pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

फूँक-फूँक कर कदम रखना

पिछले रविवार, एक स्टूल से उतरते समय अपने कदमों को जमीन पर रखने से पहले फूंकना भूल गया और पैरों के बजाए कमर के बल फर्श पर लंबायमान हो गया।  इस क्रिया के दौरान हाथों ने पैरों की नाफ़र्मानि को सुधारने की कोशिश की होगी, पर जिसका काम उसी को साजे वाली कहावत को ध्यान में नहीं रख पाए होंगे और बस आका को बचाने की कोशिश में खुद को चोटिल कर बैठे....

कहते हैं ना कि चलना ही जिंदगी है। जानवरों की तो रहने दें, वे तो जन्म लेते-लेते ही रेंगने-दौड़ने लगते हैं।  हाँ, इंसान इस क्रिया को आरंभ करने में चार-छह महीने लगा देता है। पर एक बार जो शुरू हुआ तो अपनी अंतिम यात्रा तक चलता ही चला जाता है। घुटनों से पैरों तक आने में जो भी वक्त लगे, फिर उसके पाँव एक जगह टिक नहीं पाते हैं। इसीलिए इस क्रिया को लेकर तरह-तरह के ढेरों मुहावरे भी चलन में चलते आ रहे हैं। उसी में एक कहावत है, "फूँक-फूँक कर कदम रखना।" वैसे तो इसका भावार्थ है, कि किसी भी काम को करने के पहले सोच-विचार कर, एहतियाद बरत कर, सावधानी पूर्वक काम करना चाहिए। पर शाब्दिक अर्थ के भी कुछ ऐसे ही
मायने बनते हैं। जैसे ही चालन क्रिया हरकत में आती है और बच्चा जैसे-जैसे घुटनों से पैरों तक आता जाता है उसे संभालना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है।  हर समय ध्यान रखना पड़ता है कि किसी चीज से उसके हाथ-पैरों में चोट ना लग जाए। फूँक-फूँक कर जगह साफ़ रखनी होती है। फिर जब वह किशोरावस्था से  युवावस्था में कदम रखता है तो बहुत संभावना रहती है कि उसकी चाल, उसकी दिशा सही हो। यह वह समय होता है जब बिन पीए ही इंसान के दिग्भ्रमित होने के आसार बन जाते हैं।  दिमाग में महत्वकांक्षाऐं घर कर लेती हैं। दिलो-दिमाग पर बस नहीं रहता। ऐसे में पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। जरूरी हो जाता है, उसके हर कार्य को मर्यादा के दायरे में लाना। फूँक-फूँक कर हर कार्य का निर्धारण करना पड़ता है।  फिर आता है बुढ़ापा, आँखों से दिखना कम हो जाता है, शरीर के अंग बेकाबू से होने लगते हैं।  तब दिमाग से नहीं शारीरिक कमजोरी के कारण पैरों पर भी नियंत्रण कम होने लगता है। पैरों को रखना कहीं होता है पर वे निगोड़े पड़ते कहीं और जा कर हैं। उनका यह कहीं और जा पड़ना, बचपन और जवानी से ज्यादा खतरनाक साबित होता है। बचपन की चोट, जवानी की भूल ठीक होने में ज्यादा वक्त नहीं लेती पर बुढ़ापे की चूक हफ़्तों, कभी-कभी महीनों, बिस्तर के आगोश में पड़े रहने को मजबूर कर देती है।  उस पर भी उसका दर्द जिंदगी भर सालता रह सकता है। यही वह समय होता है जब सही मायनों में कदम रखने से पहले फूंकना यानी देखना और संभलना जरुरी हो जाता है। अब चाहे जैसे भी फूँकें, फूंके जरूर।  

अब देखिए नसीहत देना कितना आसान है! दो पैरा लिख मारे !!  पर खुद पिछले रविवार, एक स्टूल से उतरते समय अपने कदमों को जमीन पर रखने से पहले फूंकना भूल गया और पैरों के बजाए कमर के बल फर्श पर लंबायमान हो गया।  इस क्रिया के दौरान हाथों ने पैरों की नाफ़र्मानि को सुधारने की कोशिश करते हुए बीच में आ संभालने की चेष्टा की, पर जिसका काम उसी को साजे वाली कहावत को ध्यान में नहीं रख पाए और आका को बचाने की कोशिश में खुद को चोटिल कर बैठे। हफ्ता ख़त्म होने को आया मालिश, सेक, परहेज के बावजूद अभी भी दाएं वाला अपने काम पर बदस्तूर हाजिर नहीं हो पा रहा है। 

 काश ! उतरते समय, कदम रखने से पहले फूँक लिया होता !!

