pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

भगवान के साथ ये सब आजकल खबरों में हैं।

एक हैं दया के सागर। बहुत बड़े नेता हैं। जैसा नाम वैसा ही गुण। आपादमस्तक दया भावना से लिथड़े हुए। सदा अपने आस-पास के लोगों की गरीबी हटा उन्हें सम्पन्न बनाने के लिए कृतसंकल्प। जो भी उनके पास रहा, बेटा-बेटी, भाई-बहन, बहू-जवांई याने "जहां तक उनकी दृष्टि काम करती है" वहां तक सबका भला करने में ही उम्र गुजार दी। सुना है जिंदगी भर भगवान को नकारने वाले अब मंदिरों में गुहार लगा रहे हैं। भगवान भली करे।

एक हैं सफल आयोजक। आजकल जेल में हैं। पर वहां की दिवारें भी उनके ख्यालों या मनसूबों को रोकने में सफल नहीं हो पा रही हैं। उनकी मंशा है देश को खेलों में, माफ करिएगा खेलों के आयोजन में देश का नाम सर्वोपरि करना। इसमें वे तन-मन से लगे रहते थे। धन तो खैर 'आनी-आनी' चीज है। इस बारे में इतने समर्पित हैं कि जेल में रह कर भी ध्यान खेलों के आयोजन पर ही है। सुनने में आया है कि माहौल के अनुसार अभी-अभी उन्हें तिहाड़ ओलिम्पिक करवाने का सपना बार-बार आ रहा है।
भगवान तिहाड़ की रक्षा करें।

एक हैं अपनी तरह के आप, फिल्म निर्माता। जो अपने पासंग किसी को नहीं समझते। पिछले वर्षों तक महानायक का गुणगान करते ही सोते-जागते, खाते-पीते थे। उनके बिना अपनी किसी फिल्म की कल्पना भी नहीं कर पाते थे। पर समय बदला, मान्यताएं बदलीं। इन दिनों आमिर की विवादास्पद नयी फिल्म और आमिर के कसीदे काढने से ही फुरसत नहीं मिल पा रही है। आमिर में उन्हें फिल्मों का भगवान नजर आने लगा है जबकि उनके खुद के अनुसार वे किसी भगवान को नहीं मानते। ये भी क्या करें बाजार की छत पर फिल्म टांगने के लिए एक खंबा तो चाहिए ही ना। स्तुति गान शुरु हो ही चुका है। आमिर की शायद निकृष्टतम कृति रूपी शिट् को भी प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा रहा है। मेरा विश्वास है कि आने वाले दिनों में वे आमिर को लेकर कुछ जरूर "बोएंगे"। जमीन तैयार की जा रही है। भगवान सहायक हों।

इसी संदर्भ मे याद आ रहे हैं, जयप्रकाश चौकसे। दैनिक भास्कर की सफलता में उनका फिल्मों से सम्बंधित कालम "परदे के पीछे" का भी हाथ है। एक बहुत बड़ा वर्ग है उनके प्रशंसकों का जो उनके निष्पक्ष तथा फिल्मों से सम्बंधित ज्ञान का कायल है। पर पिछले दिनों उन्होंने भी 'डेली बेल्ही' में हर चीज को जायज ठहरा कर पाठकों को बहुत ही निराश किया।
हो सकता है भूतकाल में जीवन के किसी मोड़ पर किसी प्रकार का सहयोग, सहायता की याद अब संकोचवश सच्चाई बयान करने से रोक रही हो। हे भगवान! ऐसी कैसी मजबूरी?

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कहां हमारे गुरुघंटाल, कहां उनके नमकहराम

"ग्लोबल फाइनैंशल इंटीग्रिटी" की सूचना के अनुसार हमारे देश का करीब 210 अरब रुपया स्विस बैंकों में जमा है। यह रिपोर्ट 2008 की है। यह बेकार पड़ा जमा धन हमारी जीड़ीपी के पचास प्रतिशत के बराबर है। ये बैंक ही वहां की अर्थ व्यवस्था को संभालते हैं हमारे पेट को काट कर। चूंकी वहां के लोगों की रोजी-रोटी ही ऐसा धन जुगाड़ करवाता है सो वहां खाता खोलने में भी आपको ढेरों सहूलियतें मुहय्या करवाई जाती हैं। बस आपके पास "माया" होनी चाहिए। बिना ज्यादा झंझटों और दस्तावेजों के सिर्फ पासपोर्ट से ही 15-20 मिनट में आपका खाता खोल आपके हाथ में डेबिट कार्ड़ थमा दिया जाता है। भविष्य में भी एक ई-मेल से आप अपना धन उनके सदा खुले मुख में उडेल सकते हैं।

