pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 31 जनवरी 2011

यह एवरेस्ट कौन थे ?

माउंट एवरेस्ट, दुनिया की सबसे ऊंची पहाड़ी चोटी। पर यह एवरेस्ट कौन थे जिनके नाम पर इस चोटी का नाम रखा गया ?

1830 से 1843 तक भारत के सर्वेयर जनरल रहे थे कर्नल सर जार्ज एवरेस्ट। आधुनिक भूगणितीय सर्वेक्षण की नींव भारत में उन्होंने ही रखी थी। दक्षिण की कन्याकुमारी से लेकर उत्तर की मसूरी तक हिमालयी पर्वत श्रेणी के वृत्तांश (meridional ark)को मापने जैसा असंभव सा कार्य सर्वप्रथम उन्होंने ही किया था। उनके इसी बहुमूल्य तथा मौलिक कार्य के कारण हिमालय के सर्वोच्च शिखर का नाम उनके नाम पर रखा गया था।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

एक और राष्ट्रीय दिवस "निपटा" सब लौट गए छुट्टी मनाने

एक और राष्ट्रीय दिवस निपटा घर लौट गये सब छुट्टी मनाने। जिस संस्था से जुडा हूं, वहां और किसी दिन जाओ न जाओ आज जाना बहुत जरूरी होता है। अपने को देश-भक्त सिद्ध करने के लिए। मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, एक तरफ साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन ने आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य किया और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। कमोबेश यही हाल सब जगह हैं।

आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और प्रेरक देशभक्ति की भावना सारे लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के ड़र से या और किसी मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। ऐसे दिन, वे चाहे गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। 

फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है।

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

औरों के लिए घुसपैठिए हमारे लिए भगवान

दुनिया वैसे चाहे जितनी छोटी होती जा रही हो पर फिर भी बटी पड़ी है तरह-तरह की सीमाओं में। जगह-जगह तरह-तरह की वर्जनांऐं मौजूद हैं। ऐसा नहीं है कि कोई किसी भी देश में ऐसे ही मनमर्जी से चला जाए और लौट आए। ठीक भी है, भाई उनका घर है ऐसे ही कैसे कोई मुंह उठाए चला जा सकता है। इसीलिए किसी भी देश में जाने-आने के लिए वहां की इजाजत लेना बहुत जरूरी होता है। लुके-छिपे, गैर कानूनी रूप से किसी भी देश में घुसने की कोशिश करने पर तरह-तरह के दंड़ों की व्यवस्था कर रखी है सभी ने।

जैसे :-

उत्तरी कोरिया की सीमा लांघने पर 12 साल के सश्रम कारावास का प्रावधान है। वह भी किसी सुनसान इलाके में।

ईरान में ऐसा करते पकड़े जाने पर उस व्यक्ति को असीमित समय के लिए कारावास में ठूंस दिया जाता है।

अफगानिस्तान में तो सीधे गोली मार दी जाती है।

अरबियन देशों में सश्रम कारावास सुना दिया जाता है।

चीन में जिसने ऐसा दुस्साहस किया वह तो ऐसा गायब कर दिया जाता है जिसका फिर कभी पता ही नहीं चलता।

वेनेजुएला में ऐसा करनेवाले को जासूस समझा जाता है और सीधे जेल की हवा खिला दी जाती है।

क्यूबा तो ऐसे ही खासा बदनाम रहा है। वहां ऐसे व्यक्ति को जेल में अमानुषिक यत्रंणाएं दी जाती हैं।

योरोप के देशों में जेल में रख कर मुकदमा चलाया जाता है।

चूँकि हम "अतिथि" को भगवान मानते हैं इसीलिए अपने देश में यदि कोई ऐसी हरकत करता है और थोड़ा सा भी 'चंट' होता है तो देखिए उसे क्या-क्या मिलता है -

*राशन कार्ड़, *पास पोर्ट, *पूरे देश में घूमने के लिए ड़्रायविंग लायसेंस, *वोटर आई.डी.,*क्रेडिट कार्ड़, *धार्मिक यात्राओं में किराए में भारी छूट, *नौकरी में आरक्षण, *सरकार द्वारा मुफ्त शिक्षा, दवा-दारू, घर, *कुछ भी बोलने की स्वतंत्रता, *अपने वोट द्वारा भ्रष्ट लोगों को चुनने की सहूलियत, जो जीत कर उनके हितों की रक्षा कर सकें।

क्या कुछ कहना चाहेंगे आप, इस बारे में ?

