pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 12 जुलाई 2017

मेरी ब्लॉग यात्रा

ब्लागिंग करते हुए यह सच्चाई भी सामने आई कि ज्यादातर लोग बहस से बचना चाहते हैं, एक दूसरे की बुराई कम ही करते हैं, लेख इत्यादि पर आलोचना नहीं के बराबर होती है, तारीफ़ की भरमार है। जो कहीं न कहीं खटकता है..................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आज उन तमाम ब्लॉगर भाई-बहनों, दोस्त-मित्रों, भाई-बंधुओं को दिल की गहराइयों से धन्यवाद देना चाहता हूँ जो रोज "कुछ अलग सा" पर आ कर मेरा हौसला बढ़ाते हैं और मेरे मनोबल को बने रहने में सहयोग प्रदान करते हैं। मेरे इस ब्लॉग का अस्तित्व या थोड़ी-बहुत जो भी पहचान बनी है, वह आप सब के प्रेम और स्नेह के कारण ही संभव  हो सका है। ऐसा ही स्नेह व अपनत्व सदा बना रहे यही कामना है।
                                             
कभी-कभार कुछ-कुछ लिखते रहने के शौक को ब्लॉग-लेखन में बदलने का सारा श्रेय हिन्दुस्तान टाइम्स की मासिक पत्रिका #कादम्बिनी को जाता है। अपने जन्म से ही यह हमारे घर की सदस्य रही है सो वर्षों से नियमित रूप से हमारे यहां आती थी। बात 2007 के इसके अक्टूबर अंक की है। उसमें #बालेन्दु_दाधीच_जी का ब्लागिंग पर एक विस्तृत लेख "ब्लॉग हो तो बात बने" छपा था। लेख की प्रेरणा, बालेन्दु जी के मार्गदर्शन और छोटे बेटे अभय की सहायता से मैंने भी अपना एक ब्लॉग बना ही लिया जिसे नाम दिया "कुछ अलग सा"। जो पूरी तरह स्वांत: सुखाय था। नई-नई विधा थी, शौक भी था तो कुछ ना कुछ रोज ही उस पर दर्ज हो जाता था। अचानक एक दिन #उड़न_तश्तरी के नाम से पहली बार एक टिपण्णी मिली। एक दो दिन बाद ही #राज_ भाटिया_जी ने अपना कमेंट भेजा, तब ब्लॉग की विशालता, उसकी ताकत और पहुँच का असली अंदाजा हुआ। इसी बीच #दैनिक_भास्कर, रायपुर और फिर #पंजाब_केसरी, जालंधर में रचना और लेख छपने से झिझक मिटी और हौसला भी बढ़ा। तभी एक दिन आस्ट्रेलिया से #अनुज_जी ने वहां हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए निकलने वाली पत्रिका #हिंदी_गौरव के लिए मेरे लेखों को छापने की अनुमति चाही, हिंदी का सवाल था, ना की गुंजाईश ही कहां थी ! इसी ब्लॉग के कारण नाम ज़रा पहचाना जाने लगा तो एक स्थानीय अखबार में भी स्तंभ लेखन का आमंत्रण मिला, अच्छा तो लगता ही है जब आपके काम को सराहना मिले। ऐसे ही सफर चलता चला जा रहा था; जब लखनऊ से #रविंद्र_प्रभात_जी के प्रयास से भूटान यात्रा का सुयोग बना। जिंदगी का बेहतरीन अनुभव। जिसके दौरान कई नए मित्र भी बने, पहचान भी बढ़ी।         

धीरे-धीरे कारवां आगे बढ़ता रहा। समय के साथ-साथ विद्वानों, गुणीजनों का साथ मिला। उत्कृष्ट रचनाओं को पढ़ने का सुयोग प्राप्त हुआ। लेखन की हर विधा से साक्षात्कार हुआ। अद्भुत फोटोग्राफी, दुर्गम स्थानों की यात्रा तफ़सील, दूर-दराज के क्षेत्रों की जानकारी, जटिल विषयों का समाधान, हल्के-फुल्के मनोरंजन, सामयिक विषयों पर वार्तालाप के साथ-साथ राजनितिक कटुता, विचार वैमनस्य की कटुता का भी स्वाद चखा। पर यह सच्चाई भी सामने आई कि ज्यादातर लोग बहस से बचना चाहते हैं, एक दूसरे की बुराई कम ही करते हैं, लेख इत्यादि पर आलोचना नहीं के बराबर होती है, तारीफ़ की भरमार है। जो कहीं न कहीं खटकता है।

