pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

अब तो ! शठे शाठ्यं समाचरेत

जिस दिन सेना निकल आई, और अपनी पर आ गई तो सारी अकड़, सारी हेकड़ी, सारी उदंडता, सारी गुंडागर्दी, सारी बकवाद भुलवा दी जाएगी ! बहुत हो गया ! कुछ समय पश्चात कमजोरी, लाचारी और बेबसी के प्रतीक बने प्रेम, मनुहार, आग्रह, उपहार इत्यादि से निजात पा ही लेनी चाहिए ! उसके बाद तो ''शठे शाठ्यं समाचरेत'' की नीति का ही प्रयोग हितकारी रहता है ! फिर चाहे वह उद्देश्य पूर्ती के बीच बाधा बनता समुद्र हो, कटु वचनों का जहर उगलता शिशुपाल या फिर अपनी कलम को देश अहित के लिए उपयोग में लाता, खैरात पर पलता कोई भी ऐरा-गैरा ...............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कल एक अखबार में एक तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकार के ज्ञान बांटने की बारी थी। ये भला आदमी चाहे कितना भी अपनी निष्पक्षता का ढोल पीटे या बौद्धिकता का प्रदर्शन करे, इसकी प्रतिबद्धता, इसकी मानसिकता, इसकी स्वामिभक्ति किनके प्रति है ये कोई छिपी बात नहीं है ! ठीक है अपने उपकृत करने वालों को नहीं भूलना चाहिए पर उसके लिए सही को गलत या अच्छाई को नजरंदाज करना पत्रकारिता तो नहीं ही होती !

कल तक स्टेज पर खड़े हो जनता को बेवकूफ समझते, गलबहियां डालते, मन में प्र.मं. की कुर्सी को कब्जियाने की लालसा पाले दो दर्जन नेताओं की कारगुजारियों को सदा ही नजरंदाज करते इस जैसे कामगारों को अब कोरोना के चश्में से उन्हीं में फिर भविष्य के वैकल्पिक नेतृत्व की झलक दिखने लगी है ! यू.पी. में काम बड़े पैमाने पर हुआ है इसलिए उसको तो छिपाया नहीं जा सकता था, पर इसके शब्दों के खेल में यह पूरी कोशिश रही है कि किसी भी तरह मोदी उभर कर सबके ऊपर ना छा जाए ! राज्य सरकारों से केंद्र की दूरी बनाए रखने जैसी बेबुनियाद बात गढ़, मोदी को क्या- क्या करना चाहिए, इसकी समझाइश देते इस इंसान को शायद सपने में भी यह ख्याल नहीं आया होगा कि मोदी में रत्ती भर भी सत्ता की लालसा, अपने पूर्वगामियों की तरह होती तो इस दारुण संकट के समय का लाभ उठाते हुए वह कभी भी आपातकाल का सहारा ले तानाशाही लागू कर देता ! कोई मुश्किल आड़े नहीं आती, रोज दिखती जहालतों को काबू करने की कोशिशों में ! वे कूढ़ मगज भी निगलने और उगलने की स्थिति में होते, जिनके आकाओं ने अपने देशों के लाखों लोगों को विरोध करने के कारण देशनिकाला या नजरबंद कर डाला था ! विरोध के जहर से कुंद इनकी यादाश्त को तो यह भी याद नहीं आता कि पडोसी ने तंग आ कर अपने ही देश में मस्जिद पर सैनिक कार्यवाई कर दी थी। 

जो हुक्म मेरे आका ! ये चिरागी जिन्न आजकल पत्रकारों का रूप धर अपनी कलमों से क़यामत ढाते हैं ! पर इनकी कलमों की रोशनाई भी इस बात पर रोशनी डालने से परहेज कर गई, कि इस समय कोई भी अड़चन नहीं थी एक और ब्लूस्टार के उदित हो जाने देने में ! कौन रोकता ! उल्टे हैरान-परेशान अवाम साथ ही देती ! पर जिस तरह सरकार द्वारा अब तक नर्मी, धैर्य, व सहनशीलता का परिचय दिया गया है वह काबिले-तारीफ हो ना हो आश्चर्य का विषय जरूर है ! 

एक सवाल जो आज आम नागरिक को परेशान कर रहा है, कि एक साधारण आदमी का किसी पर थूकना या पत्थर उठाना तो दूर, यदि वह सड़क पर निकल भी जाए तो उसके तफरीह के भूत को पुलिस का डंडा झाड़ा लगा भगा देता है ! तो ये कौन लोग हैं. जिनको किसी का खौफ नहीं ! जिनको दूसरों की जान की परवाह नहीं ! जो देश समाज के दुश्मन बने हुए हैं ! सबसे बड़ी बात इनके पीछे कौन है जिसकी शह पर यह इतने बेखौफ हो दुनिया की पांचवीं सैन्य शक्ति की तरफ से बेखबर हो उत्पात मचा रहे हैं !

