शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

सेमीनार का सफल समापन, भूटान यात्रा वृतांत - 6

सार्क समिति की महिला विंग तथा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्ष श्रीमती थिनले ल्हाम, जो इस सम्मेलन की विशेष अतिथि थीं वे भी आ गयीं। भूटान का प्रतिनिधित्व करता एक और  सरल और खुशमिजाज चेहरा। परिकल्पना (Provide Authentic Reliable Initial Knowledge And assign Literary Programme And Network Analysis) का उद्देश्य जान-समझ कर उन्होंने इसकी काफी प्रशंसा की और चाहा कि भूटान में भी ब्लागरों की संख्या में इजाफा हो।

लोगों से ही तो देश बनता है। जैसे लोग वैसा देश, वैसी ही उसकी पहचान। लोग सरल, सौम्य, हंसमुख, खुशहाल हैं तो संसार में उनका देश भी उसी रूप से जाना जाता है। भूटान की पहचान ऐसे ही नहीं दुनिया के आठवें खुशहाल देश के रूप में की जाती। जबकि एशिया में वह इस मामले में पहले नंबर पर है।    

16 जनवरी 2015,         
सुबह से ही गहमागहमी थी। सभी लोग अपनी-अपनी तैयारियों में लगे हुए थे। ख़ासकर महिला सदस्य कुछ ज्यादा ही व्यस्त थीं,
दोहरा काम जो करना पड़ रहां था, खुद को और अपने प्रेजेन्टेशन को समय पर तैयार करने के लिए। सभा-गृह पास ही था कोई सौ मीटर दूर, ज़रा सी ऊंचाई पर। रह-रह कर मनोज जी वहां की व्यवस्था का जायजा ले रहे थे।   किसी भी तरह की कोर-कसर रह न जाए सबका इसी पर ध्यान था। भूटान में समय हमारे भारतीय समय से आधा घंटा आगे चलता है, इसका सदा ध्यान रखना पड़ता था। अभी मुख्य अतिथि के आने में कुछ समय था तो सुमन जी, दास जी, गुलशन जी तथा मैं होटल से कुछ दूरी पर स्थित एक पुराने बौद्ध मंदिर की तरफ बढ़ लिए। मंदिर में ताला लगा हुआ था पर वहाँ के छोटे लामा ने हमारे लिए उसे खोल दर्शन करवा दिए। इस जगह का इतिहास में साफ उल्लेख नहीं है, इतना ही पता चलता है कि  किसी राजा का एक विशाल महल था जो एक अग्निकांड में पूर्णतया नष्ट हो गया था, उसी की याद में उस जगह के मध्य में इस मंदिर को बनवाया गया था। 

घड़ी किसी चीज की परवाह या इंतजार करे बिना चली जा रही थी, उसी से पता चला कि सेमीनार का वक्त आ पहुंचा है। हम चारों जाने जल्दी से सभा-कक्ष की ओर बढ़ लिए। वहां सारी तैयारियां हो चुकी थीं। देशपांडे परिवार ने भी कक्ष के एक तरफ अपने रूमालों और कार्डों के संकलन को सजा दिया था। कार्यक्रम के शुभारंभ के पहले गणेश वंदना फिर स्वागत गीत के उपरांत विभिन्न पुस्तकों के साथ-साथ "परिकल्पना समय" के जनवरी अंक का विमोचन भी होना था। तभी मुख्य अतिथि श्री फूप श्रृंग, जो भूटान चैंबर ऑफ कॉमर्स के मुख्य सचिव हैं, निर्धारित समय पर आ उपस्थित हुए। इतने बड़े पद पर होने के बावजूद कोई ताम-झाम नहीं, कोई फूं-फां नहीं, समय का पाबंद, सीधा-साधा हंसमुख बंदा, इतना विनम्र कि स्नेह उमड़ पड़े। उनके अनुसार भूटान का हर नागरिक अपनी संस्कृति, अपनी धरोहर, अपने पर्यावरण को बचाने के लिए अलिखित रूप से वचन-बद्ध है। राजा और प्रजा इस बारे में कटी-बद्ध हैं कि संसार के दूसरे देशों की तरह
आर्थिक संपन्नता को हासिल करने के चक्कर में कहीं आने वाली पीढ़ी अपनी मासूमियत, अपना चैन, अपना संतोष न खो बैठे। इसीलिए पर्यटन पर ज्यादातर टिकी अर्थ व्यवस्था के बावजूद हर साल सिमित पर्यटकों को ही भूटान आने की अनुमति दी जाती है और इस बात का ख़ास ख्याल रखा जाता है कि कोई अवैध रूप से यहां रहने न लग जाए। वैसे भारतीयों के लिए यहां के लोगों में खासा मैत्री भाव है हो भी क्यों न, देश को सबसे बड़ा सहारा भारत ही तो प्रदान करता है।

