pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 14 मार्च 2020

कन्याकुमारी, तीन-तीन सागर जिसके पांव पखारते हैं

यहां के तीन दर्शनीय स्थानों में पहले मंडपम में देवी कन्याकुमारी के पैरों की छाप पत्थर पर उकेरी हुई है ! दूसरा मुख्य भवन जिसके अंदर चार फुट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्वामी विवेकानंद की बेहद खूबसूरत कांसे की बनी मूर्ति स्थित है, जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव नजर आता है तथा तीसरा ध्यान कक्ष जिसकी दिवार पर ''ॐ'' की आकृति बनी हुई है और शांत नीम अँधेरे में लगातार ''ओउम'' की ध्वनि उच्चारित होती रहती है..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
कन्याकुमारी, भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित तमिलनाडु प्रांत का एक शहर, जो हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के अनोखे त्रिवेणी संगम स्थल पर स्थित है, तथा जिसके सैंकड़ों मील  के संतरण के बाद जाकर ही दक्षिणी ध्रुव का स्थल मिल पाता है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्च है। दूर-दूर फैले समुद्र की विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा एक अलौकिक दृश्य प्रदान करता है। 
देश का अंतिम छोर
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झरोखे से 
स्टीमर का इंतजार, जेटी पर बने कक्ष में 
स्टीमर में चढने के पहले, समूहचित्र 

स्वंय ! पीछे दूर कन्याकुमारी तट 
त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी की करीब सौ की.मी. की दूरी पार करने में करीब साढ़े तीन-चार घंटे लग ही जाते हैं। इसलिए अपनी यात्रा के दूसरे दिन सुबह नाश्ता वगैरह निपटा आठ बजे ग्रुप के सभी 31(29+2) सदस्यों ने बस में अपनी-अपनी सीट संभाल ली। दस्तूरानुसार हमारे ''सबसे युवा कप्तान 78 वर्षीय नरूला जी'' ने गायत्री मंत्र का पाठ कर यात्रा का शुभारंभ किया। समय अफरात था पर गाने, अंतराक्षरी तथा चुटकुलों में कब बीत गया पता ही नहीं चला ! यह भी एक अविस्मरणीय समय था।






साज-संभार 
कन्याकुमारी से करीब 500 मीटर की दूरी पर स्थित विवेकानंद स्मारक से कुछ ही दूरी पर एक दूसरी चट्टान पर तमिल भाषा के विख्यात संत कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची प्रतिमा भी  बनी हुई है, जो उनकी विख्यात कृति तिरुक्कुरल के 133 अध्यायों को ध्यान में रख बनाई गयी है।  उस दिन कन्याकुमारी से विवेकानंद स्मारक तक 50/- में जाने-आने के किराए साथ दो स्टीमर ही कार्यरत थे, ऊपर से रविवार का दिन, तो भीड़ कुछ ज्यादा ही थी। फिर भी पौने घंटे में नंबर आ ही गया। लाइफ जैकेट पहने सागर की उत्ताल लहरों पर डोलते सभी की निगाहें शनैः - शनैः पास आती शिला पर टिकी हुई थीं। 
अंतरजाल के सौजन्य से 
ध्यानकक्ष 


स्मारक दर्शन की फीस 20/- अदा कर वहां देखने के तीन स्थान हैं, पहला मंडपम जिसमें देवी कन्याकुमारी के पैरों की छाप पत्थर पर उकेरी हुई है ! दूसरा मुख्य भवन जिसके अंदर चार फुट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्वामी विवेकानंद की बेहद खूबसूरत कांसे की बनी मूर्ति स्थित है, जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव नजर आता है तथा तीसरा ध्यान कक्ष जिसकी दिवार पर हरे रंग के प्रकाशमान ''ॐ'' की आकृति बनी हुई है और जहां शांत, नीम अंधेरे में लगातार ''ओउम'' की ध्वनि उच्चारित होती रहती है। यहां बैठने पर असीम शांति की एक दिव्य अनुभूति का एहसास होता है, जिसका शब्दों में वर्णन करना असंभव है। इसके अलावा स्वामी जी से संबंधित साहित्य, शिला के बारे में परिचय देने के लिए एक कक्ष, वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए बने कुंड तथा प्रसाधन गृह तो हैं ही पर पूरी शिला से प्रकृति का जो अवर्चनीय, अलौकिक सौंदर्य दिख पड़ता है वह तो वर्णनातीत है।  
वर्षा जल का संग्रहण 
वार्तालाप 
यहां से वापस जाने की तनिक भी इच्छा ना होने पर भी जाना तो था ही ! लौटते समय ''हाई टाइड'' का समय हो गया था, इस वजह से समुंद्र की बेचैनी भी बढ़ गयी थी। स्टीमर को लौटने में भारी मशक्कत का सामना करना पड़  रहा था। लहरें उछाल मारती हुईं स्टीमर के अंदर तक आ रहीं थीं। ऐसी ही एक लहार ने किनारे बैठीं श्रीमती जी को आपादमस्तक भिगो डाला। किनारे पहुंच कर वहां से कुछ ही दूर उस स्थानपर गए जो हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का अनोखा और प्राकृतिक मिलन स्थल है !  
विश्राम 
इस पवित्र व अनूठे स्थान को ''त्रिवेणी संगम'' के नाम से जाना जाता है। पर इसकी हालत और बिखरी गंदगी को देख मन कुछ उचाट सा हो गया। पता नहीं कब हम अपनी धार्मिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक धरोहरों, विरासतों, स्थानों की अहमियत व खासियत समझेंगें। कब व्यवसायिक दोहन के दुष्परिणामों को समझ पाएंगे ! कब !!  
त्रिवेणी संगम 