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

कोटा में है, विभीषण का मंदिर

जैसे-जैसे इस जगह की ख्याति और जानकारी  बढ़ रही है वैसे - वैसे यहां लोगों के आने - जाने में भी बढ़ोत्तरी होने लगी  है। जिसका असर मंदिर की साज-सज्जा और रख - रखाव को देख साफ़ पता चलता है। पहले की अपेक्षा अब तो बहुत बदलाव हो गया है। पर अभी भी कोटा शहर में भी ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इस मंदिर के बारे में अनजान हैं। जो भी हो मंदिर तो है ही और पूजा भी होती ही है........!
                
#हिन्दी_ब्लागिंग

वर्षों बाद फिर एक बार पहले राजस्थान के कोटा शहर जाने का मौका मिला तो कैथून जाने का लोभ संवरण नहीं कर सका । सच कहूँ तो  कोटा जाने का मुख्य उद्देश्य ही  यही था।  शहर से  बीस-पच्चीस  कि.मी.  दूर यह वही  जगह है, जहां विश्वप्रसिद्ध कोटा-डोरिया की साड़ियां बनायी जाती हैं ! यहीं पर है, रावण भ्राता, विभीषण का दुनिया का  इकलौता मंदिर !  यहां  देवता  के रूप में उसकी पूजा की जाती है। यह मंदिर चौथी शताब्दी  का बना  हुआ है।   यहां हर साल मार्च के महीने में  मेले का आयोजन किया जाता है। आश्चर्य की बात है कि इस जगह बारे में स्थानीय लोगों को  भी पूरी जानकारी  नहीं है ! पर धीरे-धीरे, जैसे-जैसे  इसकी ख्याति  और  जानकारी  बढ़  रही  है,  वैसे-वैसे  यहां लोगों  के आने-जाने  में  भी बढ़ोत्तरी होने लगी है !  जिसका असर मंदिर की साज-सज्जा और रख-रखाव को देख साफ़ पता चलता है। पहले की अपेक्षा अब तो बहुत बदलाव हो गया है।  

यह सही है कि राम-रावण समर में विभीषण ने राम का साथ दिया था वैसे भी वह धार्मिक प्रवृति का था। पर था तो राक्षस कुल का ही, ऊपर से  भाई के विरुद्ध जाने के कारण उसे कुलघाती माना जा कर दुनिया भर की बदनामी भी मिलती रही है । फिर भी उसके मंदिर का होना एक आश्चर्य का विषय है। यहां मंदिर बनने की कथा कुछ इस प्रकार है कि जब लंका-विजय के पश्चात श्री राम का राज्याभिषेक होने लगा तो सारे ब्रह्माण्ड से अतिथियों का आगमन हुआ था। कैलाश से शिव जी और लंका से विभीषण भी पधारे थे। समारोह के पश्चात शिव जी ने हनुमान जी से भारत भ्रमण की
मंदिर का पार्श्व भाग 
इच्छा जाहिर की तो विभीषण ने आग्रह किया कि शिव जी और हनुमान जी को कांवड़ में बैठा कर यात्रा करवाने की उनकी कामना को पूरा करने का सुयोग प्रदान किया जाए।भगवान शिव मान तो गए पर उन्होंने एक शर्त रख दी कि यदि यात्रा के दौरान कहीं कांवड़ भूमि से छू गयी तो वहीँ यात्रा का अंत कर दिया जाएगा।  विभीषण ने बात मान ली और एक ऐसी कावंड बनवाई जिसके दोनों छोरों में आठ कोस की दूरी थी। उसी में एक तरफ शिव जी तथा दूसरी तरफ हनुमान जी बैठ गए। पर प्रभुएच्छा से कुछ समय बाद जब ये लोग कैथून, तब की कनकपुरी, पहुंचे तो शिव जी वाला हिस्सा जमीन से छू गया और शर्तानुसार यात्रा वहीँ ख़त्म हो गयी। जिस जगह शिव जी उतरे वह जगह थी चौमा गांव वहीँ उनका मंदिर भी बना। उसी
अंदरुनी भाग 
तरह कोटा के रंगबाड़ी स्थान पर हनुमान जी स्थित हो गए, दोनों जगहों की प्रतिमाएं आज भी अपनी अपूर्व छटा के साथ विद्यमान हैं। इसी तरह इनके बीचोबीच कैथून में, जहां विभीषण जी ठहरे थे, वहाँ उनके मंदिर की स्थापना हो गयी। जहां उनके धड़ के ऊपरी भाग की पूजा की जाती है।

