दुनिया वैसे चाहे जितनी छोटी होती जा रही हो पर फिर भी बटी पड़ी है तरह-तरह की सीमाओं में। जगह-जगह तरह-तरह की वर्जनांऐं मौजूद हैं। ऐसा नहीं है कि कोई किसी भी देश में ऐसे ही मनमर्जी से चला जाए और लौट आए। ठीक भी है, भाई उनका घर है ऐसे ही कैसे कोई मुंह उठाए चला जा सकता है। इसीलिए किसी भी देश में जाने-आने के लिए वहां की इजाजत लेना बहुत जरूरी होता है। लुके-छिपे, गैर कानूनी रूप से किसी भी देश में घुसने की कोशिश करने पर तरह-तरह के दंड़ों की व्यवस्था कर रखी है सभी ने।
जैसे :-
उत्तरी कोरिया की सीमा लांघने पर 12 साल के सश्रम कारावास का प्रावधान है। वह भी किसी सुनसान इलाके में।
ईरान में ऐसा करते पकड़े जाने पर उस व्यक्ति को असीमित समय के लिए कारावास में ठूंस दिया जाता है।
अफगानिस्तान में तो सीधे गोली मार दी जाती है।
अरबियन देशों में सश्रम कारावास सुना दिया जाता है।
चीन में जिसने ऐसा दुस्साहस किया वह तो ऐसा गायब कर दिया जाता है जिसका फिर कभी पता ही नहीं चलता।
वेनेजुएला में ऐसा करनेवाले को जासूस समझा जाता है और सीधे जेल की हवा खिला दी जाती है।
क्यूबा तो ऐसे ही खासा बदनाम रहा है। वहां ऐसे व्यक्ति को जेल में अमानुषिक यत्रंणाएं दी जाती हैं।
योरोप के देशों में जेल में रख कर मुकदमा चलाया जाता है।
चूँकि हम "अतिथि" को भगवान मानते हैं इसीलिए अपने देश में यदि कोई ऐसी हरकत करता है और थोड़ा सा भी 'चंट' होता है तो देखिए उसे क्या-क्या मिलता है -
*राशन कार्ड़, *पास पोर्ट, *पूरे देश में घूमने के लिए ड़्रायविंग लायसेंस, *वोटर आई.डी.,*क्रेडिट कार्ड़, *धार्मिक यात्राओं में किराए में भारी छूट, *नौकरी में आरक्षण, *सरकार द्वारा मुफ्त शिक्षा, दवा-दारू, घर, *कुछ भी बोलने की स्वतंत्रता, *अपने वोट द्वारा भ्रष्ट लोगों को चुनने की सहूलियत, जो जीत कर उनके हितों की रक्षा कर सकें।
क्या कुछ कहना चाहेंगे आप, इस बारे में ?
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
गुरुवार, 27 जनवरी 2011
बुधवार, 26 जनवरी 2011
यहाँ प्रयुक्त "आप" को आप अन्यथा न लें
किसी से बात करते समय किसी का चेहरा भले ही सपाट रहे पर उसके हाव-भाव तथा "शारीरिक भाषा" उसकी बातों की सच्चाई व्यक्त कर ही देते हैं।
* क्या आप किसी से बात करते समय अनजाने में अपने मुंह या गर्दन को छूते रहते हैं ?
* क्या किसी से बात करते हुए आप अक्सर हकला जाते हैं ?
* क्या सामने वाले से बतियाते समय आप जबरन मुस्कुराने तो नहीं लग जाते ?
* क्या किसी को कुछ कहते हुए आपका गला तो नहीं रुंध जाता ?
* क्या सामने वाले को कोई बात बताते हुए आप उससे आंखें नहीं मिला पाते ?
* क्या किसी से बात करते हुए आप बार-बार अपने कंधे तो नहीं उचकाते ?
* क्या किसी से बात करते समय आपको अपना रक्त चाप बढ़ा हुआ लगता है ? या पसीना तो नहीं आ जाता ?
* किसी से बात करते हुए क्या आपकी आवाज तेज हो जाती है ?
* क्या आप किसी को कुछ बताते समय अपनी बात बार-बार दोहराते हैं ?
