pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 16 जुलाई 2012

क्या कहिए एइसन लोगन को !!!


ऐसा क्यूं होता है कि समाज के निचले तबके से उठ कर उपर पहुंचने वाला भी यहां आकर अपने खास हो जाने के एहसास में ऐसा जकड जाता है कि फिर उसे किसी आम से कोई लगाव ही नहीं रह जाता। 


अभी एक खबर पढने को मिली कि अपने को गरीबों की सबसे बडी मसीहा मानने और मनवाने वाली ममता दीदी ने अपने परिवार के साथ भोजन करते समय ऐसे ही अपनी भाभी से सब्जियों की कीमत पूछ ली और जब उनके आसमान छूते दामों को सुना तो उनका माथा  ठनका उन्होंने तत्काल कार्यवाई करते हुए दलालों इत्यादि पर शिकंजा कसा और देखते ही देखते कोलकाता में सब्जियों के भाव कम हो गये। यह खबर का एक पहलू है जिसे दीदी के पक्ष में रखा गया था। 

दूसरा पहलू जो साथ ही उभर कर आता है वह यह है की अपने को घास के समान जमीन से जुडा दिखलाने, समझने, कहलाने वाली पार्टी प्रमुख को क्या अभी तक यह पता ही नहीं था कि बाजार में सब्जियां आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं?   गजब है !!!

मुहावरे में नहीं, लगता है सचमुच में भी उन्हें आटे-दाल का भाव मालुम नहीं होगा। होगा भी कैसे सत्तानशीं होने के बाद कभी इन सब को जानने की जरूरत कहां रह जाती है। पर फिर सवाल उठता है कि फिर ऐसे लोग हाथ उठा, आंखें चमका किस मंहगाई को लेकर सडकों पर उतरते हैं। कैसे लोग हैं ये? किस गरीब की बात करते हैं ये सब? किस देश में रहते हैं? कौन हैं इनके सलाहकार? क्या है इनका उद्देश्य? क्या मंहगाई के लिए इनका मुद्दा सिर्फ पेट्रोल-डीजल और गैस है? वह भी सिर्फ अपने हित को साधने और अपना लक्ष्य कोई मलाईदार विभाग या प्र.मं. की कुर्सी हथियाने के लिए?  क्या  बाकि जींस, वस्तुएं, रोजमर्रा की आवश्यक चीजें  बेमानी हैं? 
तभी तो कोई आइसक्रीम का उदाहरण दे देता है और कोई सीधे कार की सब्जियों से तुलना कर आम जनता के जले पर नमक छिडकने का दुस्साहस कर देता है। ऐसा क्यूं होता है कि समाज के निचले तबके से उठ कर उपर पहुंचने वाला भी यहां आकर अपने खास हो जाने के एहसास में ऐसा जकड जाता है कि फिर उसे किसी आम से कोई लगाव ही नहीं रह जाता।

सोचने की बात है कि मनुष्य की सबसे बडी जरूरतों में से एक खाद्य की जिंसों के बारे में ही जब इन्हें जानकारी नहीं है तो किस मंहगाई के विरुद्ध जनता को दिखाने के लिए हो-हल्ला मचाते हैं? इनको मालुम होना चाहिए कि सिर्फ अपनी राजनीति को मांजने के लिए भाडे के लोगों की रैलियां निकाल, देश-प्रदेश को एक-दो दिन के लिए बंद करवा, जिससे भी गरीब के पेट पर ही लात पडती है, इनके अपने फर्ज की इतिश्री समझ लेने से ही गरीब का पेट नहीं भरता।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

रोम की बांसुरी, फ्रांस का केक, भारत की आइसक्रीम


सुनते आ रहे हैं कि जब रोम जल रहा था तो सम्राट नीरो बांसुरी बजा रहा था और जब फ्रांस की जनता को रोटी के लाले पडे हुए थे तो वहां कि रानी ने उन्हें केक या पेस्ट्री खाने की सलाह दे डाली थी। ऐसी बातें सुन, ऐसे लोगों के प्रति वितृष्णा और साथ ही आश्चर्य भी होता था कि कोई इतना निर्मम और संवेदनहीन कैसे हो सकता है। पर मन में कहीं तसल्ली भी रहती थी कि शुक्र है अपने यहां ऐसे नेता नहीं हैं।