पर एक सच्चाई यह भी है कि कुछ लोग सिर्फ लातों की भाषा जानते हैं ! जिस दिन सेना निकल आई, और अपनी पर आ गई तो सारी अकड़, सारी हेकड़ी, सारी उदंडता, सारी गुंडागर्दी, सारी बकवाद भुलवा दी जाएगी ! बहुत हो गया ! ऐसा हो भी जाना चाहिए ! कुछ समय पश्चात कमजोरी, लाचारी और बेबसी के प्रतीक बने प्रेम, मनुहार, आग्रह, उपहार इत्यादि से निजात पा लेनी चाहिए ! उसके बाद तो ''शठे शाठ्यं समाचरेत'' की नीति का ही प्रयोग हितकारी रहता है, हर दृष्टि से ! फिर चाहे वह उद्देश्य पूर्ती के बीच बाधा बनता समुद्र हो, कटु वचनों का जहर उगलता शिशुपाल या फिर अपनी कलम को देश अहित के लिए उपयोग में लाता, खैरात पर पलता कोई भी ऐरा-गैरा !      

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

कोचीन, चाइनीज फिशिंग नेट, यात्रा का समापन,

क्रूज, जो कि एक बड़ा द्वितलीय बजरा ही था, में लंबे मोल-भाव के बाद सवारी साध ली गई। अंधेरा घिरने लगा था, इतने में बोट वाले ने गाने लगा दिए, कुछ देर तो सबने गीत-संगीत व सागर का आनंद लिया पर उसके बाद ''बुजुर्ग युवाओं'' का जोश नृत्य में बदल गया जिसमें उन्होंने अपने ग्रुप के अलावा अन्य सहयात्रियों को भी सम्मिलित कर लिया। घंटा-डेढ़ कब बीत गया पता ही नहीं चला.............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग     
जनकपुरी के #Retired_&_Senior_Citizens_Brotherhood (RSCB) के सौजन्य से 29 फरवरी से सात मार्च तक की केरल यात्रा का अंतिम चरण आ गया था। आज सुबह मुन्नार से चल कर कोचीन पहुंचना था, जहां से कल सात तारीख को सुबह साढ़े नौ बजे विस्तारा का विमान हमें वापस दिल्ली पहुंचाने वाला था। रोज की तरह सब निपटा कर अपनी बस ''रानी" में सवार हो, प्रभु का ध्यान कर हल्के-फुल्के माहौल में सब कोचीन की ओर रवाना हो गए ! माहौल मस्ती भरा जरूर था पर सभी के मन में कहीं ना कहीं इस खुशगवार, आनंदमयी, रोचक सफर के समापन का मलाल भी था ! पर जो भी चीज शुरू होती है उसका कभी ना कभी अंत भी होता ही है !
एशिया का सबसे बड़ा मॉल, लु लु 

कोचीन एयरपोर्ट 
इस बार यह तय पाया गया था कि होटल में ''चेक इन'' करने से पहले कोचीन दर्शन किया जाएगा ! यह शायद हमारे ट्रिप आयोजक #Riya_Travel की चूक थी कि उनको इस बात का ध्यान नहीं रहा कि शुक्रवार होने की वजह से सारे मुख्य चर्च और सिनागॉग बंद थे ! मायूसी होना लाजिमी था, कुछ गर्माहट भी आई इस लापरवाही पर, परंतु जल्दी ही सब नॉर्मल हो गया और कोचीन तट पर पुराने समय से प्रयोग में चले आ रहे मछलियां पकड़ने वाले जालों को देखने अग्रसर हो गए !


चाइनीज फिशिंग नेट - चीन से आई, मछली पकड़ने की यह तकनीक अपने आप में एक अजूबा सा ही है। जो चीन के अलावा सिर्फ कोचीन में ही प्रचलित है। इसे लिफ्ट नेट या कैंटीलिवर नेट के नाम से भी जाना जाता है ! ऐसा मानना है कि 1350 में कुबलाई खान के समय के सौदागरों के साथ यह विधि भारत आई थी। कुछ विद्वानों के अनुसार चीन के खोजकर्ता झेंग-हे ने इसे भारतवासियों से परिचित करवाया था ! चीन से जुड़े होने के कारण ही इसे मलयालम भाषा में चीनीवाला कहते हैं। विशाल झूले की तरह टंगे गोलाकार थैलेनुमा जाल को पानी में कुछ देर डुबो कर फिर ऊपर ले आते हैं, तब तक इसमें सैंकड़ों मछलियां फंस चुकी होती हैं। कोच्चि-फोर्ट के सागर तट पर लगे ऐसे अनेकों जाल आजकल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं। इसीलिए वहां के मछुआरे अपने जाल की कार्यप्रणाली दिखाने के पैसे वसूलने लग गए हैं।
कोच्चि डॉक यार्ड 


उस दिन गर्मी बहुत थी सो कुछ देर ठहर कर हम सब होटल आ गए। कुछ अपनी शॉपिंग का अंतिम डोज पूरा करने निकल गए और कुछ हम जैसे जिन्होंने अभी तक बैक वॉटर या झील में ही जलविहार किया था, वे पहुंच गए कोचीन सागर तट ! क्रूज, जो कि बड़ा द्वितलीय बजरानुमा ही था, में लंबा मोल-भाव कर सवारी साध ली गई। अंधेरा घिरने लगा था, इतने में बोट वाले ने गाने लगा दिए, कुछ देर तो सबने गीत-संगीत व सागर का आनंद लिया पर उसके बाद ''बुजुर्ग युवाओं'' का जोश नृत्य में बदल गया जिसमें उन्होंने अपने ग्रुप के अलावा अन्य सहयात्रियों को भी सम्मिलित कर लिया। घंटा-डेढ़ कब बीत गया पता ही नहीं चला। निश्चित जगह सब मिल कर होटल लौट आए ! दूसरे दिन दोपहर एयर पोर्ट पर मिलते रहने का वादा कर,सुखद यादों और भरे मन से सब अपने-अपने घरौंदों को हो लिए। 
क्रूज पर 
क्रूज से 

