किसी भी व्यक्ति के प्रति समाज के किसी भी वर्ग का अंधनुकरण या समर्पण घातक होता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं जब धर्म गुरुओं या राज नेताओं ने खुद अपने को पुजवा कर अपनी शक्ति बढा उसका दुरपयोग किया है। भेड़ों की तरह अपने अनुयायियों को अपनी वाणी से सम्मोहित कर उसे काल्पनिक संसार का सपना दिखा, अपनी बात मनवाने को अपना अनुकरण करने को बाध्य कर दिया है। फिर वह अनुयायी इंसान नहीं रह जाता एक वस्तु बन जाता है जिसका उपयोग कर्ता सिर्फ अपने हित को साधने में करने लगता है। अपने पीछे खड़ी भीड़ की ताकत दिखा वह कर्ता लोगों पर, समाज पर और तो और देश पर भी हावी होने का दुस्साहस करने लगता है।
कभी लोग किसी को पूज कर भगवान बना देते हैं कभी कोई खुद को पुजवा कर भगवान बन बैठता है। स्थितियां दोनों ही भयावह होती हैं। पर हम भी क्या करें हमें घुट्टी में घोंट-घोंट कर पिलाया गया है कि अपना जीवन सार्थक करने के लिए किसी की शरण में जाओ। वही तुम्हें सही राह दिखाएगा। सुखी हो तो मोक्ष मिलेगा दुखी हो तो त्राण। अब असुरक्षा की भावना, भावी का ड़र, रोज की कशमकश से छुटकारा पाने को बेताब किसी न किसी की शरण में जा पहुंचता है। वह शरण धार्मिक भी हो सकती है और राजनीतिक भी। वहां के भंवर में जा फंसने के बाद उसका अस्तित्व धीरे-धीरे लोप कर दिया जता है, कर्ता की सम्मोहिनी सत्ता उस पर काबिज हो जाती है। कभी-कभी वहां से उकता कर निकलने की कोशिश भी करता है तो उस मकड़ी के जाले से उसकी मुक्ति नहीं हो पाती। उसके दिमाग पर ऐसा असर डाल दिया जाता है कि अपने गुरु पर कितने आरोप भी सिद्ध हो जाएं अनुयायी विश्वास नहीं करता। अभी हाल ही के दिनों में "चैनलाई स्वयंभू भगवानों" पर कितने ही आरोप प्रमाणित हुए पर भक्तों की आंखें कहां खुलीं।
अभी भी दुनिया में हताश-निराश लोगों की भगवान में आस्था है। वह उसकी शरण में जाता भी है परंतु तुरंत राहत ना मिल पाने की वजह से वह इन कलयुगी भगवानों के चक्कर में फंस जाता है जिन्होंने बड़े ही सुनियोजित तरीके से अपना जाल फैलवा रखा होता है। यह व्यक्ति पूजा धार्मिक लबादा ओढे रहती है। जिसकी आड़ में तमाम अधार्मिक कर्म प्रशय पाते हैं।
व्यक्ति पूजा के दुसरे केंद्र राजनीतिक खेमे में चरण वंदना से खेल शुरु करवाया जाता है। चरण स्पर्श, चाटुकारिता, स्तुति-गान कुछ ऐसी सीढियां हैं जिन पर अपने कुछ खास चहेतों को चढवा कर किसी दुर्लभ जगह काबिज करवा अन्य नये-पुराने पिछ्लगुओं पर अपनी धाक जमा अपने आप को जनता का भाग्य विधाता रोपित करने में कामयाबी हासिल कर लेते हैं । फिर शुरु होती है बाकियों में भी कुछ हासिल करने के लिए उस व्यक्ति विशेष की चापलूसी, जो कभी चप्पल उठा पीछे दौड़ने के रूप में सामने आती है तो कभी जूतों पर का कीचड़ साफ करके, या फिर अपने आका को खुश करने के लिए किसी की बेज्जती कर के। इन रीढ विहीनों का एक ही मकसद होता है कि वह व्यक्ति विशेष किसी भी तरह अपनी नजरें इनायत इन पर कर दे।
यह व्यक्ति पूजा शायद मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही उसके दिमाग में रोपित हो गयी है। इसके लिए किसी देश, धर्म या पंथ की सीमा नहीं है। वह व्यक्ति सिकंदर भी हो सकता है, बाबर भी, हिटलर भी, माओ भी गद्दाफी भी या हमारे "चैनलाई स्वयंभू भगवान" भी।
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* कल ऐसे ही एक गुरु की हिमाकत जिसने करीब हजार अनुयायिओं को एक ही समय में मौत का आलिंगन करने पर मजबूर कर दिया था।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