पर समय कहां एक जैसा रहता है, बदलाव आया, स्थितियां बदलीं, हालात बदले पुरानी पौध खत्म हो गयी। वही पहले जैसी राजशाही वाली मानसिकता वाले लोग येन-केन-प्रकारेण फिर सत्तानशीं हो गये। हालात पहले के फ्रांस और रोम से भी बदतर होते चले गये। अब तो देश के हर राज्य में एक नीरो बैठा है, जगह-जगह मेरीयों का राज्य है। इनमें ना तो अपनी प्रजा के प्रति सहानुभूति है नाहीं सवेदनशीलता है नाही उनके दुख-दर्द से कोई लेना-देना है। हर तरफ निरंकुशता का बोल-बाला है। अपने किसी कर्म-दुष्कर्म से किसी को कोई डर भय नहीं रह गया है। कुछ भी करते ना तो कोई डरता है नाहीं कुछ बोलने के पहले कोई कुछ सोचता है। झट से मुंह खोलते हैं और भक्क से कुछ भी उगल देते हैं।

ऐसा ही बयान देश के प्रमुख विभागों को संभालने वाले मंत्री महोदय की ओर से आया। उनका कहना है कि लोग 15 रुपये की आइसक्रीम तो खा लेते हैं पर चावल पर एक रुपये की बढोतरी बर्दास्त नहीं करते। देश को संभालने वाले ऐसे लोगों को क्या यह नहीं मालुम कि आइसक्रीम और चावल में से क्या ज्यादा जरूरी है और किसकी रोज जरूरत पडती है। क्या इन्हें नहीं मालुम कि करोंडों लोगों के लिए आइसक्रीम एक विलासता है।  क्या इन्हें नहीं मालुम कि रोज आधा पेट खाने वालों को आइसक्रीम नहीं सपने मे भी रोटी ही नजर आती है। दुखद किंतु सत्य है कि  ऐसे नेताओं के कुत्ते भी वातानुकूलित जगह में रहते हैं और बिना "पेडिग्री" खाए वे अपना दिन शुरु नहीं करते। ऐसे लोग आवाम के वो सेवक हैं जिन्हें सचमुच आटे-दाल के भाव का अंदाजा नहीं है। कोई इनसे पूछे कि इन्होंने रोजमर्रा की चीजें अपनी कमाई से कब खरीदीं तो शायद ही जवाब दे सकें। अभी इन्होंने अपनी गलती भांप माफी मांगी ही थी कि ऐसे ही एक सज्जन ने इनकी तरफदारी करते हुए कह डाला कि कारों की कीमत बढने पर कोई कुछ नहीं बोलता पर सब्जियों के दाम बढते ही सब चिल्लाने लगते हैं। कल कोई ऐसा ही और खडा हो जाएगा और उगल देगा कि सोने के भाव चढने पर सब मौन रहते हैं पर दूध के दाम बढते ही सब बेचैन हो उठते हैं। उस पर तुर्रा यह है कि ऐसे सभी लोग अपने को गरीबों का सबसे बडा हितैषी दर्शाते हैं। 

सरकार की नाकामी, जिसे अब देश नहीं दुनिया इंगित करने लगी है, उसका निराकरण तो दूर, अब अपना दोष भी जनता के मत्थे मढना शुरु कर दिया है। हालांकी अभी-अभी सामने आए मदांधों के हश्र से भी कोई सबक लेना नहीं चाहता। इन्हें देश की 60-70 करोड भूखी-नंगी जनता का कोई दुख-दर्द नहीं सालता।

विडंबना है हमारी और हमारे देश की कि मतिहीन, गतिहीन, संवेदनहीन, सत्ता-पिपासू, धनलोलूप लोगों के हाथ बागडोर है जो आमजन को "कैटल" या गुलामों से ज्यादा न तो समझते हैं नाहीं महत्व देते हैं। पर इन्हें याद रखना चाहिए कि यदि जनता चुप है तो वह आने वाले तूफान का संकेत भी हो सकता है।

सोमवार, 9 जुलाई 2012

रायसीना की कठिन डगर


राजनीति अबूझ खेलों का गढ है। यहां के खिलाडी "जर्सी" किसी की पहनते हैं, मन से किसी और की तरफ होते हैं और "गोल" किसी और के लिए करते हैं।