अपने दही को कोई खट्टा नहीं कहता, उसी तरह हर इंसान को अपनी बुद्धि, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी कृति, अपना लेखन, सर्वोपरि लगता है, पर उसे असलियत जरूर बतानी चाहिए। जिससे वह अपनी कमियों, गलतियों को दूर कर सके। 

कृपया इसे आत्म-प्रशंसा ना समझें। पर आज जैसे कुछ अलग सा पर रोज सैंकड़ों आवक दर्ज हो रही हैं तो मन में इच्छा तो बहुत होती है कि सबसे मिला जाए, कौन हैं ! उनसे बात-चीत की जाए, पर ऐसा हो नहीं पाता, खुद आगे आ कर बात करने में एक झिझक सी सदा बनी रहती आई है ! पता नहीं प्रभु ने स्वभाव ही ऐसा बना कर भेजा है ! इसी कारण अभी तक छह-सात लोगों के अलावा किसी से मिलने का सुयोग नहीं हो पाया है। फिर भी सारे इष्ट-मित्र, साथी अपने लगते हैं। आप सभी "अनदेखे अपनो" का मैं सदा आभारी हूँ, आप का प्यार, स्नेह, अपनत्व, मार्गदर्शन सदा मिलता रहे यही कामना है।
जय हिन्द !

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

"हाइफा" के वीरों की तीन मूर्तियां

जोधपुर व मैसूर के सैनिकों ने हाइफा में सिर्फ तलवारों और भालों से दुश्मन की मशीनगनों का सामना करते हुए अप्रतिम वीरता के साथ शहर की रक्षा तो की ही साथ ही दुश्मन के एक हजार से ऊपर सैनिकों को बंदी भी बना लिया। दिल्ली में भी उनकी याद में तीन मूर्ति भवन के सामने के चौराहे पर कांसे की आदमकद, सावधान की मुद्रा में हाथ में झंडा थामे तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का स्मारक बनाया गया है...

इस बार जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  इजरायल के दौरे पर गए, जो देश के किसी भी प्रधान मंत्री का वहां का पहला
दौरा था, तो उन्होंने ने वहां के शहर हाइफा जा कर भारतीय सैनिकों को भी श्रद्धांजलि प्रदान की। इस दौरे की मीडिया में काफी चर्चा रही थी। पहले विश्व युद्ध में मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद के सैनिकों को अंग्रेजों की ओर
से युद्ध के लिए तुर्की भेजा गया था। जिसमे जोधपुर व मैसूर के सैनिकों ने इसी जगह सिर्फ तलवारों और भालों से दुश्मन की मशीनगनों का सामना करते हुए अप्रतिम वीरता दिखाते हुए शहर की रक्षा तो की ही साथ ही दुश्मन के एक हजार से ऊपर सैनिकों को बंदी भी बना लिया। हाइफा में लड़े गए युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में वहाँ तो यादगार स्थल बना ही है, अपने यहां दिल्ली में भी उनकी याद में तीन मूर्ति भवन के सामने के चौराहे पर तीन सैनिकोँ की    

खडी मूर्तियों का स्मारक बनाया गया है। ये कांसे की आदमकद, सावधान की मुद्रा में हाथ में झंडा थामे तीन मूर्तियां आज भी खडी हैं। यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है। हालांकि इन मूर्तियों का परिचय उनके नीचे लगे शिला लेख में अंकित है, फिर भी अधिकाँश लोगों ने मूर्तियों को भवन का एक अंग समझ कभी उनके बारे में  जानकारी लेने की जहमत नहीं उठाई। वर्षों पहले इस जगह बीहड़ जंगल हुआ करता था. शाम ढलते ही किसी की इधर आने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। पूरा वन-प्रदेश जंगली जानवरों से भरा पडा था। करीब छह सौ साल पहले जब दिल्ली पर मुहम्मद तुगलक का राज्य था तब यह जगह उसकी प्रिय शिकार गाह हुआ करती थी। शिकार के लिए उसने पक्के मचानों का भी निर्माण करवाया था जिनके टूटे-फूटे अवशेष अभी भी वहाँ दिख जाते हैं। समय ने पलटा खाया। देश पर अंग्रजों ने हुकूमत हासिल
कर ली. 1922 में इस तीन मूर्ति स्मारक की स्थापना हुई।  उसके सात साल बाद 1930 में राष्ट्रपति भवन के दक्षिणी हिस्से की तरफ उसी जगह राबर्ट रसल द्वारा एक भव्य भवन का निर्माण, ब्रिटिश "कमांडर इन चीफ" के लिए किया गया. उस समय इसे "फ्लैग-स्टाफ़-हाउस" के नाम से जाना जाता था। जिसे  आजादी के बाद  सर्व-सम्मति से भारत के प्रधान मंत्री का  निवास  बनने का गौरव प्राप्त हुआ और उसका नया नाम बाहर बनी तीन मूर्तियों को ध्यान में रख तीन मूर्ति भवन रख दिया गया। दिल्ली का तीन मूर्ति भवन. देश के स्वतंत्र होने के बाद भारत के प्रधान मंत्री का सरकारी निवास स्थान था, पर प्रधान मंत्री का घोषित निवास स्थान होने के बावजूद इसमें देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ही रहे, उनके निधन के बाद इसे नेहरू स्मारक तथा संग्रहालय बना दिया गया।  
#हिन्दी_ब्लागिंग 

