pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 11 जून 2011

नींद दो ही तरह की होती है, अल्प निद्रा और चिर निद्रा।

नींद शरीर के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कि खानापीना या और कुछ। यह यदि पूरी ना हो तो इस शरीर रूपी मशीन को "ऐंड़-बैंड़' होते ज्यादा देर नहीं लगती। दो-तीन दिन के रतजगे के बाद ही सरदर्द, बेचैनी, घबराहट, भ्रम जैसी परेशानियां सामने आने लगती हैं। पूछ कर देखिए उन से जो अनिद्रा से ग्रसित हैं तथा जिन्हें रोज नींद की गोलियों से ललचा-ललचा कर उसे बुलाना पड़ता है। जोसोवत है वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है" या "तूने रात बिताई सोय कर दिवस बितायो खाय, कबीरा जन्म अमोल है कौड़ी बदले जाय", जैसी नसीहतों और उपदेशों में नींद की (भले ही उपमा देकर समय की कीमत समझाई गयी हो) चाहे जितनी भी भर्त्सना की गयी हो पर सत्य यही है कि नींद शरीर की अहम आवश्यकता है। भले ही इसमें इंसान के जीवन का एक-तिहाई भाग बेहोशी में ही निकल जाता हो।


इसी खुदा की नेमत को हमारे पास पहुंचाने के एवज में सैंकड़ों कंपनियां लाखों-करोंड़ों का वारा-न्यारा करने में लगी हुई हैं। पर जिन्हें इसका वरदान प्राप्त है उन्हें किसी ताम-झाम की जरूरत नहीं पड़ती। न उन्हें गद्दा चाहिए ना तकिया, न उन्हें रोशनी या अंधकार से मतलब होता है ना जगह से ना जमीन से ना बिस्तर से मना चादर से वे तो जहां चाहे लुढक कर अपनी जरूरत पूरी कर लेते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि "भूख ना देखे बासी भात और नींद ना देखे टूटी खाट", मजाक नहीं सच कह रहा हूं आप भी देख लीजिए :

वैज्ञानिकों ने नींद के बहुत से प्रकार बताए हैं पर असल में यह दो ही तरह की होती है।
पहली अल्प निद्रा, जो हमें रोज आती है और उसी दौरान शरीर कुछ घंटों में रोजमर्रा की टूट-फूट, कमी-बेसी की भरपाई कर दूसरे दिन के लिए तरोताजा हो जाता है।
दूसरी होती है चिर-निद्रा, इसमें शरीर के अंदर की कमियों को ही नहीं पूरे खाके, ढांचे को ही बदल कर एक नये शरीर की नींव रखी जाती है इस कायनात के अस्तित्व को बनाए व चलायमान रखने में योगदान देते रहने के लिए।
पहली आए या ना आए पर दूसरी से जीव कभी वंचित नहीं होता।

यदि आपको सुख की, चैन की, गहरी प्राकृतिक नींद आती है तो उसके लिए भगवान का शुक्रिया अदा जरूर करें। क्योंकि सर्व-सुलभ चीज की कीमत हम समझ नहीं पाते।

शुक्रवार, 10 जून 2011

जहां चाह है वहां राह है


मनुष्य प्रकृति का वह अजूबा है जिसे कोई भी रुकावट रोक नहीं सकती। उसके धड़ के ऊपर स्थित कारखाने में छोटी से छोटी अड़चनों से लेकर बड़ी से बड़ी मुश्किलों के हल निरंतर निकलते रहते हैं।
विश्वास ना हो तो देख लें -




















सोमवार, 6 जून 2011

आज मन बहुत व्यथित है, अपने आप को जान कर !!!

