pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

माँ का पांचवां स्वरूप "स्कन्दमाता", जिनके पूजन से शांति और पराक्रम में वृद्धि होती है।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के "स्कन्दमाता" स्वरुप की आराधना की जाती है।

स्कन्द, भगवान कार्तिकेय का ही एक नाम है। इन्हीं की माता होने के कारण मां दुर्गा को स्कन्दमाता के नाम से भी जाना जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं। अपनी दाहिनी भुजा में इन्होंने भगवान् कार्तिक को बाल रुप में उठा रखा है, दुसरी भुजा अभय मुद्रा में उठी हुई है तथा बाकि दोनों हाथों में कमल-पुष्प है। इनका वर्ण शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। सिंह भी इनका वाहन है।इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं तथा उसे परम शांति और सुख की प्राप्ति होती है। स्कन्दमाता की आराधना से बालरुप स्कन्द भगवान की भी उपासना अपने आप हो जाती है।

नवरात्रि की पंचमी को स्कन्दमाता की आराधना करते समय साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक भी अलौकिक तेज व कांति से संपन्न हो जाता है।

सिंहासनम्ता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

जिनके सहयोग से ब्रह्मांड की रचना संभव हो सकी, "माँ कूष्मांडा"

जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर सिर्फ़ अंधकार ही अंधकार था, तब "मां कूष्माण्डा" के सहयोग से ही ब्रह्माण्ड की रचना संभव हो पायी थी।

इनकी मंद हंसी द्वारा ब्रह्माण्ड के उत्पन्न होने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा देवी अभिहित किया गया। यही सृष्टि की आदि शक्ति हैं। इनका निवास सूर्य लोक में माना जाता है। इनके शरीर की कांति, रंगत व प्रभा सूर्य के समान ही तेजोमय है। कोई भी देवी-देवता इनके तेज और प्रभाव की समानता नहीं कर सकता। इन्हीं के तेज से दसों दिशाएं प्रकाशमान होती हैं। इनके आठ हाथ हैं, जिनमें कमण्डल,धनुष, बाण, कमल, कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सिद्धियां प्रदान करने वाली जप माला है। इनका वाहन सिंह है। इनकी आराधना से यश,बल आयु तथा आरोग्य प्राप्त होता है। सभी प्रकार की सिद्धियां इनके आशिर्वाद से सुलभ हो जाती हैं।

चूंकि ये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारण हैं इसलिए संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले को मां कूष्माण्डा की पूजा अर्चना करने से लाभ होता है। इस दिन साधक का मन 'अनाहत चक्र' में अवस्थित होता है। सच्चे मन से इनकी शरण में जाने से मनुष्य को परमपद प्राप्त हो जाता है।

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सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधाना हरतपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।
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रविवार, 10 अक्टूबर 2010

परम शान्तिदायक तथा कल्याणकारी " माँ चंद्रघंटा"

नवरात्रि के तीसरे दिन, मां दुर्गा की तीसरी शक्ति "मां चंद्रघंटा" की आराधना की जाती है। इनका यह स्वरुप परम शांति तथा कल्याण प्रदान करने वाला है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान है तथा मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीसे इनका नाम "मां चंद्रघंटा" पड़ा। इनके दस हाथ हैं जिनमें अस्त्र-शस्त्र विभुषित हैं। इनका वाहन सिंह है।आज के दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में प्रविष्ट होता है। मां की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन तथा दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। पर इन क्षणों में साधक को बहुत आवधान रहने की जरुरत होती है। मां चंद्रघण्टा की दया से साधक के समस्त पाप और बाधाएं दूर हो जाती हैं। इनकी आराधना से साधक में वीरता, निर्भयता के साथ-साथ सौभाग्य व विनम्रता का भी विकास होता है। मां का ध्यान करना हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देनेवाला होता है ************************************************
पिण्डजप्रवरारूढा चण्कोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्मां चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
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शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

1857 की बदनसीब शहजादियाँ

1857 के गदर को दबाने के बाद बौखलाए हुए अंग्रेजों ने दिल्ली का जो हाल किया उसे शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल है। जुल्म और बर्बरता की इंतिहा थी। लूट-खसोट, आगजनी, हत्याएं यानि हैवानियत का नंगा नाच शुरु हो गया था। एक दरिंदा जो भी कुकर्म कर सकता है वह वहां हो रहा था। लोग जान बचाने को शहर छोड़ कर जहां जरा सी बचने की गुंजाइश दिखती वहां भाग रहे थे।

दिल्ली की दुर्दशा की पल-पल की खबरें लाल किले के अंदर पहुंच रही थीं। वहां एक अजीब तरह की दहशत छाई हुई थी। मौत के ड़र ने पूरे किले को अपने आगोश में ले रखा था। बादशाह जफर को अपने से ज्यादा अपने परिवार की चिंता खाए जा रही थी, जिन्हें दो-दो दिनों से खाना तक नसीब नहीं हुआ था। पर वहां खाना तो दूर जान के लाले पड़े हुए थे।