बुधवार, 26 जनवरी 2011

यहाँ प्रयुक्त "आप" को आप अन्यथा न लें

किसी से बात करते समय किसी का चेहरा भले ही सपाट रहे पर उसके हाव-भाव तथा "शारीरिक भाषा" उसकी बातों की सच्चाई व्यक्त कर ही देते हैं।

* क्या आप किसी से बात करते समय अनजाने में अपने मुंह या गर्दन को छूते रहते हैं ?

* क्या किसी से बात करते हुए आप अक्सर हकला जाते हैं ?

* क्या सामने वाले से बतियाते समय आप जबरन मुस्कुराने तो नहीं लग जाते ?

* क्या किसी को कुछ कहते हुए आपका गला तो नहीं रुंध जाता ?

* क्या सामने वाले को कोई बात बताते हुए आप उससे आंखें नहीं मिला पाते ?

* क्या किसी से बात करते हुए आप बार-बार अपने कंधे तो नहीं उचकाते ?

* क्या किसी से बात करते समय आपको अपना रक्त चाप बढ़ा हुआ लगता है ? या पसीना तो नहीं आ जाता ?

* किसी से बात करते हुए क्या आपकी आवाज तेज हो जाती है ?

* क्या आप किसी को कुछ बताते समय अपनी बात बार-बार दोहराते हैं ?

यदि ऐसा है तो माफी चाहूंगा :-) आप सामने वाले से झूठ बोल रहे हैं ।

वैसे झूठ बोलना हर समय गलत नहीं होता। किसी की रक्षा के लिए इसका उपयोग देवता भी करते आए हैं।
कहा भी गया है, प्रिय सत्य बोलिए। अप्रिय सत्य न बोलिए।
ऐसा शायद ही कोई इंसान होगा जिसने इसका सहारा न लिया हो। खोज बताती है कि राजनीति से जुड़े लोग इस मामले में सबसे आगे होते हैं। उसके बाद सेल्समैनों, वकीलों तथा अभिनेता/त्रियों की बारी आती है। कभी-कभी डाक्टर भी अपने मरीज के हित में झूठ बोल लेते हैं। सबसे कम इस विधा का उपयोग करने वालों में वैज्ञानिकों, स्थापत्यकारों और इंजीनियरों को शामिल किया गया है। इसका कारण भी है कि इनके मिथ्याभाषण को आसानी से पकड़ा जो जा सकता है।
एक बात और, विशेषज्ञों का कहना है कि स्त्रियाँ ज्यादा झूठ बोलती हैं ।
माफ कीजिएगा यह मैं नही न कह रहा हूँ :-)

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

पेहोवा या पृथूदक, एक प्राचीन तीर्थ स्थल

पेहोवा, भारत के प्राचीनतम स्थानों में से एक 'कुरुक्षेत्र' जहां महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, के पास का एक कस्बा है जो अब धीरे-धीरे छोटे शहर में तब्दील होता जा रहा है। कुरुक्षेत्र से 27 की. मी. तथा 'थानेसर' से 12 की.मी. की दूरी पर स्थित अपने धार्मिक मुल्यों के कारण यह तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात है। ऐसी धारणा है कि यहां प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसीलिए देश भर से लोग हरिद्वार में अस्थी विसर्जन करने के पश्चात यहां पिंड़-दान करने आते हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि किसी की मौत किसी दुर्घटना में, अस्पताल में या बिस्तर पर हुई हो तो उसकी क्रिया यहां करनी जरूरी होती है। यहां का नजदीकी रेल-स्टेशन कुरुक्षेत्र का है। सड़क मार्ग से ने.हाईवे ६५ द्वारा यह सारे देश से जुड़ा हुआ है।

