आज सावन मास का दूसरा सोमवार है। भगवान शिव का प्रिय दिन। "महामृत्युंजय मंत्र" उन्हीं देवों के देव श्री शंकर भगवान का अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है।
हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना चाहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो मंत्रों या श्लोंकों को पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसों को जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं। मंत्रों में सबसे शक्तिशाली मंत्र शिवजी का "महामृत्युंजय मंत्र" है। आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।
"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"
भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं। लेकिन अमृतरूपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।
देखने की बात यह है कि इतने प्रकार के फलों के होने के बावजूद मंत्र में खरबूजे का ही चयन क्यों किया गया। इसके बारे में यजुर्वेद में विस्तार से बताया गया है कि खरबूजे के विशिष्ट गुणों के कारण उसे यह सम्मान प्राप्त हुआ है। खरबूजा जब तक कच्चा रहता है तब तक बेल से अलग नहीं होता। जब वह पक जाता है तो उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है। उसकी मधुरता का जवाब नहीं होता। इसका चौथा गुण यह है कि वह दूसरे खरबूजे को देख रंग बदल लेता है। पक जाने पर जब वह बेल से अलग होता है तो बेल का कोई भी रेशा उसके साथ नहीं रहता। पक जाने पर वह अपने अंदर के बीजों को भी खुद से अलग कर देता है।
ठीक उसी तरह भक्त परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे देव, मुझे अकाल मृत्यु से दूर रखना, मेरे गुणों की सुगंध भी दूर-दूर तक फैले, मुझमें भी सदा औरों के लिए मधुरता यानि प्रेम बना रहे, मेरे गुणों से और लोग भी गुणी बनें, मेरे अंदर कभी दुर्गुण घर ना करें और जब मैं इस संसार को छोड़ कर जाऊं तो इसका मोह मुझे ना व्यापे और हे प्रभू आप से विनती है कि अपने से मुझे कभी दूर ना करें या रखें।
ॐ नम: शिवाय।
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