मिसेज वालिया 
इस सफर में एक से एक उम्दा, नेक, खुशदिल, हिम्मती और उम्र के इस पड़ाव पर भी बुलंद हौसले वाले इंसानों से मिलने का सुयोग प्राप्त हुआ ! पर सबसे ज्यादा किसी ने मुझे ही नहीं, सबको प्रभावित किया वह हैं  वालिया ! बैंक से अवकाश प्राप्त इस महिला की जीजीविषा अनुकरणीय है ! हालांकि उनका जिस्म उनको पूरी आजादी नहीं देता खुल कर चलने की फिर भी पूरी यात्रा में उनका जोश, उनकी जिज्ञासा, उनका कौतुहल किसी से भी किसी मायने में कम नहीं ! नाहीं उनकी वजह से यात्रा की निर्धारित रूप-रेखा में कोई व्यवधान आया ! इस मिलनसार, हंसमुख, जिंदादिल महिला के लिए हैट्स ऑफ ! वे सदा ऐसी ही स्वस्थ और प्रसन्न रहें ! उनके साथ ही सभी हमसफ़रों को भी शुभकामनाएं ! सभी स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें ! सबसे जल्द मिलना हो इसी कामना के साथ समय आ गया है विदा लेने का, गुड़बाय कहने का........सायोनारा, सी यू अगेन ! 

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

महाभारत युद्ध के दौरान भोजन व्यवस्था संभाली थी उडुपी नरेश ने

युद्धोपरांत उडुपी नरेश को श्री कृष्ण जी ने गले लगा आशीर्वाद दिया कि जिस तरह तुमने 18 दिनों तक, बिना किसी लाभ की कामना के, अथक परिश्रम कर लाखों लोगों की क्षुधा शांत कर मानव जाति की सहायता की है, उसी तरह तुम्हारे वंशज  आदि काल तक लोगों को भोजन प्राप्त करवाते रहेंगे और उसके लिए तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को सदा आदर-सम्मान और यश मिलता रहेगा ! यही कारण है कि हजारों वर्षों के पश्चात आज भी पूरे देश में भोजन के क्षेत्र में उडुपी के नाम को श्रेष्ठ, विश्वसनीय और  सर्वोपरि माना जाता है.....................!

#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारी पौराणिक कथाओं-कहानियों का असर अत्यंत प्रेरक और व्यापक होता है ! उसके मुख्य किरदार और कथावस्तु इतने प्रभावोत्पक होते हैं कि उसमें खोया हुआ या लीन श्रोता या पाठक विषयवस्तु से अलग कुछ सोच ही नहीं पाता। इससे दसियों ऐसी महत्वपूर्ण बातें अनदेखी रह जाती हैं, जिनका वर्णन कथा में किसी कारणवश नहीं हो पाया होता है। ऐसी ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात महाभारत से है !  

ज्ञातव्य है कि महाभारत युद्ध में दोनों पक्षों की सेनाओं की संख्या 18 अक्षौहिणी थी। भारतीय गणना के अनुसार प्राचीन भारत में सेना की सबसे बड़ी इकाई ! जिसके अनुसार एक अक्षौहिणि की इकाई में 21870 रथ जिनमें चार घोड़े, सारथि व रथी होता था ! इसमें हाथियों की संख्या 21870 निर्धारित थी, एक हाथी पर महावत, उसका सहायक, योद्धा व उसके दो सहायक यानि पांच लोग होते थे ! 65610 घुड़सवारों के अलावा 109350 पैदल सैनिकों का दस्ता होता था। इस प्रकार एकअक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों की संख्या 634243 के करीब बैठती है। इस हिसाब से महाभारत में सम्मिलित होने वालों की संख्या 11416374 तक जा पहुंचती है जिसमें मनुष्यों की संख्या 55 से 56 लाख होती है। 

बहुत से लोगों की इस संख्या पर भृकुटि तनना स्वाभाविक है पर उनके लिए प्राचीन इतिहास में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज की भारत यात्रा में वर्णित सम्राट चन्द्रगुप्त की सेना के वर्णन को जान लेना चाहिए। जिसमें 30000 रथों, 9000 हाथियों और 600000 पैदल सैनिकों का उल्लेख किया गया है जो भारत के सिर्फ एक राज्य की सेना की संख्या है। समस्त भारत के राज्यों की सेना का हिसाब लगाया जाए तो एक विशाल आकार सामने आ जाता है। इसलिए महाभारत में एकत्रित हुई उतनी विशाल सेना का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं लगती, जिसमें सम्पूर्ण भारत के अलावा अनेक दूसरे देशों के राजाओं ने भी भाग लिया था ! 