कनिंघम ने इसे 882 ई.पू. का बताया है जबकि यहीं के एक मंदिर के शिलालेख में इसके 895 ई.पू. के होने का उल्लेख मिलता है।

ऋगवेद के अनुसार यहां का नामकरण राजा पृथू के नाम पर "पृथूदक" किया गया था। जो बदलते-बदलते अब "पेहोवा" के नाम से जाना जाता है। राजा पृथू ने अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए उनका अंतिम संस्कार यहीं पर किया था। जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। तभी से सद्गति के लिए लोग यहां अपने पूर्वजों का पिंड़ दान करते आ रहे हैं।

वामन पुराण और महाकाव्य महाभारत में भी इस स्थल की अपार महिमा का वर्णन मिलता है। यहां पर समय-समय पर किए गये उत्खनन और मंदिरों में लगे अभिलेखों से भी इस जगह के अति प्राचीन होने का प्रमाण मिलता रहा है।

विदेशी आतातायियों के आक्रमणों और विध्वसों का यहां के मंदिरों और पूजा स्थलों को भी सामना करना पड़ा था। पृथ्वीराज चौहान की महमूद गजनी के हाथों पराजय के बाद यह क्षेत्र पूरी तरह से मुसलमानों के कब्जे में चला गया था। पर मराठों के आगमन से यहां की स्थिति में फिर परिवर्तन आया। उसी दौर में सही मायनों में पृथूदक के धार्मिक महत्व की पुनर्स्थापना हो पाई। मराठों ने ही पृथूकेश्वर, सरस्वती तथा कार्तिकेय मंदिरों का जिर्णोद्धार करवाया।

पहले लोग सिर्फ कर्मकांड़ करवाने यहां जाते थे पर अब कुरुक्षेत्र जाने वाले लोग पृथूदक यानि पेहोवा भी पहुंचने लगे हैं।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

जब मेरे पास ख़त्म हो जाते हैं तो मैं भी पचास में देता हूँ

गांव का एक लड़का अपनी नयी-नयी साईकिल ले, शहर मे नये खुले माल में घूमने आया। स्टैंड में सायकिल रख जब काफ़ी देर बाद लौटा तो अपनी साईकिल को काफ़ी कोशिश के बाद भी नहीं खोज पाया। उसको याद ही नहीं आ रहा था कि उसने उसे कहां रखा था। उसकी आंखों में पानी भर आया। उसने सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना की कि हे प्रभू मेरी साईकिल मुझे दिलवा दो, मैं ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। दैवयोग से उसे एक तरफ़ खड़ी अपनी साईकिल दिख गयी। उसे ले वह तुरंत मंदिर पहुंचा, भगवान को धन्यवाद दे, प्रसाद चढ़ा, जब बाहर आया तो उसकी साईकिल नदारद थी।

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नमस्ते सर, मैं आपका पियानो ठीक करने आया हूं। पर मैने तो आप को नहीं बुलवाया। नहीं सर, आपके पडोसियों ने मुझे बुलवाया है।

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अरे भाई, ये सेव कैसे दिये। सर साठ रुपये किलो। पर वह तुम्हारा सामने वाला तो पचास में दे रहा है। तो सर उसीसे ले लिजीए। ले तो लेता पर उसके पास खत्म हो गये हैं। सर जब मेरे पास खत्म हो जाते हैं तो मैं भी पचास में देता हूं ।

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बेटे की नौकरी चेन्नाई मे लग गयी। अच्छी पगार थी, सो उसने पांच हजार की एक साडी माँ के लिये ले ली। पर वह माँ का स्वभाव जानता था, सो उसने साडी के साथ एक पत्र भी भेज दिया कि पहली पगार से यह साडी भेज रहा हूं, दिखने में मंहगी है पर सिर्फ़ दो हजार की है, कैसी लगी बतलाना।
अगले हफ़्ते ही माँ का फोन आ गया, बेटा खुश रहो। साडी बहुत ही अच्छी थी। मैने उसे तीन हजार में बेच दिया है, तुरंत वैसी दस साडियां और भिजवा दे, अच्छी मांग है।

रविवार, 23 जनवरी 2011

हम देसी घी को छोड़ कर हर विदेशी चीज पसंद करते हैं.