रायसीना पहाडी पर बने आलीशान महल के नये मेहमान का नाम लगभग तय हो गया है। यदि कोई अनहोनी या चमत्कार ही ना हो जाए तो प्रणव मुखर्जी का वहां जाना तय है। पर उनका यहां तक का सफर इतना सहज और आसान नहीं था वह भी तब जब देश की सबसे ताकतवर महिला और उन्हीं की पार्टी की सुप्रीमो की पसंद मुखर्जी नहीं हामीद अंसारी थे।

राजनीति अबूझ खेलों का गढ है। यहां के खिलाडी "जर्सी" किसी की पहनते हैं, मन से किसी और की तरफ होते हैं और "गोल" किसी और के लिए करते हैं। प्रणव रूपी फांस सोनिया को तबसे सालती रही है जब इंदिरा जी की मृत्यु पर मुखर्जी ने प्रधान मंत्री बनने की दावेदारी पेश की थी। इसी के चलते 2004 में हर तरह से लायक होने के बावजूद प्रधान मंत्री की कुर्सी मनमोहन सिंह को सौंप दी गयी थी। अभी भी राष्ट्रपति पद के लिए प्रणव का नाम उनकी लोकप्रियता के कारण आगे बढाया जरूर गया था पर उसके पीछे आकलन था कि प्रणव-ममता के आपसी तनाव के चलते तृणमूल उनका विरोध करेगी तब हामीद अंसारी को सर्वोच्च पद के लिए मनोनीत कर दिया जाएगा और प्रणव को उपराष्ट्रपति पद सौंप कर एक बडी अडचन को भी दूर कर लिया जाएगा।

हामीद अंसारी सोनिया की पहली पसंद थे। उन्होंने अपनी भक्ति का प्रदर्शन 30 दिसंबर 2011 को लोकपाल बिल की बहस के दौरान कर भी दिया था। सोनिया को विश्वास था कि फख्रुद्दीन अलि अहमद, वी। वी। गिरी, ज्ञानी जैल सिंह और प्रतिभा पाटिल जैसे नामों की वह अगली कडी होंगे। पर प्रणव मे आगत को सूंघ लिया और उन्होंने सोनिया के दाहीने हाथ और विश्वस्त अहमद पटेल और नारायणसामी को बुलवा कर अपना आक्रोश जाहिर कर स्तीफे की धमकी दे डाली। पार्टी में खलबली मचनी स्वाभाविक थी, प्रणव के जाने का सीधा मतलब पार्टी का टूटना था। जिसका सीधा असर राहुल के कार्यकारी अध्यक्ष बनने पर पडना लाजमी था। यहीं आ कर बहुतों के बहुतेरे मंनसूबे धाराशाई हो गये, कहां तो एक तीर से दो निशाने साधने कि योजना थी और कहां तीर कमान में ही फंस कर रह गया और इसके साथ ही प्रणव के लिए रायसीना तक लाल गलीचा बिछने की पूरी संभावना उत्पन्न हो गयी।
हालांकी संगमा जी अपना पूरा जोर लगा रहे हैं, पर प्रणव जी से पार पाना मुश्किल ही है।.   



शनिवार, 7 जुलाई 2012

नमस्कार,

इस बार की लम्बी अवधी की बेहद गर्म गर्मी से छुटकारे के लिए बडी बेसब्री से पावन पावस का इंतजार था। पर यह कहां अंदाज था कि उसके आते ही ऐसा हो जाएगा।

पहली अच्छी बारिश 18 जून को हुई। रौद्र रूप देख कर सावधानियां बरत ली थीं। पर अचानक फोन ने दम तोड दिया। अब जान नहीं थी तो अंतरजाल रूपी शरीर क्या करता। रोज बी.सी.एन.एल. के अस्पताल में अर्जी लगाने के बावजूद, सरकारी काम जैसा होता है वैसे ही हुआ, आज 19 दिन बाद किसी तरह जान वापस आई है तो हाजिर हूं।

हितचिंतक समय-समय पर सलाह देते रहते हैं कि बिना सुरखाब वाली सेवाएं भी आजमा लो पर पता नहीं, डेढ साल में तीन-तीन बार 26, 22 तथा अब 19 दिन तक तनाव बढाने के बावजूद मोह छुट नहीं पा रहा। चलिए अब तो शुरु हो गया है, बीती ताही बीसार कर आगे की सुध लेते हैं।

गुरुवार, 21 जून 2012

घिर आए बदरा


इसके दूसरे पक्ष की बात आज नहीं क्योंकि वैसे भी इसमें इसका दोष नहीं होता। हमारी धन-लोलूपता, लिप्सा और बेवकूफियों की वजह से इसे मजबूरीवश  रौद्र-रूप धारण कर हमें बार-बार सचेत करना पडता है।