शनिवार, 19 फ़रवरी 2011
मयखाने भी क्या-क्या गुल खिलाते हैं
एक बड़ी कंपनी की बस से चार-पांच युवक उतर कर एक बार में पीने को घुसे। उन्होंने जम कर पी। फिर वहीं एक लड़की से छेड़खानी शुरु कर दी। वहां बैठे एकमात्र बुजुर्ग ग्राहक ने हस्तक्षेप किया तो उसकी पिटाई की और उसे बाहर धकेल दिया।लड़की ने आकर बुजुर्ग को उठाया और पूछा ज्यादा चोट तो नहीं आई, कमबख्तों ने बहुत मारा है।कोई बात नहीं बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा जब उन्हें अपनी जेबें खाली मिलेंगी तो नानी याद आ जाएगी। कंपनी की बस देखते ही मुझे उनके मालदार होने का विश्वास हो गया था क्योंकि वह कंपनी आज की तारीख में ही वेतन बांटती है। लड़की मुस्करायी और बोली, ईश्वर को धन्यवाद है कि आपकी पिटाई और मेरी एक्टिंग बेकार नहीं गयी।
(बहुत पहले आई एक फिल्म "शान" में जानी वाकर और बिंदिया गोस्वामी के रोल भी इसी ब्राजील की लघु कथा से लिए गये थे शायद।)
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बार से नशे में धुत झुमते-झामते बाहर निकलते हुए श्रीमानजी ने द्वारपाल से पूछा 'आज तक तुम्हें ज्यादा से ज्यादा टिप कितनी मिली है'?
'सौ रुपये सर' उसने जवाब दिया।
'बस! ये लो दो सौ रुपये, वैसे किसने तुम्हें सौ रुपये दिए थे?'
'कल आपने ही सर'
(बहुत पहले आई एक फिल्म "शान" में जानी वाकर और बिंदिया गोस्वामी के रोल भी इसी ब्राजील की लघु कथा से लिए गये थे शायद।)
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बार से नशे में धुत झुमते-झामते बाहर निकलते हुए श्रीमानजी ने द्वारपाल से पूछा 'आज तक तुम्हें ज्यादा से ज्यादा टिप कितनी मिली है'?
'सौ रुपये सर' उसने जवाब दिया।
'बस! ये लो दो सौ रुपये, वैसे किसने तुम्हें सौ रुपये दिए थे?'
'कल आपने ही सर'
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
"स्वयंप्रभा" रामायण का एक उपेक्षित पात्र
थके-हारे, निश्चित समय में सीता माता को ना खोज पाने के भय से व्याकुल, वानर समूह को उचित मार्गदर्शन दे, लंका का पता बताने वाली सिद्ध तपस्विनी "स्वयंप्रभा" को वाल्मीकि रामायण के बाद कोई विशेष महत्व नहीं मिल पाया। हो सकता है, श्री राम से इस पात्र का सीधा संबंध ना होना इस बात का कारण हो।
शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो की स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठा कर वह सारी बात बताती हैं।
यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देवकन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।
इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं।
आगे की कथा तो जगजाहिर है। यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है।
"पर पता नहीं, स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र उपेक्षित क्यूं रह गया।
शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो की स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठा कर वह सारी बात बताती हैं।
यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देवकन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।
इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं।
आगे की कथा तो जगजाहिर है। यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है।
"पर पता नहीं, स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र उपेक्षित क्यूं रह गया।
गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011
सामने वाले सौदेबाजों को क्यों नहीं सालता सरकार गिरने का डर ?