यदि ऐसा है तो माफी चाहूंगा :-) आप सामने वाले से झूठ बोल रहे हैं ।
वैसे झूठ बोलना हर समय गलत नहीं होता। किसी की रक्षा के लिए इसका उपयोग देवता भी करते आए हैं।
कहा भी गया है, प्रिय सत्य बोलिए। अप्रिय सत्य न बोलिए।
ऐसा शायद ही कोई इंसान होगा जिसने इसका सहारा न लिया हो। खोज बताती है कि राजनीति से जुड़े लोग इस मामले में सबसे आगे होते हैं। उसके बाद सेल्समैनों, वकीलों तथा अभिनेता/त्रियों की बारी आती है। कभी-कभी डाक्टर भी अपने मरीज के हित में झूठ बोल लेते हैं। सबसे कम इस विधा का उपयोग करने वालों में वैज्ञानिकों, स्थापत्यकारों और इंजीनियरों को शामिल किया गया है। इसका कारण भी है कि इनके मिथ्याभाषण को आसानी से पकड़ा जो जा सकता है।
एक बात और, विशेषज्ञों का कहना है कि स्त्रियाँ ज्यादा झूठ बोलती हैं ।
माफ कीजिएगा यह मैं नही न कह रहा हूँ :-)
* क्या आप किसी से बात करते समय अनजाने में अपने मुंह या गर्दन को छूते रहते हैं ?
* क्या किसी से बात करते हुए आप अक्सर हकला जाते हैं ?
* क्या सामने वाले से बतियाते समय आप जबरन मुस्कुराने तो नहीं लग जाते ?
* क्या किसी को कुछ कहते हुए आपका गला तो नहीं रुंध जाता ?
* क्या सामने वाले को कोई बात बताते हुए आप उससे आंखें नहीं मिला पाते ?
* क्या किसी से बात करते हुए आप बार-बार अपने कंधे तो नहीं उचकाते ?
* क्या किसी से बात करते समय आपको अपना रक्त चाप बढ़ा हुआ लगता है ? या पसीना तो नहीं आ जाता ?
* किसी से बात करते हुए क्या आपकी आवाज तेज हो जाती है ?
* क्या आप किसी को कुछ बताते समय अपनी बात बार-बार दोहराते हैं ?
यदि ऐसा है तो माफी चाहूंगा :-) आप सामने वाले से झूठ बोल रहे हैं ।
वैसे झूठ बोलना हर समय गलत नहीं होता। किसी की रक्षा के लिए इसका उपयोग देवता भी करते आए हैं।
कहा भी गया है, प्रिय सत्य बोलिए। अप्रिय सत्य न बोलिए।
ऐसा शायद ही कोई इंसान होगा जिसने इसका सहारा न लिया हो। खोज बताती है कि राजनीति से जुड़े लोग इस मामले में सबसे आगे होते हैं। उसके बाद सेल्समैनों, वकीलों तथा अभिनेता/त्रियों की बारी आती है। कभी-कभी डाक्टर भी अपने मरीज के हित में झूठ बोल लेते हैं। सबसे कम इस विधा का उपयोग करने वालों में वैज्ञानिकों, स्थापत्यकारों और इंजीनियरों को शामिल किया गया है। इसका कारण भी है कि इनके मिथ्याभाषण को आसानी से पकड़ा जो जा सकता है।
एक बात और, विशेषज्ञों का कहना है कि स्त्रियाँ ज्यादा झूठ बोलती हैं ।
माफ कीजिएगा यह मैं नही न कह रहा हूँ :-)
मंगलवार, 25 जनवरी 2011
पेहोवा या पृथूदक, एक प्राचीन तीर्थ स्थल
पेहोवा, भारत के प्राचीनतम स्थानों में से एक 'कुरुक्षेत्र' जहां महाभारत का युद्ध लड़ा गया था, के पास का एक कस्बा है जो अब धीरे-धीरे छोटे शहर में तब्दील होता जा रहा है। कुरुक्षेत्र से 27 की. मी. तथा 'थानेसर' से 12 की.मी. की दूरी पर स्थित अपने धार्मिक मुल्यों के कारण यह तीर्थ स्थल के रूप में विख्यात है। ऐसी धारणा है कि यहां प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसीलिए देश भर से लोग हरिद्वार में अस्थी विसर्जन करने के पश्चात यहां पिंड़-दान करने आते हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि किसी की मौत किसी दुर्घटना में, अस्पताल में या बिस्तर पर हुई हो तो उसकी क्रिया यहां करनी जरूरी होती है। यहां का नजदीकी रेल-स्टेशन कुरुक्षेत्र का है। सड़क मार्ग से ने.हाईवे ६५ द्वारा यह सारे देश से जुड़ा हुआ है।