शनिवार, 8 जुलाई 2017

सच्चाई सामने आने में बहुत समय लेने लगी है !

गठबंधन तो बहाना है, मतलब तो खुद को बचाना है !! सत्ता की गाय को दुह-दुह कर करोड़ों, अरबों की संपदा इकठ्ठा कर धन-कुबेर बनने वालों को कभी भी आने वाली मुसीबत के समय सत्ता के अभेद्य किले की जरुरत होती है जो इनके विरुद्ध होने वाली किसी भी कार्यवाही से इन्हें महफूज रख सके ! उसके लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं ! पर समय एक जैसा तो रहता नहीं, नाहीं वह किसी को बक्शता है   
  
एक लम्बे अर्से बाद देश ने किसी एक दल की स्थाई सरकार का जायजा लिया है। नहीं तो जबसे जातिबल, धर्मबल, अर्थबल या बाहुबल से सत्ता हथियाई जाने लगी है, तबसे केंद्र में गठबंधन का बोलबाला ही रहने लगा था । किसी एक दल की सरकार का बन पाना असंभव सा होता चला गया था। गठबंधन से बनी सरकार को हर वक्त अपने घटकों से ख़तरा ही बना रहता था। ऐसी सरकारों की अपनी मजबूरियां होती थीं जिनके चलते वे कभी भी चैन की सांस नहीं ले पाती थीं। उसके घटक का हरेक दल और उसका अगुआ, चाहे किसी भी कोण से किसी भी काबिल ना हों पर दिल्ली के सिंहासन पर कब्ज़ा करना उसकी जिंदगी का मुख्य ध्येय होता था। इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद हर नीति अपनाई जाती थी। छल-कपट से कोई परहेज नहीं होता था। आज भी कुछ क्षत्रप अपने आप को देश का राजा समझने का गुमान जिंदगी भर पाले रखते हैं। ऐसे में "मेरी-गो-राउंड" जैसा खेल चलता रहता है। कुछेक अंतराल से तरह-तरह के कुनबे जुड़ते हैं जिनका कोई सरोकार नहीं होता देश या जनता के हित से। उन्हें सिर्फ अपना और अपने परिवार का ध्यान होता है। वे जोड़-तोड़ लगा कर वहाँ पहुंचते हैं, मतलब पूरा करते हैं और खिसक लेते है या लाइन में लगे हुओं द्वारा खिसका दिए जाते है। वैसे आने और जाने वालों, सभी को पता रहता है इस क्षणिक-प्रभुता का इसीलिए अपने उसी संक्षिप्त या किसी तरह पूरे कार्यकाल में जितना हो सके लाभ कमाने की जुगत बैठा अपना उल्लू सीधा कर निकल लेते हैं, अगली बारी के इंतजार में।
    
सत्ताविहीन होते ही हर दल और उसका आका दोबारा सत्ता को गले लगाने के लिए सदा आतुर रहता है जिसके तहत वह अपने विरोधी की ऐसी-ऐसी बातें, खबरें, इतिहास, जनता के सामने लाता है, जिसका पता उसके विरोधी को शायद खुद भी नहीं होता। इस तरह की हरकतों में सारे दल एक समान हैं। आज की राजनीती गर्त में जा गिरी है। अधोगति की पराकाष्ठा है। कोई मर्यादा नहीं बची है। गाली-गलौच, अपशब्द, मानहानि किसी बात से किसी को परहेज नहीं रहता। इसमें नाहीं सामने वाले की उम्र देखी जाती है नहीं उसका कद या पद। उस समय कोई भी अपने गिरेबान में नहीं झांकता जबकि उसे पता होता है, अपनी भी असलियत का ! फिर भी जनता को बेवकूफ समझ एक दूसरे के बारे में अनर्गल प्रलाप किया जाता रहता है।  