जब इतने बड़े देश का मुखिया दीन-हीन बन कर ऐसी भाषा का प्रयोग करे जिसमें पूरी तरह हताशा, निराशा और कमजोरी झलकती हो तो देश की जनता कितनी निराश होगी कोई भी सोच सकता है।
देश का सबसे ताकतवर इंसान यह कहता है कि गठबंधन में समझौते करने पड़ते हैं, पर यह कैसा समझौता है कि आओ हमारी पार्टी की सरकार बनवाओ और इसके बदले में देश को लूट कर खा जाओ। यदि गठबंधन टूटने पर सरकार गिरने का ड़र आपको सालता है तो सामने वाले सौदेबाजों को भी तो मालुम है कि ऐसा होने पर वे कहीं के नहीं रहेंगे। बात तो तब होती जब आप उनके आगे झुकने से बेहतर उन्हें धमकी देते कि मैं किसी भी हालत में नाजायज मांगें स्वीकार नहीं करूंगा चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। इस पर यदि बात नहीं बनती तो फिर जनता के सामने सारी हकीकत रख फिर जनादेश के लिए चुनाव करवाना देश पर उतना भारी नहीं पड़ता जितना एक निरंकुश इंसान ने अकेले हड़प लिया। इस पर सारे देश के सामने आपकी छवि और निखर कर सामने आती।
भले ही ईमानदारी से गलती मान कर अपना पक्ष सही ठहराने की आपके द्वारा कोशिश की गयी हो पर यह सब बातें किसी के गले नहीं उतरी है। आपके सामने भ्रष्टाचार का नंगा नाच होता रहा और उसके कारण को जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहना और फिर कहना कि मैं मजबूर था। सामने वाले ने आपको समझा दिया कि सब नियमानुसार हो रहा है और आपका आंख मूंद कर बैठ जाना। अरबों की हेरा-फेरी हो रही हो और अर्थशास्त्री होने पर भी भनक ना लगना। कोई कैसे विश्वास कर पाएगा इन बातों पर। फिर अब सारा दोष दूसरों पर मढना। गठबंधन की मजबूरियां गिनाना। अब आप ही बताएं कि यदि आप ही मजबूर और लाचार हैं तो ताकतवर और सक्षम कौन है?
देश का सबसे ताकतवर इंसान यह कहता है कि गठबंधन में समझौते करने पड़ते हैं, पर यह कैसा समझौता है कि आओ हमारी पार्टी की सरकार बनवाओ और इसके बदले में देश को लूट कर खा जाओ। यदि गठबंधन टूटने पर सरकार गिरने का ड़र आपको सालता है तो सामने वाले सौदेबाजों को भी तो मालुम है कि ऐसा होने पर वे कहीं के नहीं रहेंगे। बात तो तब होती जब आप उनके आगे झुकने से बेहतर उन्हें धमकी देते कि मैं किसी भी हालत में नाजायज मांगें स्वीकार नहीं करूंगा चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। इस पर यदि बात नहीं बनती तो फिर जनता के सामने सारी हकीकत रख फिर जनादेश के लिए चुनाव करवाना देश पर उतना भारी नहीं पड़ता जितना एक निरंकुश इंसान ने अकेले हड़प लिया। इस पर सारे देश के सामने आपकी छवि और निखर कर सामने आती।
भले ही ईमानदारी से गलती मान कर अपना पक्ष सही ठहराने की आपके द्वारा कोशिश की गयी हो पर यह सब बातें किसी के गले नहीं उतरी है। आपके सामने भ्रष्टाचार का नंगा नाच होता रहा और उसके कारण को जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहना और फिर कहना कि मैं मजबूर था। सामने वाले ने आपको समझा दिया कि सब नियमानुसार हो रहा है और आपका आंख मूंद कर बैठ जाना। अरबों की हेरा-फेरी हो रही हो और अर्थशास्त्री होने पर भी भनक ना लगना। कोई कैसे विश्वास कर पाएगा इन बातों पर। फिर अब सारा दोष दूसरों पर मढना। गठबंधन की मजबूरियां गिनाना। अब आप ही बताएं कि यदि आप ही मजबूर और लाचार हैं तो ताकतवर और सक्षम कौन है?
बुधवार, 16 फ़रवरी 2011
एक युवक ने जब महिला सौन्दर्य प्रतियोगिता जीती.
