अभी कुछ दिनों पहले छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में एक “हादसा” हुआ। हादसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकी ऐसा पहली बार हुआ है कि एक आम आदमी ने लालफीताशाही से तंग आ कर ऐसा खतरनाक रवैया अपनाया हो। एक कमजोर बुजुर्ग इंसान द्वारा उठाया गया ऐसा कदम आने वाले अराजक समय का “ट्रेलर” भी हो सकता है।
हुआ यूं कि सेवानिवृत सब-इंजीनियर लोकेंद्र सिंह, जो 30 सितम्बर 2007 को रिटायर हो चुके थे, उन्हें चार साल से पेंशन के लिए भटकाया जा रहा था। इस दफ्तर से उस दफ्तर, उस टेबल से इस टेबल तक चक्कर काटते-काटते वह वृद्ध पुरुष परेशान हो चुका था। रायपुर से मीलों दूर बालाघाट में रहने वाले लोकेन्द्र सिंह इस उम्र में बार-बार इतनी दूर से आ हर बार नाउम्मीद होने, जीविकोपार्जन का कोई और साधन ना होने के बावजूद चार साल तक हाथ-पैर जोड़ने के बाद एक दिन अपना आपा खोकर चाकू से संबंधित अधिकारी पर हताशा में हमला कर बैठे। सोचने की बात है कि ऐसा आत्मघाती कदम उठाने वाले की मनोदशा कैसी कर दी गयी होगी पैसे के भूखे निर्मम बाबुओं के द्वारा। जबकि आमतौर पर सरकारी कर्मचारी के रिटायर होने के अंतिम साल में ही सारी कार्यवाही पूरी कर सेवा-निवृत होते ही अगले महीने से ही उसे पेंशन मिलनी शुरु हो जाती है।
हमले के बाद लोकेंद्र को तो थाने ले जाया जाना ही था। पर कलेक्टर महोदय ने इस सारे प्रसंग को गम्भीरता से लेते हुए जब पूरी छानबीन करवाई तो सारे संबंधित कार्यालयों की गल्तियां सामने आईं। यह बात भी पता चली कि इस दुधारू जगह में येन-केन-प्रकारेण सालों से पुराने कर्मचारी जमे बैठे हैं और पेंशन जारी करवाने के लिए मुवावजा लेकर अपना भविष्य सुधारते जा रहे हैं। सेवानिवृत होने वाला चाहे उनका पुराना साथी ही क्यों ना हो उन्हें सिर्फ माया से मतलब होता है।
कुछ महीनों पहले मैंने एक पोस्ट ड़ाली थी कि "सुधर जाओ नहीं तो जनता सुधार देगी।" भगवान ना करे कि वैसा समय आए जब हर कोई कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर हो जाए। पर सोच कर देखिए कि कौन आपा ना खो बैठेगा जब उसके सामने ये तथाकथित जनता के नौकर घूस ले-ले कर हजारों नोट रोज अपने घर ले जाते दिखें पर एक इमानदार आम आदमी अपने दो समय की रोटी के लिए हताशा-निराशा से गुजरता रहे। मंत्री-संत्री तो अपना वेतन बढवाने के लिए बेशर्मी से एकजुट हो जाएं और मंहगाई की मार को झेलने के लिए बची रहे निरीह जनता। नेता-अभिनेता तो शादी-ब्याह जैसे उत्सवों पर एक रात में करोड़ों फूंक डालें और एक मध्यम वर्गीय अपने बच्चों को एक जोड़ी कपड़े ना दिला पाने के लिए झूठ का सहारा लेता रहे। एक खेल पर तो सरकार अरबों लुटाने को तैयार दिखे पर गरीब जनता की तकदीर सवांरने को उसकी झोली सदा खाली रहे। मालदार लक्ष्मी-पुत्रों के परिवार के हर सदस्य को हवा में अठखेलियां करने का शगल हो और धरती पुत्रों को चलने के लिए जमीन ना मिले तो अंजाम ??????????????
