pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 20 जून 2011

हमारे रिश्ते अंकल-आंटी पर ही खत्म नहीं हो जाते

बाज़ार की ताकतों को अपना और अपनी कंपनी  का पेट भरने के लिए सदा बिरयानी की जरूरत होती है। जिसके लिए वे दुनिया भर में मुर्गों की तलाश करती रहतीं हैं।

वर्षों पहले एक क्रीम ने भारतीय युवतियों को गोरा बनाने का बीड़ा उठाया था। आज भी वह काम बदस्तूर जारी है। पर व्यवसाय में उतार-चढाव तो आते ही हैं। कुछ दिनों पहले जब बिक्री का ग्राफ तेजी से नीचे आने लगा  तो निर्माताओं को पुरुषों का भी ध्यान आया क्योंकि पुरुष भी तो "रब्ब की मातमपुर्सी" करने थोड़े ही पैदा हुए हैं तो एक 'बड़े मुंह वाले' के मुंह से युवकों को धिक्कारा गया   "छी: औरतों वाली क्रीम लगाता है!!!    अरे मर्द बन, यह लगा। पर शायद 'फार्मुला' उतना कारगर नहीं रहा। सो फिर लड़कियों को निशाना बनाया गया क्योंकि शायद वे उन्हें कुछ ज्यादा बेवकूफ टाईप की लगी होंगी। युवतियों को समझाया गया कि क्रीम रोज लगानी है नहीं तो निखार नहीं आता। पर जब बिक्री उससे भी बढती नहीं दिखी तो अब विज्ञापन में क्रीम को दिन में दो बार लगाने पर जोर दिया जाने लगा है। यह तो था नारी की सुंदर दिखने की आदिम चाहत को अपनी तिजोरी भरने का माध्यम बनाने वाली कुटिल चाल का एक उदाहरण।

बाजार को तो अपने से मतलब है। उसे तो अपने और अपने परिवार वालों के पेट में बिरयानी ड़ालनी ही है जिसके लिए वह दुनिया भर में मुर्गे ढूंढता रहता है। इसी कवायद में उसे भारतियों की भावनात्मक कमजोरी का भी एहसास हो गया। बस अपने उत्पादों को "गिफ्ट" का नाम दे उसने साल के दिनों को तरह-तरह की संज्ञाओं के नाम के "रैपरों" में लपेट-लपेट कर हमारे सामने पेश कर दिया। पहले फरवरी में लाया गया "प्रेम दिवस"। इस दिवस ने कंपनियों के दिन बहुरा ड़ाले। बस सिलसिला चल निकला। आने लगे, माता, पिता, भाई, बहन के लिए निर्धारित दिन। हम भी पूर्व और पश्चिम की संस्कृति के भेद को जाने बगैर जुट गये बाजार का पेट भरने। हम भूल गये कि हमारे यहां पश्चिमी सभ्यता के कुछ शहरों या घरों में हावी हो जाने के बावजूद अभी भी संयुक्त परिवारों का चलन है। जिसकी धूरी हमारे माँ-बाप हैं। उनका वरद-हस्त अभी भी रोज हमारे घर से काम पर निकलते समय हमारी रक्षा हेतु हमारा मस्तक स्पर्श करता है। जब तक लौट कर ना आ जाएं उनकी आंखें दरवाजे से हटती नहीं हैं। सारा परिवार छोटे-छोटे मनमुटावों के बावजूद एक-दूसरे की जरूरतों का ख्याल रखता है। इसके विपरीत योरोप में अधिकांश परिवार एकल होते हैं। ऊपर से तलाक और बहूविवाह रिश्तों को जटिल बना देते हैं। फिर जीवन की आपाधापी में संवेदनाएं भी लुप्त होती चली गयी हैं। ऐसे माहौल में किसी एक रिश्ते को साल का एक दिन समर्पित कर उनका उसे जीवंत बनाए रखने की कोशिश करना समझ में आता है।

