pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

सामने वाले सौदेबाजों को क्यों नहीं सालता सरकार गिरने का डर ?

जब इतने बड़े देश का मुखिया दीन-हीन बन कर ऐसी भाषा का प्रयोग करे जिसमें पूरी तरह हताशा, निराशा और कमजोरी झलकती हो तो देश की जनता कितनी निराश होगी कोई भी सोच सकता है।

देश का सबसे ताकतवर इंसान यह कहता है कि गठबंधन में समझौते करने पड़ते हैं, पर यह कैसा समझौता है कि आओ हमारी पार्टी की सरकार बनवाओ और इसके बदले में देश को लूट कर खा जाओ। यदि गठबंधन टूटने पर सरकार गिरने का ड़र आपको सालता है तो सामने वाले सौदेबाजों को भी तो मालुम है कि ऐसा होने पर वे कहीं के नहीं रहेंगे। बात तो तब होती जब आप उनके आगे झुकने से बेहतर उन्हें धमकी देते कि मैं किसी भी हालत में नाजायज मांगें स्वीकार नहीं करूंगा चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। इस पर यदि बात नहीं बनती तो फिर जनता के सामने सारी हकीकत रख फिर जनादेश के लिए चुनाव करवाना देश पर उतना भारी नहीं पड़ता जितना एक निरंकुश इंसान ने अकेले हड़प लिया। इस पर सारे देश के सामने आपकी छवि और निखर कर सामने आती।

भले ही ईमानदारी से गलती मान कर अपना पक्ष सही ठहराने की आपके द्वारा कोशिश की गयी हो पर यह सब बातें किसी के गले नहीं उतरी है। आपके सामने भ्रष्टाचार का नंगा नाच होता रहा और उसके कारण को जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहना और फिर कहना कि मैं मजबूर था। सामने वाले ने आपको समझा दिया कि सब नियमानुसार हो रहा है और आपका आंख मूंद कर बैठ जाना। अरबों की हेरा-फेरी हो रही हो और अर्थशास्त्री होने पर भी भनक ना लगना। कोई कैसे विश्वास कर पाएगा इन बातों पर। फिर अब सारा दोष दूसरों पर मढना। गठबंधन की मजबूरियां गिनाना। अब आप ही बताएं कि यदि आप ही मजबूर और लाचार हैं तो ताकतवर और सक्षम कौन है?

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

एक युवक ने जब महिला सौन्दर्य प्रतियोगिता जीती.

साल - 1932, स्थान - जरमनी का कार्ल स्वार्ड शहर, मौका - महिलाओं की सौंदर्य प्रतियोगिता का। उन दिनों प्रतियोगियों को बिना किसी पूर्व जांच के सीधे स्टेज पर पहुंच जाना होता था।

समयानुसार ताम-झाम के साथ प्रतियोगिता शुरु हुई। युवतियां स्टेज की एक तरफ से आतीं चहलकदमी के बाद दूसरी तरफ उतर जाती। जज अपनी-अपनी जगह पर बैठे हर प्रतियोगी को विभिन्न पहलुओं से आंकने और मुल्यांकन करने में लगे थे। युवती के मंच पर पदार्पण करते ही बड़ी रोचक शैली में उसका परिचय उपस्थित लोगों तक पहुंचाया जा रहा था।

करीब चालीस युवतियों की 'बिल्ली चाल' खत्म होने पर निर्णायक मंडल ने अपनी-अपनी अंक तालिका को मिलाया और कुछ देर मे सूई पटक सन्नाटे को तोड़ते हुए विजेता के नाम की घोषणा कर दी। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बेहद खूबसूरत, सुनहरे बालों वाली उस दिन की विजेता 'स्पोटेश कार्ल मारिशका' मंच पर नमूदार हुई। वह हर दृष्टि और हरेक की राय में उस दिन के खिताब की हकदार थी। उसने मंच पर आते ही दर्शकों और निर्णायक मंडल का अभिवादन किया। उसे ताज पहनाने के बाद दो शब्द कहने का आग्रह किया गया जिसे उसने सहर्ष स्वीकार कर माइक अपने हाथों में लिया और बोली "इस सम्मान को पा मैं बहुत गौर्वांन्वित हूं। किसी के लिए भी इस सम्मान को पाना गर्व का विषय हो सकता है"।
कुछ देर रुक कर वह फिर बोली "फिर भी एक सच्चाई आप सब को बताना मेरा फर्ज है। सच्चाई यह है कि मं लड़की ना हो कर लड़का हूँ " ।
इतना कह कर उसने अपने नकली बाल और स्त्रियोचित पोषाक उतार दी। अब लोगों के सामने एक सुंदर युवक खड़ा था। भौंचक्के दर्शक और आयोजक जब तक कुछ समझ पाते तब तक वह मंच से कूद कर नौ-दो-ग्यारह हो चुका था।

