pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

1857 की बदनसीब शहजादियाँ

1857 के गदर को दबाने के बाद बौखलाए हुए अंग्रेजों ने दिल्ली का जो हाल किया उसे शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल है। जुल्म और बर्बरता की इंतिहा थी। लूट-खसोट, आगजनी, हत्याएं यानि हैवानियत का नंगा नाच शुरु हो गया था। एक दरिंदा जो भी कुकर्म कर सकता है वह वहां हो रहा था। लोग जान बचाने को शहर छोड़ कर जहां जरा सी बचने की गुंजाइश दिखती वहां भाग रहे थे।

दिल्ली की दुर्दशा की पल-पल की खबरें लाल किले के अंदर पहुंच रही थीं। वहां एक अजीब तरह की दहशत छाई हुई थी। मौत के ड़र ने पूरे किले को अपने आगोश में ले रखा था। बादशाह जफर को अपने से ज्यादा अपने परिवार की चिंता खाए जा रही थी, जिन्हें दो-दो दिनों से खाना तक नसीब नहीं हुआ था। पर वहां खाना तो दूर जान के लाले पड़े हुए थे।

बादशाह किसी भी तरह अपने परिवार को अंग्रेजों के हाथों होने वाली दुर्दशा से बचाना चाहता था। पर कोई भी उपाय या सहायता नहीं सूझ रही थी। अंत में कोई और उपाय ना देख उसने आधी रात के समय अपनी सबसे लाड़ली शहजादी को अपने पति और एक माह की बेटी के साथ किले से निकल जाने को कहा। कुछ जवाहरात देकर अपनी बेगम नूरमहल को भी उनके साथ कर दिया। किसी तरह बचते-बचाते यह काफिला अपने रथवान के गांव में शरण ले सका। पर दो दिन के बाद ही गांव वालों को शाही मेहमानों का पता चल गया और उन्होंने ही परिवार को लूट कर कंगाल बना दिया। वहां से किसी तरह बेगम और शहजादी अपने लोगों के साथ हैदराबाद पहुंचे और वहां से मक्का के लिए रवाना हो गये। उसके बाद उनका कोई पता नहीं चला।

इसी तरह बादशाह की एक पोती थी चमन आरा। किले से भागते वक्त उसके साथ के सारे लोग मारे गये। शहजादी को अंग्रेज अफसर से मांग कर एक सिपाही अपने घर ले गया। देश की शहजादी जिसके एक हुक्म पर सैंकड़ों नौकर भागते आते थे, वही नन्हीं सी जान छोटी सी उम्र में एक सिपाही और उसके घर को संभालती रही।

बादशाह की एक और पोती थी शहजादी रुखसाना। जब दिल्ली पर कहर बरपा तो सबको अपनी-अपनी जान की पड़ गयी। बादशाह भी किसी तरह भाग कर हुमायूं के मकबरे में जा छिपा। पर रुखसाना किले के बाहर निकल नहीं पाई। उसकी देख-रेख करने वाली दाई ने अंग्रेजों की मिन्नत आरजू कर उसकी जान बचाई। दो दिनों के बाद उसे एक मुसलमान अधिकारी के हवाले कर दिया गया। पर वह भी एक मुठभेड़ में मारा गया। रुखसाना जान बचाने की खातिर भागते-भागते उन्नाव जा पहुंची। वहां के एक जमिंदार परिवार ने उसे शरण दी तथा उसका विवाह भी करवा दिया। पर बदकिस्मति ने उसका साथ नहीं छोड़ा। जमिंदारों की आपसी कलह में उसके पति और श्वसुर की हत्या हो जाने पर वह एक बार फिर सड़क पर आ गयी। जहां से भाग्य ने उसे फिर दिल्ली ला पटका। जहां उसे अपना गुजारा जामा मस्जिद की सीढियों पर भीख मांग कर करना पड़ा।