सार्क समिति की महिला विंग तथा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्ष श्रीमती थिनले ल्हाम, जो इस सम्मेलन की विशेष अतिथि थीं वे भी आ गयीं। भूटान का प्रतिनिधित्व करता एक और सरल और खुशमिजाज चेहरा। परिकल्पना (Provide Authentic Reliable Initial Knowledge And assign Literary Programme And Network Analysis) का उद्देश्य जान-समझ कर उन्होंने इसकी काफी प्रशंसा की और चाहा कि भूटान में भी ब्लागरों की संख्या में इजाफा हो।  इन दोनों अतिथियों का स्वभाव और सरलपन देख अपने यहां के अकड़ू व्ही.आई पियों. की याद आ गयी जो आते बाद में हैं पर माहौल के लिए तनाव पहले भिजवा देते हैं। खैर कुछ अति-उत्साहित सदस्यों के जोश के बावजूद सब कुछ बिलकुल बढ़िया तरीके से निपट गया। अब पेट-पूजा तदोपरांत शहर-दर्शन की बारी थी।
ठंड से राहत दिलाती धुप 


इस बार शहर घुमाने-दिखाने की जिम्मेदारी ली होटल के केयर-टेकर सुपुत्र श्रृंग देधूप ने, जीभ को अच्छी-खासी कसरत करवाने के बावजूद नाम का सही उच्चारण न होता देख उस छोटे पर अक्लमंद, युवा-वस्था की ओर अग्रसर, बालक ने अपने-आप को छोटू कहने की गुजारिश कर दी जो सभी को रास भी आ गयी। बाजार पहुंच सब तितर-बितर हो गए, अपने-अपने हाथों में तोते लिए हुए। देश में पीछे छूटे अपनों के लिए कुछ न कुछ उपहार जो ले जाने थे। पर अधिकांश लोगों के हाथों के तोते तब उड़ गए, आँखें कुछ ज्यादा ही चौड़ी हो गयीं जब कानों में साधारण सी चीजों की कीमत असाधारण वस्तुओं के मूल्यों से भी ज्यादा
भारत के ताज ग्रुप का होटल ताज 
सुनाई दीं। आधों ने वहीं मैदान छोड़ दिया, कुछेक ने हिम्मत कर अपनी जेब ढीली की। अब क्या करें देश में पीछे इंतज़ार करते हुओं के लिए कुछ तो ले जाना ही था। अब सब तो सुनीता यादव तो थे नहीं, जिन्होंने भारतीय महिलाओं का परचम फहराते हुए भूटान के दुकानदार को भी मजबूर कर दिया अपनी "बार्गेनिंग" से।  चाहे खरीदारी में भूटानियों ने निराश किया हो पर उनके व्यवहार ने मन जीत लिया। मैं अकेला हंड्याते हुए सड़क पार करने जेब्रा क्रासिंग पर उधर आती कारों को देख खड़ा हो गया पर उस समय सुखद आश्चर्य हुआ जब कारें आ वहां रुक गयीं और पहले मुझे सड़क पार करने का इशारा किया गया। अपने देश के किसी भी हिस्से में क्या ऐसा अनुभव संभव है ?           

