मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

महाभारत युद्ध के दौरान भोजन व्यवस्था संभाली थी उडुपी नरेश ने

युद्धोपरांत उडुपी नरेश को श्री कृष्ण जी ने गले लगा आशीर्वाद दिया कि जिस तरह तुमने 18 दिनों तक, बिना किसी लाभ की कामना के, अथक परिश्रम कर लाखों लोगों की क्षुधा शांत कर मानव जाति की सहायता की है, उसी तरह तुम्हारे वंशज  आदि काल तक लोगों को भोजन प्राप्त करवाते रहेंगे और उसके लिए तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को सदा आदर-सम्मान और यश मिलता रहेगा ! यही कारण है कि हजारों वर्षों के पश्चात आज भी पूरे देश में भोजन के क्षेत्र में उडुपी के नाम को श्रेष्ठ, विश्वसनीय और  सर्वोपरि माना जाता है.....................!

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हमारी पौराणिक कथाओं-कहानियों का असर अत्यंत प्रेरक और व्यापक होता है ! उसके मुख्य किरदार और कथावस्तु इतने प्रभावोत्पक होते हैं कि उसमें खोया हुआ या लीन श्रोता या पाठक विषयवस्तु से अलग कुछ सोच ही नहीं पाता। इससे दसियों ऐसी महत्वपूर्ण बातें अनदेखी रह जाती हैं, जिनका वर्णन कथा में किसी कारणवश नहीं हो पाया होता है। ऐसी ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात महाभारत से है !  

ज्ञातव्य है कि महाभारत युद्ध में दोनों पक्षों की सेनाओं की संख्या 18 अक्षौहिणी थी। भारतीय गणना के अनुसार प्राचीन भारत में सेना की सबसे बड़ी इकाई ! जिसके अनुसार एक अक्षौहिणि की इकाई में 21870 रथ जिनमें चार घोड़े, सारथि व रथी होता था ! इसमें हाथियों की संख्या 21870 निर्धारित थी, एक हाथी पर महावत, उसका सहायक, योद्धा व उसके दो सहायक यानि पांच लोग होते थे ! 65610 घुड़सवारों के अलावा 109350 पैदल सैनिकों का दस्ता होता था। इस प्रकार एकअक्षौहिणी सेना में समस्त जीवधारियों की संख्या 634243 के करीब बैठती है। इस हिसाब से महाभारत में सम्मिलित होने वालों की संख्या 11416374 तक जा पहुंचती है जिसमें मनुष्यों की संख्या 55 से 56 लाख होती है। 

बहुत से लोगों की इस संख्या पर भृकुटि तनना स्वाभाविक है पर उनके लिए प्राचीन इतिहास में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज की भारत यात्रा में वर्णित सम्राट चन्द्रगुप्त की सेना के वर्णन को जान लेना चाहिए। जिसमें 30000 रथों, 9000 हाथियों और 600000 पैदल सैनिकों का उल्लेख किया गया है जो भारत के सिर्फ एक राज्य की सेना की संख्या है। समस्त भारत के राज्यों की सेना का हिसाब लगाया जाए तो एक विशाल आकार सामने आ जाता है। इसलिए महाभारत में एकत्रित हुई उतनी विशाल सेना का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं लगती, जिसमें सम्पूर्ण भारत के अलावा अनेक दूसरे देशों के राजाओं ने भी भाग लिया था ! 