कनिंघम ने इसे 882 ई.पू. का बताया है जबकि यहीं के एक मंदिर के शिलालेख में इसके 895 ई.पू. के होने का उल्लेख मिलता है।
ऋगवेद के अनुसार यहां का नामकरण राजा पृथू के नाम पर "पृथूदक" किया गया था। जो बदलते-बदलते अब "पेहोवा" के नाम से जाना जाता है। राजा पृथू ने अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए उनका अंतिम संस्कार यहीं पर किया था। जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। तभी से सद्गति के लिए लोग यहां अपने पूर्वजों का पिंड़ दान करते आ रहे हैं।
वामन पुराण और महाकाव्य महाभारत में भी इस स्थल की अपार महिमा का वर्णन मिलता है। यहां पर समय-समय पर किए गये उत्खनन और मंदिरों में लगे अभिलेखों से भी इस जगह के अति प्राचीन होने का प्रमाण मिलता रहा है।
विदेशी आतातायियों के आक्रमणों और विध्वसों का यहां के मंदिरों और पूजा स्थलों को भी सामना करना पड़ा था। पृथ्वीराज चौहान की महमूद गजनी के हाथों पराजय के बाद यह क्षेत्र पूरी तरह से मुसलमानों के कब्जे में चला गया था। पर मराठों के आगमन से यहां की स्थिति में फिर परिवर्तन आया। उसी दौर में सही मायनों में पृथूदक के धार्मिक महत्व की पुनर्स्थापना हो पाई। मराठों ने ही पृथूकेश्वर, सरस्वती तथा कार्तिकेय मंदिरों का जिर्णोद्धार करवाया।
पहले लोग सिर्फ कर्मकांड़ करवाने यहां जाते थे पर अब कुरुक्षेत्र जाने वाले लोग पृथूदक यानि पेहोवा भी पहुंचने लगे हैं।
कनिंघम ने इसे 882 ई.पू. का बताया है जबकि यहीं के एक मंदिर के शिलालेख में इसके 895 ई.पू. के होने का उल्लेख मिलता है।
ऋगवेद के अनुसार यहां का नामकरण राजा पृथू के नाम पर "पृथूदक" किया गया था। जो बदलते-बदलते अब "पेहोवा" के नाम से जाना जाता है। राजा पृथू ने अपने पिता की अंतिम इच्छा को पूरा करने के लिए उनका अंतिम संस्कार यहीं पर किया था। जिससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो सके। तभी से सद्गति के लिए लोग यहां अपने पूर्वजों का पिंड़ दान करते आ रहे हैं।
वामन पुराण और महाकाव्य महाभारत में भी इस स्थल की अपार महिमा का वर्णन मिलता है। यहां पर समय-समय पर किए गये उत्खनन और मंदिरों में लगे अभिलेखों से भी इस जगह के अति प्राचीन होने का प्रमाण मिलता रहा है।
विदेशी आतातायियों के आक्रमणों और विध्वसों का यहां के मंदिरों और पूजा स्थलों को भी सामना करना पड़ा था। पृथ्वीराज चौहान की महमूद गजनी के हाथों पराजय के बाद यह क्षेत्र पूरी तरह से मुसलमानों के कब्जे में चला गया था। पर मराठों के आगमन से यहां की स्थिति में फिर परिवर्तन आया। उसी दौर में सही मायनों में पृथूदक के धार्मिक महत्व की पुनर्स्थापना हो पाई। मराठों ने ही पृथूकेश्वर, सरस्वती तथा कार्तिकेय मंदिरों का जिर्णोद्धार करवाया।