इस बार जब से केंद्र में एक मजबूत सरकार बहुमत से आई है तब से ही देश के क्षेत्रीय दलों में अपने अस्तित्व को लेकर खलबली मची हुई है। करीब-करीब सारे दल हाशिए पर चले गए हैं। हारे-थके, बिखरे दलों के मंजे-घुटे नेताओं द्वारा एक जुट हो कर एक सार्थक विपक्ष गठित करने का प्रयास, पहले तो देश के निष्पक्ष अवाम को देश हित के लिए एक सार्थक कदम लगता रहा।  भले ही इन स्वार्थी, सत्तालोलुप नेताओं ने उनके लिए कौड़ी का काम भी ना किया हो। फिर भी धर्म-जाति के नाम पर लोग उन्हें अपना मसीहा मानते रहे। उनके अपने आप को बचाने के लिए बनाए "महागठबंधनों" को भी मूर्तरूप देने में मदद करते रहे। लेकिन धीरे-धीरे, जैसे-जैसे इन मतलबपरस्त, परिवारवादी, लोभी, कपटी नेताओं की करतूतें सामने आने लगीं वैसे-वैसे इनके सत्ताधारी दल का विरोध कर गठबंधन की सरकार बनाने का मतलब भी जन-साधारण की समझ में आने लगा है। लोग समझ गए हैं कि इनके सारे सांप्रदायिकता, धर्म-निरपेक्षता को लेकर हो-हल्ला  मचाने के प्रयास देश को नहीं खुद को बचाने की कवायद है। गठबंधन इनका रक्षा-कवच है।  राजा बन सत्ता की गाय को दुह-दुह कर ये करोड़ों, अरबों की संपदा इकठ्ठा कर धन-कुबेर बन गए हैं। उस सच्चाई को छिपाने के लिए इन्हें किसी भी तरह सत्ता के अभेद्य किले की जरुरत होती है जो इनके विरुद्ध होने वाली किसी भी कार्यवाही से इन्हें महफूज रख सके ! उसके लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं ! इनकी तिकड़मों के राजदार,  इनके सहायक, इनके सलाहकार हर वह संभव कोशिश करते हैं जिससे उनका आका सलाखों के पीछे जाने से बच जाए ! इसी से सच्चाई सामने आने में काफी वक्त लग जाता है। पर समय एक जैसा तो रहता नहीं, नाहीं वह किसी को बक्शता है, उसकी लाठी में आवाज भी नहीं होती।

पर वह नेता ही क्या जो हार मान ले, अभी भी अपने विरुद्ध होने वाली कार्यवाही को अपने विरुद्ध षडंयत्र का नाम दे ऐसे लोग भोली-भली ग्रामीण जनता को बरगलाने से पीछे नहीं हट रहे ! अभी भी अपनी लच्छेदार भाषा में भाषणबाजी कर अपने आप को पाक-साफ़ साबित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा अंतिम लड़ाई जीतने की कोशिश में लगे हुए हैं। खैर देर-सबेर सच्चाई तो सामने आ ही जाएगी। पर क्या इनके किए की सजा इन्हें मिल पाएगी ? क्या साधारण जनता इन्हें सर से उतार कर इनको इनकी औकात बता पाएगी ? क्या देश घुनों से अपने-आप को बचा पाएगा ?  इन सारे यक्ष प्रश्नों का उत्तर भी समय ही देगा। 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

सेमिनार

शहर के मुख्य मार्ग से सर्किट हॉउस जाने वाली सड़क पर कुछ आगे जा कर घने इमली के पेड़ हैं। जिनकी शाखाओं पर ढेरों तरह-तरह के परिंदे वास करते हैं। शाम होते ही जब पक्षी अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं तो अक्सर शरारती लडके उन्हें अपनी गुलेलों का निशाना बनाते रहते हैं........................