रात की चादर ओढ़े कोवलम बीच 
समय की कमी को देखते हुए वापस त्रिवेंद्रम जाना ही तय पाया गया, जहां रुकते-चलते पहुंचते-पहुंचते साढ़े सात बज ही गए थे। फिर भी एक बार अंधेरे में ही सही ''कोवलम बीच'' के भी दर्शन कर करीब साढ़े आठ के लगभग वापस होटल पहुंच लिए।   
@तीसरे दिन - अलैप्पी का पिछला पानी, बैक वॉटर    

गुरुवार, 12 मार्च 2020

केरल यात्रा का पहला पड़ाव, त्रिवेंद्रम ! पहला दिन

जब हम पद्मनाभ मंदिर की ओर उन्मुख हुए, उस समय पांच बजा चाहते थे ! मंदिर पहुंच, वस्त्र बदल, लंबी लाइनों में लग करीब डेढ़ घंटे बाद गर्भ-गृह तक पहुंचे ! पर एक तो घिरते अन्धकार और दूसरे अंदर सिर्फ दीए के प्रकाश के कारण प्रतिमा के होने का आभास ही पाया जा सका। वहां से निकलते-निकलते रात के आठ बज गए थे ! थकान पूरी तरह सबको अपनी गिरफ्त में ले चुकी थी और दूसरी सुबह फिर कन्याकुमारी के लिए एक लंबी यात्रा करनी थी, तो जल्द उठना लाजिमी था............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

RSCB के सौजन्य से केरल यात्रा, 29 फ़रवरी से सात मार्च, का सुयोग प्राप्त हुआ। जिसमें त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, अलेप्पी, थेकाड्डी, मुन्नार और कोचीन जैसे पड़ाव शामिल थे। मेरे सपत्नीक शामिल होने का सबसे बड़ा आकर्षण थे, पद्मनाभ मंदिर और कन्याकुमारी, जहां जाने का सपना वर्षों से दिलो-दिमाग में कुलबुलाता रहता था पर संयोग नहीं बन पा रहा था। यह अवसर मन चाही मुराद पूरी होने जैसा था।

रिया ट्रेवेल्स, जिनके प्रतिनिधि श्री सिद्दार्थ जो सारी यात्रा के दौरान हमारे साथ बने रहे, द्वारा तयशुदा कार्यक्रम के तहत इंदिरा गांधी टर्मिनल 3 से ''विस्तारा'' की सुविधा लेने के लिए सुबह पांच बजे अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी। वहां अपने औसत 66 साल के, बीस महिलाओं और नौ पुरुषों के ग्रुप को देख एक सुखद अनुभव यह हुआ कि सभी सदस्य चुस्त-दुरुस्त नजर आ रहे थे ! उम्र का प्रभाव सिरे से नदारद था। जबकि हफ्ते भर पहले हुई यात्रा की ब्रीफिंग की मीटिंग में इसका ठीक उलट था।

करीब सवा तीन घंटे की उड़ान के बाद हम सब को त्रिवेंद्रम पोर्ट से वॉल्वो बस, जो पूरी यात्रा के दौरान हमारी सहयात्री रही, द्वारा होटल मौर्या राजधानी पहुंचाया गया। जहां से तारो-ताजा होने के पश्चात शहर दर्शनार्थ निकलना हुआ। क्योंकि मंदिर के खुलने-बंद होने के कई विभिन्न समय थे इसलिए उसके दर्शनों का समय संध्या उपरांत रखा गया। सो सबसे पहले सब करीब तीन की.मी. की परिधि में फैले चिड़ियाघर गए। फिर कुछ लोगों ने साथ ही लगे म्यूजियम को देखा। तकरीबन रात भर जगने, फिर हवाई सफर और इतना घूमने के बाद थकान हावी होने लगी थी फिर भी चाय वगैरह ले पद्मनाभ मंदिर की ओर उन्मुख हो गए, उस समय पांच बजा चाहते थे  
  