पर बाज़ार को किसी नाते-रिश्ते-अपनेपन से कोई मतलब नहीं होता उसे एक ही चीज दिखती है और वह है पैसा। जिसे पाने, अपने पास बनाए रखने के लिए रोज तरह-तरह के तरीके ईजाद किए जाते हैं। उसी ऊपर कही गयी गोरे-पन को बढाने वाली क्रीम की तरह। फिर हमारे देश का बाज़ार तो असीम संभावनाओं से भरा पड़ा है। यहां रिश्ते अंकल-आंटी पर ही खत्म नहीं हो जाते। यहां तो मामा-मामी, चाचा-चाची, मौसा-मौसी, बुआ-फूफा, बहन-जीजा, भाई-भाभी। फिर चचेरे, ममेरे, मौसेरे रिश्तों की ना खत्म होने वाली श्रृंखला है। उसके बाद भी हमारा प्रेम खत्म कहां हो जाता है वह तो सदा प्रवाहमान रहता है जिसमें गोते लगाते रहते हैं, दोस्त और उनके परिवार, पड़ोसी, नौकर-चाकर। फिर हम अपने पालतुओं को थोड़े ही ना भूल जाएंगे। यानि हम अनंत हमारा बाज़ार अनंता।

यह तो वह सब है जो दिखता है। बाज़ार को तो हमसे ज्यादा समझ है। पता नहीं वह कैसे-कैसे, ऐसे-वैसे दिन दिखलाएगा जिनके लिए साल के दिन भी शायद कम पड़ जाएं। फिर भी कोई बात नहीं, घंटे, मिनट तो बाकी रहेंगे ही ना हमारे "चौघड़िये" की तरह। आप तो बस तैयार रहें दिन का नाम तय होने और अपनी जेब ढीली करने के लिए।

शनिवार, 18 जून 2011

'माया' महा ठगिनी।

माया, सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है !!!

परिवर्तन समय की मांग है। सब समय के साथ बदलता रहता है। चाहे अच्छा हो या बुरा स्थायी कहां रह पाता है कुछ भी। राम-राज था कभी तो कंस का भी समय रहा है। मुगलों के नगाड़े शांत हुए तो अंग्रेजों की तूती बोलने लगी। नेहरू-गांधी आए, जाना उनको भी पड़ा। जाना एक शाश्वत सत्य है। बच्चा दुनिया में आता है तो यह कोई नहीं कह सकता कि वह नेता बनेगा, डाक्टर, इंजीनियर या गिरहकट पर यह सबको मालुम होता है कि वह एक दिन जाएगा जरूर। पर फिर भी अपना अगाड़ी-पिछाड़ी सुधारने की कोशिश सदा होती रही है। नश्वरता को जानते हुए भी कभी संचय की प्रवृत्ति खत्म नहीं हो पाई। फिर चाहे वह नेता बन अपने को जनता का सेवक कहे, चाहे संत बन अपने को अवतार घोषित करे, चाहे गुरु बन मार्ग-दर्शन का स्वांग करे। कहते हैं हिमालय की दुर्गम चोटियों की कंदराओं में आज भी संत-महात्मा तपस्या लीन हैं, जग की भलाई के लिए। शायद तभी दुनिया टिकी भी हुई है। पर उन दसियों बाबाओं का क्या जो रोज ढेरों मेक-अप पोत तरह-तरह की भाव-भगिंमाओं में अवतरित हो लोगों की भावनाओं से खेलते हैं। अपने भक्तों के वर्तमान-भविष्य को सुधारने का दावा करने वाले ये सब के सब एकाधिक 'फार्म हाऊसों' मनों सोने-चांदी, करोडों की नगदी के स्वामी होते हैं। क्या इन "सर्वकाल दर्शियों" को अपना हश्र पता होता है।