हम-आप अंदाज भी नहीं लगा पाएंगे कि स्विस बैंकों में पड़ी सडती रकम यदि वापस अपने देश आ जाए तो क्या कुछ हो सकता है। इससे पैंतालिस करोड़ गरीब करोड़पति बन सकते हैं। हमारे सर पर लदा अरबों का विदेशी कर्ज चुकता कर देने के बावजूद बहुतेरे आधे-अधूरे प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। इतनी रकम को किसी ढंग की जगह लगा दिया जाए तो उसके ब्याज से ही सालाना बजट पूरा हो सकता है।

ऐसे धन का ढेर बनाने में वे लेन-देन सहायक होते हैं जो हवाला के जरिए किए जाते हैं। बड़े रक्षा और बहुतेरे सौदों का कमीशन ले बाहर ही छुपा दिया जाता है। आयात-निर्यात के उल्टे-सीधे बिल बना, उससे प्राप्त पैसे को बाहर बैंकों के अंधेरे लाकरों में गर्त कर दिया जाता है। बिना किसी रिकार्ड़ के देश से पैसा बाहर भेज दिया जाता है। ये सारा काम क्या आम इंसान के वश का है? सब जानते हैं कि कैसे लोग ऐसे तरीके से वैसा धन इकट्ठा कर सकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ हमारे यहां से ही वहां धन पहुंच रहा हो। दुनिया के दूसरे देशों में भी नमकहराम बैठे हुए हैं। कम्यूनिज्म के पैरोकार रूस का इस मामले में दूसरा स्थान है, पर वह क्या खा कर हमारे चंटों का मुकाबला करेगा, दूसरा स्थान होने के बावजूद उसके धन की मात्रा हमारे से एक चौथाई भी नहीं है। जबकि हर जगह अपने को सर्वोच्च मानने वाला, धन कुबेर अमेरिका पहले के पांच स्थानों में भी जगह नहीं बना पाया है। हम उसकी ऐसी नकल क्यों नहीं करते?

बुधवार, 6 जुलाई 2011

शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब "ताक" पर भी जगह नहीं बची है।

देखा या महसूस तो आप सब ने भी किया ही होगा। विषय-वस्तु ही ऐसी है कि ध्यान जाने-अनजाने जरूर चला ही जाता है कि जितने भी दृश् माध्यम हैं उनमें जैसे होड़ लगी हुई है मानव देहों को उनके प्राकृतिक रूप में पेश करने की। जबसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वतंत्रता मिली है तब से मानसिक अभिव्यक्ति की जगह दैहिक अभिव्यक्ति का चलन कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है। कहीं गलती से किसी ने इसे अश्लील करार दे दिया तो उसे ही अश्लीलता की परिभाषाएं समझाई जाने लगती हैं। उसे ही बताया जाने लगेगा कि देखने वाले की आंखों और दिमाग में ही फितूर होता है जो कला को ऐसी दृष्टि से देखता है। अभी एक जिद्दी चित्रकार को लोग भूले नहीं होंगे, जिसकी कला को कुछेक चीजें छोड़ प्रकृति में और कुछ नजर ही नहीं आता था।

