा। सभी ने ऐसा किया तो सही ! परंतु वहां पहुँच अपनी कुटेवों से फिर भी छुटकारा न पा सके ! वहां भी सभी मदिरा के नशे में चूर होकर, भोग-विलास में लिप्त हो गए ! एक दिन मदिरा के नशे में चूर सात्याकि, कृतवर्मा के पास पहुंचा और अश्वत्थामा को मारने की साजिश रचने और पांडव सेना के सोते हुए सिपाहियों की हत्या करने के लिए उसकी आलोचना करने लगा। वहीं कृतवर्मा ने भी सात्याकि पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिए। बहस बढ़ती गई और इसी दौरान सत्याकि के हाथ से कृतवर्मा की हत्या हो गई। कृतवर्मा की हत्या करने के अपराध में अन्य यादवों ने मिलकर सात्यकि को मौत के घाट उतार दिया। मदिरा के नशे में चूर सभी ने घास को अपने हाथ में उठा लिया और सभी के हाथ में मौजूद वो घास लोहे की छड़ बन गई। जिससे सभी लोग आपस में ही भिड़ गए और एक-दूसरे को मारने लगे। वभ्रु, दारुक और श्रीकृष्ण के अलावा अन्य सभी लोग मारे गए। 
उधर मूसल के चूर्ण का कुछ अंश एक मछली ने निगल लिया था, जो उसके पेट में जाकर धातु का एक टुकड़ा बन गया था। वह मछली एक मछुआरे के हाथ लगी जिसने उसे जरा नामक शिकारी को बेच दिया। जरा ने मछली के शरीर से निकले धातु के टुकड़े को नुकीला तथा जहर में बुझा, शिकार की खातिर अपने तीर के अग्रभाग में लगा लिया। एक दिन कृष्ण सारी घटनाओं से व्यथित हो सरोवर किनारे पीपल के वृक्ष के नीचे पैर पर पैर रखे ध्यानावस्था में बैठे थे। दिन का तीसरा पहर हो चला था। अचानक पैर के अंगूठे में तीव्र आघात के साथ दर्द व जलन की लहर उठी ! महसूस हुआ, जैसे सैंकड़ों बिच्छुओं के दंश आ लगे हों ! कुछ समझें, इसके पहले ही एक मानवाकृति हाथ जोड़े, आँखों में आंसू लिए, मृग के धोखे में तीर मारने हेतु क्षमायाचना करती, सामने आ खड़ी हुई ! क्षमा तो करना ही था ! पिछले जन्म में रामावतार में इसके बाली रूप को मारने का प्रतिकार तो होना ही था ! कर्मफल और विधि का विधान सबके लिए एक हैं ! आज सोमनाथ के निकट करीब पांच किमी की दुरी पर स्थित इस जगह को भालका तीर्थ के नाम से जाना जाता है। 
सब साफ हो चला था। गांधारी बुआ के श्राप का 36वां साल आ चुका था। समय बहुत कम था। सागर भी द्वारका को लीलने के लिए आतुर बैठा था ! श्रीकृष्ण ने आबालवृद्ध, महिला, अशक्त सबको द्वारका से ले जाने के लिए अर्जुन को तुरंत बुलवाने हेतु जरा और दारुकी को अर्जुन के नाम संदेश दे तुरंत रवाना किया। । तभी उन्होंने देखा सागर किनारे दाऊ अधलेटे पड़े हैं और उनकी नाक से एक शुभ्र सर्प, जो धीरे-धीरे वृहदाकार होता जा रहा था, सागर में समा रहा है ! आदिशेष भी अपने प्रभु की अगवानी हेतु बैकुंठ की ओर प्रयाण कर रहे थे ! तभी सभी देवी-देवता, अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि ने आ कर श्रीकृष्ण की आराधना की और प्रभु सब के साथ अपने धाम को लौट गए। कुछ पलों के लिए समय भी ठहर गया ! उसी दिन द्वापर युग का समापन हुआ और कलियुग का पदार्पण ! वह दिन था, 18 फरवरी 3102  ईसा पूर्व !!  

जब तक अर्जुन आए, सब कुछ घट चुका था ! दुखी मन, रोते-कलपते अर्जुन ने से श्रीकृष्ण और बलदेव की अंत्येष्टि व अन्य कार्य किसी तरह पूरे किए ! पार्थिव शरीरों को अग्नि दी ! पर क्या प्रभु  सारा शरीर पार्थिव था ? 
अति आश्चर्य की बात थी कि चिता की अग्नि में दोनों का बाकी सारा शरीर तो  भस्मीभूत हो  गया था, पर श्रीकृष्ण का ह्रदय स्थल जलता हुआ वैसे ही बचा हुआ था ! जन्म से लेकर अब तक एक सौ छब्बीस सालों में जिस दिल ने दिन-रात विपदाएं, मुसीबतें, लांछन, श्राप, द्वेष,बैर झेला हो, उसका पत्थर हो जाना स्वाभाविक ही था ! इसीलिए मांसपेशियों के आग पकड़ने के बावजूद वह भस्म नहीं हो पा रहा था ! या फिर यह भी प्रभु की लीला का एक अंग था, जगत की रक्षा हेतु ! समय कम था, सो भस्मी के साथ ही उस पिंड को उसी अवस्था में नदी में विसर्जित कर, अर्जुन बचे हुए द्वारका वासियों, जिनमें श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ के अलावा श्रीकृष्ण जी की सोलह हजार रानियां, कुछ महिलाएं, वृद्ध और बालक ही शेष रह गए थे, को अपने साथ ले इन्द्रप्रस्थ के लिए रवाना हो गए। 

इधर शरीर के उस हिस्से ने दैवेच्छा से बहते-बहते एक काष्ठपिण्ड का रूप ले लिया। जिसे राजा इन्द्रद्युम्न ने प्रभु के आदेशानुसार भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में स्थापित किया। आज भी जब शास्त्रोक्त विधि से जगन्नाथ धाम, पुरी में नई मूर्तियों का निर्माण होता है तो प्राणप्रतिष्ठा के समय बहुत गुप्त रूप से एक पवित्र क्रिया संपन्न की जाती है, जिसका ब्यौरा एक-दो मुख्य पुजारियों को छोड़ किसी को भी ज्ञात नहीं है ! वे पुजारी भी इसे गुप्त रखने के लिए वचनबद्ध हैं ! क्या है वह गोपनीय, पवित्र प्रक्रिया ? क्या प्रभु का दिल आज भी हमारी रक्षा हेतु धड़क रहा है.........?