पहले लोग सिर्फ कर्मकांड़ करवाने यहां जाते थे पर अब कुरुक्षेत्र जाने वाले लोग पृथूदक यानि पेहोवा भी पहुंचने लगे हैं।
सोमवार, 24 जनवरी 2011
जब मेरे पास ख़त्म हो जाते हैं तो मैं भी पचास में देता हूँ
गांव का एक लड़का अपनी नयी-नयी साईकिल ले, शहर मे नये खुले माल में घूमने आया। स्टैंड में सायकिल रख जब काफ़ी देर बाद लौटा तो अपनी साईकिल को काफ़ी कोशिश के बाद भी नहीं खोज पाया। उसको याद ही नहीं आ रहा था कि उसने उसे कहां रखा था। उसकी आंखों में पानी भर आया। उसने सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना की कि हे प्रभू मेरी साईकिल मुझे दिलवा दो, मैं ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। दैवयोग से उसे एक तरफ़ खड़ी अपनी साईकिल दिख गयी। उसे ले वह तुरंत मंदिर पहुंचा, भगवान को धन्यवाद दे, प्रसाद चढ़ा, जब बाहर आया तो उसकी साईकिल नदारद थी।
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नमस्ते सर, मैं आपका पियानो ठीक करने आया हूं। पर मैने तो आप को नहीं बुलवाया। नहीं सर, आपके पडोसियों ने मुझे बुलवाया है।
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अरे भाई, ये सेव कैसे दिये। सर साठ रुपये किलो। पर वह तुम्हारा सामने वाला तो पचास में दे रहा है। तो सर उसीसे ले लिजीए। ले तो लेता पर उसके पास खत्म हो गये हैं। सर जब मेरे पास खत्म हो जाते हैं तो मैं भी पचास में देता हूं ।
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बेटे की नौकरी चेन्नाई मे लग गयी। अच्छी पगार थी, सो उसने पांच हजार की एक साडी माँ के लिये ले ली। पर वह माँ का स्वभाव जानता था, सो उसने साडी के साथ एक पत्र भी भेज दिया कि पहली पगार से यह साडी भेज रहा हूं, दिखने में मंहगी है पर सिर्फ़ दो हजार की है, कैसी लगी बतलाना।
अगले हफ़्ते ही माँ का फोन आ गया, बेटा खुश रहो। साडी बहुत ही अच्छी थी। मैने उसे तीन हजार में बेच दिया है, तुरंत वैसी दस साडियां और भिजवा दे, अच्छी मांग है।
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नमस्ते सर, मैं आपका पियानो ठीक करने आया हूं। पर मैने तो आप को नहीं बुलवाया। नहीं सर, आपके पडोसियों ने मुझे बुलवाया है।
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अरे भाई, ये सेव कैसे दिये। सर साठ रुपये किलो। पर वह तुम्हारा सामने वाला तो पचास में दे रहा है। तो सर उसीसे ले लिजीए। ले तो लेता पर उसके पास खत्म हो गये हैं। सर जब मेरे पास खत्म हो जाते हैं तो मैं भी पचास में देता हूं ।
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बेटे की नौकरी चेन्नाई मे लग गयी। अच्छी पगार थी, सो उसने पांच हजार की एक साडी माँ के लिये ले ली। पर वह माँ का स्वभाव जानता था, सो उसने साडी के साथ एक पत्र भी भेज दिया कि पहली पगार से यह साडी भेज रहा हूं, दिखने में मंहगी है पर सिर्फ़ दो हजार की है, कैसी लगी बतलाना।
अगले हफ़्ते ही माँ का फोन आ गया, बेटा खुश रहो। साडी बहुत ही अच्छी थी। मैने उसे तीन हजार में बेच दिया है, तुरंत वैसी दस साडियां और भिजवा दे, अच्छी मांग है।
रविवार, 23 जनवरी 2011
हम देसी घी को छोड़ कर हर विदेशी चीज पसंद करते हैं.
