pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

जेबें यानी "पॉकेट्स", कैसे प्रचलन में आईं

जेबें यानी "पॉकेट्स"  कैसे  और  कब  इसकी जरूरत  महसूस  की गयी होगी और कैसे यह चलन में आईं होगीं, यह एक खोज का विषय है।  आज के परिधानों की कल्पना बिना जेबों के की ही नहीं जा सकती। पर सबसे   पहले कब इंसान ने इसे बनाया होगा?  वैसे तो किसी एक इंसान को इसका श्रेय नहीं जाता पर  जेबों को आज का रूप देने में अमेरिका के   जेम्स एल. पॉकेट का बहुत बड़ा हाथ है।    

शुरुआती दौर के बाद जब इंसान का परिवार बना होगा, उसने रहने का कोई स्थाई प्रबंध भी कर लिया होगा और तब तक अधोवस्त्रों का चलन भी शुरू हो चुका होगा। तब उसे भोजन के लिए शिकार के साथ-साथ और भी कुछ वस्तुओं को अपने निवास पर ले जाने की जरूरत पड़ी होगी, जिन्हें वह कमर में यहाँ-वहाँ खोंस लेता होगा। धीरे-धीरे परिस्थितियों के तहत शरीर ढकने के उपायों की इजाद हुई होगी। पर कपड़ों के साथ सिली जेबें नहीं बनी होंगीं। उसके पहले कोई छोटी-बड़ी थैली-नुमा चीज बनी होगी जिसे हाथ में लटकाया जाता होगा या कमर में बाँध लिया जाता होगा। हो सकता है इसका ख्याल उसे कंगारू के बच्चे को अपनी माँ की प्रकृति-प्रदत्त जेब में बैठा देख कर आया हो। पर सुरक्षा की दृष्टि से ऐसी छोटी थैलियां या "पॉउच" असुरक्षित ही होते थे इन पर उठाईगिरे आसानी से हाथ साफ कर जाते थे. इससे बचने के लिए उन थैलियों को कपड़ों के अंदर सीना शुरू किया गया पर वह बाजार-हाट में व्यवहारिक नहीं हो पाया। कई भुलक्कड़ इसे जहां-तहां रख कर भूल भी जाते थे। पर धीरे-धीरे जरुरत और सहूलियत को सामने रख आज की जेबों के पितामह का जन्म संभव हुआ जिसका सुधारा रूप हमारे सामने है।      

जो भी रहा हो जरूरत के अनुसार और समय के साथ-साथ कपड़ों के अंदर-बाहर जेबों का अस्तित्व चलन में आया। आज की तरह पहले इंसान के पास इतना ताम-झाम नहीं होता था, घर से बाहर निकलने पर कुछ पैसे और घर की चाबियाँ यही उसके साथ होता था जिसके लिए एक दो जेबें काफी थीं, हाँ महिलाओं को जरूर कुछ ज्यादा जगह की जरूरत होती थी इसलिए उनकी जेबें कुछ बड़े आकार की बनाई जाती थीं जिन्हें सुरक्षा की दृष्टि से उनके अंतरंग वस्त्रों में जोड़ा जाता था। 

समय बदलता गया. वस्त्रों के आकार-प्रकार-डिजाइन भी उसके साथ ढलते गए। उसके साथ ही तरह-तरह की जेबें भी बनती चली गयीं। पहले कलाई घड़ियों का चलन न होने से घड़ी के लिए एक अलग जेब होती थी। चश्मे के लिए, ट्रेन के टिकट के लिए, सिक्कों के लिए, अलग तरह की जेबें बनाई गयीं।  कुछ बड़े कागज-पत्रों के लिए अलग जेब बनी जो "कार्गो पॉकेट" कहलाई, जो जींस में नजर आती है।  कपड़ों के साथ -साथ जेबें भी उनके अनुसार बनाने लगीं।  कमीज, जैकेट, कोट, पैंट, जींस सब की अपनी तरह की जेबें होने लगी।