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 
संदर्भ - विभिन्न ग्रंथ, पुस्तकें, कथाएं व उपकथाएं 

सोमवार, 31 मई 2021

अजीब और विवादास्पद नियम, क्रिकेट के

मान लीजिए एक बल्लेबाज बॉल को कवर, प्वाइंट, मिडविकेट या स्क्वायर लेग जैसी किसी एक जगह धकेल कर एक रन चुराने के लिए दूसरी तरफ दौड़ता है ! उधर फील्डर ने तेजी से बॉल विकेटों पर फेंकी ! बॉल से बचने के लिए बल्लेबाज पॉपिंग क्रीज से पहले जोर से कूदा और बिना जमीन छुए ऊपर ही ऊपर विकेटों को पार कर गया ! तब बॉल विकेटों में लगी तो क्या बल्लेबाज आउट होगा या नॉट आउट ?

#हिन्दी_ब्लागिंग    

क्रिकेट ! दुनिया भर में ना सही पर अनेक देशों का लोकप्रिय खेल ! खासकर हमारे देश का ! पर दुनिया की हर चीज की तरह इसमें तरह-तरह के बदलाव आते रहे हैं ! 1877 में टेस्ट के रूप में पदार्पण के पश्चात आज के तीनों प्रारूपों में ढलने तक इसके नियम-कायदों में अनगिनत बदलावों-सुधारों के बावजूद अभी भी कुछ नियम ऐसे हैं जो अजीबोगरीब और विवादास्पद हैं। 2019 का पिछला इग्लैंड और न्यूजीलैंड का वर्ल्डकप इसका जीता-जागता उदाहरण है ! जब ज्यादा बाउंड्री लगाने वाली टीम को विजेता घोषित कर दिया गया था ! 

ज्यादातर बल्लेबाजी को ध्यान में रख उसके लाभ और सहूलियत के लिए बने ऐसे ही कई नियम-कायदे अभी भी चलन में हैं, जो विवाद का विषय तो बन ही चुके हैं, उन पर कई वरिष्ठ खिलाड़ी और कोच भी अपनी असहमति जता चुके हैं ! आज ऐसे ही कुछ नियमों की खोजखबर !

* एक अजीब सा नियम है कि बॉल यदि विकेटों में लग भी जाए पर बेल्स ना गिरें तो बैट्समैन को आउट नहीं माना जाता ! क्यूं भाई ! बॉलर का उद्देश्य है बॉल को विकेट से टकरवाना ! पहले इतने यंत्र या गैजेट्स नहीं होते थे और मानवीय चूक से बचने के लिए विकेटों पर बेल्स लगाई जाती थीं जिनके गिरने पर पुख्ता तौर पर पता चल सके कि बॉल ने बैट्समैन को परास्त कर  विकेट को छू लिया है। इसमें मुख्य बात थी बाल का विकेट को छूना ना कि बेल का गिरना ! पर यह रूल आज भी वैसे ही कायम है, जबकि आज के जमाने में अत्याधुनिक एलईडी लाइट वाले स्टम्प्स प्रयोग में आते हैं, जिनमें बॉल छूते ही लाल रंग की लाइट जल जाती है ! ऐसे में बेल्स वाला नियम हास्यास्पद ही लगता है।

* ऐसा ही एक अजीब नियम है लेगबाई का ! बॉलर अपनी पूरी कुशलता से बेहतरीन बॉल फेंकता है ! बैट्समैन कोशिश कर भी उसे छू तक नहीं पाता ! पर बॉल जरा सा उसके पैड, जूते या शरीर को छू कर सीमा रेखा के पार चली जाती है तो चार रनों का इनाम मिलता है बल्लेबाज को ! बेचारा बॉलर..... !

* इसी तरह की कोई बॉल बाउंसर के रूप में बैट्समैन को डराती हुई उसे और विकेटकीपर को छकाती हुई सीमा रेखा पर कर जाती है तो बैटिंग करने वाली टीम को चार रन मिल हैं ! जबकि बैट्समैन उस बॉल पर पूरी तरह परास्त हो चुका होता है ! इस नियम ने कई मैचों का परिणाम  बदल कर रख दिया है ! इस पर भी गौर करने की जरुरत है।   

* एक ऐसा ही अजीब सा नियम नो बॉल का है ! खासकर इस खेल के 20 बॉलीय संस्करण में ! यदि किसी बॉलर से नो बॉल हो गई तो बैट्समैन को फ्री हिट मिलती है।  जिसमें वह सिर्फ रन आउट ही हो सकता है, सोचने की बात है कि बॉलर, नो बॉल का खामियाजा तो उस बॉल पर दे ही चुका है ! फिर अतिरिक्त बॉल पर और पेनल्टी क्यों ! वह भी बल्लेबाज के आउट ना होने की कीमत पर !  

* इसी तरह का एक नियम 20-20 के मैचों में पूरी तौर से बल्लेबाज के हित को ध्यान में रख कर बनाया गया है, जो खेल के पहले छह ओवर के पॉवर प्ले में फील्डिंग की सजावट पर प्रतिबंध लगाता है। खेल है ! सबको बराबर का मौका मिलना चाहिए ! बैट्समैन को अतिरिक्त सुविधा क्यों ! और बॉलर से क्या दुश्मनी है !