जब भयंकर गर्मी अपने रौद्र रूप से सारे इलाके को त्रस्त कर रख देती है, जिसके फलस्वरूप जल का गहराता संकट, निर्जीव पादप, बेचैन प्राणी जगत के साथ दिनकर के प्रकोप से सारी धरा व्याकुल हो उठती है तब प्रकृति फिर करवट बदलती है और पहुंचती है पावन पावस की ऋतु।

सारी कायनात जैसे इसी परिवर्तन की राह देख रही होती है। मौसम की यह खुशनुमा हरित क्रांति सबके अंतरमन को अभिभूत कर देती है। सतरंगी फूलों से श्रृंगार किए, धानी चुनरी ओढे, दूब के मुलायम गलीचे पर जब प्रकृति हौले से पग रखती है, आकाश में जहां सूर्य का एकछत्र राज होता था वहां अब जल से भरे मेघ अपना अधिकार जमा लेते हैं। कारे-कजरारे मेघों से झरने लगती हैं नन्हीं-नन्हीं बूंदें, जो नन्हीं ही सही पर बडी राहत प्रदान करती हैं। कभी इनकी ओर ध्यान दें तो इनके झरने में एक अलौकिक संगीत का आभास होगा। वर्षा ऋतु मनभावन ऋतु तो है ही, मादकता की संवाहक भी है। आत्मीयता के तार जुडने लगते हैं इस वक्त। धरा आकाश जैसे एक हो जाते हैं। इंद्रधनुष की किरणों के साथ-साथ नभकी अलौकिकता भी धरा पर उतरती है। नभ के अमृत से वसुधा सराबोर हो उठती है। वर्षा में भीगने के बाद सारी प्रकृति को जैसे नया रूप। नया जीवन मिल जाता है। वन-बाग, खेत-खलिहान, नर-नारी, पशु-पक्षी, पेड-पौधे यानि पृथ्वी के कण-कण का मन-मयूर नाचने-गाने को आतुर हो उठता है।

प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों से लेकर आज तक शायद ही कोई कवि या रचनाकार हुआ हो जो इस ऋतु के प्रेम-पाश से बच सका हो। जहां आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण में पावस ऋतु का उल्लेख वियोग-श्रृंगार के माध्यम से श्री राम द्वारा विस्तार से करवाया है, वहीं संस्कृत के महाकवि कालीदास ने तो मेघ को संदेशवाहक ही बना डाला है। उन्होंने वर्षाकाल की तुलना नृपति से कर ऐसा अनुपम वर्णन किया है जो काव्य-जगत में अप्रतीम है।

अपने देश के हर प्रदेश के लोक-गीतों में वर्षा ऋतु को माध्यम बना असंख्य गीतों की रचना की गयी है। संगीतकारों ने इसकी रिम-झिम से प्रेरणा लेकर एकाधिक रागों की रचना कर डाली है। फिल्म-जगत भी इसकी मधुरता को भुनाने में पीछे नहीं रहा है। एक से बढ कर एक बरखा गीत फिल्मों में फिल्माए गये हैं जिनमें से बहुतेरे आज भी श्रोताओं के कानों में रस घोलते रहते हैं।

स्वागत है इस जीवनदायीनी ऋतु का जो अपने रम्य रूप में अठखेलियां करती शशक या मृग शावक सी पूरे प्राणी-जगत के दिलों में नये रंग बिखेर जाती है। बसंत यदि ऋतु-राज है, तो वर्षा ऋतु-साम्राज्ञी है। बसंत प्राणी-मात्र पर शासन कर सकता है पर यह तो कण-कण में प्राण फूंक कर उसे सजीव कर देती है।

इसके दूसरे पक्ष की बात आज नहीं क्योंकि वैसे भी इसमें इसका दोष नहीं होता। हमारी धन-लोलूपता, लिप्सा और बेवकूफियों की वजह से इसे मजबूरीवश  रौद्र-रूप धारण कर हमें बार-बार सचेत करना पडता है।

शुक्रवार, 15 जून 2012

पहले खुद अपनी भाषा को सम्मान दें



जब तक हम ही अपनी भाषा की कद्र नहीं करेंगे, जब तक खुद उसे उचित सम्मान नहीं देंगे, तब तक हमें बाहर वालों की आलोचना करने का भी हक नहीं बनता।

