pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 18 जून 2013

भेजा फ्राई करवाना है?

हमने बहुत सारे इंटरव्यू दिए और देखे होंगे पर इस तरह के भेजा फ्राई करने वाले इंटरव्यू से शायद ही किसी का पाला पडा हो। विश्वास नहीं होता तो जरा इसमें शामिल हो देखिए। लीजिए इंटरव्यू शुरु हो चुका है।

अफसर : आपका नाम क्या है?
मोहन   : एम.पी., सर।

अफसर : ठीक से पूरा बताओ
मोहन   : मोहन पाल, सर                                                    
 
अफसर : आपके पिता का नाम?
मोहन   : एम.पी., सर।

अफसर : इसका क्या मतलब है?
मोहन   : मनमोहन पाल, सर।

अफसर : आप कहां रहते हैं?
मोहन   : एम.पी., सर।

अफसर : अच्छा, मध्य प्रदेश?
मोहन   : नहीं सर, मुन्नार पुरम।

अफसर : ओह,हो! तुम्हारी क्वालिफ़िकेशन क्या है?
मोहन   : एम.पी., सर।

अफसर : अब यह क्या है?
मोहन   : मैट्रिक पास, सर।

अफसर : तुम्हे यह नौकरी क्यूं चाहिए?
मोहन   : एम.पी., सर।

अफसर : (गुस्से से) अब इसका क्या मतलब है?
मोहन   : मनी परोब्लम, सर।

अफसर : अपनी विशेषता बताओ।
मोहन   : एम.पी., सर।

अफसर : अरे, साफ-साफ बताओ #$@#$##
मोहन   : मल्टिपरपज परस्नैलिटी।

अफसर : इंटरव्यू यहीं खत्म होता है, आप जा सकते हैं।
मोहन   :  एम.पी., सर।

अफसर : अब इसका क्या मतलब है?
मोहन   : मेरा परफ़ारमेंस...?

अफसर : (बाल नोचते हुए) एम.पी. !!!
मोहन   : यानि?
अफसर : MENTALLY PUNCTURE.        G E T...O U T

शुक्रवार, 14 जून 2013

"तार" का बेतार होना, यानी एक युग का अंत

जहां पत्र या चिट्ठी के मिलने से एक खुशी और आनंद की अनुभूति होती थी वहीं तार वाले की आवाज सुन 95 प्रतिशत लोग किसी आशंका से ग्रसित हो जाते थे, क्योंकि तार ज्यादातर शोक संदेश ही लाती है, ऐसा विश्वास लोगों के मन में घर कर गया था.  इस "सिचुएशन" का फिल्मों में कई बार हास्य के रूप में भी चित्रण किया जा चुका है, जब तार आने पर उसे पढ़े बिना ही  घर में रोना-पिटना शुरू हो जाता है जबकि तार किसी खुशखबरी को  ही लाया होता है.

आने वाली 15 जुलाई से संचार प्रणाली के एक यांत्रिक माध्यम का नाम इतिहास में दर्ज होने जा रहा है. इंटरनेट, स्मार्ट फोन, एस एम् एस, फैक्स, ई-मेल के जमाने के सामने पुरानी और मंहगी पड़ती "टेलीग्राम" सेवा, जो "तार" के नाम से प्रसिद्ध थी, को बंद करने का फैसला लिया जा चुका है.

टेलीग्राफिक यंत्र 
वैसे तो यह प्रणाली सत्रहवीं सदी से ही सेमाफोर लाइन के  रूप में मौजूद थी पर डेढ़-पौने दो सौ साल पहले सेमुअल मोर्स की "डैश-डॉट" प्रणाली, जिसे मोर्स कोड के नाम से जाना जाता रहा है, के द्वारा संचार जगत में क्रांति ला दी गयी थी.  इससे विशेष संकेतों के जरिये सूचनाएं कभी भी और कहीं भी तुरंत भेजी जा सकती थीं।

मोर्स द्वारा 1844 में वाशिंगटन से बाल्टीमोर  भेजे गए अपने पहले संदेश "what hath God wrought?" के करीब 6 साल बाद ही भारत में इसकी शुरुआत 1850 में हो गयी थी, जब कलकत्ता से डायमंड हार्बर तक तारें बिछाई गयीं थीं, जिन्होंने अगले तीन साल के अन्दर ही करीब 4000 मील की जगह को घेरते हुए तकरीबन सभी प्रमुख शहरों को अपने जाल में लपेट लिया था. जिसका सबसे बड़ा फ़ायदा अंग्रेजों को सन 1857 की लड़ाई में समाचारों को पाने और पहुंचाने में मिला.  वहीं आजादी के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा इंग्लैण्ड के प्रधान मंत्री क्लेमेंट एटली को पाकिस्तान द्वारा काश्मीर में घुसपैठ करने पर एक 230 शब्दों का संदेश भी इसी माध्यम से भेजा गया था.      

इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्किट 
शुरू से ही कुछ शब्दों और छोटे वाक्यों को लाने ले जाने वाले टेलीग्राम या तार का उपयोग बहुत ही जरूरी खबरों या संदेशों के लिए किया जाता रहा था. खुशी, गमी, सफलता, पहुंचने, त्योहारों, जन्मदिन  इत्यादि जैसी खबरों को बताने के लिए जनता की सहूलियत के लिए टेलीग्राफ विभाग ने, ऐसे लोगों के लिए जो लिखना न चाहते हों,  के लिए छोटे-छोटे 44 संदेशों का चार्ट उपलब्ध करवाया हुआ था. पर यह भी सच है कि जहां पत्र या चिट्ठी के मिलने से एक खुशी और आनंद की अनुभूति होती थी वहीं तार वाले की आवाज सुन 95 प्रतिशत लोग किसी आशंका से ग्रसित हो जाते थे, क्योंकि तार ज्यादातर शोक संदेश ही लाती है, ऐसा विश्वास लोगों के मन में घर कर गया था.  इस "सिचुएशन" का फिल्मों में कई बार हास्य के रूप में भी चित्रण किया जा चुका है, जब तार आने पर उसे पढ़े बिना ही  घर में रोना-पिटना शुरू हो जाता है जबकि तार किसी खुशखबरी को लाया होता है.

 पर अब तक अपने समय के संचार के सबसे आवश्यक और तेज माध्यम को आधुनिक युग से तारतम्य न बैठा सकने के कारण मैदान छोड़ना पड़ रहा है.  ऐसा नहीं है की इसे बचाने के प्रयास नहीं किए गए, 2006 में इसे "अपग्रेड" करने के बावजूद यह "नेट-सेवी" लोगों को आकर्षित नहीं कर पाई. बढ़ते घाटे की भरपाई के कारण  करीब 80 साल बाद 2011 में इसकी दरों में वृद्धि की गयी और 50 शब्दों के लिए, लिए जाने वाले 3 रुपयों की जगह दरें 27 रुपये कर दी गयीं, पर इस आक्सीजन से भी इसमे प्राण नहीं फूंके जा सके और अंत में संचार क्रान्ति के इस अजूबे पितामह को अजायबघर का सदस्य बनाने का निर्णय ले लिया गया.
     

गुरुवार, 13 जून 2013

एक डिब्बा मातृत्व भरा

अपने यहाँ नवजात शिशुओं और गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर बहुत ज्यादा है. वर्षों से सरकारों द्वारा  इसकी रोक-थाम के लिए कदम उठाने के बावजूद कोइ बहुत ज्यादा सुधार नहीं हो पाया है. आज के माहौल में कारणों की छीछालेदर न ही की जाए तो बेहतर है. इसी के संदर्भ में हम जब फिनलैंड जैसे छोटे देश को देखते हैं तो अचंभित होना जरूरी हो जाता है.

1930 के दशक में फिनलैंड एक बहुत ही गरीब देश था और वहां पर बाल मृत्यु दर बहुत ज्यादा थी। 1000 में से हर 65 बच्चे की मौत हो जाया करती थी। बहुत सोचविचार के बाद करीब 75 साल पहले  वहाँ की सरकार ने गर्भवती महिलाओं को एक डिब्बा देना शुरू किया। तब से दिए जा रहे इस डिब्बे को, जिसमें बच्चों के कपड़े, चटाई, खिलौने, स्लीपिंग बैग तथा  नैपकिन इत्यादि भरे रहते हैं, का इस्तेमाल बच्चों के बिस्तर के तौर पर भी किया जा सकता है। ये मातृत्व पैकेज सरकार की ओर से एक उपहार है जो हर गर्भवती महिलाओं को दिया जाता है। बच्चा चाहे जिस पृष्ठभूमि से आता हो उसे ये डिब्बा दिया ही जाता है। इससे सभी बच्चों की जिंदगी  एक समान स्तर पर शुरु होती है। इस डिब्बे की निचली सतह पर एक चटाई बिछी होती है। ये डिब्बा ही हर बच्चे का पहला बिस्तर होता है। हर तरह की समाजिक पृष्ठभूमि के लड़के कार्ड-बोर्ड की चार दीवारों से घिरे इस डिब्बे में पहली झपकी लेते हैं।