हम भारतीयों की एक विशेषता है कि हम देसी घी को छोड़ हर विदेशी चीज का आंख मूंद कर स्वागत, उपयोग तथा आदर करते हैं फिर चाहे वह विदेशी वस्तु, विचार या इंसान "रीडायरेक्ट" हो कर ही क्यूं ना हमारे पास आया हो।

हमारे ऋषी-मुनियों तथा विद्वानों ने अवाम की जिंदगी को सुंदर, सुखमय, निरोग बनाए रखने के लिए जितने उपाय हो सकते थे उन्हें खोज कर हमें सौंप दिया था। पर समय के साथ-साथ हमारी निष्ठा व सोच विदेशों की चकाचौंध में गुम होती चली गयी और हम राम में नहीं रामा में, कृष्ण में नहीं कृष्णा में, योग में नहीं योगा में, राग में नहीं रागा में सुख खोजने में खोते चले गये।

"बाजार" की ताकतें पुराने स्वरुपों को नये-नये "डिजाइनर" आवरणों में लपेट-लपेट कर फिर हमारे सामने पेश करती गयीं और हम आंख मूंद कर उन्हें अपनाने में गौरव महसूस करने लगे।

योरोप और अमेरिका की तो छोड़ें कल तक का अफीमची देश चीन भी आज हमारी इस कमजोरी का फायदा उठा अपने वतन वासियों को समृद्ध बनाने पर तुला हुआ है। खुद कम्युनिस्ट विचारधारा का होते हुए भी उसने हमारे पर्वों पर हमारे देवी-देवताओं की मुर्तियां बना-बना कर हमें बेच ड़ालीं और हम सस्ते में मिलते भगवान खुशी-खुशी घर ले आए। वहीं की एक देन है 'फेंगशुई'। जिसके पीछे आज हजारों लोग पागलों की तरह पड़ कर पता नहीं क्या-क्या सस्ती मंहगी चीजें ला-ला कर अपने घर को भरे जा रहे हैं।

इस चीनी ज्योतिष के कुछ नियम यहां दे रहा हूं आप बताएं कि इसमें ऐसा क्या है जो आप को पहले पता नहीं था या उस हिदायत का हम पालन ना करते हों।

फेंगशुई के अनुसार पांच तत्व होते हैं जिन्हें घर में ला कर रखना चाहिए, वे हैं - पृथ्वी, पानी, आग, धातु और लकड़ी। हमारे पंच तत्व में धातु और लकड़ी की जगह आकाश और वायु सम्मलित हैं। तो कौन ज्यादा प्रकृति के नजदीक हुआ।

फेंगशुई के अनुसार कुड़ा-कचरा इकट्ठा नहीं होना चाहिए, घर में चीजें व्यवस्थित होनी चाहिए, बेकार की वस्तुएं नहीं रखनी चाहिएं, रसोई घर तथा चुल्हा साफ-सुथरा होना चाहिए, वहां रोशनी तथा सामग्री प्रयाप्त मात्रा में होनी चाहिए। बाथरूम तथा टायलेट के दरवाजे सदा बंद रखने चाहिए। इत्यादि-इत्यादि।

मुद्दा यह है कि घर साफ सुथरा तथा व्यवस्थित हो। माहौल उल्लासमय हो। घर के दरो-दिवार खुशनुमा हों जिससे दिलो-दिमाग परेशानियों से मुक्ति पा सके, सोच सकारात्मक हो सके। ऐसी सोच ही हर बाधा से लड़ने की ताकत प्रदान करती है।

यह सब कहने का मेरा अभिप्राय फेंगशुई विधा को नीचा या बेकार ठहराना नहीं है। बाहर की किसी भी संस्कृति या ज्ञान की अच्छाईयों को अपनाना बुरी बात नहीं है। पर आंख मूंद कर आधी अधूरी जानकारी ले किसी के भी पीछे चल देना कोई अक्लमंदी भी नहीं है।

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