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
बुधवार, 11 मई 2011
सोमवार, 9 मई 2011
शनिवार, 7 मई 2011
भगत सिंह की बेबे।
भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव ने हर्ष ध्वनी के साथ अपनी फांसी की सजा सुनी थी।
अंग्रेज भी इनकी दिलेरी पर आश्चर्यचकित थे।
फांसी का दिन आ पहुंचा था। नियमानुसार जेलर ने भगतसिंह से उनकी अंतिम इच्छा जाननी चाही तो भगतसिंह ने कहा कि मैं अपनी बेबे के हाथ की रोटियां खाना चाहता हूं। पहले तो जेलर ने समझा कि भगत अपनी मां के हाथ की रोटी खाना चाहते हैं। पर भगतसिंह ने स्पष्ट किया कि वे जेल में कैदियों की गंदगी उठाने वाली भंगी महिला के हाथ का भोजन करना चाहते हैं । जेलर हैरान , उसने पूछा कि आप उस भंगी महिला को बेबे क्यों कहते हैं? तब भगत ने जवाब दिया कि मेरी जिंदगी में दो ही महिलाओं ने मेरी गंदगी साफ की है। छुटपन में मेरी माँ ने और अब इस महिला ने। इसीलिए मैं इन दोनो को ही अपनी बेबे कहता और मानता हूं।
जब जेल की उस महिला को भगतसिंह की इस बात का पता चला तो उसकी आंखों से अविरल अश्रु-धारा बह चली। इतना बड़ा सम्मान आज तक उसे किसी ने भी तो नहीं दिया था। उसने बड़े प्यार से रोटियां बनाईं और उतने ही प्रेम से भगतसिंह ने उन्हें खाया।
भगतसिंह देश की आजादी के साथ-साथ यहां फैली ऊंच-नीच की दिवार को भी गिरा देना चाहते थे। उनका कहना था कि समाज के ढांचे को बदले बिना मनुष्य-मनुष्य के बीच की असमानता को दूर नहीं किया जा सकता।
आज अपनी कुर्सी को बचा अपना उल्लू सीधा करने वाले तथाकथित नेताओं को इन सब प्रसंगों का पता भी नहीं होगा और होगा भी तो ??????????????????????
अंग्रेज भी इनकी दिलेरी पर आश्चर्यचकित थे।
फांसी का दिन आ पहुंचा था। नियमानुसार जेलर ने भगतसिंह से उनकी अंतिम इच्छा जाननी चाही तो भगतसिंह ने कहा कि मैं अपनी बेबे के हाथ की रोटियां खाना चाहता हूं। पहले तो जेलर ने समझा कि भगत अपनी मां के हाथ की रोटी खाना चाहते हैं। पर भगतसिंह ने स्पष्ट किया कि वे जेल में कैदियों की गंदगी उठाने वाली भंगी महिला के हाथ का भोजन करना चाहते हैं । जेलर हैरान , उसने पूछा कि आप उस भंगी महिला को बेबे क्यों कहते हैं? तब भगत ने जवाब दिया कि मेरी जिंदगी में दो ही महिलाओं ने मेरी गंदगी साफ की है। छुटपन में मेरी माँ ने और अब इस महिला ने। इसीलिए मैं इन दोनो को ही अपनी बेबे कहता और मानता हूं।
जब जेल की उस महिला को भगतसिंह की इस बात का पता चला तो उसकी आंखों से अविरल अश्रु-धारा बह चली। इतना बड़ा सम्मान आज तक उसे किसी ने भी तो नहीं दिया था। उसने बड़े प्यार से रोटियां बनाईं और उतने ही प्रेम से भगतसिंह ने उन्हें खाया।
भगतसिंह देश की आजादी के साथ-साथ यहां फैली ऊंच-नीच की दिवार को भी गिरा देना चाहते थे। उनका कहना था कि समाज के ढांचे को बदले बिना मनुष्य-मनुष्य के बीच की असमानता को दूर नहीं किया जा सकता।
आज अपनी कुर्सी को बचा अपना उल्लू सीधा करने वाले तथाकथित नेताओं को इन सब प्रसंगों का पता भी नहीं होगा और होगा भी तो ??????????????????????