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

पहुंचना फुशलिंग से थिम्फु - भूटान यात्रा भाग - 5

भूटान के चतुर्थ ब्लॉगर सम्मेलन की एक ख़ास बात यह थी, जिसका जिक्र कहीं नहीं आ पाया है, कि इसके सबसे छोटे और वरिष्ठ सदस्य के बीच तकरीबन साठ साल का फर्क था। पर इस फर्क को किसी ने फर्क न मानते हुए माहौल पर फर्क नहीं पड़ने दिया। 

पता नहीं क्यों ऐसा होता है कि जब कहीं जाने का मौका दरवाजे पर दस्तक देता है तो परिस्थिति रूपी कंबल शरीर को इस तरह जकड लेता है कि दरवाजा खोलने का अवसर ही निकल जाता है। पर इस बार भूटान यात्रा का प्रस्ताव मिलने पर मैंने निश्चय किया कि कंबल उतार फेकना है.......और आश्चर्य !  वह बड़ी आसानी से अलग हो एक अविस्मरणीय यात्रा का अनुभव लेने का संयोग दे गया।     

सबसे छोटी सदस्य अदिति 
भूटान के चतुर्थ ब्लॉगर सम्मेलन की एक ख़ास बात यह थी, जिसका जिक्र कहीं नहीं आ पाया है, कि इसके सबसे छोटे और वरिष्ठ सदस्य के बीच तकरीबन साठ साल का फर्क था। पर इस फर्क को किसी ने फर्क न मानते हुए माहौल पर फर्क नहीं पड़ने दिया। सबने हमउम्रों की तरह भूटान के इन चार दिनों को अपने जीवन के अमोल क्षणों की तरह संजोया।  

नए जलपाईगुड़ी शहर से भूटान के फुशलिंग (Phuentsholing) को एक द्वार जोड़ता है। यदि दरवाजे के बीच खड़े हो जलपाईगुड़ी की तरफ देखें तो भारत के दूसरे शहरों की तरह का नजारा ही नजर आएगा, भीड़ भरी सड़कें, धक्कम-पेल, दो-तीन-चौ पहिए एक दूसरे को ठेलियाते हुए, ठेले वाले, मुसाफिर, उन्हीं के बीच सांड, कुत्ते, गाएं पगुराते हुए, परेशान पुलिस वाला, हार्नों का शोर, धुंआ। दूसरी तरफ एक शांत, साफ-सुथरा इलाका, न शोर न ही भीड़-भाड़ नही अफरा-तफरी। जाहिर है हमारी समस्याओं का एक अच्छा- खासा प्रतिशत बेकाबू जनसंख्या के कारण भी है। खैर अपना देश है जैसा भी है अपना है, गर्व है इस पर हम सब को। 

होटल वांग्चुक 
फुशलिंग में सुबह नाश्ते बाद 36 गढ़ और उत्तर-प्रदेश के अनदेखे अपनों का परिचय थिम्फु की ओर बस में रवाना होने पर ही ठीक से हो पाया। क्योंकि यह यात्रा तकरीबन 6-7 घंटों की थी सो इस अवधि का भरपूर उपयोग किया गया। बस में एक से एक दिग्गज थे, जिन्हें अपने-अपने क्षेत्र में महारत हासिल थी। ऐसे में कविता, गीत, हास्य-व्यंग्य, का जो समा बंधा कि पता ही नहीं चला कि कब हंसते-गाते-खाते-पीते थिम्फु पहुंच गए। पर इस बीच सब ऐसे घुल-मिल गए थे जैसे सबका वर्षों पुराना परिचय हो। दोपहर बाद करीब तीन बजे बस ने होटल वांग्चुक उतारा जहां पहले से मौजूद श्री रविन्द्र प्रभात ने खुले दिल से सबका स्वागत किया। ऐसी पहाड़ी यात्राओं में समय का पता नहीं चलता, ऊपर से यहां सूर्य देवता को भी अस्ताचल जाने की जल्दी रहती है, जिससे पर्यटकों को कुछ तो हड़बड़ाहट हो ही जाती है। आज भी समय कम था, थिम्फु पहुंच शहर घूमने की बात थी, सो सभी लोग अपने-अपने निर्धारित कमरों में जा जल्दी-जल्दी "फ्रेश" हो लिए। कुछ खा-पी कर शहर देखने निकल पड़े
होटल का अंदरुनी भाग 

पर कुछ ने कल की थकान मिटाने के लिए विश्राम करना उचित समझा। कुछेक घंटों के बाद फिर एक बार सब रात के भोजन पर भोजन-कक्ष में इकट्ठा हुए, समा बंधा, गोष्ठी हुई पर सिर्फ कुछ देर के लिए, थकावट सब पर भारी पड रही थी। दूसरे दिन की तैयारी भी करनी थी। सेमीनार जो था।