पहले यह सुविधा सिर्फ गरीब तबके के लिए ही थी पर बाद में यह सबके लिए लागू कर दी गयी.  वैसे मां के पास विकल्प होता है कि वो चाहे तो मातृत्व का डिब्बा ले ले या फिर नकद पैसा। फिलहाल इस मामले में 140 यूरो नकद दिए जाते हैं। पर 95 फीसदी लोग डिब्बा ही चुनते हैं। इस डिब्बे में वो तमाम सामान मुहैया कराए जाते हैं जो बच्चे की देखभाल के लिए जरूरी होते हैं। 

आज 75 साल बीत जाने के बाद फिनलैंड में मातृत्व का डिब्बा एक रिवाज बन चुका है. इसकी सबसे अच्छी बात यह है की इसके अन्दर रखी गयी हर चीज बिना लिंग भेद के रखी गयी है. परिवार में लड़का हो या लड़की यह डिब्बा सबके लिए समान रूप से उपयोगी है.

शुरू में इसमें हाथ से बनाए कपड़े रखे जाते थे क्योंकि तब वहाँ रिवाज था की  मां तब बच्चों के कपड़े खुद बनाया करती थीं। पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इसमें कागज का  सामान रखा जाने लगा क्योंकि कपडे को सेना के उपयोग में लाना जरूरी हो गया था. पर युद्धोपरांत  रेडी मेड कपड़े का चलन बढ़ा तो 60 और 70 के दशक में नए कपड़ों का इस्तेमाल होने लगा। 1968 में इसमें स्लीपिंग बैग जोड़ा गया। इसके एक साल बाद इसमें नैपकिन शामिल कर ली गई। लेकिन बच्चों का अच्छा पालन पोषण हमेशा से मातृत्व के डिब्बे की नीति रही है। इसीलिए माँ के दूध को प्राथमिकता तथा प्रोत्साहन देने के लिए इस डिब्बे से दूध की  बोतल को  हटा दिया गया.   अब तो समय के साथ-साथ और भी चीजें जुड़ती जा रही हैं जैसे तस्वीरों वाली छोटी-छोटी पुस्तकें।    

वहाँ के लोगों का विश्वास है कि बच्चों की मृत्यु दर में कमी आना  इस डिब्बे के कारण ही संभव हुआ है. जो कहीं न कहीं समानता का भी प्रतीक है.  काश अपने यहाँ भी कम से कम जीवनोपयोगी कार्यक्रमों का पूरा फल   जरूरतमंदों तक पहुँच पा सके.




मंगलवार, 11 जून 2013

ये मानसून-मानसून क्या है

भीषण, झुलसा देने वाली गर्मियों के बाद सकून  देने वाली बरसात धीरे-धीरे सारे देश को अपने आगोश में लेने को आतुर है.  जून से सितंबर तक  हिंद और अरब महासागर से उठ कर अपने देश को  दक्षिण-पश्चिम दिशा से घेर कर  जमीन की तरफ पानी लेकर आने वाली हवाओं को मानसून के नाम से जाना जाता है. 
मानसून नाम अरबी भाषा के "मावसिम" शब्द से आया है. 
घिर आए बदरवा 
मानसून के प्रभाव से ही पाकिस्तान और बांग्ला देश में भी बरसात की सौगात प्राप्त होती है.  भारत मे इसका आगाज तकरीबन एक जून से  होता   है. पर आहट मई के अंतिम हफ्ते से शुरू हो जाती है.  मौसम विभाग कई तथ्यों का अध्ययन कर इसका पूर्वानुमान लगाता है. जिसमें देश भर के विभिन्न भागों से तापमान, हवा के रुख, बर्फबारी, वायुमंडल के दवाब इत्यादि के आंकड़ों को ध्यान में रख आने वाले मौसम की भविष्यवाणी की जाती है. पर यह भी सही है की इतने आंकड़ों को इकट्ठा करने में ज़रा सी चूक आने वाले मौसम के समय में काफी हेर-फेर ला देती है. फिर भी समय के साथ इसकी उपयोगिता पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते. 