मान लीजिए एक बल्लेबाज बॉल को कवर, प्वाइंट, मिडविकेट या स्क्वायर लेग जैसी किसी एक जगह धकेल कर एक रन चुराने के लिए दूसरी तरफ दौड़ा ! उधर फील्डर ने तेजी से बॉल विकेटों पर फेंकी ! बॉल से बचने के लिए बल्लेबाज पॉपिंग क्रीज से पहले जोर से कूदा और बिना जमीन छुए ऊपर ही ऊपर विकेटों को पार कर गया ! तब बॉल विकेटों में लगी तो क्या बल्लेबाज आउट होगा या नॉट आउट ?जब आपने 22 गज की पिच को एक रन का मानक मान लिया है और बैट्समैन पॉपिंग क्रीज को पूरा पार कर लेता है तो बैट का जमीन को छूना अनिवार्य क्यों ! मुद्दा तो 22 गज को पार करना है, वह हो गया तो फिर भले ही बैट हवा में हो, दूरी तो पूरी कर ही ली गई ना ! शुरूआती दिनों में उपकरणों की अनुपस्थिति में बैट और जमीन के सम्पर्क का मामला समझ में आता है पर आज जब एक-एक मिलीमीटर का हिसाब दिखने-मिलने लगा है तो इस बेतुके नियम को भी आउट कर देना चाहिए ! 

* जबसे क्रिकेट में हेल्मेट का उपयोग होने लगा है तब से खेल में बैट्समैन की बादशाहत सी हो गई है। पर उसी हेल्मेट को खिलाड़ी का एक अंग ही माना जाता है यदि अंपायर को लगता है कि बॉल के विकेटों पर जाने में हेल्मेट बाधक था तो वह बैट्समैन को आउट दे सकता है ! कहते जरूर हैं LBW पर खेल में पूरे शरीर को ही बाधक BBW (body before wicket) मान कर ही निर्णय दिया जाता है।

* शायद बहुत से क्रिकेट प्रेमियों को पता ना हो कि अंपायर बैट्समैन को तब तक आउट घोषित नहीं कर सकता जब तक विपक्षी टीम अपील ना करे ! आज के हो-हल्ले वाले आक्रामक खेल के जमाने में यह नियम बचकाना सा लगता है।   

* आज बैट्समैन की सुरक्षा के लिए तरह-तरह के उपकरण खेल में इस्तेमाल होते हैं ! नजदीकी फिल्डर को भी हेल्मेट पहनने की इजाजत है पर यह जान कर आश्चर्य होता है कि कोई भी फील्डर तेज गति से आती बॉल से अपने हाथों को बचाने के लिए ग्लव्स नहीं पहन सकता ! यदि वह ऐसा करता पाया जाता है तो विपक्षी टीम को पांच रनों से नवाजा जा सकता है ! ऐसा क्यूँ भई ! बैट्समैन की चोट, चोट है बाकियों की.......!

* आजकल वैसे तो रनर का चलन बहुत कम हो गया है, पर उसके लिए भी एक नियम है कि रनर को उतना ही जिरह-बख्तर, यानी बैट्समैन के बराबर के उपकरण धारण करने होंगे, जिनसे समानता बनी रहे ! पर यदि बैट्समैन का वजन 100 किलो हो और उतने भार का कोई अन्य खिलाड़ी ना हो तो ! 

* प्रसंगवश एक अनोखी और सबसे धीमी हैट्रिक की बात। घटना है 1988-89 में ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज के बीच हुए दूसरे टेस्ट मैच की। जिसमें मर्व ह्यूज को बड़े अजीबोगरीब तरीके से अपनी हैट्रिक पूरी करने का मौका मिला था। ह्यूज ने अपने छत्तीसवें ओवर की अंतिम बॉल पर एक विकेट लिया। फिर जब उसे दोबारा बॉलिंग का अवसर मिला तब तक वेस्ट इंडीज का आखिरी विकेट ही बचा था, जिसे ह्यूज ने अपने सैंतीसवें ओवर की पहली बॉल पर आउट कर दिया। फिर दूसरी पारी के अपने पहले ओवर की पहली बॉल पर उसे फिर विकेट मिला ! इस तरह दो पारियों और तीन ओवरों में दुनिया की यह अनोखी हैट्रिक पूरी हुई। क्या अजीब नहीं लगता कि ऐसे मामलों पर कोई ठोस नियम लागू नहीं होते !        

इन सब के अलावा भी कई विवादित नियम हैं, जैसे फेक फिल्डिंग नियम ! बॉल को विकेट पर जाने से रोकने के लिए बैट का उपयोग क्योंकि एक बैट्समैन का मुख्य उद्देश्य अपना विकेट बचाना ही होता है ! टोपी, रुमाल भी विकेट पर गिर जाए तो आउट, इत्यादि, इत्यादि ! जिन्हें आज के समयानुसार बदले या सुधारने की  जरुरत है ! 

बुधवार, 26 मई 2021

चैनलिया घालमेल

देश में पहला प्राइवेट टीवी न्यूज चैनल ला खबरों को रोचक बनाने का श्रेय पूरी तौर से जाता है प्रणय रॉय को ! यही वो शख्स है जिसने भारत में होने वाले चुनावों और उनके परिणामों को टीवी पर सबसे पहले लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपार सफलता पाने के बाद इन्होंने 1988 में जिस NDTV नाम के अपने प्रोडक्शन हाउस की स्थापना की थी, वह अब एक बड़े मीडिया घराने में बदल गया है और इतना ताकतवर हो चुका है कि उसके उद्घोषक या संचालक बिना किसी हिचक या संकोच के सरकार, उसके सदस्यों, उसके वरिष्ठ प्रवक्ताओं की सरे-आम, दिन-रात छीछालेदर करने से बाज नहीं आते ! ऐसा क्यूँ ..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