पर इसके साथ ही एक जिज्ञासा यह उठती है, जिसका जिक्र आम नहीं मिलता कि सागर समान इतने लोगों के जमावड़े के भोजन की व्यवस्था कैसे होती होगी। सुबह युद्ध पर जाने के पहले और शाम को थके-हारे सैनिकों के आहार की व्यवस्था और मात्रा का आकलन कैसे और कौन करता होगा ! यह एक जटिल प्रश्न बन कर उभरता है। इसके लिए यदि महाभारत की उपकथाओं को खंगाला जाए तो एक किंवदंती सामने आती है, जिसमें उडुपी नरेश के नाम का उल्लेख मिलता है। उडुपी के कृष्ण मंदिर में इस कथा का सदा पाठ होता है। 

कथा के अनुसार उस समय शायद ही कोई ऐसा राज्य रहा होगा जिसने इस महायुद्ध में भाग ना लिया हो। उस समय भारतवर्ष  के समस्त राजा दोनों पक्षों में से किसी ना किसी के साथ खड़े दिखते थे। इसी के अनुसार जब  दूरदर्शी उडुपीराज अपनी सेना सहित कुरुक्षेत्र पहुंचे तो उन्होंने सर्वप्रथम श्रीकृष्ण से भेंट कर उनसे अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि प्रभु यहां सब युद्ध के लिए उतावले हैं, पर इन असंख्य लोगों के भोजन के प्रबंध के बारे में आपको छोड़ शायद ही किसी ने सोचा हो ! हे वासुदेव ! सत्य तो यह है कि मैं भाइयों के इस आपसी युद्ध को उचित नहीं समझता इसीलिए इस युद्ध में भाग लेने की मेरी इच्छा कतई नहीं है। पर यह युद्ध टाला भी नहीं जा सकता ! इसी कारण यदि आप अनुमति दें तो मैं चाहता हूँ कि अपनी पूरी सेना के सहयोग से यहां उपस्थित सभी के लिए मैं भोजन का प्रबंध करूं ! श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए सहर्ष उनकी बात मान सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी। 

उडुपी नरेश की कुशलता के कारण, रोज सैकड़ों-हजारों सैनिकों की मृत्यु के बावजूद कभी भी अन्न का एक भी दाना बर्बाद नहीं होता था। उतना ही भोजन बनता था जितने की जरुरत होती थी ! इतनी विशाल सेना के भोजन का प्रबंध बिना अन्न की क्षति के बगैर घोर करना किसी चमत्कार से काम नहीं था ! सभी के लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी। इसीलिए युद्धोपरांत अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए जब युधिष्ठिर ने इस रहस्य को जानना चाहा तो उडुपी नरेश ने श्रद्धापूर्वक इसका सारा श्रेय श्रीकृष्ण के प्रताप और उनके मार्गदर्शन को दिया जिसके बिना इतना बड़ा आयोजन कतई संभव नहीं था। ऐसा सुन कर वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो प्रभु के प्रति नतमस्तक हो गए।

युद्धोपरांत जब उडुपी नरेश वापस जाने के अनुमति लेने श्री कृष्ण जी के पास गए तो उन्होंने उन्हें गले लगा आशीर्वाद दिया कि जिस तरह तुमने 18 दिनों तक, बिना किसी लाभ की कामना के अथक परिश्रम कर, बिना शस्त्र उठाए युद्ध में अपना सहयोग दे, लाखों लोगों की क्षुधा शांत कर मानव जाति की सहायता है, उसी तरह तुम्हारे वंशज आदिकाल तक लोगों को भोजन प्राप्त करवाते रहेंगे और उसके लिए तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को सदा आदर-सम्मान और यश मिलता रहेगा ! यही कारण है कि हजारों वर्षों के पश्चात आज भी पूरे देश में भोजन के क्षेत्र में उडुपी के नाम को श्रेष्ठ, विश्वसनीय और सर्वोपरि माना जाता है।

संदर्भ - महाभारत व अंतरजाल 

4 टिप्‍पणियां:

Dr Varsha Singh ने कहा…

ज्ञानवर्धक जानकारी देने हेतु धन्यवाद🙏🌸🙏

Jyoti Dehliwal ने कहा…

ज्ञानवर्धक जानाकारी।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

वर्षा जी,
''कुछ अलग सा'' पर सदा स्वागत है !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी,
अनेकानेक धन्यवाद !

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