ऐसी ही अनेक दुर्दशाओं में एक दास्तान है बादशाह जफर की एक और पोती गुलबदन की। बादशाह का उस पर असीम स्नेह था। महल में उसकी तूती बोलती थी। उसके एक इशारे पर वारे न्यारे हो जाते थे। पर वक्त की मार। जान बचाने के लिए अपनी मां के साथ भागते-भागते महीनों इधर-उधर बदहाली की अवस्था में छुपते-छुपाते जैसे-तैसे अपने दिन निकाल रही थी। अंग्रेजों के ड़र से कोई भी उन्हें शरण देने को तैयार न था। अक्सर उन्हें फाका करना पड़ता था। इसी कारण उसकी मां बिमार रहने लगी। ऐसे में ही चिराग दिल्ली की एक दरागाह में आंधी-पानी से बेहाल उसकी मां ने दम तोड़ दिया। गुलबदन अपनी मां से बेहद प्यार करती थी। उसकी मौत पर वह रात भर उससे लिपट कर रोते-रोते ऐसी मुर्च्छित हुई कि फिर उसे भी होश नहीं आया। कहते हैं दोनों मां बेटी के शरीर जंगल के जानवरों की खुराक बन गये।

नवरात्र के दूसरे दिन माँ के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा होती है.

पहले एक बात कहना चाहता हूं। आम लोगों की तरह, वही कुछ रटे-रटाए श्लोकों को छोड़ (उन्हें भी लिखना पड़े तो शायद पसीना आ जाए) संस्कृत में मेरा हाथ तंग ही है। सो इन नौ दिनों के "संकलन" में यदि कोई गल्ती, गल्ती से हो जाए तो क्षमा करेंगे।

नवरात्र के दूसरे दिन "माँ ब्रह्मचारिणी" की आराधना की जाती है। पुराणों के अनुसार पर्वत राज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद नारद मुनी के उपदेश से इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। पहले कंद मूल फिर शाक और फिर सिर्फ़ जमीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को ग्रहण करते हुए अहर्निश भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने पत्रों का भी त्याग कर दिया, जिससे उनका एक नाम "अपर्णा" भी पड़ा। हजारों साल तक चली इस साधना के कारण तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। उनके इस कृत्य से चारों ओर उनकी सराहना होने लगी थी। इस पर ब्रह्माजी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इनका नाम तपकारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी पड़ा।

माँ दुर्गा का यह रूप भक्तों और सिद्धों को अनंतफल देने वाला है। जीवन के कठिन समय में भी हतोत्साहित ना होने देने वाली, वैराग्यवत साहस देने वाली, सदाचार से जीवन व्यतीत करने वालों का साथ देने वाली, अपने कर्तव्य पथ से विचलित ना होने देने वाली अति दयालु माता हैं।इस दिन साधक का मन "स्वाधिष्ठान चक्र" में स्थित होता है। योगी उनकी कृपा तथा भक्ती पूर्ण रूप से प्राप्त करता है।

दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

माँ का स्वागत करें

मेहमानों की आवाजाही से हमारे यहां तो रौनक लगी रही। पहले तो गणपतजी पधारे, वैसे तो उनसे संपर्क बना रहता है पर उनका आना साल में एक बार ही हो पाता है। काफी व्यस्त रहते हैं। उनकी आवभगत में समय का पता ही नहीं चल पाया। उनके जाने के दूसरे दिन ही पितरों का आगमन हो गया, कल ही उनकी विदाई हुई और आज माँ के स्वागत का सौभाग्य प्राप्त हो गया। अपनी तो मौजां ही मौजां।

आज से नवरात्र पर्व शुरु हो रहे हैं। आप सब को भी माँ का ढ़ेरों- ढ़ेर प्यार और आशीष मिले। इन नौ दिनों में माँ के नौ स्वरुपों की पूजा होती है। आज पहला दिन है और आज माँ का "शैलपुत्री" के रूप में पूजन होता है। पर्वत राज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका यह नाम पड़ा। इनका वाहन वृषभ है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित रहता है। इनका विवाह भी भगवान शिवजी से ही हुआ। नव दुर्गाओं में प्रथम, माँ शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत मानी जाती हैं। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का शुभारंभ होता है