समय था रात के पौने दस का, तारीख थी 15 जनवरी, दिन था गुरुवार।
              

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

गुमनाम लोग, जिनके बिना भूटान यात्रा की सफलता संदिग्ध थी

श्री रजत मंडल 
भूटान में शाकाहारी भोजन मिलना नामुमकिन तो नहीं कुछ मुश्किल जरूर है। इसलिए यह परिकल्पना सम्मलेन के संयोजकों की दूरदर्शिता ही कहलाएगी कि उन्होंने खान-पान की व्यवस्था शुरू से ही अपने साथ कर रखी थी। जिसका भार श्री रजत मंडल, श्री सुमंत वसु उनके मैनेजर श्री दीपांकर मंडल तथा दो सहयोगियों ने, जो बिहार से थे, बड़ी कुशलता-पूर्वक संभाल रखा था। जरूरत का सामान भारत से ही लेकर चला गया था। रोज की आवश्यक वस्तुएं यथा दूध, फल, सब्जी वगैरह के लिए ही भूटान के बाजारों का रुख किया जाता था। वैसे भी भारत की तुलना में भूटान में मंहगाई काफी ज्यादा है। 

थिम्फु का भोजन-कक्ष 
उतनी ठंड के बावजूद, जब हाथ-पैर जमते से लगते हों, गर्म कमरे से बाहर आना दंड-स्वरुप हो, वैसे परिस्थितियों में भी सुबह की चाय होटल के एक-एक  कमरे में उपलब्ध करवाई जाती रही। जल्दी यात्रा आरंभ होने की सूरत में भी कभी नाश्ते में विलंब नहीं होने दिया गया। कैसा भी "हेक्टिक" सफर हो दिन का खाना अपने समय पर हाजिर होता रहा। कहीं पहुंचने में कैसी भी देर हो जाए इस पूरी टीम ने रात के खाने को समय पर उपलब्ध करवाया। इस के अलावा रोज अलग-अलग सुरुचि-पूर्ण व्यंजन, वह भी ऐसे कि सभी को रास आ जाएं। इसी कारण अनजानी जगह, अनजाने वातावरण, अनजाने हवा-पानी के बावजूद सारे सदस्य पूरी तरह स्वस्थ व प्रसन्न रह सके। किसी की
तबियत ज़रा सी भी नासाज नहीं हो पाई।

इस टीम के बिना इस भूटान यात्रा की सफलता संदिग्ध ही रहती। ये सब ऐसे नींव के पत्थर साबित हुए, जिन पर बनी इमारत की तो सभी प्रशंसा करते रहे, पर इनकी मुसीबतों, इनकी तकलीफों, विपरीत परिस्थितियों में भी बिना किसी शिकायत के अपने काम को अंजाम देते रहने के बावजूद इनके कार्य को  यथोचित सराहना नहीं मिल पाई। जबकि ये लोग ऐसे प्रदेशों से आए थे जहां भूटान जैसी ठंड की कल्पना भी नहीं की जाती। फिर भी किसी को इन्होंने शिकायत का मौका नहीं दिया।                
        

शनिवार, 31 जनवरी 2015

इसके पहले कि "थिम्फु" पहुंचें..........

vth king, JKN Wangchuk
भूटान, दक्षिणी एशिया में एक तरफ चीन और तीन तरफ से भारत से घिरा धरती पर स्वर्ग का एक टुकड़ा। इतिहासकारों के अनुसार  भूटान शब्द  संस्कृत के भोट-अंत,   यानी जहां तिब्बत की सीमा  ख़त्म होती हो या फिर भू-उत्तान, यानी ऊंचाई वाली जगह के पहचान स्वरूप बना है। इसका सबसे बड़ा शहर और राजधानी "थिम्फु" है। भूटानी में भूटान का नाम Druk Yul है जिसका अर्थ है थंडर ड्रैगन का स्थल। 
नीला पॉपी 