साल - 1932, स्थान - जरमनी का कार्ल स्वार्ड शहर, मौका - महिलाओं की सौंदर्य प्रतियोगिता का। उन दिनों प्रतियोगियों को बिना किसी पूर्व जांच के सीधे स्टेज पर पहुंच जाना होता था।
समयानुसार ताम-झाम के साथ प्रतियोगिता शुरु हुई। युवतियां स्टेज की एक तरफ से आतीं चहलकदमी के बाद दूसरी तरफ उतर जाती। जज अपनी-अपनी जगह पर बैठे हर प्रतियोगी को विभिन्न पहलुओं से आंकने और मुल्यांकन करने में लगे थे। युवती के मंच पर पदार्पण करते ही बड़ी रोचक शैली में उसका परिचय उपस्थित लोगों तक पहुंचाया जा रहा था।
करीब चालीस युवतियों की 'बिल्ली चाल' खत्म होने पर निर्णायक मंडल ने अपनी-अपनी अंक तालिका को मिलाया और कुछ देर मे सूई पटक सन्नाटे को तोड़ते हुए विजेता के नाम की घोषणा कर दी। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बेहद खूबसूरत, सुनहरे बालों वाली उस दिन की विजेता 'स्पोटेश कार्ल मारिशका' मंच पर नमूदार हुई। वह हर दृष्टि और हरेक की राय में उस दिन के खिताब की हकदार थी। उसने मंच पर आते ही दर्शकों और निर्णायक मंडल का अभिवादन किया। उसे ताज पहनाने के बाद दो शब्द कहने का आग्रह किया गया जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर माइक अपने हाथों में लिया और बोली "इस सम्मान को पा मैं बहुत गौर्वांन्वित हूं। किसी के लिए भी इस सम्मान को पाना गर्व का विषय हो सकता है"।
कुछ देर रुक कर वह फिर बोली "फिर भी एक सच्चाई आप सब को बताना मेरा फर्ज है। सच्चाई यह है कि मं लड़की ना हो कर लड़का हूँ " ।
इतना कह कर उसने अपने नकली बाल और स्त्रियोचित पोषाक उतार दी। अब लोगों के सामने एक सुंदर युवक खड़ा था। भौंचक्के दर्शक और आयोजक जब तक कुछ समझ पाते तब तक वह मंच से कूद कर नौ-दो-ग्यारह हो चुका था।
वैसे एक बार और भी एक पुरुष ने महिलाओं के लिए आयोजित सौंदर्य प्रतियोगिता को जीता है पर वह इस समानता के युग में आधिकारिक रूप से उस प्रतियोगिता में शामिल हुआ था।
तो महिलाओं का इस बारे में क्या विचार है ? :-)
समयानुसार ताम-झाम के साथ प्रतियोगिता शुरु हुई। युवतियां स्टेज की एक तरफ से आतीं चहलकदमी के बाद दूसरी तरफ उतर जाती। जज अपनी-अपनी जगह पर बैठे हर प्रतियोगी को विभिन्न पहलुओं से आंकने और मुल्यांकन करने में लगे थे। युवती के मंच पर पदार्पण करते ही बड़ी रोचक शैली में उसका परिचय उपस्थित लोगों तक पहुंचाया जा रहा था।
करीब चालीस युवतियों की 'बिल्ली चाल' खत्म होने पर निर्णायक मंडल ने अपनी-अपनी अंक तालिका को मिलाया और कुछ देर मे सूई पटक सन्नाटे को तोड़ते हुए विजेता के नाम की घोषणा कर दी। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बेहद खूबसूरत, सुनहरे बालों वाली उस दिन की विजेता 'स्पोटेश कार्ल मारिशका' मंच पर नमूदार हुई। वह हर दृष्टि और हरेक की राय में उस दिन के खिताब की हकदार थी। उसने मंच पर आते ही दर्शकों और निर्णायक मंडल का अभिवादन किया। उसे ताज पहनाने के बाद दो शब्द कहने का आग्रह किया गया जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर माइक अपने हाथों में लिया और बोली "इस सम्मान को पा मैं बहुत गौर्वांन्वित हूं। किसी के लिए भी इस सम्मान को पाना गर्व का विषय हो सकता है"।
कुछ देर रुक कर वह फिर बोली "फिर भी एक सच्चाई आप सब को बताना मेरा फर्ज है। सच्चाई यह है कि मं लड़की ना हो कर लड़का हूँ " ।
इतना कह कर उसने अपने नकली बाल और स्त्रियोचित पोषाक उतार दी। अब लोगों के सामने एक सुंदर युवक खड़ा था। भौंचक्के दर्शक और आयोजक जब तक कुछ समझ पाते तब तक वह मंच से कूद कर नौ-दो-ग्यारह हो चुका था।
वैसे एक बार और भी एक पुरुष ने महिलाओं के लिए आयोजित सौंदर्य प्रतियोगिता को जीता है पर वह इस समानता के युग में आधिकारिक रूप से उस प्रतियोगिता में शामिल हुआ था।
तो महिलाओं का इस बारे में क्या विचार है ? :-)
सोमवार, 14 फ़रवरी 2011