बुधवार, 4 मई 2011
विश्वास ही तो है।
भारत में महिलाओं का बिंदी लगाना एक बहुत ही आम बात है। विवाहित महिलाओं के लिए यह सुहाग की निशानी मानी जाती है। वैसे भी इसे लगाने से ललाट की शोभा बढ जाती है। अब तो एशिया के बहुत सारे देशों में इस छोटी सी टिकुली ने महिलाओं को मोह लिया है।
पश्चिमी अफरीका की बात है। वहां बहुत से भारतीय परिवार रहते हैं। वहां की महिलाएं भारतीय महिलाओं से अक्सर बिंदी के बारे में पूछती रहती हैं तो इनका जवाब रहता है कि अपने पति के लिए लगाती हैं।
वहां बहुपत्नीत्व का चलन है। इस कारण वहां की स्त्रियों में असुरक्षा की भावना बनी रहती है। ऐसी ही एक महिला ने अपनी भारतीय सहेली की देखा-देखी बिंदी लगानी शुरु कर दी। कुछ दिनों बाद उसने अपनी भारतीय सहेली को बताया कि जबसे बिंदी लगाई है तब से उसके पति ने अन्य महिलाओं में रुचि लेना छोड़ दिया है। मेरे पास ही रहता है पर मैं उसकी नशा करने की आदत नहीं छुड़वा पाई हूं।
अब इसे क्या कहेंगे, काश ऐसा होता तो यहां भारत में पारिवारिक कलह का ग्राफ भू-लुंठित ना हो गया होता ? खैर अगली खुश रहे।
क्यों क्या कहते हैं आप ?
पश्चिमी अफरीका की बात है। वहां बहुत से भारतीय परिवार रहते हैं। वहां की महिलाएं भारतीय महिलाओं से अक्सर बिंदी के बारे में पूछती रहती हैं तो इनका जवाब रहता है कि अपने पति के लिए लगाती हैं।
वहां बहुपत्नीत्व का चलन है। इस कारण वहां की स्त्रियों में असुरक्षा की भावना बनी रहती है। ऐसी ही एक महिला ने अपनी भारतीय सहेली की देखा-देखी बिंदी लगानी शुरु कर दी। कुछ दिनों बाद उसने अपनी भारतीय सहेली को बताया कि जबसे बिंदी लगाई है तब से उसके पति ने अन्य महिलाओं में रुचि लेना छोड़ दिया है। मेरे पास ही रहता है पर मैं उसकी नशा करने की आदत नहीं छुड़वा पाई हूं।
अब इसे क्या कहेंगे, काश ऐसा होता तो यहां भारत में पारिवारिक कलह का ग्राफ भू-लुंठित ना हो गया होता ? खैर अगली खुश रहे।
क्यों क्या कहते हैं आप ?
शनिवार, 30 अप्रैल 2011
मंदार पर्वत, जिससे समुद्र-मंथन हुआ था. कहाँ है वह ?
मंदार पर्वत, वही जिसे मथानी बना कर समुद्र-मंथन किया गया था।
कहां है वह ? क्या उसका अस्तित्व है ?
यदि उस मूक साधक को देखना चाहते हैं तो आपको बिहार के बांका जिले के बौंसी गांव तक जाना पड़ेगा। यह करीब सात सौ फुट ऊंची पहाड़ी भागलपुर से 30-35 मील दूर स्थित है। जहां रेल या बस किसी से भी सुविधापूर्वक जाया जा सकता है। बौंसी से इसकी दूरी करीब पांच मील की है।
जब समुद्र मंथन किया गया तो मंदार पर्वत को मथनी और उस पर वासुकी नाग को समेट कर रस्सी का काम लिया गया था। पर्वत पर अभी भी धार दार लकीरें दिखती हैं जो एक दूसरे से करीब छह फुट की दूरी पर बनी हुई हैं और ऐसा लगता है कि किसी गाड़ी के टायर के निशान हों। ये लकीरें किसी भी तरह मानव निर्मित नहीं लगतीं। जन विश्वास है कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से यह निशान बने हैं। मंथन के बाद जो हुआ वह अलग कहानी है। पर अभी भी पर्वत के ऊपर शंख-कुंड़ में एक विशाल शंख की आकृति स्थित है कहते हैं शिवजी ने इसी महाशंख से विष पान किया था।
पुराणों के अनुसार एक बार विष्णुजी के कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भाईयों का जन्म हुआ। पर धीरे-धीरे इनका उत्पात इतना बढ गया कि सारे देवता इनसे भय खाने लगे। हद से गुजरने के बाद आखिर इन्हें खत्म करने के लिए विष्णुजी को इनसे युद्ध करना पड़ा। इसमें भी मधु का अंत करने में विष्णुजी परेशान हो गये हजारों साल के युद्ध के बाद अंत में उन्होंने उसका सिर काट उसे मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया। पर उसकी वीरता से प्रसन्न हो कर उसके सिर की आकृति पर्वत पर बना दी गयी। जो अब यहां आने वालों के लिए दर्शनीय स्थल बन चुकी है।
वैसे तो यहां अनगिनत सरोवर और मंदिर हैं, सबकी अपनी-अपनी कहानी भी है पर पर्वत के नीचे बने जल-कुंड़ का अपना महत्व है इसके पानी को रोगों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
यहां से करीब 70-80 कि.मी. की दूरी पर वासुकीनाथ का मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। कभी मौका मिले तो समुद्र मंथन की इस मथानी को जरुर देखने जाएं।
कहां है वह ? क्या उसका अस्तित्व है ?
