pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

बाबाओं से कब बाज आएंगे हम

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, तकरीबन साल भर पहले की ही बात है जब एक बाबा के कारण देश में हंगामा मचा हुआ था। तब भी लोगों को ऐसे तथाकथित संतों से बचने की समझाइश, सोच समझ कर किसी पर विश्वास करने की नसीहत दी गयी थी। पर हुआ कुछ नहीं पहले की तरह ही लोग फिर अपनी नित की परेशानियों, समस्याओं, कष्टों को फौरी तौर से  दूर करने की चाहत के चलते तिकड़मबाजों के चंगुल में फसते चले गए। 

आज फिर एक तथाकथित बाबा को ले कर कोहराम मचा हुआ है। प्रिंट और दृश् मीडिया होड ले रहे हैं उसकी बखिया उधेडने की। पर इसके पहले ढेरों विवादों, दसियों आरोपों के बावजूद उस पर किसी ने ऊंगली उठाने की जहमत या हिम्मत नहीं दिखाई ? कारण साफ है, उस आदमी का रसूख और असीमित जन-सहयोग, जो बाबा के एक इशारे से वोट बैंक बन जाता है, उसे हासिल होती है उच्च पदों पर बैठे हुओं की सरपरस्ती। तो कौन बेवकूफी करेगा बाबा रूपी छत्ते को छेड़ कर मधुमक्खियों के खौफ का सामना करने का। तिकड़मी, मौका-परस्त, बिना जनाधार के धन और बाहुबल से मुखिया बने लोगों की अपनी कुर्सी और सत्ता बचाने की लालसा जन्म देती है ऐसे ही लोलुप लोगों को जो अपनी रोटी सेकने के लिए कुछ भी करने और किसी हद तक जाने को तत्पर रहते हैं और आम इंसान वर्तमान की जद्दोजहद से त्रस्त हो सुखद भविष्य की चाह में इनके मकड़जाल में फसता चला जाता है। 

हमारे देश में परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गरीबों, अशिक्षित लोगों, गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा तथा कुछ हद तक भोजन की भी व्यवस्था होती रहती थी धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से सच्चे संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया था। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा ऐसी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए। युवा पीढी के कुछ भटके नवजवान भी सहज ढंग से मिलने वाली सहूलियतों के लालच में ऐसे ढोगियों का साथ देने लगे। धीरे-धीरे पुरानी परम्राएं ध्वस्त होती गयीं और ऐसी जगहें असमाजिक तत्वों की गिरफ्त में आ बुराइयों का अड्डा बनती चली गयीं।

इसी संदर्भ में वर्षों पहले की एक सच्ची बात याद आ रही है। तब के कलकत्ता में मेरे कॉलेज में एक लड़का हुआ करता था जो शनैः - शनैः  नेता बनने के पथ पर अग्रसर था। पढ़ाई को छोड़ उसका दिमाग हर चीज में तेज था। उसने कॉलेज में यह फैला दिया था कि उसकी पहुँच विश्वविद्यालय में रसूख वाले लोगों तक है और वह वहाँ कोई भी काम करवा सकता है। काम होने पर ही पैसे लगेंगे न होने की सूरत में सब वापस हो जाएगा।  धीरे-धीरे उसके पास गांठ के पूरे दिमाग के अधूरे छात्रों का जमावड़ा लगने लगा जो किसी भी तरह पास हो डिग्री पाना चाहते थे। परीक्षा ख़त्म होते ही ये उनसे अच्छी-खासी रकम ले अपने घर जा बैठ जाता था। अब सौ-पचास छात्रों में बीस-तीस तो अपने बूते पर किसी तरह पास हो ही जाते थे।  ये उनके पैसे रख बाकियों के लौटा देता था। इस तरह इसने अच्छा-खासा व्यापार शुरू कर रखा था, जिसमें न हरड़ लगती थी नाहीं फिटकरी। पर जैसा कि होता है किसी तरह इसकी पोल खुल गयी, हुआ तो कुछ नहीं पर धंदा बंद हो गया।