मंदिर के अंदर की छत 
अपने यहां बचपन से ही कथा-कहानियों के सुनने-सुनाने का दौर शुरू हो जाता है और घरवालों की आस्था तथा मान्यताओं के अनुरूप ही हम अपने मन में उन कथाओं के चरित्रों की छवि गढ़ लेते हैं,  जो ता-उम्र वैसी ही बनी रह कर आगे भी उसी रूप में स्थानांतरित होती चली जाती है। ये अलग बात है कि कोई चरित्र किसी के लिए नायक का होता है तो वही किसी और के लिए खलनायक का। इसका कारण स्थान, वहां के लोगों की आस्था, वर्षों से चली आ रही मान्यताएं कुछ भी हो सकता है। पर अभी भी कोटा शहर में भी ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इस मंदिर के बारे में अनजान हैं।  जो भी हो मंदिर तो है ही और पूजा भी होती ही है। कभी कोटा जाएं तो इस जगह को जरूर ध्यान में रख घूम कर आएं।     

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

गेपरनाथ, भोलेनाथ का एक और रूप

मंदिर के अंदर जगह इतनी कम और संकरी है कि बमुश्किल दो लोग ही झुक कर अंदर बैठ सकते हैं। वहीँ से कुछ नीचे, पहाड़ी से गिरी हुई छोटी-बड़ी शिलाओं से घिरा, एक ताल है, जिसमें पहाड़ों से आ-आ कर पानी एकत्र होता रहता है। हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं। जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है

देव स्थान जितना दुर्गम होता है उसकी प्रमाणिकता उतनी ही बढ़ जाती है। खासकर पहाड़ों के दुर्गम रास्तों के बाद अपने गंतव्य पर जा अपने इष्ट के दर्शन मिलने पर आस्था और विश्वास दोगुना हो जाता है। कष्ट सह कर पहुँचने पर जिस अलौकिक आनंद की अनुभूति मिलती है वह वर्णनातीत होती है। पहाड़ों के अलावा भी हमारे देश में कई ऐसे स्थान हैं, जहां पहुँचना कुछ कष्ट-साध्य ही माना जाएगा। ऐसा ही एक  स्थान है, कोटा बूंदी मार्ग
घाटी के विहंगम दृश्य में दूर नीचे दिखता मंदिर
पर शिव जी का एक मंदिर जिसे स्थानीय लोग बाबा गेपरनाथ के रूप में पूजते हैं। ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि के आस-पास शिव जी अपने पूरे परिवार के साथ कुछ समय यहां गुजारते हैं। इस जगह को करीब पांच सौ साल पुराना बतलाया जाता है।    
गहरी घाटी 

 सीढियाँ 

झरता पानी 
कोटा शहर से करीब 24-25 कि.मी. की दूरी पर एक सड़क दायीं ओर मुड़ती है, जो दो किमी बाद चम्बल की घाटी और उस पर बने प्राकृतिक पहाड़ी संकरे दर्रे पर जा कर ख़त्म होती है। ऊपर से घाटी गहराई 800 से 1000 फिट तक की है। वहीँ से पहाड़ी की एक दिवार से जुडी हुई सीढ़ियों की श्रृंखला नीचे तक चली गयी है। करीब चार सौ सीढ़ियां उतरने के बाद, भूतल से करीब 100 फिट पहले एक चबूतरे पर खोह नुमा जगह पर शिव जी का छोटा सा लिंग स्थापित है जिस पर पहाड़ी के अंदर से लगातार पानी आ कर अभिषेक करता रहता है। जगह इतनी कम और संकरी है कि बमुश्किल दो लोग ही झुक कर अंदर बैठ सकते हैं।
मंदिर 
सीढ़ियों से नज़र आता मंदिर 