भारत में टीवी का उद्भव, प्रयोगात्मक तौर पर ''टेलीविजन इंडिया'' के नाम से 1959 के सितम्बर महीने की 15 तारीख को हुआ था ! जिसे 1975 में ''दूरदर्शन'' का नाम दिया गया। बेहतरीन गुणवत्ता, जबरदस्त लोकप्रियता, लोगों के प्रेम व उत्सुकता के बावजूद इसका सही उपयोग नहीं हो पाया। कारण ! वही सरकारी नियंत्रण, लाल फीताशाही, अदूरदर्शी सरकारी हाकिम, बंधा-बंधाया रवैया और अनगिनत बदिशें ! जिन्होंने कभी इसे उबरने ही नहीं दिया ! इसीलिए दूरदर्शन को देश भर के शहरों तक पहुँचने और रंगीन होने में 21 साल लग गए ! फिर भी वह जैसा भी था, अच्छा था। सदा सरकारी नियंत्रण में रहने के बावजूद उसने विरोधी दलों और उनके नेताओं पर अनर्गल कुछ नहीं कहा। जो भी टिपण्णी होती थी, सब मर्यादित। भाषा का संयम सदा बरकरार। पर फिर एक सुनामी आई तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ! जिसके तहत तरह-तरह के चैनल उग आए ! जिन्होंने अपना अस्तित्व बनाए व बचाए रखने के लिए या अपने पर हुए अहसानों का बदला चुकाने के लिए किसी ना किसी छाते के नीचे शरण ले ली ! फिर ना कोई मर्यादा रही ! ना किसी का सम्मान ! ना हीं कोई गरिमा ! 

दूरदर्शन के समय में ही एक शख्स ने इस विधा की असीमित ताकत, क्षमता, पहुंच व सम्मोहिनी शक्ति को पहचाना और उसे एक अलग दिशा दे डाली। जिसकी बदौलत देश में पहले प्राइवेट टीवी न्यूज चैनल का पदार्पण हुआ। इसका श्रेय पूरी तौर से जाता है प्रणय रॉय को जिन्होंने दूरदर्शन की एक ही शैली-पद्यति-ढाँचे में ढली, दूरदर्शन की खबरों से बाहर निकल कर उन्हें रोचक बना ''वर्ल्ड दिस वीक'' और ''न्यूज टुनाइट'' के नाम से पेश करना शुरू किया। कहना ना होगा कि इस प्रयोग को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया। यही वो शख्स है जिसने भारत में होने वाले चुनावों और उनके परिणामों को टीवी पर सबसे पहले तथ्यों से परिपूर्ण, रोचक और लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपार सफलता पाने के बाद इन्होंने 1988 में जिस NDTV नाम के अपने प्रोडक्शन हाउस की स्थापना की थी, वह अब एक बड़े मीडिया हाउस में बदल चुका है और इतना ताकतवर हो चुका है कि उसके उद्घोषक या संचालक बिना किसी हिचक के सरकार, उसके सदस्यों, उसके वरिष्ठ प्रवक्ताओं की सरे-आम, दिन-रात छीछालेदर करने से बाज नहीं आते ! ऐसा कैसे और क्यूँ हो गया !

जाहिर है यह सब बिना किसी के संरक्षण के कतई संभव नहीं है ! इसके लिए जरा पीछे मुड़ कर देखने से ही सब साफ़ हो जाता है ! प्रणय रॉय की तत्कालीन सरकार से बहुत घनिष्टता थी। इसीलिए NDTV की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री के निवास से हुई थी और उसने अपना 25वां जन्मदिन राष्ट्रपति भवन में मनाया था ! इसी से प्रणय रॉय की पहुंच, उनकी साख, उनके दबदबे का अंदाजा लगाया जा सकता है। लाजिमी है कि जिसकी बदौलत इतनी इज्जत-शोहरत-कामयाबी-दौलत मिली हो उसका वफादार रहा जाए ! और यह वफादारी यह मीडिया हॉउस आँख बंद कर निभा रहा है !

यदि एक नजर इससे जुड़े लोगों पर डाल ली जाए तो बात और भी साफ़ हो जाती है ! शुरू से ही देखें तो प्रणय रॉय का विवाह, CPI(M) के पूर्व प्रमुख प्रकाश कारत की पत्नी वृंदा कारत की बहन राधिका रॉय के साथ हुआ है।  

प्रणय रॉय, अरुंधति रॉय के चचेरे भाई (cousin) हैं। प्रणय के बंगाली पिता ने क्रिश्चियन धर्म अपना कर एक आयरिश महिला से विवाह किया था और एक ब्रिटिश कंपनी में ही कार्यरत थे। 

NDTV में कार्यरत बरखा दत्त ने जम्मू-कश्मीर की पीडीपी पार्टी के सदस्य हसीब अहमद द्राबू के साथ दूसरा निकाह किया है जबकि उनकी पहली शादी भी कश्मीर के ही एक युवक मीर से हुई थी। 

NDTV की निधि राजदान जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला की बहुत ख़ास दोस्त हैं। 

NDTV की ही सोनिया सिंह की शादी, आरपीएन सिंह, जो कांग्रेस से जुड़े हैं और यूपीए के मंत्रिमंडल के सदस्य भी रह चुके हैं, के साथ हुई है !
 
राजदीप सरदेसाई, जो पहले NDTV में हुआ करते थे, का विवाह सागरिका घोष के साथ सम्पन्न हुआ है, जो पहले CNN में कार्यरत थीं ! ये वही सागरिका घोष हैं जिनके पिता भास्कर घोष को दूरदर्शन में कांग्रेस की सरकार द्वारा डायटेक्टर जनरल का पद दिया गया था ! जिन पर बाद में NDTV को आर्थिक लाभ पहुंचाने का इल्जाम भी लगा था ! जो उनके दामाद के मालिक की कंपनी थी !

NDTV ने उन विष्णु सोम को अपने यहां एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी, जिनके पिता हिमाचल सोम को कांग्रेस सरकार ने इटली का राजदूत बनाया था और जिनकी माताश्री रेबा सोम ने नेहरूजी और कांग्रेस की विरदावली में अनेक पुस्तकें लिख डाली थीं। 

इन सब के देखने-समझने के बाद NDTV  की कार्यप्रणाली या उसके उद्देश्य या उसकी विचारधारा के बारे में कुछ कहने-सुनने की जरुरत रह जाती है क्या  ? 