ठीक यही कार्य-शैली इन तथाकथित बाबाओं की है। सीधे-साधे लोगों के अंधविश्वास, अकर्मण्यता, मानसिक कमजोरियों, भविष्य के डर, धर्मांधता का पूरा फ़ायदा उठा ये ढोंगी अपना वर्तमान और भविष्य संवारते चले जाते हैं।  बार-बार धोखेबाजों, अवसर परस्तों, ढोगियों द्वारा भोली-भाली जनता को ठगे जाने, उनकी भावनाओं का फायदा उठाने वालों की असलियत सामने आने पर भी ऐसे लोगों की जमात की बढोतरी चिंता का ही विषय है। कब हम समझ पाएंगे कि खुद को भगवान कहलवाने वाले की क्या मानसिकता है, क्या वह इस लायक भी है कि वह इंसान कहलवा सके ? कब हम इस तरह के स्वघोषित "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत उठाएंगे, भगवान ही जाने।

रविवार, 16 नवंबर 2014

बैंक लोन के साथ तनाव मुफ्त

पिछले शनिवार, 15 नवंबर को दैनिक भास्कर पत्र के "असंभव के विरुद्ध" कालम में श्री कल्पेश याग्निक जी का बैंक लोन पर लेख पढ़ कर ऐसा लगा जैसे किसी ने दुखती राग पर हाथ रख दिया हो। वे दिन याद आ गए जब बैंकों के लुभावने इश्तहार देख कर 2006 में छोटे बेटे की शिक्षा के लिए बैंक से लोन लेने की हिमाकत की थी। तब यह भी हकीकत सामने आई कि यह बैंक बने किनके लिए हैं। 

"किसी तरह" हफ़्तों की दौड़-धूप के बाद ऋण प्राप्त हो गया। उस समय बैंक के अधिकारी महोदय ने लोन पर लगने वाले ब्याज के दो रूप बताए, पहला जो सदा एक सा रहता है।  दूसरा जो आर्थिक नीतियों के साथ घटता-बढ़ता रहता है। उन्होंने ही पहले वाले रूप को अख्तियार करने की सलाह भी दी। बात हो गयी। ऋण मिल गया। किश्तों का भुगतान भी संख्या को 'पूर्ण' करने के लिए  निर्धारित रकम से 25-50 रुपये ज्यादा ही दिए जाते रहे। छ: - सात साल निकल गए, कभी भी किस्त चुकाने में कोई गफलत नहीं हुई पर अचानक 2013 में बैंक के वकील की तरफ से एक नोटिस मिला कि आपकी तरफ 250000/- की रकम पेंडिग है, जिसे तुरंत न चुकाने पर आप पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। साथ ही चल-अचल संपत्ति की नीलामी की धमकी भी दी गयी थी। यहां तक कि बिना पूरी जांच  किए  इस मनगढ़ंत कार्यवाही के खर्च के रूप में 2600/- के भुगतान को भी मेरे सर डाल दिया गया था। जबकि अभी भी लोन की बाक़ी रकम को लौटाने में करीब चार साल बचे हुए थे। इस नोटिस की एक प्रति लोन लेते समय मेरी 'ग्रांटर' बनी मेरी बहन को भी भेज दी गयी, जिससे उनका तनाव ग्रस्त होना स्वाभाविक था। पूरा परिवार पेशोपेश में पड़ गया था। कानूनी पत्र का उत्तर भी कानूनी टूर से दिया जाना ठीक समझ अपने वकील द्वारा सारी बात बता कैफियत माँगने पर बैंक के तथाकथित जिम्मेदार अफसरों ने बताया कि मेरे ऋण पर ब्याज दर तीन प्रतिशत बढ़ा दी गयी है। उसी के कारण मुझे नोटिस भेजा गया है। मेरे द्वारा पूछने पर कि इस बढ़ोत्तरी के बारे में मुझे सूचित क्यों नहीं किया गया, तो बैंक में किसी के पास इसका जवाब नहीं था। एक बार मन तो हुआ कि मान-हानि का दावा कर दिया जाए, पर फिर मध्यम वर्ग की मजबूरी और मानसिकता, जिसका फायदा अक्सर उठाया जाता रहा है, के चलते मामला ख़त्म कर दिया गया। 