शिवलिंग और अभिषेक करती जल-धारा 
वहीँ से कुछ नीचे, पहाड़ी से गिरी हुई छोटी-बड़ी शिलाओं से घिरा, एक ताल है, जिसमें पहाड़ों से आ-आ कर पानी एकत्र होता रहता है। हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं ।जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है।
ताल और दूसरे सिरे पर कंदराएँ 
दर्रे की दूसरी दिवार पर भी कुछ कुटियानुमा कंदराएँ नज़र आती हैं जिनके बारे में बताया जाता है कि पहुंचे हुए साधू-संत वहाँ रह कर अपनी साधना पूरी किया करते थे। देख सुन कर आश्चर्य होता है कि इतने दुर्गम, निर्जन, सुनसान, दुरूह इलाके की खोज कैसे हुई होगी। आज तो दस तरह की सहूलियतें उपलब्ध हैं। नीचे जाने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कर दिया गया है।

पहाड़ी से गिरे शिलाखंड
 बिजली तो खैर आज भी नहीं है, पर सैकड़ों साल पहले जब इलाका जनशून्य होता होगा, जंगली जानवरों की बहुतायद होगी,   तब कैसे   कोई   यहां आकर    साधना में लीन होता होगा।  इस जगह के रात के अँधेरे में की कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है।
वापस चढ़ते समय रुकना तो पड़ता ही है भाई  
वैसे दिन की रौशनी में प्रकृति की अपूर्व छटा साल भर लोगों को लुभा कर प्रभू के दर्शन के अलावा युवाओं को पिकनिक के लिए भी आमंत्रित करती रहती है। पर अभी भी लोगों की आमद ज्यादा नहीं है, बमुश्किल डेढ़-दो सौ लोग ही रोज आते होंगे। फिर भी कभी मौका मिले तो ऐसी अद्भुत जगह के दर्शन करने का सुयोग छोड़ना नहीं चाहिए।  

रविवार, 31 जनवरी 2016

रामायण की उप-कथा से जुड़ा कोटा का हनुमान जी का मंदिर

 रंगबाड़ी इलाके में विराजमान हनुमान जी 
चिर-काल से ही हमारे यहां कथा-कहानियों का चलन रहा है। धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, काल्पनिक, यथार्थवादी हर तरह के किस्से चलन में रहे हैं। समय के साथ-साथ परिवेश के अनुसार उनमें थोड़े बहुत फेर-बदल होते रहते हैं, उनमें उपकथाएं, उप-उप कथाएं जुड़ती रहती हैं। कभी-कभी तो इस जोड़-घटाव के कारण मूल कथा का स्वरूप ही बदल जाता था। एकाधिक बार  आख्यानों में आध्यात्मिक सत्य को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए काल्पनिक कथाओं का सहारा भी  लिया जाता  रहा है, जिसे कथा की रोचकता या कथानक पर अटूट आस्था के कारण पाठक अनदेखा कर देता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार तो कहानियाँ बनीं ही, धार्मिक और काल्पनिक गल्पों को सच्चाई के करीब लाने के लिए साक्ष्य खोजे और गढ़े गए। ऐसे अनोखे स्मारक देश भर में दिख जाते हैं।  पिछले दिनों महाकाव्य रामायण की एक उपकथा से जुड़े अवशेष राजस्थान के कोटा शहर में देखने का मौका मिला। कथा के अनुसार श्री राम के राज्याभिषेक पर भगवान शिव और हनुमान जी की भारत दर्शन की इच्छा को पूरा करने का जिम्मा लंका नरेश विभीषण ने लिया और उन्हें वृहदाकार कांवड़ में बैठा यात्रा शुरू तो कर दी पर शिव जी की शर्त के अनुसार कांवड़ के कहीं भी जमीन से छू जाने से यात्रा समाप्त हो जाएगी, के चलते उन्हें कोटा में अपना प्रयाण खत्म करना पड़ा था।  

कांवड़ के जिस हिस्से के धरा को छूने से शिव जी उतरे वह जगह थी चौमा गांव, वहीँ उनके मंदिर का निर्माण हुआ। उसी तरह कांवड़ का दूसरा सिरा जिस पर हनुमान जी बैठे थे वह रंगबाड़ी नामक जगह पर टिका वहीँ उनका मंदिर बना। पिछले दिनों कोटा प्रवास पर यहां बालाजी के दर्शन करने का सुयोग मिला था।      

बुधवार, 27 जनवरी 2016

फ्रांस के राष्ट्रपति के भोज में ऐश्वर्या ही क्यों ?