शनिवार, 22 मई 2021

उपनाम यानी सरनेम

जिस उपनाम को इंसान की सही शिनाख्त, उसकी सहूलियत, उसकी ठोस पहचान के लिए प्रयोग में लाया गया था ! समय के साथ उसी पर समाज को तोड़ने, उसे विभाजित करने, ऊँच-नीच में दरार, जाति-वर्ग की दिवार खड़ी करने का आरोप लगने लग गया ! आज मांग उठने लगी है कि अवाम अपने नाम के साथ लगने वाले उपनाम को खारिज कर दे ! उससे मुक्ति पा ले ! उसको अपने से दूर कर दे  ! जिससे समाज में समरसता आ सके...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक होता है नाम ! जो किसी भी व्यक्ति की प्रमुख पहचान होता है। दूसरा होता है उपनाम, किसी नाम के साथ जुड़ा वह शब्द जो उस नाम की जाति या किसी विशेषता को व्यक्त करता है। आज देश-विदेश में कहीं भी देखा जाए तो हर इंसान के नाम के साथ एक उपनाम, का होना आम बात हो गई है। इसकी जरुरत क्यों पड़ी ! यह भी जिज्ञासा का प्रश्न है ! इसका जवाब तो यही लगता है कि मनुष्यों की बढ़ती आबादी और उनका किसी भी कारण, कहीं भी होने वाला स्थानांतरण ही इसका मुख्य कारण होगा। क्योंकि जब जनसंख्या कम थी, तब लोगो की पहचान उनके नाम से या ज्यादा से ज्यादा पिता का नाम जोड़कर हो जाती थी। लेकिन जब आबादी बढ़ी और एक ही नाम के कई व्यक्ति होने लगे या फिर कोई इंसान अपनी जगह छोड़ किसी दूसरे स्थान पर जा कर रहने लगा तो सबकी अलग-अलग पहचान के लिए नाम को कुछ ख़ास बनाना जरुरी हो गया ! तब उपनाम की रचना हुई। जो आगे चल कर हमारी जाति, धर्म या समुदाय का भी प्रतिनिधित्व करने लगा।  

जिस उपनाम को इंसान की सही शिनाख्त, उसकी सहूलियत के लिए, उसकी ठोस पहचान के लिए बनाया गया था ! समय के साथ उसी पर समाज को तोड़ने, उसे विभाजित करने, ऊँच-नीच में दरार डालने, जाति-वर्ग की दिवार खड़ी करने का आरोप लगने लग गया 

दुनिया की तो छोड़ें ! आज हमारे देश में ही वंश, गोत्र , जातियों, उपजातियों, कर्मों, जगहों, पूर्वजों, उपाधियों और ना जाने किस-किस से जुड़े अनगिनत उपनाम चलन में हैं। जबकि हमारे ग्रंथों इत्यादि में नाम के साथ सिर्फ वंश का जुड़ा होना पाया जाता रहा है, जैसे सूर्यवंश, चन्द्रवंश या मौर्यवंश इत्यादि ! वैसे एक उपनाम (तखल्लुस) और भी होता है जिसे ज्यादातर कवि, शायर, लेखक या कलाकार अपनी रचनाओं में अपने नाम के साथ जोड़ लेते हैं ! पर इसमें आदमी की सही पहचान छिप जाती है ! कई बार तो यह असली नाम पर भी भारी पड़  जाता है।  

उपनामों की शुरुआत कब और कैसे हुई यह एक वृहद खोज का विषय है ! एक अंदाज सा लगाया जा सकता है कि जब समय के गुजरने के साथ ही इंसान को भी अपनी जीविका या अन्य उद्देश्यों के लिए दुनिया भर में स्थानांतरित होना पड़ता रहा होगा और काल-परिस्थियों-मजबूरियों से उसका कायाकल्प भी होता चला गया होगा ! ऐसे में उसे अपनी सही और ठोस पहचान बनाए रखने के लिए किसी विशेषण की जरुरत महसूस हुई होगी ! जिसके तहत विभिन्न विशेषताओं वाले उपनामों का प्रादुर्भाव हुआ होगा ! पर बढ़ती आबादी, अंतर्जातीय संबंधों, अलग-अलग परिवेशों, परिस्थियों या मजबूरियों से नाम-उपनाम भी बदलते चले गए होंगे। उनमें भी घाल-मेल हो गया होगा ! जिसके परिणाम स्वरूप आज कई उपनाम ऐसे मिलते हैं जो किसी भी मजहब के मानने वाले के हो सकते हैं, जैसे; पटेल, शाह, राठौर, राणा, सिंह इत्यादि ! 

पर जिस उपनाम को इंसान की सही शिनाख्त, उसकी सहूलियत के लिए, उसकी ठोस पहचान के लिए बनाया गया था ! समय के साथ उसी पर समाज को तोड़ने, उसे विभाजित करने, ऊँच-नीच में दरार डालने, जाति-वर्ग की दिवार खड़ी करने का आरोप लगने लग गया ! आज मांग उठने लगी है कि अवाम अपने नाम के साथ लगने वाले उपनाम को खारिज कर दे ! उससे मुक्ति पा ले ! उसको अपने से दूर कर दे ! जिससे एक समान समाज का निर्माण हो सके !   