पर्यावरणविदों और पशू-पक्षी संरक्षण करने वाली संस्थाओं ने मेरे सोते हुए कस्बाई शहर को ही क्यूं चुना, अपने एक दिन के सेमिनार के लिए, पता नहीं ! इससे शहरवासियों को कोई फ़ायदा हुआ हो या ना हुआ हो पर शहर जरूर धुल-पुंछ गया। सड़कें साफ़-सुथरी हो गयीं। रोशनी वगैरह की थोड़ी ठीक-ठाक व्यवस्था कर दी गयी। गहमागहमी काफ़ी बढ़ गयी। बड़े-बड़े प्राणीशास्त्री, पर्यावरणविद, डाक्टर, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता और भी ना
जाने कौन-कौन, बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे धूल उड़ाते पहुंचने लगे। नियत दिन, नियत समय पर, नियत विषयों पर स्थानीय सर्किट-हाउस में बहस शुरू हुई। नष्ट होते पर्यावरण और खास कर लुप्त होते प्राणियों को बचाने-सम्भालने की अब तक की नाकामियों और अपने-अपने प्रस्तावों की अहमियत को साबित करने के लिए घमासान मच गया। लम्बी-लम्बी तकरीरें की गयीं। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए। सैंकड़ों पेड़ों को लगाने की योजनाएं बनी। हर तरह के पशु-पक्षी को हर तरह का संरक्षण देने के प्रस्तावों पर तुरंत मोहर
लगी। यानी कि काफी सफल आयोजन रहा।  दिन भर की बहस बाजी, उठापटक, मेहनत-मसर्रत के बाद जाहिर है, जठराग्नि तो भड़कनी ही थी। सो सर्किट हाउस के खानसामे को हुक्म हुआ, लज़िज़, बढिया, उम्दा किस्म के व्यंजन बनाने का। खानसामा अपना झोला उठा बाजार की तरफ चल पड़ा। शाम घिरने लगी थी। पक्षी दिन भर की थकान के बाद लौटने लगे थे,  पेड़ों की झुरमुट में बसे अपने घोंसलों और बच्चों की ओर। वहीँ पर कुछ शरारती  बच्चे  अपनी  गुलेलों  से  चिड़ियों  पर  निशाना  साध  उन्हें  मार  गिराने में लगे हुए थे। पास  जाने पर
खानसामे ने तीन - चार घायल बटेरों को बच्चों के  कब्जे में देखा। अचानक उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी।  उसने  बच्चों को डरा धमका कर भगा दिया। फिर बटेरों को अपने झोले में ड़ाला, पैसों को अंदरूनी जेब में और सीटी बजाता हुआ वापस गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया।

खाना खाने के बाद, आयोजक से ले कर खानसामे तक, सारे लोग बेहद खुश थे। अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने तरीके से,  सेमिनार की अपार सफलता पर।

#हिन्दी_ब्लागिंग 

शनिवार, 1 जुलाई 2017

बाप रे ! इतना झगडालू चिडिया परिवार

साहबजादे /दी रोज ही घूमने निकले होते हैं। तीन-चार दिन पहले टाइप मशीन में फंसे बैठे थे, किसी तरह हटा कर उन्हें ऊपर रखा गया। दो दिन पहले पता नहीं कैसे फोटो-कापियर में घुस गये, वह तो अच्छा हुआ कि चलाने वाले ने मशीन साफ करते समय उनकी झलक पा ली, नहीं तो वहीं 'बोलो हरि' हो गयी होती। बड़ी मुश्किल से आधे घंटे की मशक्कत के बाद उन्हें बाहर निकाला जा सका...........

#हिन्दी_ब्लॉगिंग
मेरे कार्यालय में  बीम  और  मीटर - बाक्स   के कारण बनी एक संकरी सी  जगह में  चिड़ियों  के घोंसले के लिये
बेहतरीन स्थान बन गया है। खान-पान की नजदीकी सुविधा के साथ-साथ बिलकुल सुरक्षित, निरापद आवास।इसी कारण पिछले तीन साल से वहां कई चीड़ी परिवार बसते और पलते आ रहे हैं। बना बनाया नीड़ है, नर्सिंग होम की तरह जोड़े आते हैं, शिशु जन्मते हैं, पलते हैं और फिर उड़न छू। ऑफिस में काम करने वालों को भी बिना मांगे मनोरंजन का जैसे एक जरिया मिल गया है। कोई न कोई उनके लिए चुग्गा ले ही आता है। पानी की व्यवस्था तो खैर कर ही दी गयी है।  