पर इसके साथ ही एक जिज्ञासा यह उठती है, जिसका जिक्र आम नहीं मिलता कि सागर समान इतने लोगों के जमावड़े के भोजन की व्यवस्था कैसे होती होगी। सुबह युद्ध पर जाने के पहले और शाम को थके-हारे सैनिकों के आहार की व्यवस्था और मात्रा का आकलन कैसे और कौन करता होगा ! यह एक जटिल प्रश्न बन कर उभरता है। इसके लिए यदि महाभारत की उपकथाओं को खंगाला जाए तो एक किंवदंती सामने आती है, जिसमें उडुपी नरेश के नाम का उल्लेख मिलता है। उडुपी के कृष्ण मंदिर में इस कथा का सदा पाठ होता है। 

कथा के अनुसार उस समय शायद ही कोई ऐसा राज्य रहा होगा जिसने इस महायुद्ध में भाग ना लिया हो। उस समय भारतवर्ष  के समस्त राजा दोनों पक्षों में से किसी ना किसी के साथ खड़े दिखते थे। इसी के अनुसार जब  दूरदर्शी उडुपीराज अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुंचे तो उन्होंने सर्वप्रथम श्रीकृष्ण से भेंट कर उनसे अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि प्रभु यहां सब युद्ध के लिए उतावले हैं, पर इन असंख्य लोगों के भोजन के प्रबंध के बारे में आपको छोड़ शायद ही किसी ने सोचा हो ! हे वासुदेव ! सत्य तो यह है कि मैं भाइयों के इस आपसी युद्ध को उचित नहीं समझता इसीलिए इस युद्ध में भाग लेने की मेरी इच्छा कतई नहीं है। पर यह युद्ध टाला भी नहीं जा सकता ! इसी कारण यदि आप अनुमति दें तो मैं चाहता हूँ कि अपनी पूरी सेना के सहयोग से यहां उपस्थित सभी के लिए मैं भोजन का प्रबंध करूं ! श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए सहर्ष उनकी बात मान सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी। 

उडुपी नरेश की कुशलता के कारण, रोज सैकड़ों-हजारों सैनिकों की मृत्यु के बावजूद कभी भी अन्न का एक भी दाना बर्बाद नहीं होता था। उतना ही भोजन बनता था जितने की जरुरत होती थी ! इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध बिना अन्न की क्षति के बगैर घोर करना किसी चमत्कार से काम नहीं था ! सभी के लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी। इसीलिए युद्धोपरांत अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए जब युधिष्ठिर ने इस रहस्य को जानना चाहा तो उडुपी नरेश ने श्रद्धापूर्वक इसका सारा श्रेय श्रीकृष्ण के प्रताप और उनके मार्गदर्शन को दिया जिसके बिना इतना बड़ा आयोजन कतई संभव नहीं था। ऐसा सुन कर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो प्रभु के प्रति नतमस्तक हो गए।

युद्धोपरांत जब उडुपी नरेश वापस जाने के अनुमति लेने श्री कृष्ण जी के पास गए तो उन्होंने उन्हें गले लगा आशीर्वाद दिया कि जिस तरह तुमने 18 दिनों तक, बिना किसी लाभ की कामना के अथक परिश्रम कर, बिना शस्त्र उठाए युद्ध में अपना सहयोग दे, लाखों लोगों की क्षुधा शांत कर मानव जाति की सहायता है, उसी तरह तुम्हारे वंशज आदिकाल तक लोगों को भोजन प्राप्त करवाते रहेंगे और उसके लिए तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को सदा आदर-सम्मान और यश मिलता रहेगा ! यही कारण है कि हजारों वर्षों के पश्चात आज भी पूरे देश में भोजन के क्षेत्र में उडुपी के नाम को श्रेष्ठ, विश्वसनीय और सर्वोपरि माना जाता है।

संदर्भ - महाभारत व अंतरजाल 

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

काश ! कोरोना संकट के बाद भी पर्यावरण साफ़ और स्वच्छ रह पाता

आज निरभ्र, धूम्र, धूर रहित गगन !नब्बे से ऊपर शहरों में स्वच्छ व संतोषजनक होती वायु ! चमकीली पहाड़ों जैसी धूप ! निर्मल होता नदियों का जल ! उनमें बढ़ती मछलियों की तादाद ! 36 मॉनिटरिंग  स्थलों में से 28 की रिपोर्ट के अनुसार नहाने योग्य साफ़ होता गंगा का पानी ! हिंडन और यमुना जैसी सबसे प्रदूषित नदियों की गुणवत्ता में आता सुधार ! सागर तट के करीब डॉल्फिन, जो सिर्फ साफ़ पानी में ही रहती है, की उपस्थिति ! कालिमा रहित पेड़ों की हरीतिमा ! अक्सर मुरझाए रहने वाले गमलों पर आती रौनक ! उन पर मंडराते भौंरे-तितलियां-शलभ ! कबूतरों के अलावा अब तोते, गौरैया, कौवे, तोते, चील, मैना, टिटहरी जैसे अन्य पंक्षियों की संख्या में इजाफा ! इन दिनों प्रकृति और पर्यावरण में आए साफ़ और शुद्ध वातावरण के द्योतक हैं ! काश, संकट के बाद भी यह बदलाव चिरस्थाई रह पाता  ! वैसे संकेत सीधा और साफ़ है कि कायनात सिर्फ मानव को सबक सिखाना चाहती है....................!                                                                   