बुधवार, 19 मई 2021

तैयार रहिए, हवा खरीदने के लिए

''24 दिसंबर 2015 की पोस्ट जो आज सही साबित हो रही है "

कुछ सालों पहले बोतल बंद पानी का चलन शुरू हुआ था, जो अब करोड़ों-अरबों का खेल बन चुका है। डरा-डरा कर पानी को दूध से भी मंहगा कर दिया गया है। वही खेल अब हवा को माध्यम बना खेला जाएगा। तरह-तरह की "जगहों" के नाम से हवा की बोतलों की कीमतें निर्धारित होंगी ! डरे और आशंकित लोग बिना सोचे-समझे-परखे, सेहत के नाम पर कुछ भी सूँघते नज़र आऐंगे। पानी में तो फिर भी बोतल में कुछ भरना पड़ता है, पर इसमें तो हरड़-फिटकरी के बिना ही तिजोरी भरने का मौका मिल जाएगा ! लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब बच्चों के बैग में पानी की बोतल के साथ ही हवा की बोतल भी दिखने लग जाएगी.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इंसान को प्रकृति ने पांच नेमतें मुफ्त में दे रखीं हैं। धरती, पानी, अग्नि, वायु और आकाश। जिनके बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं बचता। जैसी की कहावत है, माले मुफ्त दिले बेरहम, हमने इन पंचतत्वों की कदर तो की ही नहीं उलटा उनका बेरहमी से शोषण जरूर किया ! धरती का दोहन तो सदियों से हम करते आ रहे हैं, जिसकी अब अति हो चुकी है। दूसरा जल, यह जानते हुए भी कि इसके बिना जीवन नामुमकिन है, उसको जहर बना कर रख दिया गया है। बची थी हवा तो उसका हाल भी बेहाल होता जा रहा है। विडंबना यह है कि हालात को सुधारने के बजाए अभी भी हम अपने कुकर्मों से बाज नहीं आ रहे हैं !

खबर आ गयी है कि चीन में शुद्ध हवा को डिब्बों में भर कर बेचने का उपक्रम शुरू हो चुका है। वैसे जापान में बहुत पहले से आक्सीजन बूथ लग चुके हैं। पर उनमें और अब में फर्क है। तो अब लगता नहीं है कि हमारे "समझदार" रहनुमा शहरों पर छाई जानलेवा दूषित वायु को साफ़ करने के लिए कोई सख्त और सार्थक कदम उठाएंगे। क्योंकि निकट भविष्य में कौडियों को ठोस सोने में बदलने के मौके हाथ लगने वाले हैं। जिसे रसूखदार कभी भी हाथ से जाने नहीं देंगें। क्योंकि सब जानते हैं कि जरुरत हो न हो, अपने आप को आम जनता से अलग दिखलवाने की चाहत रखने वाले हमारे देश में भरे पड़े हैं। कुछ सालों पहले जब बोतल बंद पानी का चलन शुरू हुआ था तो घर-बाहर-होटल-रेस्त्रां में इस तरह का पानी पीना "स्टेटस सिंबल" बन गया था। जो अब करोड़ों-अरबों का खेल बन चुका है। डरा-डरा कर पानी को दूध से भी मंहगा कर दिया गया है। कारण भी है दूध की उपलब्धता सिमित है और हर एक के लिए आवश्यक भी नहीं है, इसलिए आमदनी की गुंजायश कम थी। पर पानी तो जीवन का पर्याय है और अथाह है। सिर्फ साफ़ बोतल और ढक्कन लगा होना चाहिए फिर कौन देखता है कि उसमें भरा गया द्रव्य कहां से लिया गया है। वही खेल अब हवा के माध्यम से खेला जाएगा। तरह-तरह की "जगहों" के नाम से हवा की बोतलों की कीमतें निर्धारित होंगी ! डरे और आशंकित लोग बिना सोचे-समझे-परखे सेहत के नाम पर कुछ भी सूँघते नज़र आऐंगे। पानी में तो फिर भी बोतल में कुछ भरना पड़ता है, पर इसमें तो हरड़-फिटकरी के बिना ही तिजोरी भरने का मौका मिल जाएगा ! लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब बच्चों के बैग में पानी की बोतल के साथ ही हवा की बोतल भी दिखने लग जाएगी।

बात है डर की ! इंसान की प्रजाति सदा से ही डरपोक या कहिए आशंकित रहती आई है। अब तो डर हमारी 'जींस' में पैबस्त हो चुका है। इसी भावना का फायदा उठाया जाता रहा है और उठाया जाता रहेगा। सुबह होते ही  विभिन्न मिडिया के डराने का व्यापार शुरू हो जाता है। अरे क्या खा रहे हो, यह खाओ और स्वस्थ रहो ! ओह हो ! क्या पी रहे हो इसमें जीवाणु हो सकते हैं ! ये डब्बे वाला पियो ! अरे, ये कैसा कपड़ा पहन लिया, ये पहनो ! आज जिम नहीं गए ! हमारे यंत्र घर में ही लगा लो ! ये बच्चों-लड़कियों जैसा क्या लगा लेते हो, अपनी चमड़ी का ख्याल रखो ! आज फलाने को याद किया, तुम्हारे ग्रह ढीले हैं! कल ढिमकाने के दर्शन जरूर करने हैं ! आज प्रदूषण की मात्रा जानलेवा है ! ऐसा करोगे तो वैसा हो जाएगा, वैसा करोगे तो ऐसा ही रह जाएगा। यानी जब तक आदमी सो नहीं जाता यह सब नाटक चलता ही रहता है। आज कल हवा से डराने का मौसम चल रहा है ! हो सकता है कि भविष्य में शुरू किए जाने या होने वाले व्यवसाय के लिए हवा बाँधी जा रही हो  !!! 

सोमवार, 17 मई 2021

एक था बुधिया, द मैराथन रनर

अब वह मैराथन दौडना तो दूर, अपने साथियों के बराबर भी नहीं दौड पाता। उसने नेशनल लेवल तो क्या कोई राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रतियोगिता भी नहीं जीती है। हालांकि दावे तो ओलम्पिक और मैराथन जीतने के हुआ करते थे ! बेवक्त, बेवजह का स्टारडम, ख्याति, परिवार की उसे दूसरों से अलग व विशेष बनाने की सनक, अति अपेक्षा और लालच के चलते, मैराथन दौडने वाला बुधिया, स्कूल स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में भी सामान्य  बच्चों से पिछडता चला गया....................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