वैसे एक बार और भी एक पुरुष ने महिलाओं के लिए आयोजित सौंदर्य प्रतियोगिता को जीता है पर वह इस समानता के युग में आधिकारिक रूप से उस प्रतियोगिता में शामिल हुआ था।

तो महिलाओं का इस बारे में क्या विचार है ? :-)

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

घटनाएं, जिन्होंने विश्व प्रसिद्ध उपन्यासों को जन्म दिया

कथाकारों को अपनी रचनाओं के लिए अक्सर प्रेरणा समाज से ही मिलती है। आसपास का परिवेश, लोग, घटनाएं कहीं ना कहीं लेखक के लेखन में सहायक होती रही हैं। जैसे :-

एलेग्जेंड़र मिल्कर्क स्काटलैंड़ का रहने वाला एक नाविक था। अपने जीवनकाल में उसने ढेरों समुद्री यात्राएं कीं थीं। एक बार ऐसी ही एक यात्रा में उसका पोत दुर्घटनाग्रस्त हो सागर में डूब गया। किसी तरह बड़ी मुश्किल से उसने एक सुनसान द्वीप पर पहुंच कर अपनी जान बचाई। पर वहां से निकलने का कोई उपाय नहीं होने के कारण उसे वहां करीब साढे चार साल तक फंसा रहना पड़ा था। बाद में जब वह किसी तरह इंग्लैंड़ पहुंचा तो उसकी इस आपबीती को प्रसिद्ध लेखक ड़ेनियल ड़ेफियो ने सुना और इसी के आधार पर विश्व प्रसिद्ध उपन्यास "राबिनसन क्रूसो" का जन्म हुआ।
प्रसिद्ध लेखक लुई स्टेवेंसन ने अपने लोकप्रिय उपन्यास " स्ट्रेंज केस आफ डा. जेकल एंड मि. हाइड़" एक सच्ची घटना को आधार बना लिखा था। हुआ यूं कि एक बार एक गिरोह पुलिस के हत्थे चढा जिसके सदस्य नकाब पहन कर चोरियां किया करते थे। उनमें का एक सदस्य था, विलियम ब्रोड़ी, जो कि एक सभ्रांत नागरिक था। समाज में उसकी बहुत इज्जत थी। उसी के दोहरे व्यक्तित्व को आधार बना यह कथा रची गयी।

ऐसा ही एक और उपन्यास है "मादाम बोवारी"। जिसकी प्रेरणा स्रोत थी, डेल्फिन डेलामार नाम की उच्च घराने की एक बेहद खूबसूरत लड़की। महत्वाकंक्षा उसमें कूट-कूट कर भरी हुई थी। उसका एक ही उद्देश्य था, जीवन का भरपूर उपभोग करना। उसकी शादी एक डाक्टर से हुई थी, जो शहर से दूर गावों में रह कर जरूरतमंदों की सेवा करना चाहता था। डेलामार दिलफेंक युवती थी। उसके बहुतेरे पुरुष मित्र थे। फिर भी उसकी जिंदगी में सकून नहीं था। धीरे-धीरे वह कुंठा में डूबी रहने लगी और अंत में उसने आत्महत्या कर ली।
मशहूर लेखक गुस्ताओ फिलाबेर ने उसी की जिंदगी को आधार बना अपने उपन्यास की रचना कर डाली।

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

यह "त्रिशंकु" कौन था ?

देवराज इंद्र इस गलत परंपरा से बहुत क्रोधित थे सो इसके निवारण हेतु उन्होंने सत्यव्रत को फिर नीचे की ओर ढकेल दिया। अब ऋषी के तपोबल और देव प्रकोप के कारण सत्यव्रत कहीं का ना रहा।