#हिन्दी_ब्लागिंग   
नीला, निरभ्र, धूम्र-धूल रहित आकाश ! पहाड़ों जैसी चमकीली धूप ! लगातार स्वच्छ होती हवा ! निर्मल होता नदियों का पानी ! सागर जल में आती सवच्छता ! धूल-मिट्टी-कालीमा मुक्त पेड़ों के हरे-भरे पत्ते, पेड़ की शाखाओं में एकाधिक प्रजाति के पक्षी, घरों के गमलों में कीट रहित पौधे और फूल, उनपर मंडराते भौंरे-तितलियां-शलभ ! ये सारे परिवर्तन कोरोना के संकट के दौरान उठाए गए सुरक्षात्मक कदमों का सकारात्मक परिणाम हैं। जो इन दिनों प्रकृति और पर्यावरण में आए साफ़ और शुद्ध वातावरण के द्योतक पर देश-दुनिया पर छाए विकट संकट का दूसरा पहलू है !
अब और तब, चित्र अंतरजाल से 
हर चीज की हद होती है ! प्रकृति ने भी एक सीमा तक हमारी ज्यादितियों को सहन किया  ! बीच-बीच में बार-बार चेतावनी देने पर भी जब हम बाज नहीं आए और हमारी बेवकूफियों के कारण धरती के दूसरे वाशिंदों की जान पर बन आई तो उसने धीरे से अपनी करवट बदली। जिसका खामियाजा आज सारा संसार भुगत रहा है। यह शायद पहली बार हुआ है कि प्रकृति की नाराजगी सारी दुनिया को भोगनी पड़ रही है ! अपने को ही भगवान समझ लेने वाले इंसान की औकात आज किसी कीड़े-मकौड़े से ज्यादा नहीं रह गई है ! जबकि अन्य जीव-जंतुओं पर इसका असर नहीं पड़ा है ! संकेत सीधा और साफ़ है कि कायनात सिर्फ मानव को सबक सिखाना चाहती है !
सांस लेते पत्ते 
एक तरह से खुद ही पैदा की गई इस आपदा के खौफ के कारण आज दुनिया भर में इंसान को चूहे की तरह अपने घरों में दुबकना पड़ गया है। पर उसके इस तरह भयजदा हो, निष्क्रिय पड़े रहने का भी कुछ लाभ तो हुआ ही है। जैसे हर चीज के दो पहलू होते हैं, उसी तरह इस आपदा के भी दो पक्ष नजर आ रहे हैं ! मुसीबत, परेशानी, खौफ जिनका प्रतिशत भी बहुत ज्यादा है, भले ही अपनी जगह हों, पर इसकी कुछ अच्छाइयां, भले ही कम और कुछ समय के लिए ही हों, भी सामने आने लगी हैं। 
पता नहीं पहले कब देखा था ऐसा आकाश 
दिल्ली की ही बात करें तो बरसात के कुछ दिनों को छोड़ शायद ही आसमान का असली रंग कभी किसी को दिखाई देता हो ! बच्चे तो सिर्फ किताबों में ही उसके नीले रंग के बारे में जान पाते रहे हैं ! पर इधर वह अपने असली रंग के साथ रोज ही रूबरू हो रहा है। सुबह से शाम तक निरभ्र तथा रात को तारों से सजी चदरिया को सर पर तने देखने का आनंद वर्षों बाद दिल्ली वासियों को नसीब हुआ है। प्रदूषित पर्यावरण के कारण यहां की हवा तो कभी भी सांस लेने लायक होती ही नहीं ! पर आज खुल कर गहरी सांस ले उसे फेफड़ों में भरते घबड़ाहट नहीं होती। हवा का प्रदूषण कम होने का ही फल है कि करीब चालीस साल के बाद डेढ़ सौ की.मी. दूर धौलाधार की पहाड़ियां जालंधर शहर से नजर आने लगी हैं ! 
जालंधर से नजर आने लगीं धौलाधार के बर्फीले शिखर 
पेड़ तो दिल्ली में बेशुमार हैं पर उनकी हालत पर सदा तरस आता रहता था, पत्तियों में हरापन तो दिखलाई ही नहीं पड़ता था ! सदा उन पर धूएं-धूल-मिटटी की काली परत चढ़ी रहती थी, पौधों का सांस लेना दूभर था ! पर पिछले कुछ दिनों से उनकी हरीतिमा मन मोह ले रही है। चहूँ ओर हरियालो परिलक्षित होने लगी है। उसका असर पश्क्षियों पर भी पड़ा दिखता है ! पहले जहां कालोनी में सिर्फ कबूतर नजर आते थे वहीं अब उनके अलावा तोते, गौरैया, कौवे, चील, मैना, टिटहरी के साथ-साथ और भी एक-दो प्रजाति के पंछी उड़ान भरते दिखते हैं। घरों में गमलों में लगे नाजुक पौधे जो अक्सर बीमार व मुरझाए से रहते थे अब उन पर भी रौनक बरकरार रहने लगी है। इसी कारण अब उन पर भौंरे-तितलियां-शलभ आदि अक्सर मंडराते दिखते हैं, जो कि साफ़ और शुद्ध वातावरण का द्योतक है।
कीट रहित तुलसी 
पर कड़वी सच्चाई यही है कि यह सब ज्यादा दिन तक नहीं रहने वाला ! जैसे ही बिमारी-महामारी का भय दूर होगा, आपदा-विपदा दूर होंगी, हम श्मशान बैराग की तरह सब भूल अपनी उसी औकात पर वापस आ जाएंगे। क्योंकि हम आदतों से बाज न आ अपनी भूलों से कभी सीख नहीं लेते पर उन्हें दोहराते जरूर हैं ! इस बात के लिए किसी गवाही की जरुरत है क्या ?  