हालांकि इसने एक कुख्यात वर्ग "पाकेटमार" को भी पलने-बढ़ने में सहायता की है, लोगों की सिर-दर्दी बढ़ाई है. फिर भी सोचिए यह न होती तो और कितनी मुश्किलें सर उठाने लगती। अब तो इसका दायरा इतना बढ़ गया है कि लोग हर चीज में जेब खोजते हैं, चाहे छोटे पर्स हो, बड़े बैग हों, अटैची हों, बक्से हों, और तो और अब तो तैराकी के वस्त्रों और जूतों तक में जेबें लगनी शुरू हो चुकी हैं।

सोमवार, 24 मार्च 2014

रबर के छोटे-छोटे छल्ले, रबर बैंड

रंग-बिरंगे रबर बैंड 
रबर बैंड, एक छोटा सा गोल महीन रबर का टुकड़ा। जो छोटा होते हुए भी रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों में बेहद उपयोगी है. चाहे महिलाओं को अपने खुले, बिखरते बालों को बचाना हो, चाहे व्यवस्थित कागजों को संभालना हो, चाहे किसी पोलिथिन के लिफाफे का मुंह बंद करना हो या फिर छोटी-मोटी चीजों को एकजुट रखना हो, इससे बेहतर और कोई चीज मुफीद नहीं है।  यह सब तो इसकी छोटी-मोटी उपादेयताएं हुईं। बावजूद इसके कि इसकी हमें आदत पड चुकी है, यह सर्वसुलभ है, फिर भी यह उपेक्षित ही है। इसके बारे में हमें जानकारी बहुत कम है.

इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता अमेरिका का डाक विभाग है। जहां इसकी सालाना खपत टनों का आंकड़ा पार कर जाती है। इसके अलावा यह दुनिया भर की न्यूज पेपर इंडस्ट्री, डाक विभागों, फूलों के व्यवसाय, वनस्पति उद्योग की ख़ास जरूरत बन चुका है।  दुनिया भर में इसकी मांग भारी-भरकम रूप से दिन-दूनी-रात-चौगुनी की रफ्तार से बढती ही जा रही है।  

इसको बनाने के लिए अधिकतर प्राकृतिक रबर का ही उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें सिंथेटिक रबर से ज्यादा लचीलापन होता है। छल्ले या बैंड बनाने के रबर को कई चरणों से गुजरना पड़ता है।  इस दौरान रबर को ख़ास गोल नालियों में भर उसे गर्म और शुद्ध कर मशीनों से एकसार कर फिर आवश्यकतानुसार अलग-अलग नाप, माप और आकार में काट लिया जाता है।  फिर इन पर लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई के हिसाब से  पहचान के लिए अलग-अलग नम्बर डाल दिए जाते हैं, जिससे इनकी खरीदी-बिक्री में आसानी रहती है।  

जाने-अनजाने, पहला रबर बैंड बनाने का श्रेय इंग्लैण्ड के थॉमस हैनकॉक को जाता है जिसने एक रबर की बोतल को छोटे-छोटे छल्लों के रूप में काट कर उनका उपयोग "गार्टर" और कमरबंद के रूप में किया था। यह बात 1943 की है।  पर इस नन्हीं सी चीज की उपयोगिता को देख लोग इसकी ओर आकृष्ट होते चले गए. इसकी उपयोगिता और लोकप्रियता को देखते हुए इंग्लैण्ड के ही स्टेफन पेरी ने समय को भांपते हुए 17 मार्च 1945 में  इसका पेटेंट करवा इसे लोकप्रियता की नयी उंचाईयों पर पहुंचा दिया। 

इस तरह अमेरिकन चार्ल्स गुडइयर की रबर की खोज और इंग्लैण्ड के थॉमस, पेरी के प्रयास और मेहनत के फलस्वरूप दुनिया को यह अनूठी और बहूउपयोगी वस्तु सर्वसुलभ  हो सकी।                

रविवार, 9 मार्च 2014

"शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों करते हैं ?