पहली बार जो जोड़ा आया था, उसने पहले जगह जाँची-परखी, देखी-भाली, हर तरह से तसल्ली करने के बाद तिनका-तिनका जोड़ अपना ठौर बना लिया। कार्यालय के सफाई कर्मचारी बनते हुए घर को साफ कर देते पर यह "Encroachment" दो दिनों की छुट्टियों के बीच हुआ था। जिसके बन जाने के बाद फिर  उसे हटाने की किसी की इच्छा नहीं हुई। उस पहले जोड़े ने आम चिड़ियों की तरह अपना परिवार बढाया और चले गये। उनके रहने के दौरान एक बार उनका नवजात नीचे गिर गया था जिसे बहुत संभाल कर वापस उसके मां-बाप के पास रख दिया गया था। वैसे रोज कुछ तिनके बिखरते थे, पर उनसे किसी को कोई तकलीफ नहीं थी साफ-सफाई हो जाती थी। 

दूसरी बार तो पता ही नहीं चला कि कार्यालय में मनुष्यों के अलावा भी किसी का अस्तित्व है। लगता था वह परिवार बेहद सफाई पसंद है, न कोई गंदगी, ना शोर-शराबा।   सिर्फ बच्चे की चीं-चीं तथा उसके अभिभावकों की
हल्की सी चहल-पहल। कब आये कब चले गये पता ही नहीं चला।   तीसरा  जोड़ा नार्मल था।  मां - बाप दिन भर
अपने बच्चे की तीमारदारी करते रहते। तिनके वगैरह जरूर बिखरते थे पर इन छोटी-छोटी बातों पर हमारा ध्यान नहीं जाता था। पर एक आश्चर्य की बात थी कि और किसी तरह की गंदगी उन्होंने नहीं फैलाई। शायद उन्हें एहसास था कि वैसा होने से उसका प्रतिफल बुरा हो सकता है।

पर अब पिछले दिनों जो परिवार आया है, जिसके कारण ये पोस्ट अस्तित्व में आई, वह तो अति विचित्र है। सबेरे कार्यालय खुलते ही ऐसे चिल्लाते हैं जैसे हम उनके घर में अनाधिकार प्रवेश कर रहे हों। आवाज भी इतनी तीखी कि कानों में चुभती हुई सी प्रतीत होती है। बार-बार काम करते लोगों के सर पर चक्कर लगा-लगा कर चीखते रहते हैं दोनो मियां बीवी। इतना ही नहीं कई बार उड़ते-उड़ते निवृत हो स्टाफ के सिरों और कागजों पर अपने हस्ताक्षर कर जाते हैं। उनके घोंसले के ठीक नीचे फोटो-कापियर और टाइप मशीनें पड़ी हैं। जिन्हें रोज गंदगी से दो-चार होना पड़ता है। अब जैसे अभिभावक हैं, उनका नौनीहाल या नौनीहालिनी जो भी है, वैसा ही है। साहबजादे/दी रोज ही घूमने निकले होते हैं। तीन-चार दिन पहले टाइप मशीन में फंसे बैठे थे, किसी तरह हटा कर उन्हें ऊपर रखा गया। दो दिन
पहले पता नहीं कैसे फोटो-कापियर में घुस गये, वह तो अच्छा हुआ कि चलाने वाले ने मशीन साफ करते समय उनकी झलक पा ली, नहीं तो वहीं 'बोलो हरि' हो गयी होती। बड़ी मुश्किल से आधे घंटे की मशक्कत के बाद उन्हें बाहर निकाला जा सका।

इनकी करतूतों से सभी भर पाए हैं और इनके जाने का इंतजार कर रहे हैं। जिससे फिर साफ-सफाई कर इस "नर्सिंग होम" को बंद किया जा सके। पर इस सबसे एक बात तो साफ हो गयी कि चिड़ियों में भी इंसानों जैसी आदतें होती हैं। कोई शांत स्वभाव का होता है, कोई सफाई पसंद और कोई गुस्सैल, चिड़चिड़ा और झगड़ालू।
आपका कोई एक्सपेरीयेंस है ? (-:

बुधवार, 28 जून 2017

"गया धाम", जहां एक असुर के प्रताप से मिलता है मानवों को मोक्ष

गयासुर को देख कर ही लोग मुक्ति पाने लग गए। पापी लोग भी स्वर्ग जाने लग गए। यमलोक सूना पड़ गया, देवताओं के लिए यज्ञ होने बंद हो गए। जिससे देवताओं को हविष्य मिलना बन्द हो गया परिणामस्वरूप उनकी शक्ति क्षीण होने लगी।  देवलोक में घबड़ाहट फ़ैल गयी......
   