मंगलवार, 31 मार्च 2020

यहां सपत्नीक पूजे जाते हैं हनुमान

राम-रावण युद्ध के समय निर्णायक भूमिका निभाने वालीं, नौ अति दिव्य शक्तियों की प्राप्ति के लिए हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। सूर्य देव ने भी भविष्य को देखते हुए अपने इस बेहद प्रतिभाशाली शिष्य को उन दिव्य नौ विद्याओं का ज्ञान देने का संकल्प कर लिया था । पर पांच विद्याएं देने के बाद उनके समक्ष एक संकट आ खड़ा हुआ ! क्योंकि शेष चार विद्याएं उसी पात्र को दी जा सकती थीं जो विवाहित हो ! क्योंकि उन दिव्य शक्तियों के तेज को वहन करना किसी अकेले के बस की बात नहीं थी ¡ पर हनुमान जी ठहरे बाल ब्रह्मचारी................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
रामायण, निर्वादित रूप से देश का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ ! जिसकी लोकप्रियता सागर लांघ विदेशों तक फ़ैल गयी ! जिसका अनेकों विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ ! संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण के अलावा जिसको कई-कई विद्वानों ने अपनी भाषा में अपनी सोच और श्रद्धा के अनुसार लिखा ! इसी कारण समय-काल-परिवेश के अनुसार मुख्य कथा के साथ ना जाने कितनी उपकथाएं फिर उनकी उपकथाएं जुड़ती चली गयीं। यही कारण है कि हमें यदा-कदा मुख्य किरदारों से जुड़े कुछ अलग से आख्यान अपनी  निशानियों सहित देखने-पढ़ने को मिल जाते हैं।
रामायण में श्री राम के बाद सबसे लोकप्रिय, पूजनीय और आदरणीय पात्र हनुमान जी का है। उनके बारे में निर्विवाद धारणा यही है कि उन्होंने कभी विवाह नहीं किया। वे सदा ब्रह्मचारी ही रहे ! इसलिए उनकी पूजा भी इस बात को ध्यान में रखकर की जाती है।हालांकि राम-रावण युद्ध के दौरान एक जगह उनके पुत्र मकरध्वज का नाम आता जरूर है पर उनके विवाह का जिक्र नहीं मिलता। परंतु कुछ कथाओं में उनके विवाह का जिक्र मिलता है ! ऐसी ही एक जगह है खम्मम ! तेलंगाना में हैदराबाद से करीब सवा दो सौ की.मी. की दूरी पर स्थित इस जिले के एक प्राचीन मंदिर में हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी सुवर्चला की प्रतिमा भी स्थापित है ! यहां भक्त पूरी श्रद्धा के साथ दोनों की पूजा करते हैं। 
पाराशर संहिता में हनुमान जी के विवाह का जिक्र मिलता है ! जिसके अनुसार हनुमान जी ने नौ अति दिव्य विद्याओं की प्राप्ति के लिए सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। ये नौ विद्याएं आने वाले समय में राम-रावण युद्ध के समय निर्णायक भूमिका निभाने वालीं थीं।सूर्य देव ने भविष्य को देखते हुए अपने इस बेहद प्रतिभाशाली शिष्य को उन दिव्य नौ विद्याओं का ज्ञान देने का संकल्प कर लिया था। पर पांच विद्याएं देने के बाद उनके समक्ष एक संकट आ खड़ा हुआ ! क्योंकि शेष चार विद्याएं उसी पात्र को दी जा सकती थीं जो विवाहित हो ! क्योंकि उन दिव्य विद्याओं के तेज को वहन करना किसी अकेले के बस की बात नहीं थी। सूर्य देव ने हनुमान जी को बताया कि मेरी मानस पुत्री सुवर्चला परम तपस्वी और तेजस्वी है उसका तेज तुम ही सहन कर सकते हो, और उससे विवाहोपरांत तुम दोनों उन चार विद्याओं के तेज को संभाल पाओगे ! उससे विवाह के बाद तुम इस योग्य हो जाओगे कि शेष 4 दिव्य विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर सको। इसके अलावा और कोई उपाय उन विद्याओं को हासिल करने का नहीं है ! अब हनुमान जी भी धर्म संकट में पड़ गए, क्योंकि वो सूर्य देव से विद्याएं लेना तो चाहते थे, लेकिन साथ ही वो ब्रह्मचारी भी बने रहना चाहते थे। तब सूर्य देव ने उन्हें समझाया कि विवाह होते ही सुवर्चला तपस्या में लीन हो जाएगी। इससे तुम्हारे संकल्प पर कोई आंच भी नहीं आएगी और तुम्हें सारी विद्याएं भी प्राप्त हो जाएंगी। यह सुन काफी सोच-विचार के बाद आखिर हनुमान जी विवाह के लिए मान गए। उनकी रजामंदी मिलने पर सूर्य देव ने अपने तेज से सुवर्चला का आह्वान किया और इस तरह हनुमान जी का विवाह सम्पन्न हुआ और उन्होंने अपना ब्रह्मचर्य अटूट रखते हुए उन दिव्य शक्तियों को हासिल किया। 
तेलंगाना के खम्मम जिले में बना यह पुराना मंदिर सालों से लोगों का आकर्षण का केंद्र रहा है। शेष भारत में रहने वाले लोगों के लिए यह जगह किसी आश्चर्य से कम नहीं है क्योंकि उधर लोगों का विश्वास इस बात में ज्यादा है कि हनुमान जी ब्रह्मचारी थे ! पर स्थानीय लोग ज्येष्ठ शुद्ध दशमी, भारतीय पंचांग के अनुसार तृतीय माह की दसवीं तिथि, को हनुमान जी के विवाह के रूप में मनाते हैं। इस मंदिर से जुड़ी मान्‍यता के अनुसार जो भी हनुमानजी और उनकी पत्नी के यहां आ कर दर्शन करता है, उन भक्तों के वैवाहिक जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं और पति-पत्नी के बीच प्रेम बना रहता है।      