पहले के जमाने में राजा-महाराजा भेष बदल कर अपनी रियाया के सुख-दुख का पता लगाने निकला करते थे। मंशा यही होती थी कि यदि प्रजा सुखी संतुष्ट रहेगी तो उनका राज भी उतना ही स्थायी होगा। समय बदला सोच बदली। आज भी लोग भेष बदल कर निकलते हैं, भेष चाहे जिसका भी धरा हो मंशा एक ही रहती है, सिर्फ अपने लिए "माया" का इंतजाम करना। पर माया महा-ठगिनी, कब किसी की हुई है। सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है।

अभी आज ही कुछ दिनों पहले-गोलोक वासी हुए एक संत जी की कुटिया ने मनों आभुषण और नगदी उगली है। यह उस अकूत धन के अलावा है जिसे दुनिया जानती है।


वैसे ही अंदर-बाहर,  देश-विदेश में ऐसे-वैसे-कैसे  धन के ढेर मिट्टी की तरह पड़े हैं।   जिनका कोई हिसाब नहीं है। हिसाब मांगने वालों का  हिसाब-किताब   बराबर कर दिया जाता है।   यह भी सत्य है कि जमाखोरों को कब ढाई गज का कपड़ा लपेट चल देना पड़ेगा वे भी नहीं जानते। पर यह इस देश की बदनसीबी है कि इसकी बागडोर ऐसे हाथों में है जिनके राज में अनाज सड जाता है पर गरीब के पेट में नहीं पहुंचने दिया जाता। धन इतना है कि कोई गिनने लगे तो उम्र बीत जाए पर  निर्धन को जीवन यापन  करने से बेहतर मौत को  गले  लगाना आसान लगता है।
बस यही बात आशा-भरोसा दिलाए रहती है कि हर चीज का अंत होता है।  हर काली रात की उजली सुबह होती है। कभी तो ऐसा प्रभात होगा, कभी तो ऐसा सबेरा आएगा !!! 

गुरुवार, 16 जून 2011

यह बता तू कितने दिन रह सकता है बिना खाए ?

पिछले दिनों बाबा और संतों का अभियान चाहे सफल ना हो पाया हो पर उससे सियासती दलों की पोल जरूर खुल कर जनता के सामने आ गयी है। भले ही यह सब पहले की तरह भुला ही दिया जाने वाला हो।


देश के उत्तरी भाग में कुछ दिनों से तरह-तरह की घटनाएं मंचित होती रही हैं। उनको लेकर जनता-जनार्दन में जोश भी अपने चरम पर रहा। अन्नाजी ने अपनी भूमिका से आंधी का आह्वान किया ही था कि बाबा रामदेव ने तूफान का माहौल रच ड़ाला। यह इतना सजीव था कि आड़े-टेढे, छोटे-बड़े पांवों पर किसी तरह टिकी, घुन खाई सियासी कुर्सी और उस पर आसीन सभी को अपने अस्तित्व की चिंता ने घेर लिया। तभी अपने आकाओं की नज़रों में काजल बनने मौका देख बहुत सारी बैसाखियां दौड़ पड़ीं कुर्सी को घेर इस आपदा से बचाने के लिए।
अब कुर्सी रूपी एक अनार, उस पर लदने की फिराक में सैकड़ों बिमार। समय और दस्तूर देख भा.ज.पा. ने भी अपना दांव खेल दिया। पर राजनीति का ऊंट कब किधर बैठ जाएगा क्या पता चलता है। वैसे भी कर्ता के मन कुछ होता है और दाता कुछ और ही सोचे बैठा होता है। तो रामदेव बाबा को मोहरा बना खेला गया भाजपाई दांव तब उल्टा पड़ गया जब हिमाचल के उसी अस्पताल में 115 दिनों से अनशन कर रहे संत निगमानंद जी की मृत्यु हो गयी। अब इसका जवाब वहां की सरकार के पास नहीं है कि भ्रष्टाचार के विरोध में खड़े होने का दिखावा करने वाली सरकार ने निगमानंद की इतने लंबे समय से चली आ रही मांगों की ओर क्यों ध्यान नहीं दिया।
अब ध्यान तो तब दिया जाता है जब कि समस्याओं को सुलझाने की नीयत हो। इधर तो सारा खेल एक-दूसरे की टांग को लेकर था कि हाथ में आए, खींचें और लपक लें आसन।
दलों की गिद्ध-दृष्टि रहती है, देश के कोने-कोने में होने वाले धरनों, विरोधों, हड़तालों, अनशनों इत्यादि पर कि इन सब को भेड़ रूपी जनता का कितना समर्थन मिल रहा है, उस आंदोलन का विरोधी दल पर क्या असर पड़ने जा रहा है और उसका क्या फायदा उठाया जा सकता है। बस हवा को पक्ष में देखते ही बेशर्मों की तरह वहां अपनी उपस्थिति जताने जा पहुंचते हैं। चाहे वहां बेइज्जत होने का खतरा ही क्यूं ना मंड़रा रहा हो।