मन में आक्रोश तो बना ही रहता है, कल्पेश जी के लेख ने उसे फिर ताजा कर दिया। 

गगन शर्मा 
gagansharma09@gmail.com                                                

बुधवार, 5 नवंबर 2014

लंबा इतिहास है खूनी दरवाजे का

इतनी रक्तरंजित घटनाओं का गवाह बनने का यह नतीजा निकला कि अवाम ने  इस जगह को अभिशप्त और मनहूस मान लिया और इसे "खूनी दरवाजे" का नाम अता कर दिया गया।

दरवाजे की इमारत 
दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के पास बहादुरशाह जफ़र मार्ग के "डिवाइडर" पर एक दरवाजेनुमा इमारत खडी है। पर यह उन 14 दरवाजों में से नहीं है जिन्हें शाहजहाँ ने शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) को दीवाल से घेरने के बाद उसमें बनवाए थे। इसका निर्माण तो वर्षों पहले 1540 में शेरशाह सूरी ने अपने राज्य के अंतर्गत आने वाले फीरोजाबाद के प्रवेश द्वार के रूप में करवाया था।  उस समय अफगानिस्तान से आने वाले व्यापारियों इत्यादि को इसी में से होकर गुजरना पड़ता था।  करीब 51 फ़ीट ऊंचे दरवाजे की तीन मंजिलें हैं जो अंदर बनी सीढ़ियों से जुडी हुई हैं। किसी अलग मकसद से बनाए
गए इस दरवाजे को और इसके बनाने वालों को भी कहाँ अंदाज था कि भविष्य में यह इमारत अभिशप्त कहलाने लग जाएगी।  

सीलबंद प्रवेश 

# इसकी बदकिस्मती तब शुरू हुई जब जहाँगीर ने अपने वालिद अकबर के नवरत्नों में से एक, अब्दुल रहीम खानखाना को अपने खिलाफ बगावत करने के दंड स्वरूप उसके  बेटों को  मरवा कर उनके शरीर को सड़ने के लिये यहां लटकवा दिया था। उसके बाद जो एक के बाद एक नृशंस घटनाएं यहां घटनी शुरू हुईं उनका अंत आज तक नहीं हो पाया है।   

# फिर नादिरशाह ने जब दिल्ली को लूटा और कत्ले-आम का हुक्म दिया तो सबसे ज्यादा रक्तपात भी इसी जगह हुआ था।

# समय के साथ जब औरंगजेब दिल्ली का शासक बना तो निरंकुश राज्य करने के लिए उसने अपने भाई दारा शिकोह को मार कर उसका सर भी यहीं टंगवा दिया था। 

# इतिहास अपने को दोहराता रहा। 22 सितम्बर 1857 को बहादुरशाह जफर के आत्मसमर्पण के बावजूद अंग्रेज कमांडर विलियम हडसन ने बहादुरशाह के तीन शहजादों, मिर्जा मुगल, मिर्जा खिज्र सुल्तान  और पोते मिर्जा अबू बकर को हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार  करने के बाद अपने खिलाफ जनता के विरोध को देखते हुए हड़बड़ी में इसी जगह की सुनसानियत का फ़ायदा उठा उन्हें यहीं लाकर  उनका क़त्ल कर दिया  था।      

रख-रखाव का अभाव 
# इतने खून-खराबे के बाद भी इसकी बदनामी का अंत नहीं हुआ। देश को आजादी मिलने के पश्चात 1947 में हुए दंगों में भी इस दरवाजे पर काफी रक्तपात हुआ था। शरणार्थी शिवरों की ओर जाते अनेक लोगों को यहां  पर मौत के घाट उतार दिया गया था।