इसमें अमिताभ बच्चन की दखल या रसूख की कोई भूमिका नहीं थी। ऐश्वर्या की फांस में उसकी छवि और पहचान ने ही यह सम्मान जुटाया था।

कल काफी दिनों बाद 26 जनवरी की छुट्टी पर ठाकुर जी मेरे यहां आए। कुशल-क्षेम की जानकारी तो फोन पर हासिल हो जाती थी पर आमने-सामने बैठ वार्तालाप हुए एक अरसा हो गया था। इधर-उधर की बातचीत के बाद अपनी आदत के अनुसार उन्होंने एक सवाल दाग ही दिया कि, शर्मा जी ये बताइये कि इतनी नामचीन, कुशल, अभिनय-प्रवीण अन्य अभिनेत्रियों के होते हुए भी कल फ्रांस के राष्ट्रपति के भोज में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को ही क्यों आमंत्रित किया गया ? क्या अमिताभ बच्चन की पहुँच के कारण ?

सवाल जायज था, समीचीन भी और प्रासंगिक भी। यह बात बहुत से लोगों के जेहन में उठी भी होगी। पर आम-जन के हित-अहित से कोई सरोकार ना होने के कारण कोई ख़ास तवज्जो नहीं मिल पायी और आम खबर की तरह आई-गयी हो गयी थी। पर सवाल तो सवाल था जिसका सही उत्तर भी होना चाहिए ! तो जहां तक मेरा अंदाज था और मुझे समझ में आया, इसमें अमिताभ बच्चन की दखल या रसूख की कोई भूमिका नहीं थी। ऐश्वर्या की फांस में उसकी छवि और पहचान ने ही यह सम्मान जुटाया था। पहली बात तो यह कि वहाँ की सरकार द्वारा उसे वहाँ के सबसे बड़े नागरिक सम्मान "Knight of the Order of Arts and Letters" से नवाजा जा चुका है। दूसरे वह वहाँ, दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म समारोह, "केन्स फिल्म फेस्टिवल" की तकरीबन नियमित मेहमान रही है। वहीँ उसकी दूसरी पारी की फिल्म "जज्बा" सबसे पहले फ्रांस में ही दर्शकों के सामने पेश की गयी थी। तीसरे वह फ़्रांस की मशहूर कॉस्मेटिक कंपनी "L’Oral Paris" की भी ब्रांड एबेंस्डर है। फिर पेरिस में उसने कई फिल्मों की फिल्मांकन में भाग लेकर वहाँ अपनी पहचान बना रखी है। वैसे भी एक सौम्य, गरिमामय, बुद्धिजीवी, विवादहीन, प्रतिष्ठित परिवार का सदस्य होने का फायदा तो होता ही है। 

यही सब वे वजहें हैं जो उसे दूसरी अभिनेत्रियों की बनिस्पत तरजीह दी गयी होगी। 

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

पंद्रह किलो सोने के साथ बाबागिरी !

वैसे तो "बाबा" शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे दादा, बुजुर्ग व्यक्ति और कहीं बालक भी। पर वृहद रूप में इस शब्द को ऐसे इंसान के लिए प्रयोग किया जाता है जिसने मोह-माया त्याग दी हो, सन्यास ले लिया हो, योगी हो। खुद को अनुशासित कर हर तरह की कुटेव से दूर रहता हो।  हमारे ग्रंथों और ज्ञानी-जनों के अनुसार ऐसा इंसान दुनिया की मोह-माया को त्याग प्रभू से लौ लगा लेता है, उसका किसी भी भौतिक चीज से व्यक्तिगत लगाव नहीं रहता, उसके मन में सिर्फ प्रेम बसता है, भक्ति बचती है, सर्वहारा के लिए करुणा शेष रह जाती है वह अपने-आप को परम-सत्ता को समर्पित कर देता है।