वन्दे वाच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।।

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

इज्जत बचाने के लिए कुछ भी करेगा

हम में से अधिकांश लोगों का यह सोचना है कि आज के खिलाड़ियों को पिछले समय से ज्यादा धन प्राप्त होता है। इसका कारण भी है कि कुछ ही सालों पहले, अभी सोने की खन बने क्रिकेट को खेलने वाले खिलाड़ी सायकिलों पर खेलने आया जाया करते थे और दो-तीन सौ रुपयों के लिए अकड़ु क्लर्क के सामने खड़ा रहना पड़ता था। पर कैलिफोर्निया विश्विद्यालय के प्राध्यापक डा.डेविड यंग ने अपनी खोजों से जो बातें दुनिया के सामने रखी हैं वे हैरतगेंज हैं। डा.यंग बताते हैं कि ईसा से पहले प्राचीन ग्रीक औलंपिक में रोमन खिलाड़ी ढाई लाख पौंड सालाना के बराबर पैसा कमा लेते थे। उस समय एक जीत हासिल करने पर उन्हें ताउम्र दस हजार पौंड के बराबर पेंशन मिला करती थी। अच्छे खिलाड़ियों के लिए एक साल में पांच-सात जीत हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं थी।
डा. यंग के अनुसार उस समय खेलने वालों को सिर्फ पैसा ही नहीं मिलता था बल्कि उन्हें आजीवन मुफ्त खाना, रहना तथा अन्य कीमती उपहार भी प्राप्त होते रहते थे।
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ऊपर बात थी अपनी मेहनत के बल पर कुछ प्राप्त करने की। अब देखीए ईर्ष्या के कारण चीजें इकट्ठी करने की लत।

किश्तों पर अपना सामान बेचने वाली एक फर्म ने बोस्टन की अदालत में मिसेज फोरमैन से अपना सामान वापस लेने के लिए मुकदमा दायर किया था। फर्म का कहना था कि मिसेज फोरमैन ने उनकी फर्म से वाशिंग मशीन, रेफ्रिजेटर, वैक्यूम क्लीनर, रंगीन टी.वी., हेयर ड्रायर जैसा सामान ले तो लिया पर उसकी एक भी किश्त नहीं चुकाई।
मजे की बात यह कि यह सारा बिजली का सामान लिया तो गया पर उनके घर पर बिजली का कनेक्शन ही नहीं था। जज ने हैरान हो पूछा कि जब आपके घर में बिजली नहीं थी तो आपने इतने सारे बिजली से चलने वाले उपकरण क्यों खरीदे?
इस पर मिसेज फोरमैन ने जवाब दिया, सर मेरी सारी पड़ोसनों के पास ऐसी सारी चीजें थीं जिनकी बातें सुन मुझे शर्म आती थी इसलिए मैने ये सारी चीजें ले लीं।
जज ने पूछा आपके पति ने आपको कभी मना नहीं किया इस बात के लिए?
जी कभी नहीं। उन्होंने भी तो इस फर्म से इलेक्ट्रिकल रेजर खरीदा है। मिसेज फोरमैन का जवाब था।


कैसी लगी यह हिमाकत बताईयेगा।

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

अब तो सिर्फ खेलों की सफलता की कामना है.

तमाम आरोपों, प्रत्यारोपों, शंकाओं के बावजूद कामनवेल्थ खेल समय पर शुरु हो गये। और क्या खूब शुरू हुए। इतना भव्य, सुंदर, दिल मोह लेने वाला नजारा बहुत कम देखने को मिलता है। दूरदर्शन पर प्रसारित सारे मंजर को लोग मंत्रमुग्ध हो देखते रहे। जिनमें मैं भी था।

अपने दिल की एक बात उजागर करता हूं। सोच कर हंसी भी आती है पर पूरे प्रसारण के दौरान यही प्रार्थना करता रहा कि प्रभू देश की लाज रखना। कहीं ऐसा ना हो कि यह 25 मीटर ऊपर टंगा गुब्बारा या उसमें टंगी कठपुतलियाँ नीचे आ गिरे। भगवान ने मेरी तो सुन ली पर कलमाड़ी की नहीं सुनी। लोगों ने उसके खड़े होते ही जो हूटींग करनी शुरु की उसका प्रभाव उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। लगता है लोगों को सुरक्षा बल द्वारा शांत करवाया गया होगा।

मैं उन सब कलाकारों को हार्दिक बधाई देना चाहता हूं जिन्होंने अपने मनोबल को तरह-तरह की खबरों के बीच भी बनाए रखा और ऐसी प्रस्तुति दी कि दुनिया देखती रह गयी। नमन है उस रात को यादगार बनाने वाले सारे कलाकारों को।