# इसे इसकी बदकिस्मती ही कहेंगे कि देश की राजधानी में स्थित होने के बावजूद 2002 में  फिर इस जगह को नापाक साबित करते हुए कुछ दरिंदों ने एक युवती के साथ यहां शर्मनाक कृत्य को अंजाम दिया।  उसी के बाद इस स्थान को पूरी तरह सील कर प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर  दिया गया है।   

बदहाल स्थिति 
इतनी रक्तरंजित घटनाओं का गवाह बनने का यह नतीजा निकला कि अवाम ने  इस जगह को अभिशप्त और मनहूस मान लिया और इसे "खूनी दरवाजे" का नाम अता कर दिया गया। इसे क्या कहेंगे कि जिस बहादुरशाह जफ़र के नाम पर इस मार्ग का नामकरण हुआ है उसी के शहजादों को इसी सड़क पर  क़त्ल कर दिया गया था।

आज यह दरवाजा भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक है। पर उस रख-रखाव का पूर्णतया अभाव है जो की ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को मिलना चाहिए। 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

हनुमान जी की स्वचालित प्रतिमा, नयी दिल्ली

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी चीज को हम अक्सर देखते हैं फिर भी उसके बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते। ऐसी ही एक जानकारी जब करोल बाग मेट्रो स्टेशन के पास बनी हनुमान जी की विशाल प्रतिमा के बारे में पता लगी तो विस्मित होना स्वाभाविक ही था। इतनी बार इधर से गुजरना होता रहा पर यह नहीं पता था कि इस प्रतिमा में स्वचालन से भी कुछ होता है। दिल्ली में रहने वाले और रोज उधर से गुजरने वाले अधिकाँश लोगों को भी यह बात पता नहीं है।

कुछ दिनों पहले अपनी पोस्ट "भूली भटियारी"  की खोज-खबर के सिलसिले में जब करोल बाग में यहां आना हुआ तब पता चला कि हनुमान जी की 108 फुट की यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वचालित प्रतिमा है। हनुमान जी की छाती में उनके हाथों के पीछे श्री राम-सीता विराजमान हैं।  मूर्ती के हाथ की उँगलियां स्वचालित हैं। जब वे हटती हैं तो ऐसा लगता है जैसे हनुमान जी ने अपनी छाती फाड़ कर श्री राम-सीता को प्रगट किया हो।

http://www.youtube.com/watch?v=_LO7uOVSuxE 
लिंक पर प्रतिमा का स्वचालन देखा जा सकता है। 

बताया जाता है कि अरसा पहले एक संत नागबाबा सेवागिरी जी महाराज घूमते-घूमते यहां आ पहुंचे। तब यहां शिवजी की धूनी और हनुमान जी की छोटी-छोटी मूर्तियां विद्यमान थीं।  प्रभुएच्छा से बाबा जी का मन यहां रम गया और वे यहीं अपनी तपस्या में लीन हो गए। वर्षों की आराधना के फलस्वरूप हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए और वहां एक मंदिर के निर्माण का निर्देश दिया।  प्रभू के आदेशानुसार हनुमान जी की प्रतिमा और मंदिर का निर्माण 13.05.1994 से आरम्भ हुआ जो लगातार 13 वर्षों तक चलते हुए  02 अप्रैल, 2007 को सम्पन्न हुआ। हनुमान जी की प्रतिमा को नई तकनीक से बनाते हुए उसे स्वचालित रूप दिया गया है। इसमें हनुमान जी अपनी छाती फाड़ते हैं और भक्तों को  भगवान श्री राम व  सीताजी के दर्शन  होते हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए अपार जन समूह के उमड़ने से होने वाली दिक्कतों को देखते हुए मंदिर के ट्रस्ट ने इस स्वचालन की क्रिया को केवल मंगलवार व शनिवार को प्रातः 8.15 बजे और सांय 8.15 बजे के लिए निर्धारित कर दिया है।