घटनाएं, जिन्होंने विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों को जन्म दिया
कथाकारों को अपनी रचनाओं के लिए अक्सर प्रेरणा समाज से ही मिलती है। आसपास का परिवेश, लोग, घटनाएं कहीं ना कहीं लेखक के लेखन में सहायक होती रही हैं। जैसे :-
एलेग्जेंड़र मिल्कर्क स्काटलैंड़ का रहने वाला एक नाविक था। अपने जीवनकाल में उसने ढेरों समुद्री यात्राएं कीं थीं। एक बार ऐसी ही एक यात्रा में उसका पोत दुर्घटनाग्रस्त हो सागर में डूब गया। किसी तरह बड़ी मुश्किल से उसने एक सुनसान द्वीप पर पहुंच कर अपनी जान बचाई। पर वहां से निकलने का कोई उपाय नहीं होने के कारण उसे वहां करीब साढे चार साल तक फंसा रहना पड़ा था। बाद में जब वह किसी तरह इंग्लैंड़ पहुंचा तो उसकी इस आपबीती को प्रसिद्ध लेखक ड़ेनियल ड़ेफियो ने सुना और इसी के आधार पर विश्व प्रसिद्ध उपन्यास "राबिनसन क्रूसो" का जन्म हुआ।
प्रसिद्ध लेखक लुई स्टेवेंसन ने अपने लोकप्रिय उपन्यास " स्ट्रेंज केस आफ डा. जेकल एंड मि. हाइड़" एक सच्ची घटना को आधार बना लिखा था। हुआ यूं कि एक बार एक गिरोह पुलिस के हत्थे चढा जिसके सदस्य नकाब पहन कर चोरियां किया करते थे। उनमें का एक सदस्य था, विलियम ब्रोड़ी, जो कि एक सभ्रांत नागरिक था। समाज में उसकी बहुत इज्जत थी। उसी के दोहरे व्यक्तित्व को आधार बना यह कथा रची गयी।
ऐसा ही एक और उपन्यास है "मादाम बोवारी"। जिसकी प्रेरणा स्रोत थी, डेल्फिन डेलामार नाम की उच्च घराने की एक बेहद खूबसूरत लड़की। महत्वाकंक्षा उसमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। उसका एक ही उद्देश्य था, जीवन का भरपूर उपभोग करना। उसकी शादी एक डाक्टर से हुई थी, जो शहर से दूर गावों में रह कर जरूरतमंदों की सेवा करना चाहता था। डेलामार दिलफेंक युवती थी। उसके बहुतेरे पुरुष मित्र थे। फिर भी उसकी जिंदगी में सकून नहीं था। धीरे-धीरे वह कुंठा में डूबी रहने लगी और अंत में उसने आत्महत्या कर ली।
मशहूर लेखक गुस्ताओ फिलाबेर ने उसी की जिंदगी को आधार बना अपने उपन्यास की रचना कर डाली।
एलेग्जेंड़र मिल्कर्क स्काटलैंड़ का रहने वाला एक नाविक था। अपने जीवनकाल में उसने ढेरों समुद्री यात्राएं कीं थीं। एक बार ऐसी ही एक यात्रा में उसका पोत दुर्घटनाग्रस्त हो सागर में डूब गया। किसी तरह बड़ी मुश्किल से उसने एक सुनसान द्वीप पर पहुंच कर अपनी जान बचाई। पर वहां से निकलने का कोई उपाय नहीं होने के कारण उसे वहां करीब साढे चार साल तक फंसा रहना पड़ा था। बाद में जब वह किसी तरह इंग्लैंड़ पहुंचा तो उसकी इस आपबीती को प्रसिद्ध लेखक ड़ेनियल ड़ेफियो ने सुना और इसी के आधार पर विश्व प्रसिद्ध उपन्यास "राबिनसन क्रूसो" का जन्म हुआ।
प्रसिद्ध लेखक लुई स्टेवेंसन ने अपने लोकप्रिय उपन्यास " स्ट्रेंज केस आफ डा. जेकल एंड मि. हाइड़" एक सच्ची घटना को आधार बना लिखा था। हुआ यूं कि एक बार एक गिरोह पुलिस के हत्थे चढा जिसके सदस्य नकाब पहन कर चोरियां किया करते थे। उनमें का एक सदस्य था, विलियम ब्रोड़ी, जो कि एक सभ्रांत नागरिक था। समाज में उसकी बहुत इज्जत थी। उसी के दोहरे व्यक्तित्व को आधार बना यह कथा रची गयी।
ऐसा ही एक और उपन्यास है "मादाम बोवारी"। जिसकी प्रेरणा स्रोत थी, डेल्फिन डेलामार नाम की उच्च घराने की एक बेहद खूबसूरत लड़की। महत्वाकंक्षा उसमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। उसका एक ही उद्देश्य था, जीवन का भरपूर उपभोग करना। उसकी शादी एक डाक्टर से हुई थी, जो शहर से दूर गावों में रह कर जरूरतमंदों की सेवा करना चाहता था। डेलामार दिलफेंक युवती थी। उसके बहुतेरे पुरुष मित्र थे। फिर भी उसकी जिंदगी में सकून नहीं था। धीरे-धीरे वह कुंठा में डूबी रहने लगी और अंत में उसने आत्महत्या कर ली।
मशहूर लेखक गुस्ताओ फिलाबेर ने उसी की जिंदगी को आधार बना अपने उपन्यास की रचना कर डाली।
रविवार, 13 फ़रवरी 2011
यह "त्रिशंकु" कौन था ?