ऐसे समय में फिल्मों की तो क्या ही बात करें जहां भट्टों जैसों की बिरादरी ने पहले से ही भट्ठा बैठा कर रखा हुआ था। अब तो अपने आप को बुद्धिजीवी और आम फिल्म निर्माता से दो सीढी ऊपर समझने वाले निर्माता-निर्देशकों को भी विवादास्पद कहानियों या घटनाओं को फिल्माने के अलावा कुछ और नहीं सूझता। जब कि इनकी ऐसी “कलाकृतियां” दो दिनों में औंधे मुंह गिरती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि इस सब का विरोध नहीं होता हो पर कुछ लोग इतने मगरूर होते हैं कि वे अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं। यहां तक कि उन्हें भी नहीं जिन्होंने उनके लिए आसमान के सितारे तक जमीन पर ला दिए हों। ऐसे महानुभाव मुट्ठी भर चापलूसों को पूरा भारत समझ ऐसा आभास देते हैं जैसे उनकी कृति ना भूतो ना भविष्यते हो। इनके स्वभाव में इतना गरूर आ जाता है कि यह कहने से भी नहीं चूकते कि जिसको देखना है वह देखे जिसे पसंद नहीं हो वह ना देखे। हम तो ऐसी ही बनाएंगे। ऐसे लोगों की किस्मत से यदि एक बार कीचड़ में कमल खिल जाए तो ये कीचड़ को ही सदा के लिए अपनी कर्म भूमि बना लेते हैं और फिर उसी गंदगी का हिस्सा बन वैसी ही गंदगी फैलाना शुरु कर देते हैं। ऐसा करते हुए ना तो परिवारों का ख्याल आता है ना ही समाज का, देश की बात तो छोड़ ही दें।

ऐसे लोगों की कुछ लचर सदाबहार दलीलें होती हैं, जैसे भाई हम तो वही बनाते हैं जिसे जनता देखना पसंद करती है। या हम लीक से हट कर फिल्म बनाते हैं जिसमें समाज की सच्चाई को पेश किया जाता है या हम वही दिखाते सुनाते हैं जैसा रोज व्यवहार होता है या जैसी भाषा रोज काम में लाई जाती है। सबसे ज्यादा छूट लेने के लिए जो दलील दी जाती है वह है कहानी की मांग। इसके अंतरगत आप कुछ भी दिखा सुना सकते हैं ऐसा इन तथाकथित कलाकारों का कहना है। ख़ास कर उन युवतियों का जो इस "शो- बिजनेस" की चकाचौंध से पूरी और बुरी तरह प्रभावित होती हैं। पर्दे पर दिखने, रातों-रात अमीर और चर्चित होने के लिए वे अच्छे-बुरे में फर्क ही नहीं करना चाहतीं। उनके अनुसार यदि वे निर्देशक का कहा ना माने तो कहानी की आत्मा (जो कहीं होती ही नहीं) का नर्कवास होने का खतरा पैदा हो जाता है।

आजकल फिल्मोँ की देखादेखी अदूरदर्शन भी उसी राह चलवा दिया गया है। फिल्मों के लिए तो, चाहे कहने के लिए ही, एक कमजोर सी बाधा सेंसर के रूप में है तो सही और फिर उसे देखने के लिए कुछ जतन भी करने पड़ते हैं, पर टीवी तो पूरी तरह से उच्श्रृंखल है। ना कोई ड़र ना भय नाही कोई सामाजिक सरोकार और सबसे बड़ा खतरा कि उसकी सीधी पैठ घर के अंदरुनी कमरे तक है। उसके उल्टे-सीधे विज्ञापन, बिना सिर पैर के सीरीयल यहां तक कि उसकी खबरों ने भी एक अदृश्य हौवे "टी आर पी" क चक्कर में कोई कसर नहीं छोड़ी है बंटाधार करने में।

अब आप अखबारों को ही उठा लें। ऐसी-ऐसी खबरें, ऐसी-वैसी तस्वीरें कि भले घर-परिवारों को सोचना पड़ रहा है कि इसे लेना बंद ही कर दें तो घर के सदस्य एक दूसरे के सामने शर्मिंदगी से तो बचें। मिसाल के तौर पर आप "टाइम्स आफ इंडिया" का किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लें मेरे बात समझ में आ जाएगी।

इस घोर धन-युग में हर चीज पैसे को मद्देनज़र रख कर, की, चलाई या बनाई जा रही है। शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब ‘ताक’ पर भी जगह नहीं बची है।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

इसमे आश्चर्य की क्या बात है?

इंसान रोज जानवरों की तरह की हरकतें करता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होता। पर जब कभी जानवर इंसान की तरह "कुछ" करता है तो ?
तो, क्या खुद ही देखिए और बताईये ..............
