बाबाजी ने ज्वालाजी, हिमाचल प्रदेश, से  माँ की ज्योति 30 मार्च, 2006 को यहां लाकर स्थापित की जो तबसे  निरन्तर प्रज्जवलित है।  समय के साथ-साथ मंदिर का विस्तार होता चला गया और अब शिव जी की धूनी के अलावा माँ वैष्णव देवी, शनि देव के साथ ही शिरडी के सांई बाबा के दर्शन भी यहां भक्तों को  उपलब्ध हैं।                
अपने संकल्पानुसार सेवागिरी महाराज मंदिर निर्माण कार्य पूरा होते ही 25 जनवरी, 2008 को अपना शरीर त्याग कर प्रभू की शरण में चले गये।  मंदिर में उसी स्थान पर उनकी समाधि बना दी गयी जहां अब हर वर्ष 25 जनवरी के दिन उनकी याद में भण्डारा कराया जाता है।

तो यदि अभी तक सिर्फ मेट्रो रेल के अंदर से या सड़क मार्ग से गुजरते हुए ही इनके दर्शन किए हों तो अब ज़रा रुक कर इसकी भव्यता को निहारें और कोशिश करें की समयानुसार मंगल या शनिवार को सुबह या शाम 8. 15 पर वहाँ पहुँच प्रतिमा का स्वचालन देख सकें। 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

दिल्ली की अभिशप्त "भूली भटियारी"

ऐसी जगहों के बारे में जैसा कि अक्सर होता है इस जगह के बारे में भी लोगों के जेहन में तरह-तरह की बातें और धारणाएं घर कर चुकी हैं और यह उजाड़ और सुनसान इलाका अभिशप्त माना जाने लगा है। 

दिल्ली स्मारकों का शहर है। करीब 1300 ऐतिहासिक जगहें यहां अभी भी अस्तित्व में हैं। पर इनमें से कुछ ही ऐसी हैं जिनका ढंग से रख-रखाव हो पा रहा है, बाकी तो धीरे-धीरे खंडहरों में तब्दील होती जा रही हैं। ऐसी ही एक इमारत है "भूली भटियारी का महल", जो कहने को ही महल है नहीं तो एक दीवाल और उसमें बनी कुछ  कोठरियों के सिवा वहाँ कुछ नहीं बचा है। 

करोल बाग स्थित हनुमान जी की विशाल प्रतिमा 
14 वीं शताब्दी में दिल्ली के तत्कालीन शासक फिरोज शाह तुगलक द्वारा इस शिकारगाह का निर्माण करवाया गया था। जो शिकार वगैरह के न होने के समय सराय के रूप में भी इस्तेमाल की जाती रही थी। इसके नामकरण की भी अलग-अलग कहानियां हैं। इतिहासकार इसकी रखवालन  बु-अली-भट्टी के नाम पर इसका नामकरण मानते हैं तो कुछ भटियारा परिवार की महिला जो जंगल में गुम हो गयी थी, के नाम पर इसकी पहचान को मानते हैं, तो कुछ इसकी देख-रेख करने वाली भूरी के नाम पर इसका नाम रखे जाने को अहमियत देते हैं। 