आस्ट्रेलिया की सरकार का मानना है कि भारत में जाने वाले उसके राजनयिकों को हिंदी जानने की कोई जरूरत नहीं है। हांलाकि उसके विदेशी मामलों के एक प्रमुख के अनुसार किसी भी राजनयिक के लिए किसी भी देश में जाने से पहले उसकी भाषा को जान-समझ लेना उस देश के प्रति अपना सम्मान जताना भी होता है। पर अधिकांश अफसरों के अनुसार जब भारत में सारे काम अंग्रेजी भाषा के द्वारा आसानी से करवाए जा सकते हैं तो फिर हिंदी सीखने में समय की बर्बादी क्यूं।

ध्यान देने की बात है कि यही आस्ट्रेलिया अपने राजनयिकों को चीन, जापान, इंडोनेशिया, ईरान, टर्की या कोरिया जैसे देशों में भेजने के पहले उन्हें वहां की भाषा सीखने की हिदायत देता है। पर भारत को हल्के से लेते हुए यहां आने वालों के लिए ऐसी कोई बंदिश नहीं है। इसमें आस्ट्रेलिया का कोई दोष नहीं है, बाहर के किसी भी देश से आने वाले मेहमान से हम हिंदी में बात करना अपनी तौहीन जो समझते हैं। बात-चीत के दौरान गलती से भी हिंदी का कोई शब्द मुंह से निकलने नहीं देते जिससे सामने वाला हमें अनपढ-गंवार ना समझ बैठे। बहुत बार सामने वालों ने, खासकर मारिशस जैसे देश, जहां हिंदी काफी प्रचलित है, से आए लोगों ने बातों का जवाब हिंदी में दे ऐसे काले अंग्रेजों के मुंह पर तमाचा मारा है पर हमारी वह नस्ल ही नहीं है जो सुधर सके। इसी के चलते दुनिया में हमने अपनी पहचान एक अंग्रेजी भाषी लोकतंत्र की बनवा दी है। वह भी तब जब हमारी भाषा हर तरह से, हर सक्षम है, हर कसौटी पर खरी है। कमजोर है तो हमारी मानसिकता।

हिंदी की इस हालत के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। सोचने की बात है कि अपनी मातृभाषा को बचाने संभालने के लिए हमने साल में एक दिन तय कर रखा है। उस दिन भी अधिकांश वक्ता ऐसे हिंदी बोलते हैं जैसे खाना खाते समय मुंह में कंकड आ गया हो। विडंबना ही तो है कि हमारे बडे से बडे नेताओं को भी साफ और शुद्ध हिंदी बोलनी नहीं आती। विदेश की तो जाने भी दें अपने लोगों को भी अंग्रेजी में संबोधित करते उन्हें हिचक नहीं होती। ऐसा कर वे विदेशों को क्या संदेश देते हैं, इस पर शायद ही उनका ध्यान गया हो।

कहा जाता है कि बिना अंग्रेजी जाने ज्ञान-विज्ञान में तरक्की करना मुश्किल है। एक हद तक यह ठीक हो सकता है। पर चीन, जापान, कोरिया, फ्रांस, रशिया जैसे और बहुतेरे देशों को भी तो देखिए जिन्होंने तरक्की भी की और अपनी भाषा का सम्मान भी बनाए रखा।

जब तक हम ही अपनी भाषा की कद्र नहीं करेंगे, जब तक खुद उसे उचित सम्मान नहीं देंगे, तब तक हमें बाहर वालों की आलोचना करने का भी हक नहीं बनता।

मंगलवार, 5 जून 2012

महान दार्शनिक अष्टावक्र


उनके पिता कहोल अध्ययन में इतने डूबे रहते थे कि उन्हें और किसी चीज की सुध ही नहीं रहती थी।  गर्भस्थित शिशु ने अपनी मां को परेशान देख अपने पिता को उलाहना दे डाला जिससे क्रोधित हो पिता ने शिशु को अष्टवक्री होने का शाप दे दिया। पर फिर शांत होने और पत्नी सुजाता की प्रार्थना पर उन्होंने शिशु को जगत-प्रसिद्ध होने का वरदान भी दिया। 