आज मन बहुत व्यथित है। बाबा रामदेव के हश्र को देख कर नहीं अपनी औकात को देख कर। दो दिन से टीवी, अखबार, रिसाले, ब्लाग किसी पर भी नजर दौड़ा लीजिए, अपनी सच्चाई मुंह बाए खड़ी नजर आ रही है। शीशे में अपना अक्स साफ दिखाई दे रहा है। इन सब ने हमारी सारी असलियत खोल कर रख दी है। जता दिया है कि हम वो हैं, जिन्हें दिखावे की, वह भी झूठी, चिंता रहती है, देश-जहान की। पर कुछ कर गुजरने का मौका आने पर हम बगलें झांकने लगते हैं।

हम वो हैं जो दूसरे को मान-सम्मान मिलता देख जल-भुन-कुढ कर उसकी बुराईयां खोजने लगते हैं।

हम वो हैं जो पीठ पीछे तो नेता-अभिनेता,मंत्री-संत्री को गलियाते रहते हैं पर जब वह सामने आ जाता है तो साष्टांग पसरने में भी गुरेज नहीं करते।

हम वो हैं जो सत्ताधारियों की नीतियों, फैसलों, हठधर्मिता से परेशान हैं त्रस्त हैं। अपने को अक्लमंद समझ सबकी छीछालेदर करते हैं पर जब मौका आता है तो फिर वही ढाक के तीन पात। उन्हीं की जी-हजूरी में पहुंच जातै हैं।

हम वो हैं जो भ्रष्टाचार पर बढ-चढ कर बोलते हैं। इस पर उस पर इल्जाम लगाते हैं पर जब 100-50 रुपये मे खुद को कोई सहूलियत मिलने लगती है तो सारी नैतिकता-वैतिकता भूल उसे जायज समझ लपक लेते हैं।

हम वो हैं जो खुद कुछ नहीं करते, हिम्मत ही नहीं है, पर जब दूसरा कोई राजबल, बाहूबल, धनबल के खिलाफ खड़ा होने का साहस करता है तो उस की टांग खिंचने से बाज नहीं आते।

हम वो हैं जो दूसरे पर अत्याचार होते देख उसका साथ देने के बजाए खिड़की बंद कर घर में दुबक जाते हैं। शुक्र मनाते हैं कि हम बचे हुए हैं पर यह नहीं सोच पाते कि कब तक।

हम वो भी हैं जो अन्याय देख विचलित होते हैं, कसमसाते हैं, कुढते हैं पर कुछ कर पाने में अपने को असहाय, लाचार पा चुप हो बैठे रह जाते हैं

यह इस देश का दुर्भाग्य रहा है, सदा से कि बार-बार, हर बार आताताईयों के अत्याचार के विरुद्ध, चाहे वह देसी रहा हो या विदेशी, कुछ मुट्ठी भर जांबाजों ने ही सर उठा उन्हें ललकारा, उनका विरोध किया और शहादत को गले लगाया। बाकि करोंड़ों लोग अपनी जान बचाते हुए तमाशाई बने रहे।

कल की काली रात को क्या हुआ, एक आदमी ने आवाज उठाई तो सैंकड़ों उंगलियां उसी की ओर विरोध दर्शाते उठ गयीं या उठवा दी गयीं और उसे ही कठघरे में खड़ा करवा दिया गया। सारे माजरे को देख बहुत पहले कहीं पढी एक लघु कथा याद आ रही है -

एक ट्रेन के डिब्बे में कुछ बदमाश घुस कर लूट-खसोट करने लगे। गिनती के उन छह-सात लोगों का सामना करने की डिब्बे के लोगों मे से किसी ने भी हिम्मत नहीं दिखाई। तभी टायलेट से एक सैनिक निकला। वहां की हालत देख उसने बदमाशों को ललकारा और उनसे भिड़ गया। पर अकेला कब तक लड़ता कुछ देर में गुंडों ने उसे उठा कर गाड़ी के बाहर फेंक दिया और चेन खींच कर फरार हो गये। गाड़ी रुकी पीछे जा कर देखा गया तो उस साहसी जवान की लाश ही मिली।

कुछ देर बाद गाड़ी चली। यात्री आपस में बतियाने लगे घटी घटना को लेकर। उन्हीं मे से एक बोला, बेवकूफ था। चला था हीरो बनने। बेकार में जान गवांई। चुप-चाप पड़ा रहता उसका क्या जा रहा था। हम भी तो बैठे ही थे।

शनिवार, 4 जून 2011

जब समय आने पर वह अपना मुंह उठा चल देती है तो हमें क्या कि उस पर क्या गुजरेगी !