ऐसा ही कुछ पिछले दिनों भी देखने में आया जब कांग्रेस देश में उठे इस भीषण ज्वार में बूरी तरह डूबते-उतराते अवसाद की सीमा में पहुंच गयी थी। मशीनरी का हर पुर्जा अलग-थलग पड़ा कुछ का कुछ "कहे-करे" जा रहा था। कंट्रोल मजबूर था। पर शायद कुछ अच्छे कर्मों का फल बाकी था, तभी उसी ज्वार की एक तीव्र लहर ने उसे किनारे पर ला पटका।


उधर भा.ज.पा. उसी ज्वार की एक ऊंची लहर पर सवार थी और किनारे लगना चाहती थी कि पतवार पकड़े नाविक की गलती से नाव बीच में ही उलट गयी।


इधर जनता जो भ्रष्टाचार रूपी तमाशे से खुश हो खुशहाली के सपने देखने लगी थी, उसका ध्यान बटाने के लिए एक अबूझ पहेली उसके सामने रख दी गयी कि बताओ जब निगमानंद 115 दिन तक अनशन कर सकते हैं। एक आम नेता भी भूख-हड़ताल पर 20-25 दिन निकाल देता है तो योग को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले योग-गुरु का आसन नौ दिन में ही क्यों डोल गया?


सौ पचास को लगा कि, हां भाई, बात तो ठीक है !! अब जनता तो जनता ही होती है। जहां कुछ को लगा तो बाकी भी भेड़ की तरह लग गये लाइन में, बिना सवाल करने वाले से पूछे कि पहले यह बता कि तू कितने दिन रह सकता है बिना खाए ?


पर पूछे कौन? यदि पहली चोरी पर ही माँ का थप्पड़ पड़ गया होता तो बेटा बड़ा हो कर चोर ना बनाता

बुधवार, 15 जून 2011

मैं हिमांचल की राजकुमारी "मनाली" बोल रही हूं।


प्रकृति ने अपना खजाना मुक्त हस्त से मुझ पर लुटाया है, बर्फीले पर्वत शिखर उनकी ढ़लानों पर सेवों के बागीचे, सीढ़ी नुमा खेत, खिलौने की तरह के घर और यहां के सीधे-साधे वाशिंदे आपको मोह ना लें तो कहिएगा। 