हम भारतीयों की एक विशेषता है कि हम देसी घी को छोड़ हर विदेशी चीज का आंख मूंद कर स्वागत, उपयोग तथा आदर करते हैं फिर चाहे वह विदेशी वस्तु, विचार या इंसान "रीडायरेक्ट" हो कर ही क्यूं ना हमारे पास आया हो।
हमारे ऋषी-मुनियों तथा विद्वानों ने अवाम की जिंदगी को सुंदर, सुखमय, निरोग बनाए रखने के लिए जितने उपाय हो सकते थे उन्हें खोज कर हमें सौंप दिया था। पर समय के साथ-साथ हमारी निष्ठा व सोच विदेशों की चकाचौंध में गुम होती चली गयी और हम राम में नहीं रामा में, कृष्ण में नहीं कृष्णा में, योग में नहीं योगा में, राग में नहीं रागा में सुख खोजने में खोते चले गये।
"बाजार" की ताकतें पुराने स्वरुपों को नये-नये "डिजाइनर" आवरणों में लपेट-लपेट कर फिर हमारे सामने पेश करती गयीं और हम आंख मूंद कर उन्हें अपनाने में गौरव महसूस करने लगे।
योरोप और अमेरिका की तो छोड़ें कल तक का अफीमची देश चीन भी आज हमारी इस कमजोरी का फायदा उठा अपने वतन वासियों को समृद्ध बनाने पर तुला हुआ है। खुद कम्युनिस्ट विचारधारा का होते हुए भी उसने हमारे पर्वों पर हमारे देवी-देवताओं की मुर्तियां बना-बना कर हमें बेच ड़ालीं और हम सस्ते में मिलते भगवान खुशी-खुशी घर ले आए। वहीं की एक देन है 'फेंगशुई'। जिसके पीछे आज हजारों लोग पागलों की तरह पड़ कर पता नहीं क्या-क्या सस्ती मंहगी चीजें ला-ला कर अपने घर को भरे जा रहे हैं।
इस चीनी ज्योतिष के कुछ नियम यहां दे रहा हूं आप बताएं कि इसमें ऐसा क्या है जो आप को पहले पता नहीं था या उस हिदायत का हम पालन ना करते हों।
फेंगशुई के अनुसार पांच तत्व होते हैं जिन्हें घर में ला कर रखना चाहिए, वे हैं - पृथ्वी, पानी, आग, धातु और लकड़ी। हमारे पंच तत्व में धातु और लकड़ी की जगह आकाश और वायु सम्मलित हैं। तो कौन ज्यादा प्रकृति के नजदीक हुआ।
फेंगशुई के अनुसार कुड़ा-कचरा इकट्ठा नहीं होना चाहिए, घर में चीजें व्यवस्थित होनी चाहिए, बेकार की वस्तुएं नहीं रखनी चाहिएं, रसोई घर तथा चुल्हा साफ-सुथरा होना चाहिए, वहां रोशनी तथा सामग्री प्रयाप्त मात्रा में होनी चाहिए। बाथरूम तथा टायलेट के दरवाजे सदा बंद रखने चाहिए। इत्यादि-इत्यादि।
मुद्दा यह है कि घर साफ सुथरा तथा व्यवस्थित हो। माहौल उल्लासमय हो। घर के दरो-दिवार खुशनुमा हों जिससे दिलो-दिमाग परेशानियों से मुक्ति पा सके, सोच सकारात्मक हो सके। ऐसी सोच ही हर बाधा से लड़ने की ताकत प्रदान करती है।
यह सब कहने का मेरा अभिप्राय फेंगशुई विधा को नीचा या बेकार ठहराना नहीं है। बाहर की किसी भी संस्कृति या ज्ञान की अच्छाईयों को अपनाना बुरी बात नहीं है। पर आंख मूंद कर आधी अधूरी जानकारी ले किसी के भी पीछे चल देना कोई अक्लमंदी भी नहीं है।
हमारे ऋषी-मुनियों तथा विद्वानों ने अवाम की जिंदगी को सुंदर, सुखमय, निरोग बनाए रखने के लिए जितने उपाय हो सकते थे उन्हें खोज कर हमें सौंप दिया था। पर समय के साथ-साथ हमारी निष्ठा व सोच विदेशों की चकाचौंध में गुम होती चली गयी और हम राम में नहीं रामा में, कृष्ण में नहीं कृष्णा में, योग में नहीं योगा में, राग में नहीं रागा में सुख खोजने में खोते चले गये।