करोल बाग़ मेट्रो स्टेशन के पास हनुमान जी की विशाल प्रतिमा के बगल से एक रास्ता दिल्ली की 'हरी पट्टी' की ओर जाता है उसी पर लगभग 100 मी. की दूरी पर सड़क के दाहिने तरफ, पेड़ों के झुण्ड के पीछे इसके खंडहर खड़े हैं। सड़क की दाहिनी तरफ नौ-दस सीढ़ियां चढ़ इसका मुख्य द्वार पड़ता है जिससे अंदर जाते ही आठ-दस कदमों की घुमावदार जगह के बाद एक और वैसा ही दरवाजा अंदर बड़े से अहाते में पहुंचा देता है जिसकी आयताकार दीवाल में तीन छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई हैं। इस
भूली भटियारी 
अहाते के दक्षिणी  भाग में फिर पांच-छह 
सीढ़ियां चढ़ कर इसके ऊपरी भाग में जाया जा सकता है जहां एक दरवाजे और दीवाल की ओट में एक ऐसा निर्माण है जो  में शायद शौच के काम आता होगा।  सारा इलाका घनी घास और झाड़-झंखाड़ से अटा पड़ा है। लगता है जैसे वर्षों से सुध न ली गयी हो। यहां सबसे विचित्र बात यहां के पेड़ों की टहनियों की बनावट है जो किसी अजगर की तरह बल खाती टेढ़ी-मेढ़ी हुई पड़ी हैं। ऐसी जगहों के बारे में जैसा कि अक्सर होता है इस जगह के बारे में भी लोगों के जेहन में तरह-तरह की बातें और धारणाएं घर कर चुकी हैं और यह उजाड़ और सुनसान इलाका अभिशप्त माना जाने लगा है। संध्या समय में अन्धेरा गहराने के पहले इस तक आने वाली सड़क को पुलिस द्वारा बंद कर दिया जाता है। सुरक्षा के लिहाज से और असामाजिक तत्वों की कारगुजारी को रोकने के लिए भी यह जरूरी है। 


जीर्णोद्धार की सूचना देता बोर्ड 

प्रथम द्वार 
द्वितीय द्वार 
अहाता 
पूरा परिसर ऐसे ही भरा पड़ा है 
शौच स्थान 
दीवाल में बनी कोठरियां 
8 x 8 की कोठरी 
डाली है या एनाकोंडा 
इस सुनसान इलाके की इस सड़क से एक्का-दुक्का ही कोई गाड़ी निकलती है। इसके अलावा न आदम न आदमजात। इमारत में भी कोई दरबान वगैरह नहीं है। पर हम जैसे ही यहां पहुंचे यह कुत्ता पता नहीं कहाँ से नमूदार हुआ और अंदर-बाहर तब तक मूक रूप से साथ लगा रहा जब तक हम यहां से विदा नहीं हो गए।    
गाइड 
हालांकि यहां दिल्ली पर्यटन विभाग का एक बोर्ड इसकी मरम्मत की सूचना देता लगा है पर खुद उस बोर्ड की हालत भी इमारत जैसी जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है और देखने से ही लगता कि उसे खुद मरम्मत की जरुरत है।समय की मार को झेलती यह उपेक्षित और लावारिस ऐतिहासिक धरोहर कितने दिन संघर्ष कर पाएगी यह कहना मुश्किल है।         

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

यहां आदमी और शेर आमने-सामने हैं

संसार में सुंदरवन अकेली जगह है, जो करीब 500 शेरों (बाघों) का आश्रय स्थल है। एक ही स्थान पर शायद ही इतने शेर कहीं और पाए जाते हों। पर यहां इंसान भी बसते हैं,  जो मजबूर हैं, यहां रहने के लिए, दहशत भरी जिंदगी जीने के लिए।

संसार में सुंदरवन अकेली जगह है, जहां शेर लगातार आदमी का शिकार करते रहतें हैं। हर साल करीब 50 से 60 लोग यहां शेरों के मुंह का निवाला बन जाते हैं। वहां के लोग किन परस्थितियों में जी रहे हैं इसका रत्ती भर अंदाज भी बाहर की दुनिया को नही है। यहां आकर तो लगता है कि जानवर ही नहीं आदमी को भी बचाने, संरक्षण देने की जरूरत है।
             