रविवार, 3 जुलाई 2011

ज्योतिष के अनुसार तो द्रविड़ और तेंदुलकर को 2009 में संन्यास ले लेना था।

आज एक पुरानी कतरन हाथ लगी जिसमें और बहुत सी बातों के साथ एक भविष्यवाणी भी थी। जिसमें दावा किया गया था कि 2009 तक क्रिकेट के खेल से राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर संन्यास ले लेंगे।
बात तब की है जब क्रिकेट के पांच दिग्गजों में से दो गांगुली और कुंबले को खेल से अलविदा कहलवा दिया गया था। धोनी की गुड़्ड़ी आकाश में लहरा रही थी और इन दोनों की लय कुछ बिगड़ी हुई थी तथा भविष्य ड़ावां-ड़ोल लग रहा था साथ ही चारों ओर से नकारात्मक प्रचार भी किया जा रहा था। पर किसी को भी इनके दृढ निश्चय की थाह नहीं थी।

तीन साल पुरानी इस कतरन में बिहार के पटना शहर के न्यू पुनाईचक इलाके के भविष्यवक्ता श्री समीर उपाध्याय ने अपनी तरह-तरह की गणना के आधार पर यह भविष्यवाणी की हुई है कि द्रविड नवंबर, 2008 से मार्च 2009 या फिर जुलाई से सितंबर 2009 में अंतराष्ट्रिय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे।
सचिन के बारे में उनका आकलन था कि वे या तो अगस्त, 2009 से नवंबर, 2009 तक खेल से अलग हो जाएंगे नहीं तो विश्वकप के दौरान जनवरी से मार्च, 2011 में वे क्रिकेट को अलविदा कह देंगे।

शनिवार, 2 जुलाई 2011

एक मकबरा जिसकी नक़ल पर "ताजमहल" बना है.


हिंदुस्तान में मुगलों का वह प्रारंभिक दौर था। बाबर के बाद हुमायुं ने शासन की बागडोर संभाली तो थी पर शेरशाह से हार कर उसे भागते-छुपते रहना पड़ रहा था। तमाम मुश्किलातों को झेलने, दर-दर की ठोकरें खाने के बाद फिर उस पर एक बार
किस्मत मुस्कुराई और सन 1555 में वह फिर एक बार बादशाह बना पर सिर्फ साल भर के लिए। 1556 में एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी। उसकी पत्नी हाजी बेगम ने नौ साल बाद 1565 में उसका मकबरा बनवाना शुरु किया। इसका सारा खाका फारस के मशहूर वास्तुकार तथा भवन निर्माता 'मिरक मिर्जा गियात' द्वारा तैयार किया गया था।


उस समय मुगलों के खजाने की माली हालत उतनी सुदृढ नहीं थी सो किफायत को मद्देनजर रख इसका निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से करवाया गया जिन्हें आगरा के पास के तंतपुर नामक स्थान से लाया जाता था। वैसे सुंदरता को बनाए रखने के लिए सफेद और काले संगमरमर का भी कुछ मात्रा में प्रयोग किया गया है जो राजस्थान के मकराना से आता था। इसकी बनावट फारसी वास्तुकला से प्रेरित है। यह दुमंजिला चौकोर ४२.5 मीटर ऊंचा मकबरा एक सुंदर बगीचे के बीच ऊंचे चबु
तरे पर बना हुआ है। पूरे बगीचे को पानी की नालियों द्वारा फूलों से सजे चार सुंदर भागों में बांटा गया है। इसके अष्टभुजाकार मध्य कक्ष में स्मारक कब्र है। उसी के नीचे असली कब्र है जहां हिंदुस्तान का शहंशाह वर्षों से सोया हुआ है। इस मकबरे की सबसे बड़ी खासियत इसका दुहरा गुम्बद है। जिसके चारों ओर स्तंभयुक्त छतरियां बनी हुई हैं। यद्यपि सिकंदर लोदी का मकबरा पहला ऐसा था जो किसी बगीचे के बीच बनाया गया हो पर हुमायुं के मकबरे से यह प
रंपरा चलन में आयी जिसका सबसे विशिष्ट उदाहरण ताजमहल है। जो पूर्णतया हुमायुं के मकबरे की तर्ज पर बनाया गया है। जो आज दुनिया भर में मशहूर तथा एक तरह से भारत की पहचान बन गया है। इन दोनों मकबरों में एक और समानता है। दोनों ही प्रेम में समर्पण की अमर निशानियां हैं। जहां हुमायुं के मकबरे को, उसके प्रति पूर्ण रूप प्रति पूर्ण रूप से समर्पित उसकी बेगम ने पैसों की कमी के बावजूद, पूरा करवाया। वहीं अपनी बेगम की याद को अमर करने के लिए शाहजहां ने ताजमहल के रूप में अपने प्रेम को मूर्त रूप दिया।