पुरानी कथाओं में एक ऐसे महान दार्शनिक का विवरण मिलता है जिनका शरीर आठ जगहों से वक्री याने टेढा था। जिसके कारण उनका नाम ही अष्टावक्र पड गया था। अपने समय के वे प्रकांड विद्वान और महान दार्शनिक थे।  उनका शरीर जन्म से ही आठ जगहों से टेढा था,   इसीलिए उन्हें अष्टावक्र कह कर पुकारा जाने    लगा। कथा है कि उनके पिता कहोल अध्ययन में  इतने  डूबे रहते थे कि उन्हें और  किसी  चीज की  सुध ही नहीं
रहती थी।  गर्भस्थित शिशु ने अपनी मां को परेशान देख अपने पिता को उलाहना दे डाला जिससे क्रोधित हो पिता ने शिशु को अष्टवक्री होने का शाप दे दिया। पर फिर शांत होने और पत्नी सुजाता की प्रार्थना पर उन्होंने  शिशु को जगत-प्रसिद्ध होने का वरदान भी दिया। 

अष्टावक्र जन्म से ही मेधावी थे। बहुत जल्द वे सभी शास्त्रों के ज्ञाता हो गये। विवाह योग्य होने पर उन्होंने वदान्य ऋषि की कन्या सुप्रभा से विवाह करना चाहा। ऋषि ऐसे कुरुप युवक को कैसे अपनी कन्या का हाथ दे सकते थे सो साफ मना ना करते हुए उन्होंने एक कठिन शर्त रखी कि हिमालय में तपस्या कर रही वृद्ध स्त्री का आशिर्वाद ले कर आने के बाद ही उनका विवाह संभव हो पाएगा। उनकी सोच थी कि ऐसा अपंग युवक कहां ऐसी दुर्गम यात्रा कर पाएगा। परंतु वदान्य अष्टावक्र के दृढ-संकल्प को नहीं समझ पाए थे। अष्टावक्र ने उनकी शर्त पूरी कर सुप्रभा को अपनी पत्नी बना लिया।

ऋषि अष्टावक्र महाज्ञानी, महादार्शनिक, विद्वान, शांत, सहनशील तथा विशाल-ह्रदय थे। अपने कुरुप शरीर को लेकर उनके मन में कोई हीन भावना भी नहीं थी, जैसा था वैसे से वे संतुष्ट थे। एक बार वह राज-पथ पर चले जा रहे थे, उसी समय वहां से राजा जनक की सवारी निकल रही थी। राजसेवकों ने उन्हें राजा का हवाला देते हुए मार्ग छोडने के लिए कहा। ऋषि ने जवाब दिया कि राजा की सुविधा के लिए प्रजा के आवश्यक कामों में अवरोध डालना अनुचित है। राजाज्ञा का विरोध करने के फलस्वरूप उन्हें बंदी बना लिया गया। बात राजा जनक तक पहुंची, सारी बात सुन उन्होंने कहा कि राजा को सही मार्ग दिखलाने वाले सत्पुरुष जिस देश में हों वह महान है और उन्होंने ऋषि को मिथिला का राजगुरु बना दिया जिससे प्रजा पर कभी भूल से भी अन्याय ना हो सके। पर साधारण जन पहले वस्त्र और रूप-रंग देख कर ही मानव का आकलन करते हैं। अष्टावक्र जैसे ही राजदरबार में
पहुंचे तो वहां उपस्थित सभासद उनके वक्री शरीर और चाल को देख माखौल में हंस पडे पर धीर-गंभीर  ऋषि जरा भी विचलित नहीं हुए, उल्टे उन्होंने सभासदों से ही सवाल  कर डाला कि आपलोग किस बात पर हस रहे हो? इस नश्वर शरीर पर या उस परम पिता की कृति पर ? हमें तो सिर्फ परम सत्य को जानने की अभिलाषा होनी चाहिए। आप सब मुझे नहीं परम तत्व को देखने समझने की इच्छा करें। ऐसा विद्वता पूर्ण और सार-गर्भित बात सुनते ही सभी सभासद नतमस्तक हो गये।

अष्टावक्र ने अपने समय में बहुत सारे विद्वता पूर्ण दृष्टांत, आध्यात्मिक संवाद और शरीर की नश्वरता पर अकाट्य संवाद  रखे जो उनकी विद्वता का प्रमाण हैं। उनके द्वारा राजा जनक को सुझाए मार्ग और उन दोनों के बीच हुए विद्वतापूर्ण संवादों के संकलन को अष्टावक्र संहिता या अष्टावक्र गीता के नाम से जाना जाता है।

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गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...