करीब आठ लाख की आबादी वाला यह देश भगवान बुद्ध को सर्वोपरि मानता है। विश्व में यह अकेला देश है जो बौद्ध वज्रयान धर्म को अपनाए हुए है। यहां के लोग हंसमुख, शांति-प्रिय, मृदुभाषी, मिलनसार तथा अपने राजा के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। यहां की प्रजा अपने राजा को  पिता समान मानती है और यहां आने वाले पर्यटकों से भी उम्मीद करती है कि वे उनका सम्मान करें। राजाज्ञा ही उनके लिए कानून है। हो भी क्यों न !  गरीबी के बावजूद यहां शिक्षा और स्वास्थय सेवा मुफ्त है। राजा की
राष्ट्रीय पशु ताकिन 
तरफ से हर घर से एक सदस्य को नौकरी 
उपलब्ध करवाई जाती है। सरकारी नौकरी में लगे हर स्त्री-पुरुष को राष्ट्रीय पोशाक पहनना आवश्यक है। परुषों का परिधान 'घो' और स्त्रियों की पोषक 'किरा' कहलाती है। बेटियों को यहां बेटों से ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं। समाज का नजरिया "खुला" है। यह एशिया का प्रथम और विश्व का आठवां  सबसे खुशहाल देश है। इसीलिए पर्यटकों के लिए यह शायद विश्व का सबसे सुरक्षित देश माना जाता है।   भूटानी अपने पूजा स्थलों के प्रति भी बहुत संवेदनशील होते हैं। यहां पवित्र स्थलों ढक कर जाना अच्छा नहीं समझ जाता।   
नीला पॉपी, जो एक दुर्लभ फूल है, यहां का राष्ट्रीय पुष्प है। इनके राष्ट्रीय पशु का नाम ताकिन है। इसका मुंह
बकरी के सामान तथा बाक़ी शरीर गाय के जैसा होता है। राष्ट्रिय पक्षी का दर्जा तीन आँखों वाले दुर्लभ पक्षी को प्राप्त है। भूटान के ऊपरी हिस्से में नीली भेड़ें पाई जाती हैं. 
यहां की भाषा भूटानी है जिसे Dzongkha कहा जाता है। तीरंदाजी यहां का राष्ट्रीय खेल है, वैसे फूटबाल और क्रिकेट भी काफी लोकप्रिय हैं। यहां की करेंसी Ngutrum है जो हमारे रुपये के बराबर मूल्य रखती है। रुपये का लेन - देन आम है। सिगरेट-तंबाखू तथा पॉलीथिन को पूरी तरह बैन करने वाला यह विश्व का एकमात्र देश है। ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए यहां गाड़ियों के हार्न बजाना भी मना है। अपनी यात्रा के चार दिनों में कहीं भी कर्कश शोर सुनाई नहीं पड़ा। विश्व में सिर्फ दो देशों की राजधानियां ऐसी हैं जहां सडकों पर कोई ट्रैफिक लाइट्स
साफ-सुथरा शहर 
नहीं हैं। पहली प्रशांत सागर में स्थित Palau की राजधानी Ngerulmud तथा दूसरी भूटान की राजधानी थिम्फू, इसके बावजूद यहां यातायात संबधित कोई परेशानी नहीं दिखाई दी।  


विज्ञापनों में कई बार दिखा होगा, मुस्कुराइए कि आप फलानी जगह हैं, यहां बिना कहे ही आपके होटों पर मुस्कराहट तिर जाएगी। यदि जिंदगी कभी मौका दे तो स्वर्ग के इस छोटे से टुकड़े को अपनी यात्रा में जरूर शामिल करें। 

यहां एक ही दिक्कत हुई इन चार दिनों में किसी भी एक इंसान का नाम ना ठीक से समझ पाए ना ही उच्चारित किया जा सका।  :-)  

बुधवार, 28 जनवरी 2015

भूटान में पहला दिन

कोलकाता के दूसरे स्टेशन सियालदह से रात दस बजे चल कर अगले दिन सुबह आठ बजे न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचने वाली दार्जिलिंग मेल, घने कुहासे की वजह से डेढ़ घंटे विलंब से करीब साढ़े नौ बजे अपने गंतव्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकी। स्टेशन पर पूरी यात्रा की व्यवस्था संभालने वाले श्री रजत मंडल ने हमारी अगवानी की। हम कुल जमा पांच लोगों का यह पहला जत्था था। जिसमें मेरे अलावा श्री ललित शर्मा, श्री अरविंद देशपांडे, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अल्पना देशपांडे तथा उनकी प्यारी सी बिटिया अदिति देशपांडे थे। स्टेशन के बाहर ही रजत जी ने हमें व्रत-तोडू जलपान करवा कर अपने एक सहायक श्री दीपांकर मंडल के साथ एक टैक्सी में बैठा कर फुशलिंग जो भूटान में हमारा पहला पड़ाव था, की ओर रवाना कर दिया, इस हिदायत के साथ कि रास्ते में हमारी हर जरूरत का ध्यान रखा जाए। समय था सुबह के 10. 45 .