याद है आपको, वह पांच साल का बच्चा, बुधिया ! जिसने ओडिसा में 2006 के मई महीने की तपती दोपहरी में लगातार सात घंटे दो मिनट दौड़ कर पुरी से भुवनेश्वर तक की 65 किलोमीटर की दूरी को नाप कर दुनिया का सबसे कम उम्र का मैराथन धावक बनने का गौरव हासिल कर, सब को आश्चर्यचकित कर रख दिया था ! जिसका उत्साहवर्धन करने और मनोबल बनाए रखने के लिए रिजर्व पुलिस बल के दो सौ जवान भी उसके साथ दौड़े थे। जो रातों-रात हर अखबार और टेलीविजन चैनल की सुर्खियों में छा दुनिया भर में मशहूर हो गया था ! जबकि उस समय उसकी उम्र चार वर्ष से कुछ ही ज्यादा थी ! इस हैरतंगेज कारनामे के लिए उसका नाम ''लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस" में  भी शामिल किया गया था। बुधिया ने महज 5 साल की उम्र में 48 मैराथन पूरे कर लिए थे ! नन्हें बुधिया के चर्चा में आते ही विभिन्न संस्थाओं ने उसके लिए ढेरों कोष बनाने की घोषणाएं भी की थीं। उसके नाम के साथ Budhiya Born to Run ! Budhiya the Wonder Boy जैसे तरह-तरह के विशेषण जुड़ने लग गए थे ! पर फिर क्या हुआ ? कहां गुम हो गया, वह नन्हा मैराथन धावक ?

 


बुधिया सिंह ! एक अत्यन्त गरीब परिवार का बेटा ! गरीबी इतनी कि दूसरों के घर काम करती, उसकी माँ सुकांति सिंह ने अपने इस बच्चे को सिर्फ आठ सौ रूपए में एक परिवार को बेच दिया ! पर फिर भाग्य को कुछ तरस आया और एक दिन खेलते हुए इस बच्चे पर दौड़ाक और जुडो कोच बिरंची दास की नजर पड़ी ! उन्होंने प्रतिभा को भांप लिया और बुधिया को गोद ले अपने निरक्षण में दौड़ने का प्रसिक्षण देने लगे। पर भाग्य का फेर ! बुधिया का कुछ नाम होते ही उसकी माँ ने, जिसने चंद रुपयों के लिए उसे बेच डाला था, कोच बिरंची दास पर ना केवल गलत व अनर्गल आरोप लगाये बल्कि बुधिया को बंधक बनाने तक के मुकदमे भी दर्ज करा दिए ! इसी तनातनी के बीच बिरंची दास की रहस्यमय तरीके से हत्या कर दी गई ! इसके साथ ही बुधिया के दुर्दिन फिर शुरू हो गए !

कोच बिरंची दास के साथ बुधिया 



हालांकि उसकी प्रतिभा के चलते सरकार ने उसे भुवनेश्वर के SAI होस्टल मे रख, लंबी दूरी का धावक बनाने का प्रयास विधिवत रूप से शुरू किया भी था ! मगर इस सब से उचाट बुधिया हाॅस्टल से ही भाग निकला ! अपनी माँ की महत्वाकांक्षा और लालच के चलते एक विलक्षण प्रतिभा का वो हश्र हुआ, जो नही होना चाहिये था ! यह एक कटु सत्य है कि जो बच्चे अपने बचपन में ही अनायास मिली ख्याति, प्रसिद्धि और स्टारडम का स्वाद चख लेते हैं, आगे चल कर असफलता उनकी नियति बन जाती है ! हमारे आस-पास ऐसे लाखों उदाहरण मौजूद हैं ! इसमें उन मूर्ख अभिभावकों का भी बहुत बड़ा हाथ  होता है जो अपने अधूरे सपनों को अपने मासूम बच्चों की मार्फ़त पूरा करने की भूल किए जाते हैं ! जिंदगी की दौड़ में अपने बच्चे के पिछड़ जाने के बेफिजूल डर से वे अपने बच्चों से उनका बचपन, मासूमियत, भोलापन छीन बेवजह पैसा लुटा उसे सफल बनाने पर तुले रहते हैं ! वे भूल जाते हैं कि पौधा प्राकृतिक रूप से ही बड़ा हो पेड़ बनता है ! ज्यादा खाद-पानी उसे नष्ट भी कर सकते हैं ! पर नहीं ! सबके सब अपने बच्चों को बिना उनकी लियाकत या रुझान जाने, नायक, गायक, खिलाड़ी बनाने पर आमादा रहते हैं ! एक अँधी दौड चल रही है ! एक छलावा भ्रमित किए हुए है ! यही बुधिया के साथ हुआ !

बुधिया सिंह, अब 
आज वो वंडर ब्वाॅय बुधिया सिंह जवान हो चुका है। उस पर एक फिल्म भी बन चुकी है ! पर अब वह मैराथन दौडना तो दूर, अपने साथियों के बराबर भी नहीं दौड पाता। उसने नेशनल लेवल तो क्या, कोई राज्य स्तरीय अथवा जिला स्तरीय प्रतियोगिता भी नहीं जीती है । हालांकि दावे तो ओलम्पिक और मैराथन जीतने के हुआ करते थे ! जबकि उसे हर सहूलियत, विधिवत प्रशिक्षण और सरकारी मदद भी मिली पर फिर भी वह जीवन मे कुछ खास नही कर पाया ! बेवक्त, बेवजह का स्टारडम, ख्याति, परिवार की अति अपेक्षा, उसे दूसरों से अलग व विशेष बनाने की सनक और लालच के चलते, मैराथन दौडने वाला बुधिया, स्कूल स्तर की प्रतिस्पर्धाओं मे भी सामान्य बच्चो से पिछडता चला गया । उसका कैरियर बनने से पहले ही ढह कर रह गया !
यह एक बानगी, एक चेतावनी, एक नसीहत भी है उन अभिभावकों के लिए, जो अपने अधूरे सपनों, अपनी ख्वाहिशों को मूर्त रूप  देने के लिए, वक्त से पहले ही अपने बच्चों को क्षणिक प्रसिद्धि और बिना मतलब की ख्याति दिलाने हेतु अपने बच्चों के भविष्य को अँधकारमय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते ! ऐसे अभिभावकों से इतना ही कहा जा सकता है कि वे अपने बच्चों को नैसर्गिक तौर पर ही खेलने-कूदने-बढ़ने-फलने-फूलने दें ! उनसे उनका बचपन ना छीने ! उनके कोमल कंधों पर अपनी आकंक्षाओं को ना लादें ! वे जो चाहते हैं, करने दें ! आप सिर्फ उनका हौसला बढ़ाइए ! मीडिया पर छाए, बेवकूफ बनाते विज्ञापनों, तरह-तरह के उटपटांग सीरियलों के झांसे में ना आ कर, उन्हें प्राकृतिक तौर पर सीखने-समझने का मौका दीजिए ! 

