pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से ही तिरंगा क्यों फहराया जाता है ?

स्वतंत्रता दिवस की पहली सुबह, सारा देश रात भर सो ना पाया था। अंग्रेजों के चंगुल से लहूलुहान स्वतंत्रता को छीन लाने में हजारों-हजार नवजवान मौत का आलिंगन कर चुके थे। उनकी शहादत रंग लाई
थी। सारा देश जैसे सड़कों पर उतर आया था। लोगों की आंखें भरी पड़ी थीं खुशी और गम के आंसूओं से। खुशी आजादी की, गम प्रियजनों के बिछोह का।
दिल्ली तो जैसे पगला गयी थी। होती भी क्यों ना आजाद देश की राजधानी जो थी। हुजूम का हुजूम, ठट्ठ के ठट्ठ बढे जा रहे थे लाल किले की ओर। आज यह एतिहासिक किला भी फूला नहीं समा रहा था अपने भाग्य पर। बहुत उतार-चढाव देख रखे थे इसने अपने जीवन काल में, जबसे शाहजहां, ने उस जमाने में करीब एक करोड़ की लागत से इसे नौ सालों में बना कर पूरा किया था,
तब से आज तक यह अनगिनत घटनाओं का साक्षी रहा था। इसे यह गौरव ऐसे ही नहीं मिल गया था।

1857 की क्रांति में स्वतंत्रता संग्राम के वीरों ने अंग्रेजों को मात दे कर यहीं बहादुर शाह जफर को अपना सम्राट चुना था। किला गवाह है उस इतिहास का कि कैसे बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने मौत का तांडव शुरु कर दिया था। हजारों वीर मारे गये थे, कितनों को फांसी पर लटका दिया गया था, सैंकडों को काला पानी नसीब हुआ था। बुढे शेर को कैद कर रंगून भेज दिया गया था।
जहां यह किला मुगलों की शानो-शौकत का गवाह रहा था वहीं दो सौ साल बाद अंतिम बादशाह की दर्दनाक मौत का अभिसाक्षी भी इसे बनना पड़ा। ऐसा नहीं है कि इसके पहले या बाद में इसने जुल्मों-सितम नहीं देखे थे। सालों बाद एक बार फिर 1945 में ब्रिटिश हुकूमत ने आजाद हिंद फौज के जांबाजों, जी एस ढिल्लन, कैप्टन शाहनवाज तथा कैप्टन सहगल पर यहीं मुकदमा चला उन्हें सजा देने की कोशिश की थी पर उस समय सारा देश उनके पीछे खड़ा हो गया था। प्रचंड विरोध छा गया था पूरे देश में और डर के मारे अंग्रेजों को उन वीरों को मुक्त करना पड़ गया था। देश में विजयोत्सव मनाया गया और लाल किला उस विजय का प्रतीक बन गया। इसीलिए जब हमें आजादी मिली तब देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने सर्वसम्मति से इसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर झंडोतोलन के लिए सबसे उपयुक्त स्थल मान यहां से सारे राष्ट्र को संबोधित किया। उसके बाद से आज तक देश का हर प्रधान मंत्री यहां से झंडा फहरा कर अपने आप को गौरवांन्वित महसूस करता है।
आप सभी को, असंख्य विडंबनाओं के बावजूद, यह शुभ दिन मुबारक हो।
जय हिंद।

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

सुना है हवाई किराया और कम होगा :-)

इधर रेलवे किराया बढाने का सोच रही है, उधर हवाई कम्पनियां अपने किराए में कमी लाने जा रही हैं। नतीजा -

सोमवार, 8 अगस्त 2011

एक अनोखा मंदिर, जहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है.