देवराज इंद्र इस गलत परंपरा से बहुत क्रोधित थे सो इसके निवारण हेतु उन्होंने सत्यव्रत को फिर नीचे की ओर ढकेल दिया। अब ऋषी के तपोबल और देव प्रकोप के कारण सत्यव्रत कहीं का ना रहा।
सत्ता और धन आज से नहीं हजारों-हजार साल से मनुष्य के दिमाग को विकृत करते आए हैं। फिर उस असंतुलित दिमाग ने अपने स्वामी को अहम से भर सनकी बना अजीबोगरीब काम या फैसले करने पर मजबूर
किया है। ऐसा ही एक चरित्र है "त्रिशंकु"। जिसका असली नाम था सत्यव्रत। सूर्यवंशी राजा सत्यव्रत। उस पर प्रभू की असीम कृपा थी। यश चारों ओर फैला हुआ था। सब ठीक-ठाक था पर उसे कुछ अनोखा करने की इच्छा सदा बनी रहती थी। अचानक एक दिन उसके दिमाग में एक कीडा कुलबुलाया और एक सनक ने जन्म लिया कि मुझे सशरीर स्वर्ग जाना है। बस फिर क्या था इस प्रयोजन के लिए उसने विशेष यज्ञ की तैयारी कर अपने कुलगुरु ऋषी वसिष्ठ को यज्ञ का संचालन करने को कहा। पर वसिष्ठ ने इस प्रकृति विरुद्ध कार्य को करने से इंकार कर दिया। राजा पर तो सनक सवार थी उसने ऋषी वसिष्ठ के पुत्रों के पास जा उनसे इस कार्य को संपन्न करवाने को कहा। पर वे भी इस गलत परंपरा को डालने को किसी भी प्रकार राजी नहीं हुए। समझाने पर भी राजा ने उनकी बात नहीं मानी और उन्हें बुरा-भला कहने लगा जिससे ऋषी पुत्रों को क्रोध आ गया और उन्होंने उसे चांडाल बन जाने का श्राप दे डाला। उसी क्षण राजा की कांति मलिन हो गयी और वह श्रीहीन हो गया। पर उसने भी हठ नहीं छोड़ा और उसी अवस्था में वह ऋषी विश्वामित्र के पास गया और सारी बात बता अपना यज्ञ पूरा करने की प्रार्थना करने लगा। उसका हाल देख ऋषी द्रवित हो गये और उन्होंने यज्ञ संचालित करने की स्वीकृति दे दी। यज्ञ में शामिल होने के लिए सारे ब्राह्मणों को आमंत्रंण भेजा गया पर वसिष्ठ पुत्रों ने यह कह कर आने से इंकार कर दिया कि ब्राह्मण कुल के हो कर वे किसी चांडाल के यज्ञ में भाग नहीं ले सकते जब कि वह यज्ञ भी एक ब्राह्मण द्वारा संचालित ना हो कर एक क्षत्रीय द्वारा किया जा रहा हो। उनके इन कटु वचनों से क्रुद्ध हो कर विश्वामित्र ने उन्हें भस्म हो जाने और अगले जन्म में चांडाल योनि में जन्मने का श्राप दे डाला। फिर उन्होंने यज्ञ पूरा किया और अपने तपोबल से राजा सत्यव्रत को सदेह स्वर्ग भिजवा दिया।
उधर देवराज इंद्र इस गलत परंपरा से बहुत क्रोधित थे सो इसके निवारण हेतु उन्होंने सत्यव्रत को फिर नीचे की ओर ढकेल दिया। अब ऋषी के तपोबल और देव प्रकोप के कारण सत्यव्रत कहीं का ना रहा।
कहते हैं आज भी वह धरती और आकाश के बीच त्रिशंकु बन लटका हुआ है।
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