रक्त, हड्डी, मांस-मज्जा, नस-नाड़ियों, विभिन्न अंगों, हवा, पानी इत्यादि के अलावा भी मेरे अंदर कुछ है। यह सदा से ही मुझे लगता रहा है। जो मेरे साथ हंसता है, गाता है, खुश होता है, दुखी होता है यानि मेरा सहभागी है। मुझे यह भी लगता है कि यह जो भी है हर जीव में होता होगा, ” कुछेक” को छोड़ कर। अब यह होता है या होती है इसका पता नहीं चल पाया है सो लिंग निर्धारण भी नहीं हो सका है। आगे इसे “ती” मान कर चर्चा जारी रखते हैं।
अब जाहिर है कि अपने अंदर कुछ हो तो उसके बारे में जानने की उत्सुकता तो होगी ही। इसी के कारणवश कुछ खुद के प्रयत्नों और इधर-उधर पूछने, पता करने पर अलग-अलग ग्रंथों, विभिन्न श्रेणियों के लोगों, महानुभावों ने अपने-अपने “सटीक” ज्ञान से मेरे सूखे बगिया रूपी ज्ञान को हरा-भरा करने की कोशिश की। जो लब्बो-लुआब सामने आया वह कुछ इस तरह का है।

संत, महात्मा, योगी, ऋषि-मुनि, ज्ञानी लोग इसे ”आत्मा” की संज्ञा देते हैं। डाक्टर, चिकित्सक, शायर आदि इसे “दिल” कहते हैं और आम जन इसे “मन” के नाम से जानते हैं। ये सारे के सारे लोग अपनी-अपनी दी गयी संज्ञाओं को महिमा मंडित करने में जुटे रहते हैं।

इनमें डाक्टरों इत्यादि को छोड़ ही दें क्योंकि उनके लिए यह शरीर का एक आवश्यक अवयव मात्र है, जिसके बिना शरीर का चलना नामुमकिन है।

आम इंसान का यह मन भी कुछ अजीब चीज है। वह सोचता कुछ है तो होता कुछ है। वह चाहता कुछ है तो मिलता कुछ है। वह अपनी करना चाहता है पर करने वाले को करना कुछ और ही पड़ता है। इसी उहा-पोह में बचपन-जवानी-बुढापा बिता कल था आज फ्रेम में कैद हो दिवार पर टंग जाता है।

सबसे ज्यादा खींचा-तानी, वाद-विवाद, सवाल-जवाब होते रहे थे, होते रहे हैं तथा होते रहेंगे “आत्मा” को लेकर। ऋषि-मुनियों, साधू-संतों, आधुनिक मजमे-बाज गुरुओं आदि सब का ही यही कहना है कि यह जो आत्मा है वह अजर-अमर है। उस पर कोई व्याधि, सुख-दुख नहीं व्यापता। आग, हवा, पानी, अस्त्र-शस्त्र का उस पर कोई असर नहीं होता। ठीक है भाई, आप सब ज्ञानी हैं सत्य ही कहते होंगे। पर जब वह इतनी सशक्त है तो शरीर रूपी सहारे, आसरे, आधार के अंदर सुरक्षित रहते हुए उसकी शक्ति क्षीण क्यों हो जाती है? और "घर" से बाहर आते ही इतनी शक्तिशाली कैसे हो जाती है? जिस शरीर में 100-50 सालों तक डेरा डाले पड़ी रहती है उसी के खत्म होते समय निर्मोही की तरह दुम झाड़ के अपना रास्ता कैसे अख्तियार कर लेती है?
इधर वह इंसान, जिसे पता नहीं कैसे-कैसे उल्टे-सीधे विशेषणों से “अलंकृत” किया जाता रहा है, जो किसी कुत्ते-बिल्ली, तोता-मैना को दो-तीन साल के लिए भी पाल लेता है तो उसकी जुदाई में दिनों हफ्तों उदास, भावुक बना रहता है क्योंकि उसमें प्रेम की भावना होती है। जो शायद आत्मा में नहीं पाई जाती। तभी तो शरीर के खत्म होते ही उसे त्याग अपनी राह चल देती है। चलो त्याग दिया तो त्याग दिया, सही भी है खुद क्यों जलें या दफन हों किसी के साथ। पर फिर सवाल यह उठता है कि जब वह इतनी ही वितरागी है तो फिर शरीर द्वारा किए गये पाप-पुण्य का लेखा-जोखा उसे क्यों भुगतना पड़ता है। आवास से निकलने के बाद क्यों उसे आग, पानी, अस्त्रों-शस्त्रों से तकलीफ होने लगती है। चलो होती भी है तो उसके त्यागे हुए चोले को धारण करने वाले को क्यों डराया-धमकाया जाता है कि मरने के बाद ऊपर जाने पर ऐसा होगा, वैसा होगा। अरे होगा तो हो। जो हमारे अंदर वर्षों रह कर भी हमारी नहीं रही, जो हमारे खत्म होने पर मुंह उठा कर चल दी तो यदि उसे कुछ होता है हमें क्यों डराते हो और हम भी क्यों डरें ? वैसे भी इन डराऊ उपदेशों का असर हम पर क्यों और कैसे होगा जब हम, हम ही नहीं रहेंगे?