मेरे परिवार हिमाचल में आपका स्वागत है। मेरे परिवार के सारे सदस्य बहुत सुंदर, शांत और आथित्य प्रेमी हैं। मेरे सबसे बड़े भाई शिमले को हिमाचल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। हम भाई बहन एक से बढ़ कर एक खूबियों के मालिक हैं। मैं और मेरा भाई कुल्लू दोनों जुड़वां हैं। एक राज की बात बताती हूं। कुल्लू थोड़े पूराने विचारों का है। इसीलिए उसकी सारी पूरानी बस्तियां, मंदिर, मोहल्ले वैसे के वैसे ही हैं। पर मेरे बार-बार टोकते रहने पर अब धीरे-धीरे बदलना शुरु कर रहा है। जिसके फलस्वरूप उसे एक फ्लाई-ओवर का पुरस्कार मिला है इससे पीक सीजन में, अखाड़ा बाजार पर लगने वाले घंटों के जाम से यात्रियों को राहत भी मिल गयी है। उसकी बनिस्पत मैं आधुनिक विचारों की हूं। इसी कारण पर्यटक अब मेरे पास आना ज्यादा पसंद करते हैं।

पर इस आधुनिकता का खामियाजा भी मुझे भुगतना पड़ा था, सालों पहले, जब हिप्पी समुदाय के लोगों ने मेरे यहां जमावड़ा डाल, चरस गांजे का अड़्ड़ा बना कर दुनिया भर में मुझे बदनाम कर दिया था। बड़ी मुश्किलों के बाद धीरे-धीरे फिर मैंने अपना गौरव प्राप्त कर लिया है।

कुल्लू से मेरी दूरी 40 किमी की है। व्यास, जिसे नद होने का गौरव प्राप्त है, के दोनों किनारों पर बने सुंदर सड़क मार्ग यात्रियों को मुझ तक पहुंचाते हैं। व्यास के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं पर ठीक बीस किमी पर एक कस्बा पतली कुहल है,

जो आस-पास के गांवों की जरूरतों को पूरा करता है। इसी के पास नग्गर नामक स्थान पर विश्व प्रसिद्ध रशियन चित्रकार ‘निकोलस रोरिक’ की आर्ट गैलरी है। रोरिक हिंदी फिल्म जगत की पहली सुपर-स्टार तथा पहले दादा साहब फाल्के पुरस्कार की विजेता देविका रानी के पति थे। पतली कुहल में सरकारी मछली पालन केन्द्र भी है। पर जैसे-जैसे लोगों की आवाजाही बढ़ रही है वैसे-वैसे मेरा प्राकृतिक सौंदर्य भी खतरे में पड़ता जा रहा है। मेरे माल रोड से पांच-सात किमी पहले से ही होटलों की कतारें शुरु हो जाती हैं। जिनकी सारी गंदगी व्यास को भी दुषित बना


रही है। यह एक अलग विषय है। अभी आप अपना मूड और छुट्टियां खराब ना कर मेरी अच्छाईयों की तरफ ही ध्यान दें। जहां माल रोड खत्म होता है वहीं से एक सीधी चढ़ाई आप को हिडम्बा माता के मंदिर तक ले जाती है, घबड़ाने की बात नहीं है वहां तक आप अपनी गाड़ी से आराम से पहुंच सकते हैं। इस जगह पहले घना जंगल था पर उसे अब व्यवस्थित कर पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया है। इसकी विस्तृत चर्चा फिर कभी। नीचे मुख्य मार्ग, व्यास को पार कर दूसरे किनारे से आने वाले रास्ते से