#हिन्दी_ब्लागिंग 
पुराणों और धर्मग्रथों के अनुसार आदिकाल में जो मुख्य जातियां हुआ करती थीं, उनमें सुर यानी देवताओं को उत्कृष्ट और अपने कर्मों, उच्चश्रृंखलता और देव विरोधी होने के कारण असुरों यानी दैत्य, दानव और राक्षसों को हेय व हीन  माना गया है। पर इन अलग-अलग जातियों में भी विद्वान, पराकर्मी, शूरवीर, धर्मात्मा और नेकदिल पुरुषों के साथ ही अनेक महिला विदुषियों का जन्म भी हुआ था, जिन्होंने अपनी विद्वता, साहस, त्याग, और प्रेम से 
दुनिया भर में अपनी जाति का नाम रौशन किया था। इनमें से कुछ को तो आज भी आदर-सम्मान से देखा जाता है और उनकी पूजा-अर्चना भी की जाती है। ऐसा ही एक नाम है गयासुर। कथाओं के अनुसार भस्मासुर के वंशज गयासुर ने अपनी कठोर तपस्या के बल पर विष्णु भगवान् से यह वर प्राप्त कर लिया कि उसका शरीर समस्त तीर्थों के बनिस्पत अधिक पवित्र हो जाए। जो भी उसे देखे या उसका स्पर्श कर ले उसे यमलोक नहीं जाना पड़े। ऐसा व्यक्त‌ि सीधे व‌िष्‍णुलोक जाए।

भगवान ने उसे यह वरदान दे तो दिया पर इसका बड़ा ही अप्रत्याशित फल हुआ। अब गयासुर को देख कर ही लोग मुक्ति पाने लग गए ! पापी लोग भी स्वर्ग जाने लग गए ! यमलोक सूना पड़ गया ! देवताओं के लिए यज्ञ होने बंद हो गए ! जिससे देवताओं को हविष्य मिलना बन्द हो गया, परिणामस्वरूप उनकी शक्ति क्षीण होने लगी !  देवलोक में घबराहट फैल गयी। सारे देवता चिंतित हो ब्रह्मा जी के पास गए। विचार-विमर्श के बाद देवताओं ने फिर छल का सहारा लिया। ब्रह्मा जी गयासुर के पास गए और उससे कहा कि देवता एक खास यज्ञ करना चाहते हैं, जिसके लिए पवित्र स्थान चाहिए और तुम्हारे शरीर से पवित्र तो कोई जगह है ही नहीं, तो तुम अपने शरीर को इस काम के लिए प्रस्तुत करो। गयासुर इसके ल‌िए राजी हो गया और उत्तर की तरफ पांव और दक्षिण की ओर    
मुख करके लेट गया। गयासुर की पीठ पर सभी देवताओं के बैठने के बावजूद वह स्थिर नहीं हो पा रहा था, इसलिए एक भारी भरकम शिला, जो आज भी प्रेत शिला कहलाती है, को भी उसके ऊपर रखा गया पर कोई असर न पड़ता देख गदा धारण कर व‌िष्‍णु जी भी उस पर बैठे तब जा कर उसका शरीर स्थिर हुआ। उसके इस त्याग को देख कर प्रभू ने उसे यह वरदान दिया कि जब तक यह धरती रहेगी तब तक ब्रह्मा, विष्णु और शिव इस शिला पर विराजेंगे तथा तुम्हारे नाम पर यह तीर्थ गया कहलाएगा ! इस 
 
तीर्थ से समस्त मानव जाति का कल्याण होगा। आज भी ऐसा माना जाता है कि गया में जिसका श्राद्ध हो गया हो, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसीलिए गया में श्राद्ध व पिंडदान करने के बाद फिर कभी श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। मान्यता है कि गयासुर का शरीर पांच कोस में फैला हुआ था इसलिए उस पूरे पांच कोस के भूखण्ड का नाम "गया" पड़ गया। 

बिहार की राजधानी पटना से करीब 104 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गया। जहां देश के किसी भी हिस्से से 
आसानी से जाया जा सकता है।  धार्मिक दृष्टि से यह न सिर्फ हिन्दूओं के लिए बल्कि बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए भी तीर्थस्थल है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे महात्मा बुद्ध का ज्ञान क्षेत्र मानते हैं, जबकि हिन्दू गया को मुक्तिक्षेत्र और मोक्ष प्राप्ति का स्थान मानते हैं। इसलिए हर दिन देश के अलग-अलग भागों से ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बसने वाले हिन्दू गया आकर अपने परिवार के मृत परिजन की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान करते हैं।  

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 


शुक्रवार, 23 जून 2017

सुर, दैत्य, दानव, राक्षस सभी ऋषि कश्यप की संताने थीं !