यदि उस मूक साधक को देखना चाहते हैं तो आपको बिहार के बांका जिले के बौंसी गांव तक जाना पड़ेगा। यह करीब सात सौ फुट ऊंची पहाड़ी भागलपुर से 30-35 मील दूर स्थित है। जहां रेल या बस किसी से भी सुविधापूर्वक जाया जा सकता है। बौंसी से इसकी दूरी करीब पांच मील की है।
जब समुद्र मंथन किया गया तो मंदार पर्वत को मथनी और उस पर वासुकी नाग को समेट कर रस्सी का काम लिया गया था। पर्वत पर अभी भी धार दार लकीरें दिखती हैं जो एक दूसरे से करीब छह फुट की दूरी पर बनी हुई हैं और ऐसा लगता है कि किसी गाड़ी के टायर के निशान हों। ये लकीरें किसी भी तरह मानव निर्मित नहीं लगतीं। जन विश्वास है कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से यह निशान बने हैं। मंथन के बाद जो हुआ वह अलग कहानी है। पर अभी भी पर्वत के ऊपर शंख-कुंड़ में एक विशाल शंख की आकृति स्थित है कहते हैं शिवजी ने इसी महाशंख से विष पान किया था।
पुराणों के अनुसार एक बार विष्णुजी के कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भाईयों का जन्म हुआ। पर धीरे-धीरे इनका उत्पात इतना बढ गया कि सारे देवता इनसे भय खाने लगे। हद से गुजरने के बाद आखिर इन्हें खत्म करने के लिए विष्णुजी को इनसे युद्ध करना पड़ा। इसमें भी मधु का अंत करने में विष्णुजी परेशान हो गये हजारों साल के युद्ध के बाद अंत में उन्होंने उसका सिर काट उसे मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया। पर उसकी वीरता से प्रसन्न हो कर उसके सिर की आकृति पर्वत पर बना दी गयी। जो अब यहां आने वालों के लिए दर्शनीय स्थल बन चुकी है।
वैसे तो यहां अनगिनत सरोवर और मंदिर हैं, सबकी अपनी-अपनी कहानी भी है पर पर्वत के नीचे बने जल-कुंड़ का अपना महत्व है इसके पानी को रोगों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
यहां से करीब 70-80 कि.मी. की दूरी पर वासुकीनाथ का मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। कभी मौका मिले तो समुद्र मंथन की इस मथानी को जरुर देखने जाएं।
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
व्याधि, रोग, ज़रा और मौत भेद-भाव नहीं करते
इस धरा का यह शाश्वत सत्य है कि यहां जो भी जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। बच्चा जब भी जन्म लेता है तो यह अनिश्चित होता है कि वह बड़ा बन कर क्या बनेगा या क्या करेगा पर जन्म के साथ ही यह निश्चित हो जाता है कि वह एक दिन यहां से प्रस्थान जरूर करेगा। प्रकृति के इस अटूट नियम से कोई भी परे नहीं रह पाया है। चाहे वह साधू हो, सन्यासी हो, महापुरुष हो, भगवान का अनन्य भक्त हो या खुद भगवान का ही अंश क्यों ना हो। यहां आए हो तो जाना पहली शर्त है। श्री राम , श्री कृष्ण, ईसा मसीह, पैगम्बर, बुद्ध, महावीर जैसे अवतारों को भी अपना समय पूर्ण होने पर धरा छोड़नी पड़ी थी तो इंसान की क्या औकात है।
मृत्यु तो खैर अटल है ही, आदि-व्याधि से भी कोई बिरला ही बच पाता है। प्रकृति प्रदत्त ये हमारे 'परिक्षक' या 'उपदेशक' किसी में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते। ये नहीं देखते कि उनका लक्ष्य स्त्री है या पुरुष, अमीर है या गरीब, ढोंगी है या साधू, जन है या महाजन। बुढापा, व्याधि, बिमारी और मौत ये नाहीं किसी का पक्षपात करते हैं नाही किसी पर दया। यह किस रूप में आएंगे यह भी कोई ना जानता है ना बतला सकता है।