"बाजार" की ताकतें पुराने स्वरुपों को नये-नये "डिजाइनर" आवरणों में लपेट-लपेट कर फिर हमारे सामने पेश करती गयीं और हम आंख मूंद कर उन्हें अपनाने में गौरव महसूस करने लगे।
योरोप और अमेरिका की तो छोड़ें कल तक का अफीमची देश चीन भी आज हमारी इस कमजोरी का फायदा उठा अपने वतन वासियों को समृद्ध बनाने पर तुला हुआ है। खुद कम्युनिस्ट विचारधारा का होते हुए भी उसने हमारे पर्वों पर हमारे देवी-देवताओं की मुर्तियां बना-बना कर हमें बेच ड़ालीं और हम सस्ते में मिलते भगवान खुशी-खुशी घर ले आए। वहीं की एक देन है 'फेंगशुई'। जिसके पीछे आज हजारों लोग पागलों की तरह पड़ कर पता नहीं क्या-क्या सस्ती मंहगी चीजें ला-ला कर अपने घर को भरे जा रहे हैं।
इस चीनी ज्योतिष के कुछ नियम यहां दे रहा हूं आप बताएं कि इसमें ऐसा क्या है जो आप को पहले पता नहीं था या उस हिदायत का हम पालन ना करते हों।
फेंगशुई के अनुसार पांच तत्व होते हैं जिन्हें घर में ला कर रखना चाहिए, वे हैं - पृथ्वी, पानी, आग, धातु और लकड़ी। हमारे पंच तत्व में धातु और लकड़ी की जगह आकाश और वायु सम्मलित हैं। तो कौन ज्यादा प्रकृति के नजदीक हुआ।
फेंगशुई के अनुसार कुड़ा-कचरा इकट्ठा नहीं होना चाहिए, घर में चीजें व्यवस्थित होनी चाहिए, बेकार की वस्तुएं नहीं रखनी चाहिएं, रसोई घर तथा चुल्हा साफ-सुथरा होना चाहिए, वहां रोशनी तथा सामग्री प्रयाप्त मात्रा में होनी चाहिए। बाथरूम तथा टायलेट के दरवाजे सदा बंद रखने चाहिए। इत्यादि-इत्यादि।
मुद्दा यह है कि घर साफ सुथरा तथा व्यवस्थित हो। माहौल उल्लासमय हो। घर के दरो-दिवार खुशनुमा हों जिससे दिलो-दिमाग परेशानियों से मुक्ति पा सके, सोच सकारात्मक हो सके। ऐसी सोच ही हर बाधा से लड़ने की ताकत प्रदान करती है।
यह सब कहने का मेरा अभिप्राय फेंगशुई विधा को नीचा या बेकार ठहराना नहीं है। बाहर की किसी भी संस्कृति या ज्ञान की अच्छाईयों को अपनाना बुरी बात नहीं है। पर आंख मूंद कर आधी अधूरी जानकारी ले किसी के भी पीछे चल देना कोई अक्लमंदी भी नहीं है।
शुक्रवार, 21 जनवरी 2011
हृदयहीन, फिल्मजगत की मायानगरी
आज खबरों में पढा कि वयोवृद्ध सिनेकर्मी, पूर्व स्वतंत्रता सैनानी 95 वर्षीय श्री अवतार कृष्ण हंगल जो, ए.के. हंगल के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं, बहुत बिमार हैं और काफी दिनों से बिस्तर पर हैं। वे अपने पुत्र विजय के साथ रह रहे हैं जो खुद 74 साल के हैं। इस जानलेवा मंहगाई के दौर में पूरा परिवार तंगदस्ती से गुजर रहा है। हंगल जी के इलाज के लिए हर महीने करीब 10 से 15 हजार रुपयों की आवश्यकता पड़ती है जिसके अभाव में उनका उचित इलाज नहीं हो पा रहा है।
यह चकाचौंध भरे, खुशहाली की तस्वीर बने, मौज-मस्ती के पर्याय फिल्म जगत और उसके सितारों के रजत पट के पीछे के घने अंधकार, मतलब परस्ती तथा तंग दिली की सच्चाई है।