पर आजकल सारी मान्यताएं, धारणाएं बदली-बदली सी नजर आने लगी हैं। सन्यास लेने के बाद, बाबा कहलाने के बावजूद भी लोग मोह-माया नहीं त्याग पाते।  गुरु बन जाते हैं। शिष्यों की फौज खड़ी हो जाती है।  सैंकड़ों एकड़ में आश्रम खुल जाते हैं। ऐसे गुरु स्वयं ही भौतिक जगत से मुक्त नहीं हो पाते तो शिष्य को क्या मुक्ति दिला पाएंगे। यहाँ भी घृणा, द्वेष, शोषण, भय, प्रसिद्धि पाने की ललक, अपने-आप को श्रेष्ठ साबित करने की हवस, सब स्थाई भाव हैं। यहाँ भी जिसके साथ जन-बल होता है, सत्ता होती है, वह अराजक बन जाता है। यहां भी वह सब कुछ होता है, जो बाकी भौतिक जगत में होता है, अंतर होता है तो केवल वस्त्रों के रंग का | अपने-आप को औरों से अलग दिखाने की चाहत, समाज में अपने नाम की चर्चा की ललक, किसी भी तरह प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा के लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। जिसका नाम भी कभी नहीं सुना गया हो, वह भी अपने क्रिया-कलापों से रातों-रात मशहूरी पा लेता है। समाज में चर्चा का विषय बन जाता है। जैसा कि अभी पिछले दिनों एक तथाकथित बाबा की, अपने स्वर्ण-प्रेम के चलते, बहुत चर्चा थी मीडिया में। अक्सर हरिद्वार से कांवड़ ले दिल्ली आने वाले इस शिव-भक्त के शरीर पर पंद्रह किलो (इनके शिष्यों के अनुसार आठ किलो) सोना, जिसकी कीमत तकरीबन तीन करोड़ के ऊपर होगी सदा शोभायमान रहता है। किसी समय के व्यापारी ने अपने ताम-झाम से लोगों को आकृष्ट करवा अब "गोल्डन बाबा" की उपाधि हासिल कर ली है।       

अनगिनत नकारात्मक खबरों के बावजूद रोजमर्रा की परेशानियों से जूझते, किसी अलौकिक चमत्कार की आशा में अभी भी लोगों की आस्था, विश्वास, श्रद्धा साधू-सन्यासियों के प्रति कम नहीं हुई है। पर उनसे आशा रखते हैं मार्ग-दर्शन की। अपेक्षा रखते हैं सात्विकता की। उन्हें लगता है कि ऐसे लोग आध्यात्म को गहराई से समझते हैं, प्रभू के ज्यादा करीब हैं इसलिए उनकी मुश्किलों का उनके कष्टों का, उनकी परेशानियों का निवारण कर सकते हैं। उनके दिमाग में ऐसे लोगों की छवि प्रभू के दूत की बन जाती है इसीलिए उनकी बेजा हरकतें भी उन्हें नागवार नहीं गुजरतीं। 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

युद्ध-रत, कर्ण-घटोत्कच की अद्भुत प्रतिमा

राजस्थान के कुशल कारीगर तो सदा पाषाण में प्राण फूँकते रहे हैं।  उनके द्वारा निर्मित एक से एक उत्कृष्ट कलाकृतियां देश-विदेश में सराहना पाती रही हैं। ऐसी ही एक 2013 में निर्मित एक शानदार, विलक्षण, अद्भुत, वृहदाकार प्रतिमा राजस्थान के कोटा शहर के महावीर नगर 3 और रंगबाड़ी इलाके के एक चौराहे पर स्थित है। जिसमें महाभारत के उस पल को अतीत की गहराइयों से निकाल यादगार बना दिया गया है, जब कर्ण ने घटोत्कच के युद्ध-तांडव से कौरव सेना को बचाने के लिए, अर्जुन के वध के लिए संभाल कर रखे "शक्ति बाण" का प्रयोग कर वीर घटोत्कच का वध किया था।
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पूरी की पूरी मूर्ति ही अद्भुत है। जिसके एक-एक इंच पर कारीगरों की कला सजीव हो उठी है। इसकी भव्यता तो सिर्फ देख कर ही महसूस की जा सकती है उसका वर्णन करना मुश्किल है। ऎसी ही एक प्रतिमा बाली, इंडोनेशिया में भी स्थापित की गयी है।      

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...