पर अपने देश में ऐसे-ऐसे लोग हुए हैं जो बिना किसी यंत्र-पाती के आने वाले समय का सटीक आंकलन करने की क्षमता रखते थे. आज भी गाँव-देहात में "घाघ-भड्डरी" संवाद  इनमें प्रमुख  है. कहते हैं उनकी काव्यात्मक भविष्यवाणियां कभी भी गलत नहीं होती थी। उनके द्वारा की गयी ऎसी कुछ भविष्यवाणियों को आप भी आजमा और परख सकते हैं -

# कितनी भी कड़ी धूप हो, जब चिड़ियाँ धूल में नहाने लगें तो समझ लीजिए दो-एक दिन में वर्षा होने वाली है.

# जब चीटीयाँ अपने अंडे मुंह में दबाए किसी ऊंची जगह पर जाने लगें तो जान जाना चाहिए की  बरसात  दस्तक दे चुकी है
# मानसून की आहट  होते ही मछलियाँ पानी की  पर आ तैरने लगती हैं।

# मोर का नाचना भी पानी बरसने का संकेत होता है.

# कुछ और  पक्षी भी अपने हाव-भाव से आने वाली बरसात की पूर्व सूचना दे देते हैं, जिनमे पपीहा, कूकू, घोघिल तथा कई प्रवासी पक्षी सम्मलित हैं।

# गाँव के बूढ़े-बुजुर्ग तो बादलों के रंग और हवा के तापमान तथा रुख को देख कर आज भी  मौसम का सटीक आकलन कर लेते हैं। 

पर जिस तरह आजकल पर्यावरण दूषित हो रहा है, 'ग्लोबल वार्मिंग' बढ़ रही है उससे डर  है कि मानसून जो ज्यादातर भारत पर सह्रदय रहा है वह आने वाले समय में अपना समय और दिशा बदल सकता है. ऐसा हो इसके पहले सतर्क होने की जरूरत है.

   
      

बुधवार, 5 जून 2013

आज का दिन गहन चिंतन का है

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। प्रदूषित होते अपने वातावरण को सुधारने की ओर ध्यान दिलाने का दिन। वैसे अपनी पृथ्वी, अपनी धरा, अपने संसार को बचाने के लिए किसी एक ही दिन सोचना कुछ औपचारिक लगता है क्योंकि यह समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करते जा रही है। इसी के फलस्वरुप आजकल सूरज का प्रकोप कुछ इस कदर बढ़ गया है कि समूचा देश त्राहि-त्राहि कर रहा है, खासकर मध्य से उत्तर भारत में दिन के शुरू होते ही सूरज सिर के ऊपर चढ़ आता है और देर रात तक उसकी मौजूदगी का तीखा एहसास बना रहता है। लोगों के लिए लू के थपेड़ों के बीच चलना दुस्साहस की मांग करता है। पशु-पक्षियों के लिए पानी की जरूरत पूरा करना जान लेवा होता जा रहा है। पेड-पौधे झुलस के रह गये हैं।

राहत के तमाम कुएं सूख चुके हैं और तालाबों में पानी नहीं के बराबर बचा है। मानसून को पूरे देश में पहुंचने में अभी भी विलंब है। अधिकांश राज्यों में पारा 40 के ऊपर बना हुआ है। वैसे देखा जाए तो सूरज का यह प्रकोप या रूप नया नहीं है। गर्मियां तो सदा से ही प्राकृतिक रूप से अपने नियमानुसार आती ही रहती थीं। पर तब प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता मधुर हुआ करता था, हमारे जीवन में तब मशीनों का इतना दखल नहीं हुआ था। भीषण गर्मियों में भी तब कुओं, तालाबों, सरोवरों में इफरात पानी होता था। बाग-बगीचों, पेड-पौधों, जंगलों की भरमार थी जो झुलसा देने वाली गर्म हवा से बचने का वायस होते थे। वर्षों पहले जब पंखे, कूलर, वातानुकूलन यंत्र नहीं होते थे तब भी इंसान सकून से समय बिता लेता था। क्योंकि प्रकृति उसकी सहायक हुआ करती थी। पर हमारी बेवकूफियों का ही यह नतीजा है कि आज अधिकांश आबादी को "टायलेट और दुषित" पानी को ही कुछ हद तक साफ कर फिर काम में लाना पड रहा है.  