पार्टियों में एक ही रात में लाखों रुपये उड़ा देने वाले, छोटे-बड़े पर्दे पर नकली मुस्कान बिखेरते बड़ी-बड़ी बातें बनाने वाले, कुत्ते-बिल्लीयों, जंगलों के लिए दिखावे की मुहिमों में फोटो खिचवाने वाले, मानवाधिकार के लिए विवादाग्रस्त लोगों के पक्ष में देश के भी विरुद्ध बोल कर अपने को मानव समर्थक कहलाने की लालसा वाले, यहां-वहां के मंदिरों में पैदल घूम-घूम कर करोंड़ों रुपयों को मुर्तियों पर अर्पण करने वाले, छोटे पर्दे पर आयोजित-प्रायोजित इनामी तमाशों में भाग लेकर कहां-कहां के N.G.O. को लाखों देने की बात करने वाले चर्चित चेहरे अपने ही व्यवसाय के एक साथी को इस बूरी दशा में नजरंदाज कर अपनी असलियत का ही पर्दाफाश कर रहे हैं।
ऐसा भी नहीं है कि इस विशाल व्यवसाय का श्री हंगल कोई एक अनजान पुर्जा हों। वे एक जानी मानी हस्ती रहे हैं। उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अपने उत्कर्ष में जरुरतमंदों के काम आने वाले इंसान का यह हश्र तकलीफदेह है।
पहले भी अनेकों बार फिल्म जगत की निर्मम मायानगरी अपने सरल ह्रदय सदस्यों के साथ ऐसा खेल खेल चुकी है, उनकी ढलती शामों में। ऐसे समर्पित कलाकारों की आड़े समय मे क्यों किसी को सुध नहीं आती यह दुखद और विचारणीय प्रश्न अक्सर दिल को कचोटता है।
यह चकाचौंध भरे, खुशहाली की तस्वीर बने, मौज-मस्ती के पर्याय फिल्म जगत और उसके सितारों के रजत पट के पीछे के घने अंधकार, मतलब परस्ती तथा तंग दिली की सच्चाई है।
पार्टियों में एक ही रात में लाखों रुपये उड़ा देने वाले, छोटे-बड़े पर्दे पर नकली मुस्कान बिखेरते बड़ी-बड़ी बातें बनाने वाले, कुत्ते-बिल्लीयों, जंगलों के लिए दिखावे की मुहिमों में फोटो खिचवाने वाले, मानवाधिकार के लिए विवादाग्रस्त लोगों के पक्ष में देश के भी विरुद्ध बोल कर अपने को मानव समर्थक कहलाने की लालसा वाले, यहां-वहां के मंदिरों में पैदल घूम-घूम कर करोंड़ों रुपयों को मुर्तियों पर अर्पण करने वाले, छोटे पर्दे पर आयोजित-प्रायोजित इनामी तमाशों में भाग लेकर कहां-कहां के N.G.O. को लाखों देने की बात करने वाले चर्चित चेहरे अपने ही व्यवसाय के एक साथी को इस बूरी दशा में नजरंदाज कर अपनी असलियत का ही पर्दाफाश कर रहे हैं।
ऐसा भी नहीं है कि इस विशाल व्यवसाय का श्री हंगल कोई एक अनजान पुर्जा हों। वे एक जानी मानी हस्ती रहे हैं। उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अपने उत्कर्ष में जरुरतमंदों के काम आने वाले इंसान का यह हश्र तकलीफदेह है।
पहले भी अनेकों बार फिल्म जगत की निर्मम मायानगरी अपने सरल ह्रदय सदस्यों के साथ ऐसा खेल खेल चुकी है, उनकी ढलती शामों में। ऐसे समर्पित कलाकारों की आड़े समय मे क्यों किसी को सुध नहीं आती यह दुखद और विचारणीय प्रश्न अक्सर दिल को कचोटता है।
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
शायद प्रारब्ध की हर घटना का स्थान और समय निश्चित होता है.