सत्ता और धन आज से नहीं हजारों-हजार साल से मनुष्य के दिमाग को विकृत करते आए हैं। फिर उस असंतुलित दिमाग ने  अपने स्वामी को अहम से भर सनकी बना अजीबोगरीब काम या फैसले  करने पर मजबूर
किया है। ऐसा ही एक चरित्र है   "त्रिशंकु"।    जिसका असली नाम था सत्यव्रत। सूर्यवंशी राजा सत्यव्रत। उस पर प्रभू की असीम कृपा थी। यश चारों ओर फैला हुआ था। सब ठीक-ठाक था पर उसे कुछ अनोखा करने की इच्छा सदा बनी रहती थी। अचानक एक दिन उसके दिमाग में एक कीडा कुलबुलाया और एक सनक ने जन्म लिया कि मुझे सशरीर स्वर्ग जाना है। बस फिर क्या था इस प्रयोजन के लिए उसने विशेष यज्ञ की तैयारी कर अपने कुलगुरु ऋषी वसिष्ठ को यज्ञ का संचालन करने को कहा। पर वसिष्ठ ने इस प्रकृति विरुद्ध कार्य को करने से इंकार कर दिया। राजा पर तो सनक सवार थी उसने ऋषी वसिष्ठ के पुत्रों के पास जा उनसे इस कार्य को संपन्न करवाने को कहा। पर वे भी इस गलत परंपरा को डालने को किसी भी प्रकार राजी नहीं हुए। समझाने पर भी राजा ने उनकी बात नहीं मानी और उन्हें बुरा-भला कहने लगा जिससे ऋषी पुत्रों को क्रोध आ गया और उन्होंने उसे चांडाल बन जाने का श्राप दे डाला। उसी क्षण राजा की कांति मलिन हो गयी और वह श्रीहीन हो गया। पर उसने भी हठ नहीं छोड़ा और उसी अवस्था में वह ऋषी विश्वामित्र के पास गया और सारी बात बता अपना यज्ञ पूरा करने की प्रार्थना करने लगा। उसका हाल देख ऋषी द्रवित हो गये और उन्होंने यज्ञ संचालित करने की स्वीकृति दे दी। यज्ञ में शामिल होने के लिए सारे ब्राह्मणों को आमंत्रंण भेजा गया पर वसिष्ठ पुत्रों ने यह कह कर आने से इंकार कर दिया कि ब्राह्मण कुल के हो कर वे किसी चांडाल के यज्ञ में भाग नहीं ले सकते जब कि वह यज्ञ भी एक ब्राह्मण द्वारा संचालित ना हो कर एक क्षत्रीय द्वारा किया जा रहा हो। उनके इन कटु वचनों से क्रुद्ध हो कर विश्वामित्र ने उन्हें भस्म हो जाने और अगले जन्म में चांडाल योनि में जन्मने का श्राप दे डाला। फिर उन्होंने यज्ञ पूरा किया और अपने तपोबल से राजा सत्यव्रत को सदेह स्वर्ग भिजवा दिया।

उधर देवराज इंद्र इस गलत परंपरा से बहुत क्रोधित थे सो इसके निवारण हेतु उन्होंने सत्यव्रत को फिर नीचे की ओर ढकेल दिया। अब ऋषी के तपोबल और देव प्रकोप के कारण सत्यव्रत कहीं का ना रहा।

कहते हैं आज भी वह धरती और आकाश के बीच त्रिशंकु बन लटका हुआ है।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

बाहर वाले भी हमारी बेवकूफी पर हंसते होंगे

स्विस बैंक के एक प्रबन्धक ने भारत की अर्थ व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत की जनता गरीब हो सकती है पर देश गरीब नहीं है। उसने आगे कहा कि वहां का इतना पैसा स्विस बैंकों में जमा है जिससे :-

# भारत सरकार 30 सालों तक बिना टैक्स का बजट पेश कर सकती है।

# 60 करोड़ नौकरियां वहां उपलब्ध करवा सकती है।

# दिल्ली से देश के हर गांव तक 4 लेन सड़क बनवा सकती है।

# बिजली की अनवरत सप्लाई की जा सकती है।

# वहां के हर नागरिक को साठ साल तक 2000 रुपये दे सकती है।

# ऐसे देश को किसी भी वर्ल्ड बैंक या कर्ज की कोई जरूरत नहीं पड़ सकती।

यह कहना था वर्ल्ड बैंक के एक जिम्मेदार अधिकारी का। जरा गंभीरता से सोचिये कि भ्रष्टता की यह कौन सी सीमा है। ऐसी कौन सी मजबूरी है सरकार पर या वह कौन सी ताकते हैं जिनके सामने किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही कुछ करने की और उस धन को वापस लाने की।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