पद्मनाभ मंदिर विष्णु जी का वही विश्व प्रसिद्ध मंदिर है जो अपने तहखानों में संग्रहित विशाल, अमोल और अकूत खजाने के कारण सदा चर्चा में रहा है। इसके प्रवेश के अपने नियम कानून हैं जिनके तहत महिलाओं को साड़ी और पुरुषों को सिर्फ धोती पहन कर ही मंदिर में प्रवेश की इजाजत मिलती है, जो वहां की दुकानों पर सर्व सुलभ हैं। पर इसके साथ ही सर ढकने की भी मनाही है, जिसके कारण हमारे दो सिक्ख साथी श्री गिल और श्री बेदी चाहते हुए भी अंदर नहीं जा सके। 
पद्मनाभ स्वामी मंदिर 


  मेहरा जी, नरूला जी तथा मुकुंदी जी 



खैर वस्त्र बदल, लंबी लाइनों में लग करीब डेढ़ घंटे बाद मंदिर के गर्भ-गृह तक पहुंचे ! पर एक तो घिरते अन्धकार और दूसरे अंदर सिर्फ दीए के प्रकाश के कारण प्रतिमा के होने का आभास ही पाया जा सका। वहां से निकलते-निकलते रात के आठ बज गए थे ! थकान पूरी तरह सबको अपनी गिरफ्त में ले चुकी थी और दूसरी सुबह फिर कन्याकुमारी के लिए एक लंबी यात्रा करनी थी, तो जल्द उठाना लाजिमी था। सो सब होटल पहुंच जैसे-तैसे कुछ खा कर अपने-अपने बिस्तर में जा दुबके। कब नींद ने अपने आगोश में लिया कब सुबह हो गयी पता ही नहीं चला। पर सुबह सभी ताजा दम और उत्साहित थे अगली यात्रा को ले कर ! 
@कल कन्याकुमारी         

बुधवार, 11 मार्च 2020

दिल्ली, जनकपुरी की RSCB नामक संस्था वर्षों से वरिष्ठ नागरिकों के लिए कार्यरत है

देश की राजधानी दिल्ली के जनकपुरी इलाके में भी एक ऐसी ही संस्था, Retired & Senior Citizens Brotherhood, कई सालों से समर्पित भाव से वरिष्ठ तथा सेवानिवृत लोगों के लिए कार्यरत है। जो उनकी शारीरिक व मानसिक समस्याओं का हल निकालने में मदद तो करती ही है, साथ ही उनके लिए तरह-तरह की देश-विदेश की यात्राओं का भी आयोजन करती है। इस तरह के कई आयोजन पूरी सफलता के साथ संपन्न हो चुके हैं। ऐसी यात्राओं में सम्मिलित लोगों की आयु, क्षमताओं, आवश्यकताओं को देखते हुए छोटी से छोटी बात का भी पूरी तरह से ध्यान रख कर ही सारे प्रोग्राम की रूपरेखा बनाई जाती है.............!       

#हिन्दी_ब्लागिंग  
समय के साथ-साथ देश-दुनिया-समाज में भी तरह-तरह के उलट-फेर होते रहते हैं। बदलाव होते रहते हैं ! लोगों की सोच बदलती रहती है, समझ बढ़ती है जागरूक लोगों की समाज के प्रति प्रतिबद्धता सामने आती है ! एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का एहसास उत्पन्न होता है ! इसी सब के तहत किसी संवेदनशील इंसान का ध्यान समाज के कुछ उन बुजुर्गों की तरफ भी गया होगा, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय अपने घर-परिवार-समाज को दिया होता है, पर अब उम्र के इस पड़ाव पर शारीरिक रूप से सक्षम होते हुए भी मानसिक तौर पर अपने-आप को जीवन की दौड़ में अनुपयोगी मान, अलग-थलग पड़ जाते हैं ! शौक होते हुए भी उसे पूरा करने में एक झिझक का अनुभव करते हैं। कहीं आने-जाने में युवाओं के साथ कदम-ताल करते समय पिछड़ने का भय मन में घर कर जाता है। तेजी से बदलती चीजों, नए-नए उपकरणों के साथ कुछ-कुछ अपनी घटती शारीरिक क्षमता उन्हें बाहरी दुनिया के साथ ताल-मेल बैठाने में संकोची बना देती है ! ऐसे में वे सिर्फ घर की चारदीवारी में घिर कर रह जाते हैं ! जिससे एक प्रेमल, केयरिंग तथा समर्पित परिवार का सदस्य होने के बावजूद, रोज एक ही तरह की दिनचर्या  उन्हें कुछ हद तक आलसी, निष्क्रिय, चिड़चिड़ा तथा तनावग्रस्त कर एक अलग ही तरह का जीव बना देती है।

समाज के ऐसे बहुत बड़े तबके को जीवन की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए देश-दुनिया में तरह-तरह की संस्थाएं आगे आईं। जिनका मुख्य ध्येय और उद्देश्य, बिना किसी लाभार्जन के, समाज के वरिष्ठ, वयोवृद्ध, बुजुर्ग लोगों के जीवन में पसरते मरुधर को फिर से हरियाली में बदलने, उनको आत्मविश्वासी बनाने, उनकी नीरस दिनचर्या को बदलने, उन्हें खुश तथा तनाव मुक्त करने का था।