मिल लाहौल-स्पिति, जो एशिया का सबसे बड़ा बर्फिला रेगिस्तान है, की ओर बढ़ जाता है। इसी पर मेरे माल रोड से एक-ड़ेढ़ किमी की दूरी से एक सड़क उपर उठती चली जाती है महर्षि वशिष्ठ के आश्रम की ओर। यहां उनका प्राचीन मंदिर है। अब कुछ सालों पहले एक राम मंदिर का भी निर्माण हो गया है। यहां एक गर्म पानी का सोता भी है, जिसमें नहाने वालों के चर्म रोगों को मैंने ठीक होते देखा है। जो इस पानी में प्रचूर मात्रा में सल्फर की उपस्थिति से संभव है। पर यहां भी बढ़ती आबादी का दवाब साफ दिखाई पड़ने लगा है। यह सुंदर रमणीक स्थान अब दुकानों घरों से पट गया है। फिर भी प्रकृति ने अपना खजाना मुक्त हस्त से मुझ पर लुटाया है। अभी भी और जगहों की बनिस्पत आप मुझे निसर्ग के ज्यादा पास पाएंगें। बर्फीले पर्वत शिखर उनकी ढ़लानों पर सेवों के बागीचे, सीढ़ी नुमा खेत, खिलौने की तरह के घर और यहां के सीधे-साधे वाशिंदे आपको मोह ना लें तो कहिएगा। अभी भी यहां के हवा-पानी तथा लोगों के दिलों पर बाहरी सभ्यता की बुराईयां पूरी तरह से हावी नहीं हो पायी

हैं। हम अपने नाम "देव भूमी" को अभी भी सार्थक करते हैं। मेरे छोटे भाई-बहन, मंडी, धर्मशाला, मैक्लाडगंज, सुंदर नगर आदि प्रकृति ने अपने हाथों से गढे हैं। जिनका निश्छल सौंदर्य किसी का भी पहली नज़र में मन मोह लेता है। उन पर अभी बढती आवा-जावी का भी असर नहीं पड़ा है। जिसे आप खुद महसूस कर पाएंगे।


अपने बारे में तो कोई भी कहने से नहीं थकता। हो सकता है कि पढ़ने से आप बोर भी हो जायें। पर यह मेरा दावा है कि एक बार यदि आप मेरे पास आयेंगें तो फिर मुझे भूल नहीं पायेंगें। अब तो मुझ तक पहुंचने के लिए हर तरह की सुविधा भी उपलब्ध है।

तो कब आ रहे हैं ? मैं इंतजार में हूं.

सोमवार, 13 जून 2011

हमारे मामले में तो भगवान भी लाचार हैं।

खबर विश्वसनीय सूत्रों से ही मिली थी, पर विश्वास नही हो पाया था कि ऐसा भी हो सकता है। खबर आपके सामने है और फ़ैसला आपके हाथ में। हर बारहवें साल सावन के महीने मे मेघा नक्षत्र के उदय होने के पूर्व एक मुहूर्त बनता है जिसमे प्रभू का दरबार धरती वासियों के लिए कुछ देर के लिये खोला जाता है। इसका पता अभी-अभी 2G की बखिया उधेड़ते समय अचानक ही साईंस दानों को लगा था। आनन-फानन में देशों में विचार-विमर्श हुआ, और तय पाया गया कि इस मौके का पूरा लाभ उठाना चाहिए। कमेटी बनी जिसने लाटरी सिस्टम लागू कर दिया। पहली बारी में भारत, अमेरीका तथा जापान के तीन नुमांईदों को उपर जाने का वीसा मिला। तीनों को एक जैसा ही सवाल पूछने की इजाजत थी। पहले अमेरीकन ने पूछा कि मेरे देश से भ्रष्टाचार कब खत्म होगा, प्रभू ने जवाब दिया कि सौ साल लगेंगे। अमेरीकन की आंखों मे आंसू आ गये। फिर यही सवाल जापानी ने भी किया उसको उत्तर मिला कि अभी पचास साल लगेंगे। जापानी भी उदास हो गया कि उसके देश को आदर्श बनने मे अभी समय लगेगा। अंत मे भारतवासी ने जब वही सवाल पूछा तो पहले तो प्रभू चुप रहे फिर उदास स्वर में धीरे-धीरे बोले कि, इस भूमि से पता नहीं मुझे इतना लगाव क्यूं है? जितना मैं इसका ध्यान रखता हूं उतनी ही मुझे निराशा होने लगी है। अब तो वहां के लोग भी कहने लगे हैं कि यह देश "भगवान के भरोसे ही चल रहा है।" इतना कह वे फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़े।