ऐसे सवाल अपनी अक्ल-मंदी में तेजी लाने के लिए कोई ना कोई तो पूछेगा ही। उसे अलग-अलग तरह-तरह के जवाब भी मिलेंगे। पर साथ ही यह भी सच है कि जवाब देने वाला अपने तथाकथित उपदेशों से सामने वाले को कितना भी प्रभावित कर ले पर खुद उसे भी मालुम नहीं होता कि वह जो बोल रहा है वह कितना सच है।
इधर फिर मुझे लग रहा है कि मेरे अंदर कोई है जो मेरे साथ मेरा सहभागी है। कौन है वह ?

शुक्रवार, 3 जून 2011

कांग्रेस डरती नहीं है, इसका अर्थ आप क्या लगाएंगे ?

एक हैं दिग्विजय सिंह। बड़े कांग्रेसी नेता हैं। कई बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। बड़े-बड़े बयान देते रहते हैं। बड़े-बड़े बयानों से बड़ी-बड़ी परेशानियां खडी होती रही हैं। अभी पिछले दिनों ओसामा के पीछे "जी" लगा कर बड़ी-बड़ी खबरों में छाए रहे थे। पार्टी के और बड़े-बड़े लोगों ने समझाया, कुछ देर शांत रहे पर कल फिर वैसा ही कुछ बोल गए।
बाबा रामदेव के जटिल आसनों से घबडा कर उन्होंने क्या कहा देखिए - " कांग्रेस बाबा से नहीं डरती। नहीं तो उन्हें अब तक जेल पहुंचा दिया होता। डर नहीं है, तभी तो खुला छोड़ा है।"
इसका एक अर्थ यह नहीं लगता कि जिससे भी कांग्रेस डरती है उसे जेल में बंद करवा देती है ?
अब ऐसे शब्द निकल जाते हैं कि निकाले जाते हैं यह भी शोध का विषय हो सकता है।

गुरुवार, 2 जून 2011

मैं तो चूक गया था आप मत चूकिएगा

खाने-पीने के मामले में पंजाबियों का स्थान काफी ऊपर माना जाता है। पेट को इसके लिए चाहे अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती हो पर जीभ इसका नाम सुनते ही "पानी-पानी" हो जाती है। उसमें भी अमृतसर के भोज्य-पदार्थ तो सारे देश में मशहूर हैं। पर यह बदकिस्मती ही रही कि वर्षों से वहां के लजीज व्यंजनों का नाम तथा उत्पादन केंद्रों को याद रखने के बावजूद "कड़ाही के पास से भूखे वापस" आ गये। बड़े दिनों के बाद पंजाब यात्रा का मौका मिला था पर समय की कमी के कारण उसका फायदा, खाने के लिहाज से, नहीं उठा पाए हम सब और "नियामतों" के पास तक भी नहीं पहुंच सके। क्योंकि लंका में तो सब दस हाथ के पर रावण की तो अलग ही बात थी। वैसे ही अमृतसर में भोजनालय तो बेशुमार हैं पर "सिरमौर" को तो खोजना ही पड़ता है।