हुमायुं का मकबरा दिल्ली में निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास मथुरा रोड़ और लोदी रोड़ के चौराहे के नजदीक स्थित है। इसके अंदर जाने के लिए दो ऊंचे प्रवेश द्वार हैं जो इसकी दक्षिण और पश्चिम दिशा में स्थित हैं। वैसे आजकल पश्चिम वाला द्वार ही काम में लाया जाता है। इसके निर्माण में उस जमाने में पन्द्रह लाख रुपये का खर्च आया था।
अभी तक इस खूबसूरत स्मारक का प्रचार उतना नहीं हो पाया था। इसकी तकदीर भी हुमायुं की तरह ही रही थी।
कुछ उपेक्षित, कुछ अनजानी। यहां तक की अधिकांश दिल्ली निवासी भी इसके दीदार को नहीं आते थे। इसकी किस्मत ने अभी पिछले दिनों तब पलटा खाया जब अमेरिका के राष्ट्पति ओबामा ने अपनी भारत यात्रा पर अपना कुछ समय यहां बिताया (साथ के विडीयो में उनकी झलक देखी जा सकती है ) . उसके बाद रातों-रात इसकी ख्याति देश-विदेश में ऐसी फैली कि अब यहां लोगों का तांता लगा रहता है।


अभी इसकी सारी देख-रेख श्री राकेश झींगन जी के कुशल निर्देशन में है। उन्हीं की मेहनत और अपने काम के प्रति समर्पण का नतीजा है कि इसके सुंदर बगीचों के रख-रखाव के कारण यह स्मारक एकाधिक बार सर्वश्रेष्ठता का पुरस्कार प्राप्त कर चुका है।

मंगलवार, 28 जून 2011

लोभ का फल तो बुरा ही होता है.

लालच या लोभ कैसा भी हो, किसी भी वस्तु के लिए हो बुरा ही होता है। इसी के अंतर्गत संचय की प्रवृत्ति भी आती है।

बहुत पहले कहीं पढी एक कहानी याद आ गयी आज के कर्णधारों की मनोवृत्ति देख कर।
एक बार भीषण अकाल पड़ने से सारे जीव-जंतु बेहाल हो गये। शहर, गांव, जंगल सभी उसकी चपेट में आ गये। खाने और पीने के पानी का घोर संकट आ पड़ा। ऐसे ही एक जंगल में दो सियार रहते थे। उनमें से एक बुजुर्ग था दूसरा जवान। अपनी उम्र की तरह ही उनकी आदतें भी थीं। बुजुर्ग अपने साथ जिंदगी भर का अनुभव लिए चलता था तो जवान सिर्फ आज में विश्वास करता था। दोनों में एक बात समान थी दोनों परले दर्जे के लालची थे। एक दिन वे भोजन-पानी की तलाश में गांव की तरफ निकल गये भोजन की तलाश में। भाग्य से उन्हें वहां एक मुर्गियों का दड़बा मिल गया।

दोनों ने अंदर घुस कर अपना पेट भरना शुरु कर दिया। कुछ देर बाद बुजुर्ग ने छोटे को कहा कि ज्यादा ना खा कर कुछ कल के लिए भी बचा कर रख लेते हैं। पर छोटा तो मानो सब आज ही हड़प कर जाना चाहता था। वह बोला कल किसने देखा है मैं तो आज ही इतना खा लूंगा कि चार दिनों का कोटा पूरा हो जाए। दोनों ने अपने मन की की।

छोटे ने इतना खा लिया कि रात में उसका पेट जवाब दे गया और उसकी मौत हो गयी। लालच का मारा दूसरा फिर दूसरे दिन दड़बे में पहुंचा तो घात लगाए बैठे दड़बे के मालिक किसान ने उसका काम तमाम कर दिया।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...