शनिवार, 15 मई 2021

बाबूजी मैं आपसे बहुत प्यार करता था, पर.......

मेरी जिंदगी भर एक ही कामना रही कि आपसे कह सकूँ कि बाबूजी मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ! पर कभी भी कह नहीं पाया ! जबकि आप अपने रुतबे को कभी घर नहीं लाए। सदा गंभीर रहते हुए भी सरल, निश्छल, प्रेमल बने रहे ! पर पता नहीं दोष किसका रहा ! मेरी झिझक का, मेरे संकोच का या आज से बिल्कुल विपरीत उस समय का जब पिता के सामने पड़ने के लिए भी काफी हिम्मत की जरुरत होती थी। सारे काम, जरूरतें, संवाद माँ के जरिए ही संपन्न होते थे.................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
बाबूजी सादर प्रणाम ! 14 मई, आपका जन्मदिन ! पर वर्षों तक ना कभी आपने बताया और ना हीं मनाया ! वह तो भला हो कनिष्ठा पूनम का, जिसने देर से ही सही इस दिशा में पहल की ! अलबत्ता अपना ना सही पर आपने दूसरों का मनाया और मनवाया भी ! पर उन लोगों ने भी कभी जरुरत नहीं समझी, सिर्फ शुभकामना देने तक की ! सिर्फ अपना मतलब सिद्ध करते रहे ! आप जान कर भी अनजान रहे ! कैसा समय हुआ करता था ! कितनी दूरी होती थी इस पीढ़ी के बीच ! प्यार-स्नेह-ममता-लगाव सब कुछ तो था ! पर जताया नहीं जाता था कभी, पता नहीं क्यूँ ? 
मेरी जिंदगी भर एक ही कामना रही कि आपसे कह सकूँ कि बाबूजी मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ! आप मेरे आदर्श है ! पर कभी भी कह नहीं पाया ! जबकि आप अपने रुतबे को कभी घर नहीं लाए। सदा गंभीर रहते हुए भी सरल, निश्छल, प्रेमल बने रहे ! पर पता नहीं दोष किसका रहा ! मेरी झिझक का, मेरे संकोच का या आज से बिल्कुल विपरीत उस समय का जब पिता के सामने पड़ने के लिए भी काफी हिम्मत की जरुरत होती थी। सारे काम, जरूरतें, संवाद माँ के जरिए ही संपन्न होते थे ! क्या आज की पीढ़ी सोच भी सकती है वैसे हालात के बारे में !  
जब एकांत में आपकी बेपनाह याद आती है ! जब आपसे एकतरफा बात करता हूँ ! तब लाख कोशिशों के बाद भी आँखें किसी भी तरह काबू में नहीं रहतीं 
हर बच्चे के लिए उसका पिता ही सर्वश्रेष्ठ व उसका आदर्श  होता है ! पर आप तो सबसे अलग थे ! मैंने जबसे होश संभाला तब से आपको अपनी नहीं सिर्फ दूसरों की फ़िक्र और उनकी बेहतरी में ही लीन देखा ! यहां तक कि छोटी सी उम्र से ही अपने पालकों को भी पालते रहे ता-उम्र आप ! अपने भाई बहन का तो बहुत से लोग जीवन संवारते हैं, पर आपने तो उनके साथ ही माँ के परिवार को भी सहारा दिया ! वह भी बिना किसी अपेक्षा के या कोई अहसान जताए या चेहरे पर शिकन लाए ! यह जानते हुए भी कि बहुत से लोग आपका अनुचित फ़ायदा उठा रहे हैं, आप अपने कर्तव्य पूर्ती में लगे रहे ! आखिर वह दिन भी आ ही गया जब आपको भी आराम की जरुरत महसूस होने लगी ! तब मतलब पूर्ती का स्रोत सूखता देख कइयों ने अपना पल्ला झाड़ रुख बदल लिया ! पर आप नहीं बदले ! जितना भी बन पड़ता था, दूसरों की सहायता करते रहे ! कहने-सुनाने को तो मेरे पास अनगिनत बातें हैं, इतनी कि पन्नों के ढेर लग जाएं पर स्मृतियाँ शेष ना हों !
जब भी पुरानी यादें मुखर होती हैं, तो बहुत से ऐसे वाकये भी याद आते हैं जब आप मुझसे नाराज हुए ! पर सही मायनों में बताऊँ तो आज तक समझ नहीं पाया कि जिस बात को मैं सोच भी नहीं सकता वैसा कैसे और क्यूँ हुआ ! सब गैर-इरादतन होता चला गया ! किसी दुष्ट ग्रह की वक्र दृष्टि और कुछ विघ्नसंतोषी लोगों का षड्यंत्र, कुछ का कुछ करवाता चला गया ! याद आता है तो बहुत दुःख और अजीब सा लगता है, अपने को सही साबित ना कर पाना और दूसरों के कुचक्र को ना तोड़ सकना ! पर जब कुछ-कुछ कोहरा छंटने लगा था तभी आप भी मुझे छोड़ गए !  

आज जब एकांत में आपकी बेपनाह याद आती है ! जब आपसे एकतरफा बात करता हूँ ! तब आँखें फिर किसी भी तरह काबू में नहीं रहतीं !  बाबूजी मैं (हम सब) आपसे बहुत प्यार करता था, हूँ और रहूंगा........! 

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...