इतिहास गवाह है कि दुनिया की महान सभ्यताएं नदी किनारों पर ही बसती पनपी थीं। आज सभ्यता बड़े-बड़े टाउनशिपों में पलती-पनपती है। जहां पानी की अविरल आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है। पानी के अभाव का आलम यह है कि गर्मी के इस मौसम में राष्ट्रीय राजधानी में जलापूर्ति टैंकरों के भरोसे है, तो सोचा जा सकता है की बाकी राज्यों और शहरों का क्या हाल होगा.  ज्यादातर नदियां सूख कर अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। विडंबना है कि गर्मियों में अधिक मांग होने के कारण जब बिजली की कमी हो जाती है, तो पानी का भी अभाव हो जाता है।

आज मनुष्य के हित के लिए विकास अवश्यम्भावी है। पर उसी विकास के साधनों का अधिक इस्तेमाल करने के कारण पृथ्वी गर्म हो रही है। ऊपर से सूरज का प्रकोप, इन दो पाटों के बीच अपने जीवन को दुभर बनाने का  दोषी भी इंसान ही है। इसीलिए हर बार गर्मी के हर मौसम में हम सब को ऐसा कष्ट झेलना पडता है। इसके बावजूद हम अपने रहन-सहन का ढर्रा बदलने के बारे में नहीं सोचते। हमें लगता है कि  जब हमारे पास पूरा पानी है तो चिंता काहे की. पर यह समस्या व्यक्तिगत नहीं है। आने वाले दिनों में इसकी गिरफ्त में सारा संसार आने वाला है.  अभी भी कुछ नहीं बिगडा है। अभी भी सही दिशा में उठाया गया हमारा एक कदम आने वाली पीढ़ियों को सुख-चैन से जीने का अवसर दे सकता है. 

मंगलवार, 4 जून 2013

टूटना छींके का बिल्ली के भागों

अपने यहां चुनावों का मतलब त्यौहार है। आमतौर पर त्यौहारों पर आम-जन खुश, उम्मंगित और उत्साहित रहता है। पर बाकी त्यौहारों और इस त्यौहार में मूल फर्क यह होता है कि और उत्सवों पर नागरिक अपनी जेब से पैसा खर्च कर खुश होता है पर चुनावी उत्सव पर सरकार मौका देती है उसे खुश होने का। चुनाव की घोषणा होते ही जनता चातक की तरह इंतजार करने लगती है सरकारी राहत घोषणाओं का और उसका इंतजार बेकार भी नहीं जाता। सालों विभिन्न तरह से जनता की कमाई बटोरने वाली सरकारों की आंखों में ममता छा जाती है, दिल अचानक दया से द्रवित हो उठते हैं। देने के नाम पर कभी एक हाथ न उठाने वाले दस-दस हाथों से कृपा बरसाने लगते हैं। समझते दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से हैं पर मौके पर बही बयार का फायदा उठाने से नहीं चूकना चाहते।        

अब फिर चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है। दोनो पक्ष भी तैयार हैं। उसी के तहत कैबिनेट में नोट करीब-करीब बन चुका है जिस पर सहमति और घोषणा होते ही देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र साठ साल से बढ कर बासठ साल हो जाएगी। इस नई व्यवस्था में उन कर्मचारियों के हाथों भी बटेर लग जाएगी जो रिटायरमेंट की दहलीज पर पहुंच बस टापने ही वाले थे।   

आगामी नवम्बर में दिल्ली में होने वाले चुनावों को देखते हुए सरकार ने कर्मचारियों को खुश कर अपने हक में करने के लिए यह दांव खेला है। क्योंकि केंद्र के 85 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी दिल्ली में ही रहते हैं। अगर कैबिनेट में इस फैसले पर मुहर लगती है तो यह तीसरा मौका होगा जब सरकार केंद्रीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाएगी। 

इससे पहले भाजपा की एनडीए सरकार ने 1998 में केंद्रीय कर्मचारियों की रिटायरमेंट आयु बढ़ाकर 60 वर्ष की थी। वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन युद्ध के बाद 1962 में कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाकर 58 वर्ष कर दी थी। 