देश की राजधानी दिल्ली के जनकपुरी इलाके में भी एक ऐसी ही संस्था, Retired & Senior Citizens Brotherhood, कई सालों से समर्पित भाव से वरिष्ठ तथा सेवानिवृत लोगों के लिए कार्यरत है। जो उनकी शारीरिक व मानसिक समस्याओं का हल निकालने, पेंशन संबंधित परेशानियों को सुलझाने, बुजुर्गों के प्रति होने वाली ज्यादितियों में मदद तो करती ही है, साथ ही उनके लिए तरह-तरह की देश-विदेश की यात्राओं का भी आयोजन करती है। इस तरह के कई आयोजन पूरी सफलता के साथ संपन्न हो चुके हैं। ऐसी यात्राओं में सम्मिलित लोगों की आयु, क्षमताओं, आवश्यकताओं को देखते हुए छोटी से छोटी बात को भी पूरी तरह ध्यान में रख कर ही सारे प्रोग्राम की रूपरेखा बनाई जाती है। शुरू में एक मुश्त खर्च ले कर फिर यात्रा की पूरी अवधि में किसी भी तरह का आर्थिक भार नहीं डाला जाता। हाँ व्यक्तिगत शॉपिंग इसमें शामिल नहीं होती। इस तरह के लोग बधाई के पात्र हैं। उनके लिए साधुवाद !!
अभी पिछली 29 फ़रवरी से सात मार्च तक की उनकी केरल यात्रा में मैं भी सपत्नीक शामिल हुआ था। 29 फ़रवरी को सात बजे इंदिरा गांधी टर्मिनल से श्री नरूला जी, जिनके सरल स्वभाव से प्रभावित हो श्रीमती जी ने उनके साथ पिता-पुत्री का रिश्ता गठ डाला, जो एक शांत स्वभाव के हंसमुख, मिलनसार, अनुभवी इंसान हैं, उनके नेतृत्व मे शुरू हुई हवाई यात्रा कब थिरुवनंतपुरम, कन्याकुमारी, अलेप्पी, थेकाड्डी, मुन्नार और कोचीन होते हुए फिर सात मार्च को दोपहर एक बजे वहीं आ कर ख़त्म हो गयी, पता ही नहीं चला ! हालांकि रोज बस और पैदल सफर अत्यधिक थकान उत्पन्न कर देता था पर दूसरे दिन अलसुबह सारे ''युवा वरिष्ठ सदस्य'' बिना किसी देर सबेर, तरोताजा हो आगे के मुकाम के लिए तय समय पर हाजिर रहते थे। मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी ने किसी भी दिन जरा सा भी विलंब किया हो। ऐसे जवानों को मेरा ''हैट्स आफ।'' सबसे अच्छी बात यह रही कि 65/66 की औसत उम्र के इस ग्रुप के सदस्यों को तक़रीबन रोज जगह, भोजन, पानी बदलते रहने के बावजूद किसी को भी उदर संबंधी शिकायत पेश नहीं आई ! जबकि इस उम्र में खान-पान में जरा सी लापरवाही या ऊक-चूक परेशानी का सबब बन जाती है।  

इस यात्रा की सफलता में इसका ताना-बाना बुनने वाली कंपनी #रिया_ट्रेवलर्स और उनके सहयोगी #श्री_सिद्दार्थ का भी बहुत बड़ा हाथ था। सिद्दार्थ की तो प्रशंसा करना इसलिए भी लाजिमी है कि पहले दिन से ही उसने सदा मुस्कराते हुए बड़े संयम, धैर्य और शांत रहते हुए हम सब अलग-अलग पैरामीटर वाले लोगों को खुश और संतुष्ट रखा। उनके केरल के सहयोगी जिन्हें सब प्यार से #जीनू कह कर पुकारते रहे उसके स्वभाव का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। आज के समय में ऐसा सीधा, सरल, मृदु, तत्पर तथा मितभाषी इंसान होना बहुत बड़ी बात है। हम सब इस यात्रा के साथ-साथ उसको भी यथासंभव याद रखेंगे।            

मंगलवार, 10 मार्च 2020

होली के पावन पर्व पर मुस्कुराइए, ठहाके लगाइए

होली है ! 
हंसी, ख़ुशी, मस्ती के पर्व पर सभी को यथायोग्य शुभ व मंगलकामनाएं। सदा स्वस्थ व प्रसन्न रहते हुए हरेक के जीवन में खुशियों के रंग बिखरते रहें। आज के दिन तो बिना हँसे रहना मना है !

