इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
सोमवार, 13 जून 2011
शनिवार, 11 जून 2011
नींद दो ही तरह की होती है, अल्प निद्रा और चिर निद्रा।
नींद शरीर के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कि खानापीना या और कुछ। यह यदि पूरी ना हो तो इस शरीर रूपी मशीन को "ऐंड़-बैंड़' होते ज्यादा देर नहीं लगती। दो-तीन दिन के रतजगे के बाद ही सरदर्द, बेचैनी, घबराहट, भ्रम जैसी परेशानियां सामने आने लगती हैं। पूछ कर देखिए उन से जो अनिद्रा से ग्रसित हैं तथा जिन्हें रोज नींद की गोलियों से ललचा-ललचा कर उसे बुलाना पड़ता है। जो
सोवत है वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है" या "तूने रात बिताई सोय कर दिवस बितायो खाय, कबीरा जन्म अमोल है कौड़ी बदले जाय", जैसी नसीहतों और उपदेशों में नींद की (भले ही उपमा देकर समय की कीमत समझाई गयी हो) चाहे जितनी भी भर्त्सना की गयी हो पर सत्य यही है कि नींद शरीर की अहम आवश्यकता है। भले ही इसमें इंसान के जीवन का एक-तिहाई भाग बेहोशी में ही निकल जाता हो।
शुक्रवार, 10 जून 2011
जहां चाह है वहां राह है
सोमवार, 6 जून 2011
आज मन बहुत व्यथित है, अपने आप को जान कर !!!
शनिवार, 4 जून 2011
जब समय आने पर वह अपना मुंह उठा चल देती है तो हमें क्या कि उस पर क्या गुजरेगी !
शुक्रवार, 3 जून 2011
कांग्रेस डरती नहीं है, इसका अर्थ आप क्या लगाएंगे ?
बाबा रामदेव के जटिल आसनों से घबडा कर उन्होंने क्या कहा देखिए - " कांग्रेस बाबा से नहीं डरती। नहीं तो उन्हें अब तक जेल पहुंचा दिया होता। डर नहीं है, तभी तो खुला छोड़ा है।"
इसका एक अर्थ यह नहीं लगता कि जिससे भी कांग्रेस डरती है उसे जेल में बंद करवा देती है ?
अब ऐसे शब्द निकल जाते हैं कि निकाले जाते हैं यह भी शोध का विषय हो सकता है।
गुरुवार, 2 जून 2011
मैं तो चूक गया था आप मत चूकिएगा
खाने-पीने के मामले में पंजाबियों का स्थान काफी ऊपर माना जाता है। पेट को इसके लिए चाहे अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती हो पर जीभ इसका नाम सुनते ही "पानी-पानी" हो जाती है। उसमें भी अमृतसर के भोज्य-पदार्थ तो सारे देश में मशहूर हैं। पर यह बदकिस्मती ही रही कि वर्षों से वहां के लजीज व्यंजनों का नाम तथा उत्पादन केंद्रों को याद रखने के बावजूद "कड़ाही के पास से भूखे वापस" आ गये। बड़े दिनों के बाद पंजाब यात्रा का मौका मिला था पर समय की कमी के कारण उसका फायदा, खाने के लिहाज से, नहीं उठा पाए हम सब और "नियामतों" के पास तक भी नहीं पहुंच सके। क्योंकि लंका में तो सब दस हाथ के पर रावण की तो अलग ही बात थी। वैसे ही अमृतसर में भोजनालय तो बेशुमार हैं पर "सिरमौर" को तो खोजना ही पड़ता है।
खैर पर यदि आपका जाना हो तो कुछ "भोजन गाईड" बता रहा हूं चूकिएगा नहीं रसास्वादन से। आप एक बार आकर यहां के ढाबों का स्वाद जीभ को ले लेने भर दें, मजाल है कभी वह इस स्वाद को भूल पाए। बात चाहे पीढियों से चले आ रहे 'केसर के ढाबे' की हो चाहे 'भ्राबां के ढाबे' की, इनके भरवां पराठे, दाल और मोटी मलाई वाला दही कितना भी खालें पेट भर जाता है पर मन नहीं। सारा खेल धीमी आंच और शुद्ध घी का होता है। यह इनकी ईमानदारी की ही बरकत है कि मंहगाई के इस जमाने में जबकि यह ग्राहक से कुछ भी वसूल सकते हैं, ये सिर्फ जायज कीमतों पर ही लोगों का पेट भरने का व्रत ले अपना काम करते जाते हैं।
अमृतसर की बात हो और यहां के कुलचों का जिक्र ना हो यह कैसे हो सकता है। यहां के कुलचे जब देशी घी में नहा कर निकलते हैं तो उनका रूप-रंग तथा उनमें भरे गये अनारदाने और किसमिस का स्वाद बड़े-बड़े उपवासियों को अपना उपवास तोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इन कुलचों का अभिन्न अंग होते हैं मसालेदार चने। जिनको बनाने का तरीका जानने के लिये देश के बड़े-बड़े पंचतारा होटलों के शेफ भी लालायित रहते हैं।
पूरे खाने की बात हो या चाट पकौड़ी की अमृतसर किसी बात में पीछे नहीं है। यहां के 'बृजवासी चाट भंडार' की आलू की टिक्की का जायका इसको बनते देख ही मुंह में पानी ला देता है। सादी आलू की टिक्की हो या सोयाबीन की पिठ्ठी से भरी दही, सोंठ और हरी चटनी के साथ या पनीर वाली, मिलती बहुत से शहरों में हैं पर इनके जैसा स्वाद अन्यत्र दुर्लभ है। एक बात और जब कभी भी आप यहां आयें तो पनीर की भुजिया खाना तथा पेड़ा ड़लवा कर लस्सी पीना ना भूलें। इसके अलावा आप यहां का स्वाद अपने साथ बांध कर भी ले जा सकते हैं। यहां की आलूबुखारा भरी बड़ियां या अनारदाने वाले पापड़, ये घर पर भी आपको अपनी यात्रा का स्वाद दिलवाते रहेंगे।
ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है। सुना है यहां का मांसाहार लोगों को लखनवी या हैदराबादी स्वाद भूलने पर मजबूर कर देता है। ऐसे रेस्त्रांओं पर जुटी भीड़ इस बात की साक्षी रहती है।
तो कब जा रहे हैं अमृतसर बताईएगा।
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