पांडवों को क्या पता था कि उनका अंत किन परिस्थितियों में होगा, सुकरात - मीरा को जहर का सेवन करना पड़ा था, रामकृष्ण परमहंस जैसे सत्य पुरुष को भी भयंकर बिमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। महर्षी रमण, महायोगी अरविंद डायबिटीज से जुझते रहे। जवाहर लाल नेहरु की मृत्यु लकवे के कारण हुई, स्वामी श्रद्धानंद, महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी को गोलियों का शिकार होना पड़ा। हाल ही में सांई बाबा को एकाधिक रोगों से ग्रसित रहने के कारण शरीर त्यागना पड़ा। ये तो कुछ नाम हैं पर असंख्य महापुरुषों ने अपने जीवन में असाध्य रोगों का सामना किया और बहुतों ने अपनी अंतिम सांस अत्यंत कष्ट भोगते हुए ली।
कोई भी नहीं जानता कि किसका अंत किस रूप में आएगा और कब। यही एक बात यदि भगवान ने अपने पास ना रखी होती तो आज लोग उसका अस्तित्व ही नकार देते। खासकर वे जो भोली-भाली जनता की कमजोरियों का फायदा उठा अपने आप को भगवान निरूपित करने में नहीं झिझकते।
मृत्यु तो खैर अटल है ही, आदि-व्याधि से भी कोई बिरला ही बच पाता है। प्रकृति प्रदत्त ये हमारे 'परिक्षक' या 'उपदेशक' किसी में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं करते। ये नहीं देखते कि उनका लक्ष्य स्त्री है या पुरुष, अमीर है या गरीब, ढोंगी है या साधू, जन है या महाजन। बुढापा, व्याधि, बिमारी और मौत ये नाहीं किसी का पक्षपात करते हैं नाही किसी पर दया। यह किस रूप में आएंगे यह भी कोई ना जानता है ना बतला सकता है।
पांडवों को क्या पता था कि उनका अंत किन परिस्थितियों में होगा, सुकरात - मीरा को जहर का सेवन करना पड़ा था, रामकृष्ण परमहंस जैसे सत्य पुरुष को भी भयंकर बिमारी ने अपनी चपेट में ले लिया था। महर्षी रमण, महायोगी अरविंद डायबिटीज से जुझते रहे। जवाहर लाल नेहरु की मृत्यु लकवे के कारण हुई, स्वामी श्रद्धानंद, महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी को गोलियों का शिकार होना पड़ा। हाल ही में सांई बाबा को एकाधिक रोगों से ग्रसित रहने के कारण शरीर त्यागना पड़ा। ये तो कुछ नाम हैं पर असंख्य महापुरुषों ने अपने जीवन में असाध्य रोगों का सामना किया और बहुतों ने अपनी अंतिम सांस अत्यंत कष्ट भोगते हुए ली।
कोई भी नहीं जानता कि किसका अंत किस रूप में आएगा और कब। यही एक बात यदि भगवान ने अपने पास ना रखी होती तो आज लोग उसका अस्तित्व ही नकार देते। खासकर वे जो भोली-भाली जनता की कमजोरियों का फायदा उठा अपने आप को भगवान निरूपित करने में नहीं झिझकते।
सोमवार, 25 अप्रैल 2011
तैयार रहें नमक के नाम पर जेब ढीली करने के लिए
कुछ साल पहले तक कहा जाता था कि हमारे यहां गरीब आदमी कुछ ना हो तो नमक के साथ ही रोटी खा पेट भर लेता है। पर इस सबसे सस्ते खाद्य पर भी व्यवसायियों की गिद्ध दृष्टि पड़ ही गयी। तरह-तरह की बिमारियों का भय दिखा, उल्टे-सीधे व्यक्तव्य बता, संत्री-मंत्रियों की मिली-भगत ने इस गरीब से गरीब और अमीर से अमीर सब के भोजन के इस अविभाज्य अंग को एकदम आम से खास बना दिया था। बहाना यह था कि गले का रोग घेंघा ना हो इसलिए आयोडीन का सेवन जरूरी है। ड़रना हमारी फितरत है, कोई भी कभी भी आ कर हमें ड़रा जाता है। हम ड़र गये और शुरु