धर्मग्रन्थों में असुरों  का वर्णन शक्तिशाली, अतिमानवीय और अर्धदेवों के रूप में किया गया है। कथाओं में उनके अच्छे और बुरे दोनों गुणों पर प्रकाश डाला गया है। असुरों में मुख्य, दैत्य दिति के तथा दानव दनु के पुत्र थे। राक्षस प्राचीन काल की एक प्रजाति का नाम था, जो रक्ष संस्कृति या रक्ष धर्म की अनुयायी थी, इसकी स्थापना रावण ने की थी....

पौराणिक कथाओं के अनुसार दानवों और राक्षसों का आपस में काफी पुराना बैर चला आ रहा था, इसी के चलते राक्षसराज रावण ने अपने ही बहनोई दानव विद्युतजिह्वा का वध कर दिया था। आम धारणा और बोलचाल में असुर, दानव, दैत्य और राक्षसों को तकरीबन एक जैसा ही माना जाता है। पर इनमें आपस में बहुत फर्क है। यह विषय काफी गूढ़ और पेचीदा है। हमारे ग्रंथों में इसको पूरी तरह परिभाषित किया गया है कि कैसे, कहां और किससे इन  उत्पत्ति हुई और किन कारणों से इनमें आपस में विद्वेष जन्मा। पर किसी एक ग्रंथ से पूरी जानकारी हासिल नहीं की जा सकती। तर्क-कुतर्क की बहुत गुंजाइश है। फिर भी सरल जानकारी के तौर पर जाना जा सकता है कि देवताओं की अदिति, दैत्यों की दिति, दानवों की दनु  और राक्षसों 
की सुरसा से उत्पत्ति हुई। जबकि इनके पिता एक ही थे, वैदिक ऋषि कश्यप, जिनकी गणना सप्तऋषियों में की जाती है। जिनका गोत्र इतना विशाल है कि माना जाता है कि सृष्टि के प्रसार में उनके वंशजों का योगदान ही सर्वोपरि है। पर  महान पिता की विभिन्न माताओं से जन्मी संताने, जो आपस में भाई-बहन ही थे, कभी भी एक मत नहीं हुए और अपने-अपने हित, स्वार्थ के लिए जिंदगी भर लड़ते-मरते रहे। वैसे कुछ विद्वानों का मानना है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा और उनके कुल के लोग धरती के वासी नहीं थे। उन्होंने धरती पर अपने कुल के विस्तार की खातिर आक्रमण कर यहां दैत्यों और दानवों का दमन किया जिसकी वजह से धरती और स्वर्ग के वाशिंदों में सदा के युद्ध की शुरुआत हुई थी।  

ऐसा नहीं था कि देवताओं का विरोध करने वाले असुर सिर्फ बुरे ही थे, धर्मग्रन्थों में उनका वर्णन शक्तिशाली, अतिमानवीय और अर्धदेवों के रूप में किया गया है। कथाओं में उनके अच्छे और बुरे दोनों गुणों पर प्रकाश डाला गया है। असुरों में मुख्य, दैत्य दिति के तथा दानव दनु के पुत्र थे। राक्षस प्राचीन काल की एक प्रजाति का नाम था, जो रक्ष संस्कृति या रक्ष धर्म की अनुयायी थी। इसकी स्थापना रावण ने की थी। रक्ष धर्म को मानने वाले राक्षस कहलाते थे। एक अन्य कथा के अनुसार प्रजापिता ब्रह्मा ने समुद्रगत जल और प्राणियों की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के प्राणियों को उत्पन्न किया। उनमें से कुछ प्राणियों ने सबकी रक्षा की जिम्मेदारी संभाली इसीलिए वे रक्षा करने वाले यानी राक्षस कहलाए। 

हालांकि इनकी छवि देवताओं के विरोधी होने की वजह से धूमिल मानी जाती है पर इन अलग-अलग जातियों में भी विद्वान, पराकर्मी, शूरवीर, धर्मात्मा और नेकदिल पुरुषों के साथ ही अनेक महिला विदुषियों का जन्म भी हुआ था, जिन्होंने अपनी विद्वता, साहस, त्याग और प्रेम से दुनिया भर में अपनी जाती का नाम रौशन किया था। इनमें कुछ प्रमुख हस्तियां थीं, शुक्राचार्य, गयासुर, मायासुर, बलि, प्रह्लाद, रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, माल्यवान, सुमाली, मंदोदरी, सुलोचना, वृंदा, लंकिनी, त्रिजटा आदि। 

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