बिजलेश्वर महादेव , जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भावविभोर हो जाता है। जिव्हा एक ही वाक्य उच्चारण करती है - त्वं शरणम
पिछली बार फोटो नहीं लगा पाया था उसी कमी को पूरा कर रहा हूं सावन माह के इस चौथे पावन सोमवार को।

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा लेता है।

ऐसा ही ए अद्भुत स्थल है, हिमाचल में बिजलेश्वर महादेव। जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादेव के नाम से भी जाना जाता है। हिमाचल के कुल्लू शहर से 18 कीमी दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर "मथान" नामक स्थान में स्थित है, शिवजी का यह प्राचीन मंदिर। इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे "कुलांत पीठ" के नाम से भी जाना जाता है।

इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी तथा अपने आप में अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत यहां के पुजारीजी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस का के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।

मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। व्यास नदी पार कर 15 किमी का सडक मार्ग 'चंसारी गांव' तक जाता है। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। उस समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है।

मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणीकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।

कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है जिसके बाद गर्भ गृह है जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जिसका व्यास करीब ४ फ़िट तथा उंचाई २.५ फ़िट के लगभग है।

वहां ऊपर पहाड़ की चोटी पर रोशनी तथा पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दू से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है य मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।

पर एक बात जो सालती है मन को कि जैसे-जैसे यहां पहुंचने की सहूलियतें बढने लगी हैं वैसे-वैसे कुछ अवांछनीयता भी वहां स्थान पाने लगी है। कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। पर क्या कहेंगे, गंदा है पर धंधा है।


नोट :- U-tube पर सुंदर विडिओ उपलब्ध है।
सारी फोटो नहीं डाली गयीं, बार-बार "टंग" हो कर तंग कर रहा था।

शनिवार, 6 अगस्त 2011

"झंडा ऊंचा रहे हमारा", किसने इस गीत की रचना की ?

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता है, हर भारतीय का दिल इसके प्रति श्रद्धा विभोर हो उठता है। पर इस गीत की रचना किसने की यह शायद बहुत से लोगों को मालुम नहीं है।

इस राष्ट्रीय झंडा गीत के रचनाकार थे स्वर्गीय श्री श्याम लाल गुप्त। इनका जन्म कानपुर के नरवल गांव में 16 सितंबर 1893 को हुआ था। इनके पिता का नाम श्री विश्वेश्वर गुप्त तथा माता का नाम कौश्लया देवी था। परिवार के आर्थिक संकट से जुझने के कारण श्याम लालजी बचपन से ही पढाई के साथ-साथ पिता का हाथ भी बटाया करते थे। बड़े होने के साथ-साथ इनका रुझान पत्रकारिता की ओर होता चला गया और इनकी देश भक्ति से ओत-प्रोत कविताएं तथा लेख अखबारों इत्यादि में छपने लगे जो काफी लोक प्रिय भी होते चले गये। इसी के कारण धीरे-धीरे नेताओं का ध्यान इनकी ओर गया और श्री गणेश शंकर विद्यार्थीजी की प्रेरणा से ये कांग्रेस के सक्रीय कार्यकर्ता बन गये और अपनी मेहनत और लगन के सहारे 1920 में फतेहपुर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पहुंच गये।
उस समय तक कोई झंड़े को सम्मान देने वाला ऐसा गीत नहीं बन पाया था जिसे सुन मन उद्वेलित हो सके। गणेश शंकरजी इनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे सो उन्होंने ही इन्हें कोई ऐसा गीत लिखने की जिम्मेदारी सौंप दी जो सीधा दिल तक पहुंचे। श्याम लालजी के सामने बहुत बड़ी चुन्नौती थी। काफी मेहनत और लगन से आखिर उन्होंने गीत लिखा। उसे बड़े-बड़े नेताओं ने सुना, पढा और उन सब के अनुमोदन के बाद उसे गांधीजी को दिखाया गया उन्होंने गीत को कुछ छोटा करने का परामर्श दे इसे झंडा गीत बनने का गौरव प्रदान कर दिया।
फिर तो यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलुसों, प्रभात फेरियों के अवसर पर गाया जाने लगा और जब 1938 में हरिपुरा के ऐतिहासिक कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ध्वजारोहण करते ही वहां पांच हजार लोगों ने देश के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति में भाव-विभोर हो इसे गाया तो इसे राष्ट्रीय झंड़ा गीत होने का गौरव भी मिल गया।