शनिवार, 28 मार्च 2020

केरल का नंदनकानन, यात्रा मुन्नार की

मुन्नार का अर्थ होता है, तीन नदियों का संगम, केरल के इडुक्‍की जिले में स्थित है। हिमाचल के शिमला की तरह यह भी अंग्रेजों का ग्रीष्म कालीन रेजॉर्ट हुआ करता था। इसकी हरी-भरी वादियां, विस्तृत भू-भाग में फैले चाय के ढलवां बागान, सुहावना मौसम इसे स्वर्ग जैसा रूप प्रदान करते हैं। हमारी इस यात्रा की यह खासियत थी कि इसमें सम्मिलित लोगों को समुंद्र, मैदान और पहाड़, प्रकृति के इन तीन रूपों को देखने का अवसर समय के कुछ ही अंतराल में प्राप्त हो गया था .....!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देखते-देखते 29 फरवरी को सुबह सात बजे की विस्तारा की फ्लाइट से शुरू हुई आठ दिवसीय केरल की यात्रा का पांचवां दिन कब आ पहुंचा पता ही नहीं चला ! आज हमें पेरियार से 90 की.मी. दूर, सागर तल से करीब 5900 फिट की ऊंचाई पर बसे, दक्षिण के एकमात्र पहाड़ी इलाके के शहर मुन्नार पहुंचना था। सो सुबह सारे जरुरी कार्यों को निपटा, आठ बजते-बजते बस में बैठ, सदा की तरह परंपरानुसार प्रभु का स्मरण कर यात्रा के अगले चरण की ओर बढ़ लिया गया। इस यात्रा की खासियत यह थी कि इसमें सम्मिलित लोगों को समुंद्र, मैदान और पहाड़, प्रकृति के इस तीन रूपों को देखने का सुअवसर समय के कुछ ही अनिराल में प्राप्त हो गया था !              




टाटा चाय संग्रहालय के सामने 
मुन्नार केरल के इडुक्की जिले में स्थित है। हिमाचल के शिमला की तरह यह भी अंग्रेजों का ग्रीष्म कालीन रेजॉर्ट हुआ करता था। इसकी हरी-भरी वादियां, विस्तृत भू-भाग में फैले चाय के मनमोहक ढलवां बागान, सुहावना मौसम इसे स्वर्ग सा रूप प्रदान करते हैं। मुन्नार एक मलयालम शब्द है'; जिसका अर्थ होता है, तीन नदियों का संगम ! जो यहां की तीन नदियों मधुरपुजहा, नल्लाथन्नी और कुंडली के संगम के कारण पड़ा है।   


संग्रहालय 


चाय प्रसंस्करण, पुराने तरीके से  


पुराने उपकरण 




सूर्यास्त 
हालांकि हमें सौ की.मी. से कम दूरी ही तय करनी थी, पर पहाड़ी रास्ते की वजह से काफी समय लग गया। रास्ते में ही टाटा ग्रुप के नलथन्नी टी इस्टेट संग्रहालय को देखने के लिए रुके। इसकी स्थापना चाय उत्पादन के लिए टाटा ग्रुप द्वारा 1880 में की गई थी। आज भी यहां इतिहास को ज़िंदा रखने के लिए पुराने तरीके से ही चाय का प्रसंस्करण किया जाता है। एक छोटे से संग्रहालय में संजो कर रखी गई पुराने समय से जुड़ी निशानियों, उपकरणों तथा तस्वीरों और आधे घंटे के एक सिनेमा शो द्वारा शुरुआत में सामने आई कठिनाइयों, मुश्किल परिस्थियों, दिक्कतों को बताया जाता है। इसके साथ ही उस समय की टी प्रोसेसिंग ईकाई में चाय बनने की पूरी प्रक्रिया को दिखाया और समझाया जाता है। यहीं पर उनके द्वारा चालित टी शॉप में अपनी नॉर्मल टी दस रूपए में, ग्रीन टी बीस और व्हाइट टी पचास रूपए में उपलब्ध थी, हमने 'अपनी' चाय ली और फिर होटल की ओर बढ़ लिए। कुछ देर पहले ही रिम-झिम हो चुकी थी। मौसम खुशहाल था ! होटल का परिवेश भी मनोनुकूल होने और कुछ-कुछ थकान के एहसास के कारण ज्यादातर लोग वहीं सिमट गए। जिनके मनोरंजन के लिए होटल में ही तंबोला का प्रावधान था। पांच-सात लोगों ने बाहर टहलने को तवज्जो दी। 
कुण्डला झील 