हल्की-हल्की कुनकुनी ठंड थी। मौसम खुशगवार था। वैसे भी नई जगह देखने के मौके ने सब में उल्लास भर रखा था। सड़क पर यातायात कम था। सड़क ऐसी सुन्दर, चिकनी, सपाट लग रहा था कि गाडी को भी उस पर चलने में खुशी की अनुभूति हो रही है। रुकते-चलते एक सौ चालीस की. मी. का सफ़र तय कर करीब तीन बजे हम भारत-भूटान के बार्डर पर फुशलिंग गेट के सामने आ पहुंचे थे। रोमांचक क्षण था वह जब हम
दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर रहे थे। कुछ ही मिनटों बाद आबादी से ज़रा हट कर और कुछ ऊंचाई पर स्थित हम अपनी आरामगाह होटल मिड प्वाइंट के प्रांगण में जा उतरे।

न्यू ज. गु. की व्यस्त सड़क 
सफर चाहे जैसा भी हो थकान तो थोड़ी-बहुत हो ही जाती है, उसे ही दूर करने मैं सबसे पहले नहाने के लिए स्नान कक्ष में जा घुसा।  गर्म पानी वैसे ही शरीर को आराम दे जाता है।  नहा, कपडे बदल बाहर आया तो अपने बाकी चारों साथियों का कोई अत-पता नहीं था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि भाई लोग होटल के तरण-ताल में तैरने का आनंद उठा रहे हैं। आश्चर्य हुआ कि पहाड़ी इलाके में ठंड के मौसम में स्विमिंग पूल ?  हुआ क्या था,  कि ललित भाई रफ-टफ, मस्त-मौला इंसान।  पानी देखा और छलांग लगा दी। अरविंद भाई ने पूछा, पानी ठंडा तो नहीं है ? जवाब मिला, बिल्कुल नहीं। तो अगला भी उतर गया, डुबकी लगाने। अब जब पानी में अरविंद जी को देखा तो माँ-बेटी भी आँख मूँद कर चल दीं उनके पीछे। यह अलग बात थी कि पानी को छूते ही शरीर की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती थी...…हिक्क.......। मैंने कहा भी कि भले आदमी पानी कोई दस फुट दूर तो नहीं था, छू कर देख ही लेना था ! खैर मौज-मस्ती रही। नहा-वहा कर उदर पूर्ती की गयी। तब तक दूसरे "बैच" के साथियों की कोई खबर नहीं मिल पाई थी।

अस्ताचलगामी सूर्य 

यह होटल आबादी से कुछ दूर ऊंचाई पर था और हमें छोड़ कर गाड़ी फिर स्टेशन रवाना हो चुकी थी, इसलिए मजबूरी में हमें वहीं आस-पास मंडराते रहना था। अब तक हम आपस में काफी खुल चुके थे। अचानक मेरे पीछे कुत्ते के भौंकने की आवाज आई, मुड़ कर देखा तो अरविंद जी थे ! फिर तो उन्होंने अपनी इस कला का जो प्रदर्शन किया तो आस-पास के सारे श्वान-पुत्रों में खलबली मच गयी। स्वाभाविक भी था उन्हें आवाज जरूर सुनाई पड रही थी पर अपना विदेशी भाई कहीं नज़र नहीं आ रहा था, इधर-उधर दौड़ते-भागते उनकी अजीब हालत हो रही थी। इधर शाम की चुनरी थामे रात धीरे-धीरे धरती को अपने आगोश में समेटने की तैयारी कर रही थी। सूरज के विदा होते ही ठंड ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया था। कुछ भी हो सफर की थकान तो थी ही, सो रात का भोजन ले हम सब अपने-अपने बिस्तरों में दुबक गए।

घड़ी रात के आठ बजा रही थी, स्थानीय समयानुसार। तारीख थी 13. 01. 15 .                
होटल मिडप्वाइंट 