एक परिक्रमा खुद की भी होती है जो घर इत्यादि में पूजा की समाप्ति पर एक जगह खड़े होकर घूमते हुए की जाती है जो याद दिलाती है कि हमारे भीतर भी  वही प्रभू, वही शक्ति, वही परम सत्य विराजमान हैं जिनकी प्रतिमा की हम अभी-अभी पूजा-अर्चना किए हैं।      

आज शाम टहलने निकला तो रास्ते में पंडित रामजी मिल गए। उनके साथ बतियाते हुए भोले नाथ के मंदिर प्रांगण में पहुँच गया।  वहां कुछ लोग शिवलिंग की प्रदक्षिणा कर रहे थे तो वैसे ही राम जी से पूछ लिया कि हम प्रदक्षिणा क्यों करते हैं ?

राम जी ने बताया कि जिस तरह सूर्य को केंद्र में रख सारे ग्रह उसका चक्कर लगाते हैं जिससे सूर्य की ऊर्जा उन्हें मिलती रहे, उसी तरह हम प्रभू यानी सर्वोच्च सत्ता, जो सारे विश्व का केंद्र है, वही कर्ता है, वही सारी गतिविधियों का संचालक है, उसी की कृपा से हम अपने नित्य प्रति के कार्य पूर्ण कर पाते हैं, उसी से हमारा जीवन है. फिर प्रभू समदर्शी हैं अपने सारे जीवों पर एक समान दया भाव रखते हैं इसका अर्थ है कि हम सभी उनसे समान दूरी पर स्थित हैं और उनकी कृपा बिना भेद-भाव के सब पर बराबर बरसती है। परिक्रमा करना भी उनकी पूजा अर्चना का एक हिस्सा है जो उनके प्रति अपनी कृतज्ञतायापन का एक भाव है, उन्हें अपने प्रेम-पाश में बांधने की एक अबोध कामना है। केवल प्रभू  ही नहीं जिनका भी हम आदर करते हैं, जो बिना किसी कामना के हमें लाभान्वित करते हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए हम उनकी परिक्रमा करते हैं, चाहे वे हमारे माता-पिता हों, गुरुजन हों, अग्नि हो या वृक्ष हों। एक परिक्रमा खुद की भी होती है जो घर इत्यादि में पूजा की समाप्ति पर एक जगह खड़े होकर घूमते हुए की जाती है जो याद दिलाती है कि हमारे भीतर भी  वही प्रभू, वही शक्ति, वही परम सत्य विराजमान हैं जिनकी प्रतिमा की हम अभी-अभी पूजा-अर्चना किए हैं।        

मैंने फिर पूछा कि परिक्रमा प्रतिमा को दाहिने रख कर यानी घड़ी की सूई की चाल के अनुसार ही क्यों की जाती है ?  यह सुन कर वहाँ बैठे एक सज्जन बोले कि इससे आपस में लोग भिड़ने से बचे रहते हैं नहीं तो कोई दाएं से चलेगा और कोई बांए से आएगा तो मार्ग अवरुद्ध होने लगेगा।  
पंडित जी मुस्कुरा कर बोले, ऐसा नहीं है. हमारे यहाँ दाएं भाग को ज्यादा पवित्र और सकारात्मक माना जाता है, इसीलिए जो हमारी सदा रक्षा करते हैं, हर ऊँच-नीच से बचाते हैं, सदा हमारा ध्यान रखते हैं उन प्रभू को हम अपनी दाईं और रख अपने आप को सदा सकारात्मक रहने की याद दिलाते हुए, उनकी परिक्रमा करते हैं।