 गांव से नये-नये आये नौकर को पानी का गिलास यूंही हाथ में उठा कर लाते देख संताजी चिल्लाए, अरे गधे पानी कहीं इस तरह लाया जाता है ? नौकर ने घबडा कर पूछा, फिर कैसे लाऊं, मालिक ? संताजी बोले, प्लेट में रख कर लाओ। सहमा हुआ नौकर, मालिक चम्मच भी लाऊं या ऐसे ही चाट लेंगे ?

एक दादी मां मरने से बहुत डरती थीं। सो भगवान से सदा प्रार्थना करती रहती थीं। एक बार प्रभू ने तंग आकर उन्हें दर्शन दे ही दिए और बता दिया कि उनकी उम्र अभी चालीस साल और तीन महिने बाकी है। दादी मां खुश। अगले दिन से ही सुखमय जिंदगी की तैयारियां शुरु कर दीं। ब्युटी-पार्लर में जा बाल डाई करवाये, मसाज करवाई, फ़ेशिअल, पैडी और ना जाने क्या-क्या करवा कर जैसे ही बाहर निकलीं एक बस की चपेट में आ स्वर्ग सिधार गयीं। ऊपर जाते ही प्रभू का गला पकड़ लिया, कि तुमने तो मेरी उम्र अभी चालीस साल और बताई थी, तो यह क्या कर दिया। प्रभू भी हड़बड़ा गये, बोले "अरे माई तुम्हें तो मैं पहचान ही नहीं पाया।"

दो चलाकू टाईप के आदमी दिल्ली से, रात में कहीं जाने के लिए ट्रेन के डिब्बे में चढ़े, तो पाया कि कहीं बैठने तक की जगह नहीं है। तभी उनमें से एक चिल्लाने लगा, सांप-साप, भागो-भागो। इतना सुनना था कि सारे यात्री सर पर पैर रख भग लिए। दोंनो ने एक दूसरे को मुस्करा कर देखा और ऊपर की बर्थ पर चादर बिछा कर सो गये। सबेरे नींद खुलने पर उन्होने पाया कि गाड़ी कहीं खड़ी है, उन्होनें बाहर झाड़ु देते आदमी से पूछा कि भाई कौन सा स्टेशन है? उसने जवाब दिया, दिल्ली। अरे दिल्ली तो कल रात में थी, इन्होंने पूछा। तो जवाब मिला, साहब, कल रात इस डिब्बे में सांप निकल आया था तो इस डिब्बे को काट कर अलग कर बाकी गाडी चली गयी थी।
पोता दादा जी से जिद कर रहा था सर्कस दिखाने की। चलिए ना दादा जी सर्कस में नयी-नयी चीजें दिखा रहे हैं। हाथी और गैंडा फुटबाल खेलते हैं। जोकर बहुत हंसाते हैं। पर दादा जी मान ही नहीं रहे थे, क्या बिटवा वही सब पुराने खेल हैं। पोता भी कहां मानने वाला था बोला सुना है इस में ढेर सारे घोड़े ताल में नाचते हैं। दादा जी भी नहीं मान रहे थे बोले देख तो रहे हो मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। पर पोता भी अड़ा हुआ था, बताने लगा, उपर झूले में एक साथ दस जने झूलते हैं और अबकी चीन से लड़कियां आयीं हैं जो छोटे-छोटे कपड़ों में पोल डांस करती हैं !