रात के करीब दो बजे कुछ शोर-गुल से नींद उचटी, लगा कुछ लोग आ-जा रहे हैं, कमरों के खुलने-बंद होने से आभास हो गया कि लखनऊ-बाराबंकी के साथी अब पहुँच पाए हैं। पर कुछ थकान, कुछ ठंड और कुछ गहरी नींद की खुमारी की वजह से उठा नहींगया। वैसे उन्हें भी आराम की सख्त जरूरत थी और उनसे पहले परिचय भी नहीं था तो सुबह मिलना ही उचित था।

वे सब भी जल्दी-जल्दी खाना-पीना निपटा अपने-अपने गदेलन में घुस गए थके शरीर को कुछ राहत देने की इच्छा लिए।  सबेरे पता चला कि गाड़ियां घंटों देर से चल रही हैं। उन लोगों को तो ज्यादा आराम भी नसीब नहीं हो पाया, क्योंकि सुबह-सुबह साढ़े सात बजे भूटान की राजधानी "थिम्फु" के लिए रवाना जो होना था।

कल थिम्फु की ओर ………

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

अथ भूटान यात्रा - प्रथम भाग

पिछले अक्टूबर में जब परिकल्पना द्वारा चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन की भूटान में होने की घोषणा  हुई और उसमे मैंने अपना नाम भी पाया तो काफी ऊहापोह की स्थिति बनी हुई थी। मेरे जाने के पक्ष में अधिकतम मत थे और विपक्ष में मैं अकेला। कारण कुछ आर्थिक भी था मेरे जेहन में। काफी सोच-विचार, हाँ-ना के बाद यह तय रहा कि मुझे विदेश-भ्रमण कर ही आना चाहिए। मेरे दोस्ताने का दायरा ऐसे भी बहुत सिमित है, जो दो-तीन लोगों से थोड़ी बहुत जान-पहचान है उसी का सिरा पकड़ इस बारे में उनका कार्यक्रम जानना चाहा तो कोई ठोस जवाब नहीं मिल पाने और उनके आधे-अधूरे कार्यक्रम के कारण बनी असमंजस की स्थिति में ही मैंने रायपुर से हावड़ा और सियालदह से न्यू जलपाईगुड़ी तथा वैसे ही वापसी की टिकट करवा ही ली। 

12  जनवरी को मुंबई मेल से हावड़ा रवाना हुआ। दो दिन बाद ही गंगा-सागर का मेला था, जिसकी वजह से गाड़ी अपने हर डिब्बे की औकात से दुगने यात्रियों को लादे हांफ़ते-कांखते चल रही थी। कोलकाता पहुंच कर देखा कि हर ट्रेन उसी स्थिति से गुजरते हुए आ रही है। मेरे चलित फोन का सिम  बी. एस. एन. एल. का है। मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि इस सरकारी सिम को गुर्दे वाले लोग ही इस्तेमाल करते हैं। तो जैसी इसकी तासीर है यह कब बंद हो गया पता ही नहीं चला।  उधर छोटे भाई मनोज परेशान कि गाड़ी के अपने समय 5. 30 पर आ जाने के बावजूद भैया कहाँ रह गए। इस बार काफी समय के बाद कोलकाता जाना हुआ था इसलिए बहुत कुछ करने की सोच के कारण काफी व्यस्त सा प्रोग्राम बना हुआ था। पर मनोज ने पिछली रात की हालत जान कर मुझे आराम करने की सलाह दी क्योंकि उसी रात फिर सफर

जारी रखना था जलपाईगुड़ी के लिए। सो बंगाली मिठाईयों का लुत्फ लेते और सोते सारा दिन गुजार दिया, अच्छा भी रहा आगे की "हेक्टिक" यात्रा को मद्देनजर रखते हुए।         