मैंने पंडित जी से फिर पूछा कि पूजा समाप्ति पर हम "शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों करते हैं ?
पंडित जी बोले, शांति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह सब जगह सदा विद्यमान रहती है। जब तक इसे हमारे या हमारे क्रिया-कलापों द्वारा भंग ना किया जाए। इसका यह भी अर्थ है कि हमारी गति-विधियों से ही शांति का क्षय होता है पर जैसे ही यह सब ख़त्म होता है शांति पुन: बहाल हो जाती है। यह जहां भी होती है वहां सदा खुशियों का डेरा रहता है। इसीलिए शांति की प्राप्ति के लिए हम प्रार्थना करते हैं. जिससे हमारी मुसीबतों, दुखों, तकलीफों का अंत होता है और मन को शांति मिलती है। जीवन में कुछ ऐसी  प्राकृतिक आपदाएं होती हैं जिन पर किसी का वश नहीं चलता, जैसे भूकंप, बाढ़ इत्यादि। कुछ ऐसी विपदाएं होती हैं जो हमारे द्वारा या हमारी गलतियों से घटती हैं जैसे प्रदूषण, दुर्घटना, जुर्म इत्यादि।  सारी रुकावटें, दुःख और परेशानियों का कारण तीन स्रोत, आदि-दैविक, आदि-भौतिक, आध्यात्मिक हैं। इसलिए हम प्रभू से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे दुखों, तकलीफों, तथा जीवन में आने वाली अड़चनों का शमन करें। चूँकि ये मुसीबतें तीन ओर से आती हैं इसलिए शांति का उच्चारण भी तीन बार किया जाता है।
शाम गहरा गयी थी पंडित जी को मंदिर का अपना कार्य पूरा करना था, इधर घर पर मेरा इंतजार भी शुरू हो चुका था  इसलिए उनसे आज्ञा और नई जानकारियां ले मैं भी घर की ओर रवाना हो गया।


शनिवार, 8 मार्च 2014

कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व हो तुम !!!

आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे।

क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को दिल से बराबरी का हकदार मानता है? वैसे ऐसे समाज, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का? आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। यह इतना आसान नहीं है, हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन पुरुष उन्हें परोस कर अपना मतलब साधते रहते हैं।


 यह क्या पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन, आठ मार्च, महिला दिवस जैसा नामकरण कर उनको समर्पित कर दिया है। कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है? यदि ऐसा नहीं है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता? पर सभी खुश हैं। विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।
आश्चर्य होता है, दुनिया के आधे हिस्से के हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए, उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन निश्चित किया गया है। इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए, जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर समाज ने, समाज में  उन्हें इतना चौंधिया दिया होता है कि वे अपने कर्मों के अंधेरे को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की. अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की। अपने सोए हुए जमीर को जगाने की।
कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व  हो तुम !!!  

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

मणिकर्ण, शिव-रात्री पर विशेष

अपने विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा माता पार्वती  घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे।   उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी  कि  वे यहां  ग्यारह हजार वर्ष  तक निवास करते रहे। 

मणिकर्ण का विहंगम दृश्य 
मणिकर्ण, हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र तीर्थ-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ, जो कुल्लू से 35 कीमी  दूर समुंद्र तट से 1650 मीटर  की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है। पौराणिक कथा है कि अपने विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा माता पार्वती  घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे।  उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी  कि  वे यहां  ग्यारह हजार वर्ष  तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही जब शिवजी ने काशी नगरी  की स्थापना की, तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट ही  रक्खा। 
खौलते पानी का कुंड 

इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं  यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है, ऐसी मान्यता है यहां के लोगों मे। कहते हैं कि यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव् धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। उसके मणि ना लौटाने के दुस्साहस से शिवजी क्रोधित हो गये. तब उनके क्रोध से भयभीत हो शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग-अलग  तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।  


 यहाँ एक प्राचीन भव्य राम मंदिर भी है. जहां यात्रीयों और भक्तों के लिए नि:शुल्क रहने और खाने की समुचित व्यवस्था उपलब्ध है।   

   


सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

अजीबोगरीब स्थिति

करीब दो महीने के बाद मुझे एक ई-मेल मिला जिसमे एक भले आदमी ने उसी धर्मशाला से अपने चोरी हुए सामान के लिए धर्मशाला के प्रबंधकों के साथ मुझे भी पत्र भेज मारा। मैं असमंजस में पड गया कि अगला चाहता क्या है?    