दादा जी उठे बोले चल इतनी जिद करता है तो चले चलता हूं। मैने भी घोड़ों को ताल पर नाचते नहीं देखा है।
संता, बंता तथा कंता पुलिस में भर्ती होने गए। उनको अपराधियों की शिनाख्त करने के लिये एक फोटो दिखाई गयी जिसमें एक आदमी का बगल से खिंचा गया चित्र था। पहले कंता से पूछा गया कि इस आदमी की क्या खासियत है ? इसे कैसे पहचानोगे ? कंता बोला, अरे यह तो बहुत आसान है ! इस आदमी का एक ही कान है। इसे तुरंत पहचान लूंगा। 
सामने वाले ने अपना सिर पीट लिया। इसके बाद बंता को बुला कर उससे भी वही सवाल पूछा गया, उसने भी झट से जवाब दिया कि एक आंख वाले को पकड़ने और पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है। साक्षात्कार लेने वाला झल्ला कर बोला, कैसे बेवकूफ हो तुम्हें इतना भी नहीं पता कि यह साइड पोज है। चलो भागो यहां से। चले आते हैं पुलिस में काम पाने। 
अब संता की बारी थी। उसको बुला कर भी वही सवाल पूछा गया, कि इस आदमी को कैसे पहचानोगे ? संता ने गौर से फोटो देखी और बोला, मैं इसे पहचान लूंगा, क्योंकि इसने कान्टेक्ट लेंस लगाया हुआ है। साक्षात्कार लेने वाला हैरान। यह बात तो उसे भी मालुम नहीं थी। तुरंत फाइलें खंगाली गयीं तो पाया गया कि संता का कहना सही है। सबने उसकी सूझ-बूझ की बड़ी प्रशंसा की। फिर ऐसे ही उससे पूछ लिया गया कि उसे यह बात कैसे पता चली। संता बोला, जी यह तो कॉमन सेंस की बात है। एक आंख वालों की नज़र कमजोर होती है और इस बेचारे का कान भी एक ही है तो यह चश्मा तो पहन नहीं सकता। जाहिर है यह कांटेक्ट लेंस ही लगाता होगा।
ननकु  ट्रेन में टायलेट जाकर लौटा तो बदहवास था। सहयात्री ने पूछा, क्या हो गया ?
ननकु बोला टायलेट के छेद से मेरा पर्स नीचे गिर गया।
अरे, तो चेन खींचनी थी ना। सहयात्री ने कहा।
दो बार खींची, पर हर बार पानी बहने लगा।
बाहर से आए पर्यटक को गाइड ने बताया कि जब अकबर सिर्फ चौदह साल का था तभी उसने बादशाह बन देश पर राज करना शुरु कर दिया था। पर्यटक बोला तुम्हारा देश भी अजीब है, यहां चौदह साल में देश संम्भालने दिया जाता है पर शादी अठ्ठारह साल के पहले नहीं करने दी जाती।
अब तुम्हें क्या बताएं साहब कि घर चलाना देश चलाने से कितना मुश्किल है। गाइड ने जवाब दिया।
पत्नी खर्च पूरा ना पड़ने और पति की अल्प कमाई से परेशान थी।एक दिन रहा नहीं गया बोली, "मैं शर्म के मारे अपना सर नहीं उठा पाती हूं। मेरी मां हमारे घर का किराया देती है। मेरी मौसी के यहां से कपड़े आते हैं। मेरी बहन हमारा राशन भरती है। कब हमारी हालत सुधरेगी?
" पति बोला, "शर्म तो आनी ही चाहिए। तुम्हारे दो-दो चाचा हैं जो एक पैसा भी नहीं भेजते।"
बाढ़ग्रस्त इलाके में तैनात कर्मचारियों से वायूसेना ने पूछा कि लोगों को निकालने के लिये कितनी ट्रिप लगेंगी। जवाब दिया गया कि तीस-एक ट्रिप में गांव खाली हो जायेगा। बचाव अभियान शुरु हो गया। एक-दो-तीन-पांच-दस-बीस, पचास फेरे लगने के बाद भी लोग नज़र आते रहे, तो सेना ने पुछा कि आपने तीस फेरों की बात कही थी यहां तो पचास फेरों के बाद भी लोग बचे हुए हैं ऐसा कैसे। नीचे से आवाज आयी कि सर, गांव वाले पहली बार हेलिकॉप्टर  में बैठे हैं तो जैसे ही उन्हें बचाव क्षेत्र में छोड़ कर आते हैं, वे फिर तैर कर वापस यहीं पहुंच जाते हैं।
गांव का एक लड़का अपनी नयी-नयी साईकिल ले, शहर मे नये खुले माल में घूमने आया। स्टैंड में सायकिल रख जब काफ़ी देर बाद लौटा तो अपनी साईकिल को काफ़ी कोशिश के बाद भी नहीं खोज पाया। उसको याद ही नहीं आ रहा था कि उसने उसे कहां रखा था। उसकी आंखों में पानी भर आया। उसने सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना की कि हे प्रभू मेरी साईकिल मुझे दिलवा दो, मैं ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। दैवयोग से उसे एक तरफ़ खड़ी अपनी साईकिल दिख गयी। उसे ले वह तुरंत मंदिर पहुंचा, भगवान को धन्यवाद दे, प्रसाद चढ़ा, जब बाहर आया तो उसकी साईकिल नदारद थी।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