झील परिसर 




होटल में 
दूसरे दिन सुबह सदल-बल मुन्नार से 20 की.मी. की दूरी पर स्थित कुण्डला झील पहुंचे। यह झील पर्वत शृंखलाओं के बीच बने बांध के कारण निर्मित, एक कृत्रिम जलाशय है। बस की पार्किंग से परिसर में प्रवेश करने पर करीब पचास फिट की उतराई के बाद जलाशय तक पहुंचना हो पाता है। परिसर बेहद साफ़-सुथरा और अति सुंदर फूलों से आच्छादित होने के कारण मन मोह लेता है। वहीं महिलाओं और बच्चों के वस्त्रों और अन्य सजावटी सामानों को उचित मूल्य पर उपलब्ध करवाने वाला एक आउटलेट भी है, जहां खरीदारी करना स्वाभाविक हो जाता है। नीचे जलाशय में स्पीड बोट और बड़ी बजरेनुमा नौका द्वारा जलविहार की सुविधा का प्रावधान भी है, जो कि यहां का मुख्य आकर्षण है। अब जब आए ही थे तो उसका अनुभव उठाना तो बनता ही था। सो घूम-फिर, जेब हल्की करवाने के बाद ही ईको प्वाइंट देखने का मुहूर्त बन पाया !  







ईको प्वाइंट 


मुन्नार से पंद्रह की.मी. के फैसले पर नदी के किनारे ढलान पर खड़े हो कर जोर से आवाज लगाने पर सामने घने जंगल से परावर्तित हो लौटती ध्वनि को सुनना, एक अलहदा ही अनुभव प्रदान करता है। हमारे पहुंचने पर हवा की दिशा जंगल से हमारी ओर होने के कारण प्रतिध्वनि उत्पन्न नहीं हो रही थी पर कुछ देर बाद सुनना संभव हो गया था। यहीं प्रोफेशनल लोगों से फोटो भी खिंचवा, नारियल पानी से गला तर करने बाद वापसी हुई। होटल के पहले पड़ते बाजार से स्थानीय मसालों को खरीदने का लोभ संवरण कर पाना, वह भी दुनिया के मसालों के सबसे बड़े केंद्र केरल में, मुश्किल था ! सो कुछ अनिक्षुक लोगों को बस से होटल, जो बाजार के नजदीक ही था, भेज ज्यादातर लोग अपने शॉपिंग के शौक को पूरा करने में जुट गए। रात हंसी-ख़ुशी, मस्ती-मजाक में गुजरी। दूसरे दिन यात्रा का अंतिम पड़ाव था, कोचीन। जहां से एक दिन बाद वापस दिल्ली के लिए लौटने की हवाई यात्रा मुकर्रर थी।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

लायर बर्ड, संसार के सबसे सुंदर पक्षियों में से एक

नक़ल के हुनर में पारांगत लायर बर्ड के नर की सोलह हिस्सों वाली बेहद लंबी और बहुत ही  खूबसूरत पूंछ होती है। जिसके फैलाए जाने पर उसका आकार वाद्ययंत्र वीणा की तरह का हो जाता है। इसके शरीर का रंग तकरीबन भूरा तथा गले का कुछ लालिमा लिए हुए होता है।स्वभाव से बहुत ही शर्मिला होने के कारण यह आसानी से दिखाई नहीं पड़ता ! इसकी आवाज से ही इसकी उपस्थिति का अंदाज लगाना पड़ता है।  मादा पक्षी भी आवाज की नकल करने में बहुत कुशल होती है पर महिलाओं के स्वभाव के विपरीत वह बहुत कम बोलती है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
लायर बर्ड, जिसे हिंदीं में वीणा पक्षी के नाम से जाना जाता है। ज्यादातर आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में पाए जाने वाले इस पक्षी के नर की विचित्र पर खूबसूरत वीणा वाद्ययंत्र के बनावट वाली पूंछ के कारण ही इसको वीणा पक्षी कहा जाता है। हमारे तीतर से इसका आकार बहुत मिलता जुलता है। संसार के सबसे सुंदर पक्षियों में से एक, इस प्राणी की सबसे बड़ी खूबी इसकी आवाजों की नकल करने की क्षमता है। यह दूसरे पक्षियों की आवाजों, उनके कलरव, कुत्तों के भौंकने, कारों के हॉर्न की नक़ल तो करता ही है साथ ही यह सीटी की आवाज भी निकालने में अति कुशल होता है। 



मादा पक्षी से नर पक्षी लंबा एवं बड़ा होता है। नर पक्षी की सोलह हिस्सों वाली बेहद लंबी पूंछ बहुत ही खूबसूरत होती है और ये जब उसे फैलाता है तो उसका आकार वाद्ययंत्र वीणा की तरह का हो जाता है। इसके शरीर का रंग तकरीबन भूरा तथा गले का कुछ लालिमा लिए हुए होता है। स्वभाव से बहुत ही शर्मिला होने के कारण यह आसानी से दिखाई नहीं पड़ता है ! इसकी आवाज से ही इसकी तत्काल उपस्थिति को जाना जा सकता है। मादा पक्षी भी आवाज की नकल करने में बहुत कुशल होती है पर महिलाओं के स्वभाव के विपरीत वह बहुत कम बोलती है। वह एक बार में एक ही अंडा देती है, जिससे 50 दिनों के बाद बच्चा निकलता है। जिसकी देख-भाल का जिम्मा माँ ही सम्हालती है। इनका भोजन कीट-पतंगेकेंचुऐमकडियां, दीमक इत्यादि हैं।


हालांकि फिलहाल इनकी प्रजाति पर कोई खतरा नहीं है पर प्रकृति की इस सुंदरतम नेमत पर ध्यान देने और रखने की बहुत जरुरत है।

@सभी चित्र अंतरजाल के सौजन्य से    

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...