पूरा गीत इस प्रकार है :-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसानेवाला
वीरों को हर्षानेवाला
मातृभूमि का तन-मन-सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
लाल रंग भारत जननी का,
हरा अहले इस्लाम वली का,
श्वेत सभी धर्मों का टीका,
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
है चरखे का चित्र संवारा,
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा,
हरे देश का संकट सारा,
है यह सच्चा भाव हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
इस चरखे के नीचे निर्भय,
होवे महाशक्ति का संचय,
बोलो भारत माता की जय,
सबल राष्ट्र है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
आओ प्यारे वीरो आओ,
राष्ट्र ध्वज पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
शान ना इसकी जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए
विश्व विजय कर के दिखलाये
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।

जय हिंद।

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

यदि आपके "मेज वाले" या "गोद वाले" की घड़ी धीमी हो तो ठीक कर लें।

सावन का पवित्र, खुशहाल माह। शिवजी की परिवार सहित पूजा-अर्चना। पावन सोमवारों की अपनी महत्ता। रिमझिम फुहारों का आनंद। कृषकों के खिले चेहरे। ग्रीष्म से छुटकारा पा तन-मन तर करवाते जीव-जंतु। आपस में भीगते-भिगोते, हंसते-खेलते बच्चे।

ऐसे ही हल्के-फुल्के मौसम में याद आया कि पिछली बार शिवजी की हिमाचल में स्थित अद्भुत क्रीड़ा स्थली "बिजली महादेव" पर आधारित पोस्ट बिना फोटो के ड़ालनी पड़ी थी जब कि इस बार फोटो उपलब्ध हैं। तो तीसरे सोमवार को यह शुभ कार्य करने का निश्चय किया। पर तेरे मन कुछ और है कर्ता के कुछ और। रवीवार को जब जिरह-बख्तर कसने लगा तो देखा कि संत गुगलानंद समाधी में चले गये हैं। पर जब सोमवार शाम को भी समाधी नहीं टूटी और अजीब-अजीब संदेश आने लगे तो इस महान धारा के प्रवर्तक श्री ललितजी को आवाज लगाई। उन्होंने तसल्ली देते हुए कहा कि बाबा बहुत बार अपना आचन-पाचन ठीक करने में वक्त ले लेते हैं जल्दी ही प्रवचन देने लगेंगे। सोमवार निकल गया, मंगल की शाम आ धमकी, गुगलानंद की समाधी नहीं टूटनी थी सो नहीं टूटी। इस सब गोरख धंधों से अंजान अपने हाथ पैर फूलने लगे। तभी गुरु पाबलाजी का ध्यान आया। चलित फोन से सम्बंध साधा, उन्होंने समाधी से जुड़े एक-दो सवाल किए और बोले कि घबड़ाने की कोई बात नहीं है, गुगलानंद की "नाड़ी" की गति धीमी है, उसका "समय" ठीक नहीं चल रहा है। समय यंत्र की दोलन क्रिया ठीक कर दें, स्वत: ही समाधी के बाहर आ जाएंगे। लो जी अगले पांच मिनटों में गुगलानंद पूछ रहे थे, मैं कहां हूं?

इस नामुराद "नाड़ी" ने तो बहुत बार "सिम्पटम" दिखाए थे पर अपन ही समझ नहीं पाए थे। यह पता नहीं था कि जरा सी 'घड़ी' कौन सी 'घड़ी' दिखा देगी। चलो इसी बहाने कुछ सीखने को ही मिला।

पर मुसीबत खत्म कहां हुई थी जो बरखा का आंनद ले पाते। गुगलानंदजी की समाधी टूटी तो उनकी देखा-देखी कम्प्यूटर बाबा अड़ गये। डाक्टरी जांच के बाद निदान पाया गया कि उनकी ग्लूकोज की सप्लाई बंद हो गयी है यानि "एडोप्टर" महाशय हड़ताल पर चले गये हैं। मैंने ऊपर देख शिवजी से पूछा क्या प्रभू आप ही का तो गुणगान करना चाहता हूं फिर ये बाधाएं क्यूं?
प्रभू मुस्कुराए बोले, हर किसी चीज का समय बंधा हुआ है। जिसे चौथे सोमवार आना था तुम उसे तीसरे में ही ला रहे थे, बस।