कारूं का खजाना ¡ एक बतकही, कारूं पर



भानुमति का पिटारा, छज्जू का चौबारा जैसी अपनी विशेषताओं के लिए मुहावरों और लोकोक्तियों के अति प्रसिद्ध पात्रों की श्रृंखला की तीसरी कड़ी कारूं का  खजाना ! कौन था यह कारूं ? जो कहीं भी बेहिसाब दौलत का जिक्र आते ही सामने आ खड़ा होता है ! जिसके बारे में यह प्रचलित था कि वह यूनानी राजा ''मिडास'' का वंशज है। क्या यह कोई काल्पनिक पात्र था या वास्तव में इसका वजूद था ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कभी-कभी समय के साथ-साथ कल्पित कथा-कहानियां या उसके पात्र हमसे इतने घुल-मिल जाते हैं कि हम उन्हें वास्तविक समझने लगने लगते हैं और इसके उलट कभी-कभी वास्तविक घटनाएं, पात्र और उनके द्वारा किए गए मानवेत्तर कार्य इतने लोकप्रिय हो जाते हैं कि लोकोक्तियां या मुहावरे बन, वास्तविकता और कल्पना की सीमा को ही ख़त्म कर देते हैं ! ऐसा ही एक पात्र है कारूं ! बेहिसाब दौलत का जब कहीं भी जिक्र होता है तो कारूं के खजाने का मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है ! भारत में यह मुहावरा फ़ारसी से आया है। जहां कारूं का उल्लेख कारून के रूप में मिलता है। अंग्रेजी में यही कारून, क्रोशस के रूप में उल्लेखित है ! जहां ''एज़ रिच एज़ क्रोशस'' वाक्य मशहूर है। कौन था यह शख्स ? क्या यह कोई काल्पनिक पात्र था या वास्तव में इसका वजूद था ? इतिहास के सागर में यदि गोता मारा जाए तो यह सच सामने आता है कि यह नाम कोई कोरी कल्पना नहीं है। कभी इस नाम का एक बहुत ही धनी राजा हुआ था पर वह जितना ऐश्वर्यवान था उतना ही महाकंजूस तथा घमंडी भी था।   
कारूं 
ईसा से 560 से 547 वर्ष पूर्व एशिया माइनर यानी आज की टर्की में लीडियन साम्राज्य के राजा क्रोशस का शासन था, जिसकी राजधानी सार्डिस थी। उसके बारे में यह प्रचलित था कि वह यूनानी राजा ''मिडास'' का वंशज है। हो सकता है यह धारणा उसके स्वर्ण के प्रति अत्यधिक मोह के कारण बनी हो ! उसके राज्य में ढेरों सोने की खदानों के अलावा राज्य में से हो कर बहती नदियों में भी प्रचुरता से स्वर्ण कणों की उपलब्धता थी। लीडिया की धरती उस समय सोने का पर्याय बन गयी थी। उसकी समृद्धि, धन-वैभव, विशाल व असाधारण खजाने की ख्याति देश-विदेश में चारों ओर फैली हुई थी। पर इतनी अकूत संपत्ति का स्वामी होने के बावजूद वह पर्ले दर्जे का घमंडी व कंजूस था। पर इसके बावजूद उसने दुनिया को एक अनोखी देन भी दी थी और वह है टकसाल ! क्रोशस से पहले सिक्के ठोक-पीट कर बनाए जाते थे पर उसने सोने को ढाल कर इलेक्ट्रम नामक स्वर्णमुद्रा की ईजाद की जिसकी गुणवत्ता बनाए रखने पर बड़ी कड़ाई से ध्यान रखा गया। इसके अलावा वह पहला एशियाई राजा था जिसने यूनान पर अपना अधिकार स्थापित किया। 
ढली हुई स्वर्णमुद्रा 
सदियाँ बीत गयीं उस रहस्यमय खजाने पर समय की धूल जमती चली गई ! वह अप्रतिम खजाने का क्या हश्र हुआ यह सवाल अभी तक सुलझ नहीं पाया है। ऐसा माना जाता है कि वह विशाल धन भंडार किसी शाप की वजह से तुर्की के उसाक प्रांत में जमींदोज हो गया है और जो कोई भी उसको हासिल करने की कोशिश करेगा उसकी या तो मौत हो जाएगी या बहुत नुकसान झेलना पडेगा ! पर दुनिया में साहसियों, हठधर्मियों और सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास न करने वालों की बड़ी-पूरी जमात है ! ऐसे ही लोग समय-समय पर उस खजाने को हथियाने की कोशिश करते रहे हैं ! बहुतों को बहुत कुछ हासिल भी हुआ, पर वे उसका उपयोग कुछ दिनों तक ही कर पाए और किसी न किसी हादसे का शिकार हो गए ! 
इसके बावजूद भी बीच-बीच में तुर्की के आस-पास लालचवश या जरुरत के लिए हुए खनन इत्यादि में तरह-तरह के आभूषण, सोने-चांदी के पात्र, स्वर्णमुद्राएँ और सोने से भरे बर्तन मिलने की ख़बरें आती रहती हैं, पर साथ ही प्राप्तकर्ता के साथ हुए हादसों का जिक्र भी होता है ! इससे यह धारणा और भी पुख्ता होती जाती है कि यह खजाना शापित है ! खजाना तो है इसका प्रमाण है यहां से प्राप्त अमूल्य वस्तुओं में से करीब 363 वे नायाब और अमूल्य कलाकृतियां जो टर्की के म्यूजियम में सुरक्षित रखी हुए हैं ! वास्तविकता चाहे जो हो पर जब तक यह कायनात रहेगी, कारूं के खजाने की चर्चा और लोकोक्ति भी जीवित रहेगी। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