केंद्रीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ने के बाद अन्य राज्यों के राज्य कर्मचारियों की भी आशा बढ जाएगी। अभी केवल मध्य प्रदेश में कर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु 62 साल है। चाहे जो हो जैसे भी हो आने वाला त्यौहार कुछ चेहरों पर खुशी और रौनक तो ला ही देगा। 

सोमवार, 3 जून 2013

गांव से माँ आई है

गांव से माँ आई है। गर्मी पूरे यौवन पर है। गांव शहर में बहुत फर्क है। पर माँ को यह मालुम नहीं है। माँ तो शहर आई है अपने बेटे, बहू और पोते-पोतियों के पास, प्यार, ममता, स्नेह की गठरी बांधे। माँ को सभी बहुत चाहते हैं पर इस चाहत में भी चिंता छिपी है कि कहीं उन्हें किसी चीज से परेशानी ना हो। खाने-पीने-रहने की कोई कमी नहीं है दोनों जगह पर जहां गांव में लाख कमियों के बावजूद पानी की कोई कमी नहीं है वहीं शहर में पानी मिनटों के हिसाब से आता है और बूदों के हिसाब से खर्च होता है। यही बात दोनों जगहों की चिंता का वायस है। भेजते समय वहां गांव के बेटे-बहू को चिंता थी कि कैसे शहर में माँ तारतम्य बैठा पाएगी, शहर में बेटा-बहू इसलिए परेशान कि यहां कैसे माँ बिना पानी-बिजली के रह पाएगी। पर माँ तो आई है प्रेम लुटाने। उसे नहीं मालुम शहर-गांव का भेद।

पहले ही दिन मां नहाने गयीं। उनके खुद के और उनके बांके बिहारी के स्नान में ही सारे पानी का काम तमाम हो गया। सारे परिवार को गीले कपडे से मुंह-हाथ पोंछ कर रह रहना पडा। माँ तो गांव से आई है। जीवन में बहुत से उतार-चढाव देखे हैं पर पानी की तंगी !!! यह कैसा शहर है जहां लोगों को पानी जैसी चीज नहीं मिलती। जब उन्हें बताया कि यहां पानी बिकता है तो उनकी आंखें इतनी बडी-बडी हो गयीं कि उनमें पानी आ गया।

माँ तो गांव से आई हैं उन्हें नहीं मालुम कि अब शहरों में नदी-तालाब नहीं होते जहां इफरात पानी विद्यमान रहता था कभी। अब तो उसे तरह-तरह से इकट्ठा कर, तरह-तरह का रूप दे तरह-तरह से लोगों से पैसे वसूलने का जरिया बना लिया गया है।

माँ तो गांव से आई है उसे कहां मालुम कि कुदरत की इस अनोखी देन का मनुष्यों ने बेरहमी से दोहन कर इसे अब देशों की आपसी रंजिश का वायस बना दिया है। उसे क्या मालुम कि संसार के वैज्ञानिकों को अब नागरिकों की भूख की नहीं प्यास की चिंता बेचैन किए दे रही है। मां तो गांव से आई है उसे नहीं पता कि लोग अब इसे ताले-चाबी में महफूज रखने को विवश हो गये हैं।

 माँ तो गांव से आई है जहां अभी भी कुछ हद तक इंसानियत, भाईचारा, सौहाद्र बचा हुआ है। उसे नहीं मालुम कि शहर में लोगों की आंख तक का पानी खत्म हो चुका है। इस सूखे ने इंसान के दिलो-दिमाग को इंसानियत, मनुषत्व, नैतिकता जैसे सद्गुणों से विहीन कर उसे पशुओं के समकक्ष ला खडा कर दिया है।

माँ तो गांव से आई है जहां अपने पराए का भेद नहीं होता। बडे-बूढों के संरक्षण में लोग अपने बच्चों को महफूज समझते हैं पर शहर के रसविहीन समाज में कोई कब तथाकथित अपनों की ही वहिशियाना हवस का शिकार हो जाए कोई नहीं जानता।        

ऐसा नहीं है कि बेटा-बहू को मां की कमी नहीं खलती, उन्हें उनका आना-रहना अच्छा नहीं लगता। उन्हें भी मां के सानिध्य की सदा जरूरत रहती है पर वे चाहते हैं कि माँ  इस शुष्क, नीरस, प्रदूषित वातावरण से जितनी जल्दि वापस चली जाए  उतना ही अच्छा।





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