इस बार जैसी ठंड तब भी पड़ी थी। क्या इंसान क्या पशू-पक्षी सभी बेहाल हो गये थे। ऐसे ही में एक गिद्धराज अपनी सर्दी दूर करने के लिए धूप में एक वृक्ष की फुनगी पर बैठे थे। उसी समय उधर से यमराज का निकलना हुआ। उनको जैसे ही पेड़ पर बैठा गिद्ध नजर आया उनकी भृकुटी पर बल पड़ गये पर उन्होंने कहा कुछ नहीं और अपनी राह चले गये। वे तो अपनी राह चले गये पर उनके तेवर देख गिद्ध की जान सूख गयी। उसके सारे के सारे देवता कूच कर गये। अब वह ठंड से नहीं ड़र से कांप रहा था। इतने में उधर से 'नारायण-नारायण' उच्चारते नारद जी आ पहुंचे। नारद जी ने कांपते हुए गिद्ध को देखा तो रुक कर पूछने लगे, गिद्धराज तबीयत तो ठीक है? बहुत बुरी तरह से कांप रहे हो, क्या बात है? किसी सहायता की जरूरत हो तो मुझसे कहें।
ड़र से लरजते गिद्ध ने बड़ी मुश्किल से बताया कि अभी-अभी इधर से यमराज निकले थे। मैंने तो जाने-अनजाने कोई भूल भी नहीं की फिर भी वे बड़ी टेढी नजर से मुझे देखते हुए गये हैं। बहुत गुस्से मे लग रहे थे। इसीसे मुझे बड़ा ड़र लग रहा है। नारद जी ने दो मिनट विचार कर कहा कि तुम एक काम करो। यहां से सौ योजन की दूरी पर रामटेक नामक पहाड़ी है। उसकी कंदरा में जा कर छिप जाओ तब तक मैं यमराज से बात कर उनकी नाराजगी का कारण पूछता हूं।
गिद्ध ने उनकी बात मान रामटेक की पहाड़ी में शरण ले ली। इसी बीच नारद जी ने यमराज के पास जा पूछा कि महाराज आज क्या बात हो गयी जो सबेरे-सबेरे उस गरीब गिद्ध पर आपकी कोप दृष्टी जा पड़ी थी। यमराज बोले, अरे कुछ नहीं, जैसे ही मैं बाहर निकला तो सामने वह गिद्ध नजर आ गया। आज रात उसकी जिंदगी का समापन है जिसे सौ योजन दूर रामटेक की पहाड़ियों में सम्पन्न होना है। मैं यह सोच रहा था कि इसे तो वहां होना चाहिए यहां क्या कर रहा है।
नारद जी को यह समझ नहीं आ रहा था कि उन्होंने अच्छा किया या बुरा।
ड़र से लरजते गिद्ध ने बड़ी मुश्किल से बताया कि अभी-अभी इधर से यमराज निकले थे। मैंने तो जाने-अनजाने कोई भूल भी नहीं की फिर भी वे बड़ी टेढी नजर से मुझे देखते हुए गये हैं। बहुत गुस्से मे लग रहे थे। इसीसे मुझे बड़ा ड़र लग रहा है। नारद जी ने दो मिनट विचार कर कहा कि तुम एक काम करो। यहां से सौ योजन की दूरी पर रामटेक नामक पहाड़ी है। उसकी कंदरा में जा कर छिप जाओ तब तक मैं यमराज से बात कर उनकी नाराजगी का कारण पूछता हूं।
गिद्ध ने उनकी बात मान रामटेक की पहाड़ी में शरण ले ली। इसी बीच नारद जी ने यमराज के पास जा पूछा कि महाराज आज क्या बात हो गयी जो सबेरे-सबेरे उस गरीब गिद्ध पर आपकी कोप दृष्टी जा पड़ी थी। यमराज बोले, अरे कुछ नहीं, जैसे ही मैं बाहर निकला तो सामने वह गिद्ध नजर आ गया। आज रात उसकी जिंदगी का समापन है जिसे सौ योजन दूर रामटेक की पहाड़ियों में सम्पन्न होना है। मैं यह सोच रहा था कि इसे तो वहां होना चाहिए यहां क्या कर रहा है।
नारद जी को यह समझ नहीं आ रहा था कि उन्होंने अच्छा किया या बुरा।
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आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
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चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...