कई बार ऎसी बातें या घटनाएं घट जाती हैं जो विचार करने पर बड़ी अजीब सी लगती हैं। ऐसा ही पिछले दिनों कुछ हुआ.  इस बार शरद पूर्णिमा के अवसर पर  राजस्थान के चूरू जिले के एक कस्बे सुजानगढ़ में स्थित हनुमान जी के सुप्रसिद्ध बालाजी मंदिर दर्शन करने फिर सुयोग मिला। वैसे तो यहाँ साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है. पर चैत्र और आश्विन पूर्णिमा के समय यहाँ मेला भरता है जब लाखों लोग अपनी आस्था और भक्ति के साथ यहाँ आकर हनुमान जी के दर्शन का पुण्य लाभ उठाते हैं. 

पहले भी दो बार सालासर जाना हुआ था, पर इस देव-स्थान का कुछ ऐसा आकर्षण है कि मन नहीं भरता और बार-बार जाने की इच्छा होती है। इस बार भी मौका मिलते ही आठ-नौ जनों का समूह 17. 10. 13 को हनुमान जी के दर्शन के लिए सालासर रवाना हो गया। यह याद नहीं रहा कि यह अवसर शरद पूर्णिमा का है, नहीं तो ठहरने की व्य्वस्था पहले करवा लेते। रास्ते में इसकी जानकारी मिली पर फिर सब प्रभू पर छोड़ आगे बढ़ाते रहे. करीब साढ़े दस बजे हम सालासर धाम पहुंचे। पर वहाँ तो जैसे लोगों का सैलाब उमड़ा पड़ा था। पैदल चलने तक की जगह नहीं थी।  दिन रात का जैसे कोइ फर्क ही नहीं था.  लोग खुले मे, तंबुओं में, शामियाने में, जहां जगह मिली पड़े थे. उस समय भी कोई नहा रहा था, कोई मस्ती में नाच-गा रहा था तो कोइ भूख मिटाने की फिराक में भोजन का प्रबंध करने में जुटा था. गाड़ी बेहद धीरे-धीरे रेंग रही थी. हमें तो सोच कर ही सिहरन हो रही थी की यदि जगह न मिली तो कैसे क्या होगा ? जगह की सचमुच किल्लत लग रही थी. पर कहते हैं ना की प्रभू कभी अपने बच्चों को मायूस नहीं करता. सो उसी दैवयोग से हमारी रेंगती और कोई आश्रय ढूँढ़ती गाड़ी एक जगमगाती सुन्दर सी इमारत के सामने जा रुकी.  नज़र उठा के देखा तो ऊपर नाम लिखा हुआ था "चमेली देवी अग्रवाल सेवा सदन". भीड़ वहाँ भी थी फिर भी अन्दर जा पता करने की सोची। स्वागत कक्ष में बैठे सज्जन ने पहले तो साफ मना ही कर दिया पर फिर पता नहीं बच्चों या हमारे हताश चेहरों को देख तीसरे तल्ले पर स्थित एक "वी आई पी सूइट" जिसमें दो आपस में जुड़े हुए कमरे अपने-अपने प्रसाधन कक्ष के साथ थे, का आवंटन दूसरे दिन ग्यारह बजे तक के लिए कर दिया. हमें तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गयी हो. वहीं खाने की भी व्यवस्था थी, खाना सचमुच स्वादिष्ट था सो निश्चिंत और शांत मन से उदर पूर्ती की गयी.  दूसरे दिन दर्शन लाभ कर वापस हो लिए।  