शाम सात बजे के आस-पास ललित शर्मा का फोन आया कि वे सियालदह स्टेशन पर बैठे हैं और श्री अरविंद व अल्पना देशपांडे से संपर्क नहीं हो पा रहा है, जिनके पास उनका आगे की यात्रा का रेल अनुमति पत्र है। मैंने कहा आप वहीं रहें मैं आ रहा हूँ जैसा होगा देखा जाएगा। खैर सब कुछ ठीक-ठाक रहा और दार्जिलिंग मेल से दो अलग-अलग डिब्बों में यात्रा कर हम सुबह निश्चित समय से डेढ़ घंटे विलंब से न्यू जलपाई गुड़ी पहुँच गए। स्टेशन पर ही आगे की पूरी यात्रा में हमारे रहने-खाने, चलने-ठहरने, घुमाने,  हर तरह की सुविधा की जिम्मेदारी संभालने वाले श्री रजत मंडल से भेंट हुई। हमारी इस पांच सदस्यों की टोली को उन्होंने सुबह का व्रत-तोड़ जलपान संपन्न करवा भूटान के पहले पड़ाव फुशलिंग (Phuentsholing), जो वहां से करीब 110 की. मी. की दूरी पर है, रवाना कर दिया। खुद वहीं दूसरे "बैच" के स्वागत के लिए ठहर गए।      

सोमवार, 26 जनवरी 2015

26 जनवरी पर विशेष, "झंडा ऊंचा रहे हमारा"

विश्व विजयी तिरंगा प्यारा, "झंडा ऊंचा रहे हमारा" 

हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो उठता है। हर भारतीय का दिल इसके प्रति श्रद्धा विभोर हो जाता है, पर इस गीत की रचना किसने की यह शायद बहुत से लोगों को मालुम नहीं है। इस राष्ट्रीय झंडा गीत के रचनाकार थे स्वर्गीय श्री श्याम लाल गुप्त।  इनका जन्म  कानपुर के  नरवल  गांव में 16
सितंबर 1893 को हुआ था।   इनके पिता का नाम श्री विश्वेश्वर गुप्त तथा माता का नाम कौश्लया देवी था। परिवार के आर्थिक संकट से जुझने के कारण श्याम लालजी बचपन से ही पढाई के साथ-साथ पिता का हाथ भी बटाया करते थे। बड़े होने के साथ-साथ इनका रुझान पत्रकारिता की ओर होता चला गया और इनकी देश भक्ति से ओत-प्रोत कविताएं तथा लेख अखबारों इत्यादि में छपने लगे जो काफी लोक प्रिय भी होते चले गये। इसी के कारण धीरे-धीरे नेताओं का ध्यान इनकी ओर गया और श्री गणेश शंकर विद्यार्थीजी की प्रेरणा से ये कांग्रेस के सक्रीय कार्यकर्ता बन गये और अपनी मेहनत और लगन के सहारे 1920 में फतेहपुर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पहुंच गये। उस समय तक कोई झंड़े को सम्मान देने वाला ऐसा गीत नहीं बन पाया था जिसे सुन मन उद्वेलित हो सके। गणेश शंकरजी इनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे सो उन्होंने ही इन्हें कोई ऐसा गीत लिखने की जिम्मेदारी सौंप दी जो सीधा दिल तक पहुंचे। श्याम लालजी के सामने बहुत बड़ी चुन्नौती थी। काफी मेहनत और लगन से आखिर उन्होंने गीत लिखा। उसे बड़े-बड़े नेताओं ने सुना, पढा और उन सब के अनुमोदन के बाद उसे गांधीजी को दिखाया गया उन्होंने गीत को कुछ छोटा करने का परामर्श दे इसे झंडा गीत बनने का गौरव प्रदान कर दिया।

फिर तो यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलुसों, प्रभात फेरियों के अवसर पर गाया जाने लगा और जब 1938 में हरिपुरा के ऐतिहासिक कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ध्वजारोहण करते ही वहां पांच हजार लोगों ने देश के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति में भाव-विभोर हो इसे गाया तो इसे राष्ट्रीय झंड़ा गीत होने का गौरव भी मिल गया। 

पूरा  गीत इस प्रकार है :-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसानेवाला
वीरों को हर्षानेवाला
मातृभूमि का तन-मन-सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
लाल रंग भारत जननी का,
हरा अहले इस्लाम वली का,
श्वेत सभी धर्मों का टीका,
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
है चरखे का चित्र संवारा,
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा,
हरे देश का संकट सारा,
है यह सच्चा भाव हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
इस चरखे के नीचे निर्भय,
होवे महाशक्ति का संचय,
बोलो भारत माता की जय,
सबल राष्ट्र है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
आओ प्यारे वीरो आओ,
राष्ट्र ध्वज पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
शान ना इसकी जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए
विश्व विजय कर के दिखलाये
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।

जय हिंद।

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