क्षीण होती जाती है स्पर्श शक्ति भी धूम्रपान से

धूम्रपान की ढेर सारी बुराइयों में एक यह भी है कि इससे शरीर की स्पर्श शक्ति भी क्षीण होती चली जाती है। अमेरिका के वैज्ञानिकों के परीक्षण मे यह बात सामने आई है। उन्होंने युवकों के दो दल बनाए, एक में वे लोग थे जो सिगरेट नहीं पीते थे तथा दूसरे में वे जो इसके आदी थे। फिर एक लोहे की राड़ को हल्का गर्म कर बारी-बारी से दोनों दलों को पकड़ने को कहा गया। जो धूम्रपान नहीं करते थे उन्होंने सलाख की गर्मी को तुरंत महसूस किया। इसके विपरीत धूएं का सेवन करने वालों को किसी भी तरह की गरमाहट का आभास नहीं हुआ।
इसका एक और भी निष्कर्ष निकाला गया कि ज्यादा धूम्रपान करने वालों को ह्रदयाघात का दर्द महसूस नहीं होता जिससे रोग का निदान जल्द ना होने से समय पर इलाज नहीं हो पाता जो जानलेवा भी हो जाता है।
इसका दुष्प्रभाव हाथ की उन ऊंगलियों पर भी अपना प्रकोप ड़ालता है जिनमें सिगरेट ज्यादा देर तक फंसी रहती है। उसकी गर्मी त्वचा की संवेदना को खत्म कर देती है।


# चर्चिल सिगार बहुत पीते थे। एक बार किसी ने उनसे कहा, "इतना धूम्रपान आपको धीरे-धीरे मौत की ओर ले जा रहा है।"
चर्चिल ने तुरंत जवाब दिया "मुझे भी कोई जल्दी नहीं है"

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

समय रहते चेत जाओ नहीं तो चेतने के लिए भी समय नहीं मिलेगा

प्रकृति का प्रकोप या अनहोनी अचानक ही नहीं घटित हो जाती। बहुत पहले से वह अपने अच्छे-बुरे बदलाव का आभास देने लग जाती है। ऐसे ही एक बदलाव की पदचाप दूर से आती महसूस होने लगी है।

भ्रष्टाचार, तानाशाही, मंहगाई की मार से दूभर होती जिंदगी से देश का नागरिक त्रस्त है। अपने सामने गलत लोगों को गलत तरीके से धनाढ्य होते और उस धनबल से हर क्षेत्र में अपनी मनमानी करते और इधर खुद और अपने परिवार की जिंदगी दिन प्रति दिन दुश्वार होते देख अब एक आक्रोश उसके दिलो-दिमाग में जगह बनाता जा रहा है। यदि इसका कहीं विस्फोट हो गया तो ऐसे भ्रष्ट धनकुबेरों का क्या हश्र होगा तथा उनके संरक्षक किस बिल को ढूंढेंगे अपना अस्तित्व बचाने के लिए इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एक पुरानी कहानी है। एक मठ में कुछ संत रहते हुए ध्यान-पूजन किया करते थे। बाकी तो सब ठीक था पर एक चूहा उन सब को बहुत परेशान किए रहता था। जितने संभव उपाय थे वह सब किए जा चुके थे पर वह इतना निड़र और उद्दंड था कि किसी के भी काबू नहीं आता था। दिन प्रति दिन उसका उत्पात बढता ही जा रहा था। एक दिन उसी मठ में एक संत आए। बातों ही बातों में उन्हें उस आतातायी चूहे के बारे में भी पता चला। सारी बातें जानने के बाद उन्होंने कहा कि उस चूहे को स्वर्णबल प्राप्त है। उसका बिल खोदा जाए। जब चूहे का बिल खोदा गया तो वहां स्वर्ण का भंडार मिला। जिसे जनहितार्थ खर्च कर दिया गया। उस दिन के बाद से वह चूहा, चूहा बन कर ही रह गया।

ऐसे ही हमारे तथाकथित जनसेवकों का अकूत धन विदेशों की दिवारों में दफन है। पर उसके बल पर यहां 'ये' तो ये इनके लगे-बधें भी ओछी हरकतें करने से बाज नहीं आते। इन्हें किसी भी तरह का ड़र नहीं व्यापता चाहे वह पुलिस हो या न्यायालय। पर अब इन कुछ मुट्ठी भर अमीर लोगों के गरीब देश के निरीह वाशिंदों का दिलो-दिमाग अब और ना सह पाने के कारण आक्रोशित होने लगा है।

यह भी प्रकृति के उसी बदलाव के आगमन का सूचक है, जो आभास दे रहा है कि समय रहते चेत जाओ नहीं तो चेतने के लिए भी समय नहीं मिलेगा।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...