जीवन को जीएं, काटें नहीं

पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

अपनी दिनभर की दिनचर्या में रोज ही ऐसे कई युवा मिल जाते हैं जो निढाल, निस्तेज, सुस्त नजर आते हैं। जैसे जबरदस्ती शरीर को ढो रहे हों। अधिकांश नवयुवकों को किसी ना किसी व्याधि से ग्रस्त दवा फांकते देखना बडा अजीब लगता है। आज के प्रतिस्पर्द्धात्मक समय में हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी समस्या से जुझता हुआ किसी यंत्र की कसी हुई तार की तरह हर वक्त तना रहता है। जिसके फलस्वरूप देखने में बिमारी ना लगने वाली, सर दर्द, कमर दर्द, अनिद्रा, अपच, कब्ज जैसी व्याधियां उसे अपने चंगुल में फंसाती चली जाती हैं, जिससे अच्छा भला युवा उम्रदराज लगने लगता है। सदियों से हमारे यहां प्रभू से प्रार्थना की जाती रही है कि "हे प्रभू हमें सौ साल की उम्र प्राप्त हो।" पर यदि 30-35 साल के बाद ही रो-धो कर, दवाएं फांक कर, ज्यादातर समय बिस्तर पर गुजार कर जीना पडे तो ऐसे जीवन से क्या फायदा।

      

निश्चिंतता 
पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। अनियमित दिनचर्या, कुछ भी खाने-पीने का शौक, लापरवाही, मौज-मस्ती युक्त अपना रख-रखाव इस मशीन को भी बाध्य कर देता है अपने से ही विद्रोह के लिए। युवावस्था में यदि थोडी सी भी "केयर" अपने तन-बदन की कर ली जाए तो यह एक लम्बे अरसे तक मनुष्य का साथ निभाता है। लोग भूल जाते हैं कि मौज-मस्ती भी तभी तक रास आती है जब तक शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है। 

पर इस नैराश्य पूर्ण स्थिति में भी आप अपने चारों ओर देखें तो आपको ऐसे अनेक लोग दिख जाएंगे जो अपने कर्मों से, अपने आचरण से, अपने अनुभवों से हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। जिन्हें देख जिंदगी को खुशहाल बनाने के तौर-तरीकों को समझा जा सकता है, उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। ऐसे ही एक शख्स हैं मेरे मामा जी। जो 85 साल के होने के बावजूद किसी 35 साल के युवा से कम नहीं हैं। आज देश-प्रदेश के लोगों के बीच बहुचर्चित शतायु मैराथन धावक फौजा सिंह के प्रांत पंजाब के एक कस्बे फगवाडा के पास के गांव हदियाबाद के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में श्री प्यारे लाल सुंधीर बचपन से ही सामान्य कद-काठी के इंसान रहे। पर लाख विषमताओं, हजारों अडचनों, सैंकडों परेशानियों के बावजूद उन्होंने अनियमितता का सहारा नहीं लिया। यहां तक कि छोटी उम्र में ही जीवनसाथी की असमय मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपने को संभाले रखा और अपने बच्चों को सही तालीम दिलवा कर उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर और स्थापित किया। आज जब वे हर तरह से सम्पन्न हैं, घर में हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध है फिर भी इस उम्र में में भी उन्हें खाली बैठना ग्वारा नहीं है। आज भी सिर्फ व्यस्त रहने के लिए उन्होंने अपने व्यवसाय को तिलांजली नहीं दी है।  घर में कार होने के बावजूद अपनी सेहत की खातिर इस उम्र में भी रोज 10 से 15 की.मी. सायकिल पर चलना उनका शौक है। किसी भी तरह की चिंता, फिक्र, तनाव को वे पास नहीं फटकने देते। इसी वजह से बिना किसी का साथ ढूंढे अपनी बिटिया के पास नार्वे तक हर ढेढ दो साल बाद चक्कर लगाने से नहीं घबराते। वहा भी घर पर नहीं रुकते, आस-पास के दूसरे देशों को देखना, घूमना भी उनका शगल है, फिर चाहे किसी का साथ मिले या ना मिले। अपना देश तो इनका घूमा हुआ ही है वह भी अकेले. हमारे यहां तो उनका हर साल आना हमारी जरूरत है। उनके 10-15 दिनों का प्रवास हमें एक नई शक्ति प्रदान कर जाता है।  यह सब उन लोगों के लिए सबक है जो बचपन के खान-पान की कमी, अपनी उम्र, किसी का सहारा ना होने या अपनी जीवन में ना टाली जा सकने वाली मुसीबतों को अपने द्वारा पैदा की गयीं मुसीबतों का जिम्मेदार मानते हैं। सीधी  सी बात है जिसमे जीने की उद्दाम इच्छा हो उसके लिए कोइ बाधा कोइ मायने नहीं रखती।    

सोचिए जब होनी को टाला नहीं जा सकता तो फिर परेशान क्यों ? जब जो होना है, हो कर ही रहना है तो फिर नैराश्य क्यों ? जब भविष्य अपने वश में नहीं है तो उसके लिए वर्तमान में चिंता क्यों ?

जरा सोचिए, मैं भी सोचता हूं ! कठिन जरूर है पर मुश्किल बिल्कुल नहीं !

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