खैर पर यदि आपका जाना हो तो कुछ "भोजन गाईड" बता रहा हूं चूकिएगा नहीं रसास्वादन से। आप एक बार आकर यहां के ढाबों का स्वाद जीभ को ले लेने भर दें, मजाल है कभी वह इस स्वाद को भूल पाए। बात चाहे पीढियों से चले आ रहे 'केसर के ढाबे' की हो चाहे 'भ्राबां के ढाबे' की, इनके भरवां पराठे, दाल और मोटी मलाई वाला दही कितना भी खालें पेट भर जाता है पर मन नहीं। सारा खेल धीमी आंच और शुद्ध घी का होता है। यह इनकी ईमानदारी की ही बरकत है कि मंहगाई के इस जमाने में जबकि यह ग्राहक से कुछ भी वसूल सकते हैं, ये सिर्फ जायज कीमतों पर ही लोगों का पेट भरने का व्रत ले अपना काम करते जाते हैं।

अमृतसर की बात हो और यहां के कुलचों का जिक्र ना हो यह कैसे हो सकता है। यहां के कुलचे जब देशी घी में नहा कर निकलते हैं तो उनका रूप-रंग तथा उनमें भरे गये अनारदाने और किसमिस का स्वाद बड़े-बड़े उपवासियों को अपना उपवास तोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इन कुलचों का अभिन्न अंग होते हैं मसालेदार चने। जिनको बनाने का तरीका जानने के लिये देश के बड़े-बड़े पंचतारा होटलों के शेफ भी लालायित रहते हैं।

पूरे खाने की बात हो या चाट पकौड़ी की अमृतसर किसी बात में पीछे नहीं है। यहां के 'बृजवासी चाट भंडार' की आलू की टिक्की का जायका इसको बनते देख ही मुंह में पानी ला देता है। सादी आलू की टिक्की हो या सोयाबीन की पिठ्ठी से भरी दही, सोंठ और हरी चटनी के साथ या पनीर वाली, मिलती बहुत से शहरों में हैं पर इनके जैसा स्वाद अन्यत्र दुर्लभ है। एक बात और जब कभी भी आप यहां आयें तो पनीर की भुजिया खाना तथा पेड़ा ड़लवा कर लस्सी पीना ना भूलें। इसके अलावा आप यहां का स्वाद अपने साथ बांध कर भी ले जा सकते हैं। यहां की आलूबुखारा भरी बड़ियां या अनारदाने वाले पापड़, ये घर पर भी आपको अपनी यात्रा का स्वाद दिलवाते रहेंगे।

ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है। सुना है यहां का मांसाहार लोगों को लखनवी या हैदराबादी स्वाद भूलने पर मजबूर कर देता है। ऐसे रेस्त्रांओं पर जुटी भीड़ इस बात की साक्षी रहती है।

तो कब जा रहे हैं अमृतसर बताईएगा।

मंगलवार, 31 मई 2011

पंजाब यात्रा के दौरान लिए गए कुछ चित्र


वाघा बार्डर

हरमंदिर साहब परिसर में जूते रखने का विशाल स्थान
सरोवर में क्रीडा करती भाग्यशाली मछलियाँ

सरोवर का एक विहंगम दृश्य

हरमंदिर साहब
वह एकमात्र बाहर जाने की संकरी गली जिसे घेर कर डायर ने गोलियां चलवाई थीं.
जलियाँवाला स्मारक
वह कुआं जिसमे गोलियों से बचने के लिए लोग कूद गए
दुर्ग्याना मंदिर का मुख्य द्वार दुर्ग्याना मंदिर, बिलकुल हरमंदर साहब का प्रतिरूप।


विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...