बादशाह किसी भी तरह अपने परिवार को अंग्रेजों के हाथों होने वाली दुर्दशा से बचाना चाहता था। पर कोई भी उपाय या सहायता नहीं सूझ रही थी। अंत में कोई और उपाय ना देख उसने आधी रात के समय अपनी सबसे लाड़ली शहजादी को अपने पति और एक माह की बेटी के साथ किले से निकल जाने को कहा। कुछ जवाहरात देकर अपनी बेगम नूरमहल को भी उनके साथ कर दिया। किसी तरह बचते-बचाते यह काफिला अपने रथवान के गांव में शरण ले सका। पर दो दिन के बाद ही गांव वालों को शाही मेहमानों का पता चल गया और उन्होंने ही परिवार को लूट कर कंगाल बना दिया। वहां से किसी तरह बेगम और शहजादी अपने लोगों के साथ हैदराबाद पहुंचे और वहां से मक्का के लिए रवाना हो गये। उसके बाद उनका कोई पता नहीं चला।

इसी तरह बादशाह की एक पोती थी चमन आरा। किले से भागते वक्त उसके साथ के सारे लोग मारे गये। शहजादी को अंग्रेज अफसर से मांग कर एक सिपाही अपने घर ले गया। देश की शहजादी जिसके एक हुक्म पर सैंकड़ों नौकर भागते आते थे, वही नन्हीं सी जान छोटी सी उम्र में एक सिपाही और उसके घर को संभालती रही।

बादशाह की एक और पोती थी शहजादी रुखसाना। जब दिल्ली पर कहर बरपा तो सबको अपनी-अपनी जान की पड़ गयी। बादशाह भी किसी तरह भाग कर हुमायूं के मकबरे में जा छिपा। पर रुखसाना किले के बाहर निकल नहीं पाई। उसकी देख-रेख करने वाली दाई ने अंग्रेजों की मिन्नत आरजू कर उसकी जान बचाई। दो दिनों के बाद उसे एक मुसलमान अधिकारी के हवाले कर दिया गया। पर वह भी एक मुठभेड़ में मारा गया। रुखसाना जान बचाने की खातिर भागते-भागते उन्नाव जा पहुंची। वहां के एक जमिंदार परिवार ने उसे शरण दी तथा उसका विवाह भी करवा दिया। पर बदकिस्मति ने उसका साथ नहीं छोड़ा। जमिंदारों की आपसी कलह में उसके पति और श्वसुर की हत्या हो जाने पर वह एक बार फिर सड़क पर आ गयी। जहां से भाग्य ने उसे फिर दिल्ली ला पटका। जहां उसे अपना गुजारा जामा मस्जिद की सीढियों पर भीख मांग कर करना पड़ा।

ऐसी ही अनेक दुर्दशाओं में एक दास्तान है बादशाह जफर की एक और पोती गुलबदन की। बादशाह का उस पर असीम स्नेह था। महल में उसकी तूती बोलती थी। उसके एक इशारे पर वारे न्यारे हो जाते थे। पर वक्त की मार। जान बचाने के लिए अपनी मां के साथ भागते-भागते महीनों इधर-उधर बदहाली की अवस्था में छुपते-छुपाते जैसे-तैसे अपने दिन निकाल रही थी। अंग्रेजों के ड़र से कोई भी उन्हें शरण देने को तैयार न था। अक्सर उन्हें फाका करना पड़ता था। इसी कारण उसकी मां बिमार रहने लगी। ऐसे में ही चिराग दिल्ली की एक दरागाह में आंधी-पानी से बेहाल उसकी मां ने दम तोड़ दिया। गुलबदन अपनी मां से बेहद प्यार करती थी। उसकी मौत पर वह रात भर उससे लिपट कर रोते-रोते ऐसी मुर्च्छित हुई कि फिर उसे भी होश नहीं आया। कहते हैं दोनों मां बेटी के शरीर जंगल के जानवरों की खुराक बन गये।

नवरात्र के दूसरे दिन माँ के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा होती है.

पहले एक बात कहना चाहता हूं। आम लोगों की तरह, वही कुछ रटे-रटाए श्लोकों को छोड़ (उन्हें भी लिखना पड़े तो शायद पसीना आ जाए) संस्कृत में मेरा हाथ तंग ही है। सो इन नौ दिनों के "संकलन" में यदि कोई गल्ती, गल्ती से हो जाए तो क्षमा करेंगे।

नवरात्र के दूसरे दिन "माँ ब्रह्मचारिणी" की आराधना की जाती है। पुराणों के अनुसार पर्वत राज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद नारद मुनी के उपदेश से इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। पहले कंद मूल फिर शाक और फिर सिर्फ़ जमीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को ग्रहण करते हुए अहर्निश भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने पत्रों का भी त्याग कर दिया, जिससे उनका एक नाम "अपर्णा" भी पड़ा। हजारों साल तक चली इस साधना के कारण तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। उनके इस कृत्य से चारों ओर उनकी सराहना होने लगी थी। इस पर ब्रह्माजी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इनका नाम तपकारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी पड़ा।

