माया, सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है !!!
परिवर्तन समय की मांग है। सब समय के साथ बदलता रहता है। चाहे अच्छा हो या बुरा स्थायी कहां रह पाता है कुछ भी। राम-राज था कभी तो कंस का भी समय रहा है। मुगलों के नगाड़े शांत हुए तो अंग्रेजों की तूती बोलने लगी। नेहरू-गांधी आए, जाना उनको भी पड़ा। जाना एक शाश्वत सत्य है। बच्चा दुनिया में आता है तो यह कोई नहीं कह सकता कि वह नेता बनेगा, डाक्टर, इंजीनियर या गिरहकट पर यह सबको मालुम होता है कि वह एक दिन जाएगा जरूर। पर फिर भी अपना अगाड़ी-पिछाड़ी सुधारने की कोशिश सदा होती रही है। नश्वरता को जानते हुए भी कभी संचय की प्रवृत्ति खत्म नहीं हो पाई। फिर चाहे वह नेता बन अपने को जनता का सेवक कहे, चाहे संत बन अपने को अवतार घोषित करे, चाहे गुरु बन मार्ग-दर्शन का स्वांग करे। कहते हैं हिमालय की दुर्गम चोटियों की कंदराओं में आज भी संत-महात्मा तपस्या लीन हैं, जग की भलाई के लिए। शायद तभी दुनिया टिकी भी हुई है। पर उन दसियों बाबाओं का क्या जो रोज ढेरों मेक-अप पोत तरह-तरह की भाव-भगिंमाओं में अवतरित हो लोगों की भावनाओं से खेलते हैं। अपने भक्तों के वर्तमान-भविष्य को सुधारने का दावा करने वाले ये सब के सब एकाधिक 'फार्म हाऊसों' मनों सोने-चांदी, करोडों की नगदी के स्वामी होते हैं। क्या इन "सर्वकाल दर्शियों" को अपना हश्र पता होता है।पहले के जमाने में राजा-महाराजा भेष बदल कर अपनी रियाया के सुख-दुख का पता लगाने निकला करते थे। मंशा यही होती थी कि यदि प्रजा सुखी संतुष्ट रहेगी तो उनका राज भी उतना ही स्थायी होगा। समय बदला सोच बदली। आज भी लोग भेष बदल कर निकलते हैं, भेष चाहे जिसका भी धरा हो मंशा एक ही रहती है, सिर्फ अपने लिए "माया" का इंतजाम करना। पर माया महा-ठगिनी, कब किसी की हुई है। सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है।
अभी आज ही कुछ दिनों पहले-गोलोक वासी हुए एक संत जी की कुटिया ने मनों आभुषण और नगदी उगली है। यह उस अकूत धन के अलावा है जिसे दुनिया जानती है।
वैसे ही अंदर-बाहर, देश-विदेश में ऐसे-वैसे-कैसे धन के ढेर मिट्टी की तरह पड़े हैं। जिनका कोई हिसाब नहीं है। हिसाब मांगने वालों का हिसाब-किताब बराबर कर दिया जाता है। यह भी सत्य है कि जमाखोरों को कब ढाई गज का कपड़ा लपेट चल देना पड़ेगा वे भी नहीं जानते। पर यह इस देश की बदनसीबी है कि इसकी बागडोर ऐसे हाथों में है जिनके राज में अनाज सड जाता है पर गरीब के पेट में नहीं पहुंचने दिया जाता। धन इतना है कि कोई गिनने लगे तो उम्र बीत जाए पर निर्धन को जीवन यापन करने से बेहतर मौत को गले लगाना आसान लगता है।
बस यही बात आशा-भरोसा दिलाए रहती है कि हर चीज का अंत होता है। हर काली रात की उजली सुबह होती है। कभी तो ऐसा प्रभात होगा, कभी तो ऐसा सबेरा आएगा !!!