वहाँ से लौटने के बाद मैंने धर्मशाला के प्रबंधकों को एक आभार जताते हुए पत्र लिखा था जिसमे उस रात कठिन समय में हमारी सहायता की गयी थी। अब होती है शुरू असली बात, जिसके लिए इतनी भूमिका बांधी। करीब दो महीने के बाद मुझे एक ई-मेल मिला जिसमे एक भले आदमी ने उसी धर्मशाला से अपने चोरी हुए सामान के लिए धर्मशाला के प्रबंधकों के साथ मुझे भी पत्र भेज मारा। मैं असमंजस में पड गया कि अगला चाहता क्या है? क्या मेरे पत्र में धर्मशाला की प्रशंसा अगले को रास नहीं आई? या आगे कभी वहाँ न ठहरूँ  या कोई और बात है? खैर मैंने उसे एक पत्र द्वारा अपनी उस यात्रा की असलियत तो बता दी थी. 
नुक्सान किसी का भी हो दुःख तो होता ही है वह भी ऐसी जगह जहां आदमी आस्था ले कर जाता है पर उसके लिए सभी को  वहाँ से शिकायत हो ऐसा तो संभव नहीं हो सकता न। उनका नुक्सान हुआ तो वहीं उसका निराकरण कर लेना चाहिए था बनिस्पत घर लौट कर अपना गुस्सा जग-जाहिर करने के।                      

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है पर..........

प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है।

संत वेलेंटाइन

फिर एक बार संत वेलेंटाइन का संदेश ले फरवरी का माह आ खड़ा हुआ। बाजारों में, अखबारों में युवाओं में काफी उत्साह उछाल मार रहा है। जो उत्सव कुछ समय पहले एक दिन का होता था उसे बाजार ने अपनी सहूलियत को मद्दे-नजर रख हफ्ते भर का कर दिया। देखा जाए तो हमारे सदियों से चले आ रहे पर्व "वसंतोत्सव" का भी तो यही संदेश है। हमारी तो प्रथा रही है प्रेम बरसाने की। इंसान की तो छोड़ें हमारे यहाँ तो पशु-पक्षियों से भी नाता जोड़ लिया जाता है। उन्हें भी परिवार का सदस्य मान अपना स्नेह उड़ेल दिया जाता है। जीवंत की बात तो क्या यहां तो पत्थरों और पेड़ों में भी प्राण होना मान उनकी पूजा होती रही है। सारे संसार को प्रेम का संदेश देने वाले को आज प्रेम सीखना पड़ रहा है पश्चिम से। सनातन काल से हमारे देश में रिवाज रहा है, प्रेम का, भाईचारे का, सौहार्द का। पर इसे कभी भुनाया नहीं गया। पर  जब आर्थिक उदारीकरण के  "बाजार" ने इसे वेलेंटाइन के नाम से जोड़ 'वाया' पश्चिम से प्रेम दिवस के रूप में प्रचारित कर आयात किया तो हमारी आंखें चौंधिया गयीं हमें चारों ओर प्यार ही प्यार नज़र आने लगा। गोया कि  "कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, आज वे हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।"

वसंतोत्सव 
इस उत्सव ने भारतीय युवाओं को खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने-अपने तरीके से मनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस संवेदनहीन और भावनाहीनता के समय में  कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है? सच तो यह है कि अधिकाँश इसे सिर्फ मौज-मस्ती का जरिया मान आनंद पाने की दौड़ में शामिल होते हैं उन्हें सामाजिक या अपने दायित्व का कोई एहसास नहीं होता।  प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है। जिस तरह के हालात हैं, मानसिक विकृतियां हैं, दिमागी फितूर है उसके चलते युवाओं को काफी सोच समझ कर अपने कदम उठाने चाहिए। खास कर युवतियों को। 

प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है। पर ये जो व्यवसायिकता है। अंधी दौड़ है या इसी बहाने शक्ति प्रदर्शन है उसे किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता।

किसी की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

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