अब आज के जमाने मे कौन ऐसी बात पर विश्वास करता है। पर यह खबर सोलह आने? मेरा मतलब है सौ पैसे सच है। विश्वास ना हो तो अंतर-जाल पर रशिया की अखबारों की खबर पढ लें।

शनिवार, 11 जून 2011

नींद दो ही तरह की होती है, अल्प निद्रा और चिर निद्रा।

नींद शरीर के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कि खानापीना या और कुछ। यह यदि पूरी ना हो तो इस शरीर रूपी मशीन को "ऐंड़-बैंड़' होते ज्यादा देर नहीं लगती। दो-तीन दिन के रतजगे के बाद ही सरदर्द, बेचैनी, घबराहट, भ्रम जैसी परेशानियां सामने आने लगती हैं। पूछ कर देखिए उन से जो अनिद्रा से ग्रसित हैं तथा जिन्हें रोज नींद की गोलियों से ललचा-ललचा कर उसे बुलाना पड़ता है। जोसोवत है वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है" या "तूने रात बिताई सोय कर दिवस बितायो खाय, कबीरा जन्म अमोल है कौड़ी बदले जाय", जैसी नसीहतों और उपदेशों में नींद की (भले ही उपमा देकर समय की कीमत समझाई गयी हो) चाहे जितनी भी भर्त्सना की गयी हो पर सत्य यही है कि नींद शरीर की अहम आवश्यकता है। भले ही इसमें इंसान के जीवन का एक-तिहाई भाग बेहोशी में ही निकल जाता हो।


इसी खुदा की नेमत को हमारे पास पहुंचाने के एवज में सैंकड़ों कंपनियां लाखों-करोंड़ों का वारा-न्यारा करने में लगी हुई हैं। पर जिन्हें इसका वरदान प्राप्त है उन्हें किसी ताम-झाम की जरूरत नहीं पड़ती। न उन्हें गद्दा चाहिए ना तकिया, न उन्हें रोशनी या अंधकार से मतलब होता है ना जगह से ना जमीन से ना बिस्तर से मना चादर से वे तो जहां चाहे लुढक कर अपनी जरूरत पूरी कर लेते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि "भूख ना देखे बासी भात और नींद ना देखे टूटी खाट", मजाक नहीं सच कह रहा हूं आप भी देख लीजिए :

वैज्ञानिकों ने नींद के बहुत से प्रकार बताए हैं पर असल में यह दो ही तरह की होती है।
पहली अल्प निद्रा, जो हमें रोज आती है और उसी दौरान शरीर कुछ घंटों में रोजमर्रा की टूट-फूट, कमी-बेसी की भरपाई कर दूसरे दिन के लिए तरोताजा हो जाता है।
दूसरी होती है चिर-निद्रा, इसमें शरीर के अंदर की कमियों को ही नहीं पूरे खाके, ढांचे को ही बदल कर एक नये शरीर की नींव रखी जाती है इस कायनात के अस्तित्व को बनाए व चलायमान रखने में योगदान देते रहने के लिए।
पहली आए या ना आए पर दूसरी से जीव कभी वंचित नहीं होता।

यदि आपको सुख की, चैन की, गहरी प्राकृतिक नींद आती है तो उसके लिए भगवान का शुक्रिया अदा जरूर करें। क्योंकि सर्व-सुलभ चीज की कीमत हम समझ नहीं पाते।

शुक्रवार, 10 जून 2011

जहां चाह है वहां राह है


मनुष्य प्रकृति का वह अजूबा है जिसे कोई भी रुकावट रोक नहीं सकती। उसके धड़ के ऊपर स्थित कारखाने में छोटी से छोटी अड़चनों से लेकर बड़ी से बड़ी मुश्किलों के हल निरंतर निकलते रहते हैं।
विश्वास ना हो तो देख लें -




















विशिष्ट पोस्ट

गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...