तो रब रक्खे सुख, अगले सोमवार को बिजली महादेव यानि मक्खन महादेव या कहिए बिजलेश्वर महादेवजी के दर्शन करना मत भूलिएगा।

और हां यदि आपके "मेज वाले" या "गोद वाले" की घड़ी धीमी हो तो ठीक कर लें। कहीं ऐसा ना हो कि यह यंत्र "टाईम मशीन" बन जाए :-)

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

नाम, जो अपने धारक से भी लम्बा है।


कल की पोस्ट में न्यूजीलैंड की एक पहाड़ी का जिक्र किया था, जिसका नाम दुनिया के किसी भी स्थान के सबसे लम्बे नाम के रूप में दर्ज है। आज उसी के बारे में कुछ         
तफसील से -
न्युजीलैंड के  दक्षिणी हिस्से    में एक   305 मी.   ऊंची पहाड़ी    को दुनिया  के किसी भी स्थान के सबसे लम्बे नाम वाली जगह होने का गौरव प्राप्त है। न्यूजीलैंड की Maori भाषा में    बोला जाने वाला   यह नाम कुछ इस प्रकार है -

“Taumatawhakatangihangakoauauotamateahaumaitawhitiurehaeaturipukakapikimaungahoronukupokaiwhenuakitanatahu”

पूरे 105 शब्दों वाले नाम को  बोलने की   आसानी के लिए संक्षिप्त कर पहले 57 शब्दों का बनाया  गया पर फिर                                                                                            

और छोटा कर उसे Taumata कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि इस जगह की खोज वर्षों पहले किसी "तामाटी" नाम के व्यक्ति ने की थी।

अब नाम है तो जाहिर है उसका कुछ अर्थ भी होगा। तो इस लम्बे से शब्द समूह का अर्थ है :- वह पहाड़ी जहां बैठ कर या परिक्रमा करते हुए तामाटी नामक बड़े घुटनों वाला, घुमक्कड पर्वतारोही अपनी प्रेयसी के लिए नाक से बजाई जाने वाली बांसुरी बजाता था। कैसा लगा, अंतरजाल की सहायता से मिला यह लम्बा सा बांसुरी वादन :-)

बुधवार, 27 जुलाई 2011

अजीब जरूर हैं, पर गरीब बिल्कुल नहीं हैं।

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हमारे आस-पास होती रहती हैं, हम उपयोग में भी लाते हैं पर उनकी "अजीबोगरीबियत" का हमें अंदाजा भी नहीं लग पाता। ऐसे ही कुछ नमूने पेश हैं :-

1, बताईये यह क्या लिखा गया है -
Taumatawhakatangihangakoauauotamateapokaiwhenuakitanatahu
यह न्यूजीलैंड की एक पहाड़ी का नाम है, जो संसार के किसी भी स्थान का सबसे लम्बा नाम है।

2, अंग्रेजी का 15 अक्षरों का अकेला शब्द uncopyrightable है जिसमें कोई भी अक्षर दोहराया नहीं जाता।

3, धन-दौलत-पैसा, जैसे शब्द सुनने में मधुर तथा कर्ण प्रिय लगते हैं। पर कर्ण प्रियता यानि संगीत का बाजार विश्व भर में करीब 40 खरब डालर का है।

4, आजकल नोट सिर्फ कागज के ही नहीं बनते बल्कि उनमें सूती और लिनेन जैसे कपडों की कतरने भी मिलाई जाती हैं।

5, अंग्रेजी भाषा के "set' शब्द के सबसे ज्यादा अर्थ मिलते हैं।

6, अमेरिकन और यूरोपियन लोग हर साल अपने पालतुओं पर करीब 17 बिलियन डालर खर्च कर डालते हैं।

7, " i " शब्द के ऊपर की बिंदी tittle कहलाती है।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...