सुंदरवन करीब 500 शेरों (बाघों) का आश्रय स्थल है। एक ही स्थान पर शायद ही इतने शेर कहीं और पाए जाते हों। पर यहां इंसान भी बसते हैं,  जो मजबूर हैं, यहां रहने के लिए, दहशत भरी जिंदगी जीने के लिए।  रोजी-रोटी, परिवार को पालने की जिम्मेदारी जो है सर पर। समुद्र के पास होने के कारण यहां ज्वार-भाटा काफी भयंकर रूप से उठता है जिससे शेरों को अपना शिकार खोजने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। दूसरी तरफ यहां रहने वाले लोगों का जीवनयापन नदी से प्राप्त होने वाली मछलियों और जंगल की वनोत्पजों पर निर्भर करता है। इसीलिए जंगलों से आना-जाना उनकी मजबूरी है जिसका  फ़ायदा यहां के वनराज को मिलता है। वैसे भी जंगली जानवरों के शिकार की बनिस्पत मानव को अपना भोजन बनाना बहुत आसान है, इसीलिए यहां के शेर आसानी से मनुष्य भक्षी बन जाते हैं। पानी के पास रहते-रहते ये अच्छे तैराक भी हो गए हैं। जिससे ये इतने निडर हो गए हैं कि मौका पाते ही नाव में सवार मछुआरों पर भी हमला करने से नहीं झिझकते।

सरकार ने और यहां के रहवासियों ने अपने-अपने स्तर पर इस आपदा से बचने के लिए कुछ इंतजाम किए भी हैं, जिससे हमले से मरने वालों की संख्या में कमी भी आई है। शेर हरदम मनुष्य पर पीछे से हमला करता है, खासकर रीढ़ की हड्डी पर।  इसीलिए सरकारी कर्मचारी कमर से लेकर गरदन तक का एक मोटा पैड सा पहने रहते हैं जिससे काफी हद तक हमले की गंभीरता कम हो जाती है। यहां के लोग जंगल में या नौका में आते-जाते समय अपने चहरे के पीछे, गरदन के ऊपर एक मुखौटा लगा कर चलते हैं। जिससे शेर को लगे कि सामने वाला मुझे देख रहा है, पर वह ज्यादा देर
धोखे में नहीं रहता और हमला कर देता है। इसके अलावा यहां के निवासी पूजा-पाठ में भी बहुत विश्वास करते हैं इसीलिए अपने रोजगार पर निकलने के पहले वनदेवी जिसे स्थानीय भाषा में "बोनदेवी" कहते हैं (बंगला भाषा में 'वन' का उच्चारण 'बोन' होता है ) की पूजा-अर्चना कर निकलते हैं। पर कहीं न कहीं, कभी न कभी भिड़ंत हो ही जाती है। दोनों की मजबूरी है, कोई भी पक्ष अपनी रिहाइश छोड़ और कहीं जा नहीं सकता। शेरोन पर तो यह एक तरह से दोहरी मार है।  इनकी प्रजाति पर पहले से ही "पोचरों"  से   खतरा बना  हुआ था,  उस पर अब  एक और गंभीर समस्या

बढ़ती जा रही है। धीरे-धीरे यहां के मनुष्यों और शेरों में एक अघोषित युद्ध शुरू हो चुका है। जैसे ही कोई मानव शेर का शिकार करता है वैसे ही शेर से बदला लेने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। यह बात दोनों ही पक्षों के लिए घातक हैं। इस आपसी भिड़ंत को ख़त्म या कम करने के लिए अभी तक आजमाए गए उपायों का बहुत ही कम असर हुआ है।  फिर भी कुछ न कुछ उपाय किए ही जा रहे हैं जैसे घने जंगल में तार का घेराव या फिर शेरों को उनके भोजन के लिए जानवरों की उपलब्धता इत्यादि। पर पूर्णतया कारगर कोई उपाय अभी सामने नहीं आ पाया है। तब तक अभिशप्त हैं दोनों प्राणी एक दूसरे के दुश्मन बने रहने के लिए।  

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

आतिश का मायाजाल

एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो। 

दीपावली का शुभ दिन पड़ता है अमावस्या की घोर काली रात को।  शुरू होती है अंधेरे और उजाले की जंग। अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दो-जहद।  निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाने रखने की पुरजोर कोशिश। इसमें अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा अपने महाबली शत्रु से जूझती हैं सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ। अंधकार कितना भी गहरा हो ये छोटे-छोटे रोशनी के सिपाही अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके।

ऐसा होता भी है, इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चहरे पर फैली मुस्कान और हंसी को देख कर अपने-आप हो जाती है।  एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है।    
एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो।    

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...