हो गया कारूं के खजाने का खेल। मैदान में आ ड़टीं करोड़ों-अरबों का वारा - न्यारा करने वाली कम्पनियां, और तो और विदेशी भी आ जुटे बीमारी से हमें बचाने के 'नेक' काम' में। देखते-देखते 1-2 रुपये में मिलने वाली जींस की कीमत हो गयी 12 से 15 रुपये। वह भी उस चीज को मिलाने के झांसे में जो गर्म होते ही भोजन का साथ छोड़ देता है। इसके अलावा वैज्ञानिकों ने चेताया भी है कि रक्त-चाप जैसी बिमारियों में इसी आयोडीन युक्त नमक का हाथ है। बहुत से देशों में यह 'बैन' भी हो चुका है। पर हम उस चीज की कीमत चुकाते आ रहे हैं जो की है ही नहीं।
इतनी लम्बी-चौड़ी बात इसलिए कही कि आप तैयार रहें अगले आक्रमण के लिए। अभी सुगबुगाहट चल रही है कि एक बार फिर जनता को ड़राया जाए उनके शरीर में लोहे की कमी को लेकर। खासकर औरतों में पाए जाने वाली एनिमिया की बिमारी के ड़र का प्रचार कर के। सुनने में आ रहा है कि अब लौह मिश्रित नमक को बाजार में लाने की तैयारी है, जिससे रक्ताल्पता से छुटकारा दिलाया जा सके। और लीजिए नमक 50 रुपये की सीमा छूता ही है। क्योंकि इसके बिना कोई भी रसोई पूरी होती नहीं सो बच के कहां जाएंगें ?
यह कुचक्र ठीक वैसा ही है जैसे अभी कुछ दिनों पहले एक तथाकथित गोरेपन की नयी क्रीम बाजार में निर्माता कम्पनी ने यह कह कर फेंकी है कि मर्दों को गोरा करने के लिए दूसरे फार्मूले की जरुरत होती है। यह दूसरी बात है कि यह ख्याल पहले ब्रांड की गिरती साख के बाद आया। इसके बाद वृद्धों और बच्चों के लिए लाए जा सकने वाले 'प्रोड़क्ट' का रास्ता साफ हो जाता है।
मुद्दा यह है कि हमें अब तरह-तरह की विशेषता वाले नमकों का स्वागत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोई बड़ी बात नहीं है कि कुछ दिनों में उपरी मिली भगत हमें ड़रा-धमका कर विटामिन 'बी-काम्पलेक्स' जैसी चीजें भी नमक में ही देना शुरु कर दें। और हम ड़रे-ड़रे अपनी जेब ढीली करते रहें।
इतनी लम्बी-चौड़ी बात इसलिए कही कि आप तैयार रहें अगले आक्रमण के लिए। अभी सुगबुगाहट चल रही है कि एक बार फिर जनता को ड़राया जाए उनके शरीर में लोहे की कमी को लेकर। खासकर औरतों में पाए जाने वाली एनिमिया की बिमारी के ड़र का प्रचार कर के। सुनने में आ रहा है कि अब लौह मिश्रित नमक को बाजार में लाने की तैयारी है, जिससे रक्ताल्पता से छुटकारा दिलाया जा सके। और लीजिए नमक 50 रुपये की सीमा छूता ही है। क्योंकि इसके बिना कोई भी रसोई पूरी होती नहीं सो बच के कहां जाएंगें ?
यह कुचक्र ठीक वैसा ही है जैसे अभी कुछ दिनों पहले एक तथाकथित गोरेपन की नयी क्रीम बाजार में निर्माता कम्पनी ने यह कह कर फेंकी है कि मर्दों को गोरा करने के लिए दूसरे फार्मूले की जरुरत होती है। यह दूसरी बात है कि यह ख्याल पहले ब्रांड की गिरती साख के बाद आया। इसके बाद वृद्धों और बच्चों के लिए लाए जा सकने वाले 'प्रोड़क्ट' का रास्ता साफ हो जाता है।
मुद्दा यह है कि हमें अब तरह-तरह की विशेषता वाले नमकों का स्वागत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोई बड़ी बात नहीं है कि कुछ दिनों में उपरी मिली भगत हमें ड़रा-धमका कर विटामिन 'बी-काम्पलेक्स' जैसी चीजें भी नमक में ही देना शुरु कर दें। और हम ड़रे-ड़रे अपनी जेब ढीली करते रहें।
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