माँ दुर्गा का यह रूप भक्तों और सिद्धों को अनंतफल देने वाला है। जीवन के कठिन समय में भी हतोत्साहित ना होने देने वाली, वैराग्यवत साहस देने वाली, सदाचार से जीवन व्यतीत करने वालों का साथ देने वाली, अपने कर्तव्य पथ से विचलित ना होने देने वाली अति दयालु माता हैं।इस दिन साधक का मन "स्वाधिष्ठान चक्र" में स्थित होता है। योगी उनकी कृपा तथा भक्ती पूर्ण रूप से प्राप्त करता है।

दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

माँ का स्वागत करें

मेहमानों की आवाजाही से हमारे यहां तो रौनक लगी रही। पहले तो गणपतजी पधारे, वैसे तो उनसे संपर्क बना रहता है पर उनका आना साल में एक बार ही हो पाता है। काफी व्यस्त रहते हैं। उनकी आवभगत में समय का पता ही नहीं चल पाया। उनके जाने के दूसरे दिन ही पितरों का आगमन हो गया, कल ही उनकी विदाई हुई और आज माँ के स्वागत का सौभाग्य प्राप्त हो गया। अपनी तो मौजां ही मौजां।

आज से नवरात्र पर्व शुरु हो रहे हैं। आप सब को भी माँ का ढ़ेरों- ढ़ेर प्यार और आशीष मिले। इन नौ दिनों में माँ के नौ स्वरुपों की पूजा होती है। आज पहला दिन है और आज माँ का "शैलपुत्री" के रूप में पूजन होता है। पर्वत राज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका यह नाम पड़ा। इनका वाहन वृषभ है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित रहता है। इनका विवाह भी भगवान शिवजी से ही हुआ। नव दुर्गाओं में प्रथम, माँ शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत मानी जाती हैं। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का शुभारंभ होता है

वन्दे वाच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

इज्जत बचाने के लिए कुछ भी करेगा

हम में से अधिकांश लोगों का यह सोचना है कि आज के खिलाड़ियों को पिछले समय से ज्यादा धन प्राप्त होता है। इसका कारण भी है कि कुछ ही सालों पहले, अभी सोने की खन बने क्रिकेट को खेलने वाले खिलाड़ी सायकिलों पर खेलने आया जाया करते थे और दो-तीन सौ रुपयों के लिए अकड़ु क्लर्क के सामने खड़ा रहना पड़ता था। पर कैलिफोर्निया विश्विद्यालय के प्राध्यापक डा.डेविड यंग ने अपनी खोजों से जो बातें दुनिया के सामने रखी हैं वे हैरतगेंज हैं। डा.यंग बताते हैं कि ईसा से पहले प्राचीन ग्रीक औलंपिक में रोमन खिलाड़ी ढाई लाख पौंड सालाना के बराबर पैसा कमा लेते थे। उस समय एक जीत हासिल करने पर उन्हें ताउम्र दस हजार पौंड के बराबर पेंशन मिला करती थी। अच्छे खिलाड़ियों के लिए एक साल में पांच-सात जीत हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं थी।
डा. यंग के अनुसार उस समय खेलने वालों को सिर्फ पैसा ही नहीं मिलता था बल्कि उन्हें आजीवन मुफ्त खाना, रहना तथा अन्य कीमती उपहार भी प्राप्त होते रहते थे।
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ऊपर बात थी अपनी मेहनत के बल पर कुछ प्राप्त करने की। अब देखीए ईर्ष्या के कारण चीजें इकट्ठी करने की लत।

किश्तों पर अपना सामान बेचने वाली एक फर्म ने बोस्टन की अदालत में मिसेज फोरमैन से अपना सामान वापस लेने के लिए मुकदमा दायर किया था। फर्म का कहना था कि मिसेज फोरमैन ने उनकी फर्म से वाशिंग मशीन, रेफ्रिजेटर, वैक्यूम क्लीनर, रंगीन टी.वी., हेयर ड्रायर जैसा सामान ले तो लिया पर उसकी एक भी किश्त नहीं चुकाई।
मजे की बात यह कि यह सारा बिजली का सामान लिया तो गया पर उनके घर पर बिजली का कनेक्शन ही नहीं था। जज ने हैरान हो पूछा कि जब आपके घर में बिजली नहीं थी तो आपने इतने सारे बिजली से चलने वाले उपकरण क्यों खरीदे?
इस पर मिसेज फोरमैन ने जवाब दिया, सर मेरी सारी पड़ोसनों के पास ऐसी सारी चीजें थीं जिनकी बातें सुन मुझे शर्म आती थी इसलिए मैने ये सारी चीजें ले लीं।
जज ने पूछा आपके पति ने आपको कभी मना नहीं किया इस बात के लिए?
जी कभी नहीं। उन्होंने भी तो इस फर्म से इलेक्ट्रिकल रेजर खरीदा है। मिसेज फोरमैन का जवाब था।


कैसी लगी यह हिमाकत बताईयेगा।

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