अब आशाएं टिकी हैं अपने खिलाड़ियों पर जो देश का नाम रौशन करने के लिए उतावले हैं।

जय हिंद।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

कहाँ गए ऐसे लोग

उन दिनों गांधीजी तथा सरदार पटेल नरवदा जेल में थे। दोनों सुबह-सुबह नीम की दातुन किया करते थे। इसके लिए पटेल वहीं के पेड़ से रोज दातुन बना लिया करते थे। यह देख गांधीजी ने कहा, रोज-रोज दातुन लाने की जरूरत नहीं है। इस्तेमाल किया हुआ हिस्सा काट देने से दातुन बहुत दिनों तक चल सकती है। पटेल ने कहा, पर यहां नीम की बहुत सी टहनियां उपलब्ध हैं। गांधीजी ने कहा, हैं तो पर हम उनका दुरुपयोग तो नहीं कर सकते।
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एक बार गांधीजी तथा सरोजिनी नायड़ू आगा खां महल में थे। एक दिन सरोजिनीजी ने गांधीजी को अपने साथ बैड़मिंटन खेलने को कहा। सरोजिनीजी के दाहिने हाथ में कुछ तकलीफ थी सो उन्होंने अपने बायें हाथ में रैकेट थाम रखा था। इसे देख बापू ने भी अपने बायें हाथ में रैकेट पकड़ लिया। इसे देख सरोजिनीजी हंस पड़ीं और पूछने लगीं कि आपने बायें हाथ में रैकेट क्यों पकड़ा है? बापू बोले, तुमने भी तो बायें हाथ में ले रखा है। सरोजिनी बोलीं कि मेरे तो दाहीने हाथ में दर्द है इसलिए मैंने उसे बायें हाथ में लिया है। बापू ने तुरंत जवाब दिया, मैं तुम्हारी कमजोरी का लाभ नहीं उठाना चाहता।
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उन दिनों लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधान मंत्री थे। तभी एक प्रतिष्ठित व्यापारिक प्रतिष्ठान से उनके बड़े पुत्र हरिकृष्णजी को नौकरी की पेशकश की गयी। हरिकृष्णजी ने इसके बारे में अपने पिता लाल बहादुरजी को जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव मेरे प्रधान मंत्री होने के कारण आया है अब यह तुम्हारे विवेक पर निर्भर करता है कि तुम यह काम करो या ना करो। यदि तुम समझते हो कि यह काम तुम्हारी लियाकत के अनुरूप है तो जरूर जाओ अन्यथा नहीं।हरिकृष्णजी ने भी बिना एक क्षण गवांए तुरंत संस्थान को मना कर दिया।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

इस सप्ताह मेरे जैसा ही कुछ तो नहीं दिया आपने दूसरों को ?

आजकल "देने के सुख का सप्ताह" यानि Joy of giving week चल या चलाया जा रहा है। जो याद दिला रहा है कि कुछ दान दक्षिणा करो भाई देखो कितना सुख मिलता है (किसे? खरीदना तो बाजार से ही है ना :-)) याद करो तुम्हारे पूर्वज कैसा-कैसा दान करते थे, देते-देते खुद नंगे-भिखमंगे हो जाते थे। बहुतों ने तो इस सुख के लिए अपनी जान तक गंवा दी थी। कयी रसातल में जा पहुंचे थे। बहुतों ने तो अपना परिवार तक गंवा दिया था। तुम भी सोचो मत दूसरों को कुछ तो दो।

इस समझाइश से थोड़ा जागरुक हो कर अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो पाया कि प्रकृति और भगवान जैसी दार्शनिकता को छोड़ भी दें तो भी कोई ना कोई कुछ ना कुछ तो दे ही रहा है। और बदले में खुश हो रहा है।
कुंठाई देने लेने को देखें तो नेता वर्षों से आश्वासन देता आरहा है और परिवार समेत खुश रहता है। कारोबारी प्रलोभन देता है और अपनी खुशी का इंतजाम करता है। छोटे व्यापारी तीन के बदले चार जैसा कुछ देते हैं, देने वाला जेब कटवा कर और लेने वाला दाम बना कर खुश हो जाते हैं।

पर कहीं-कहीं आपको सचमुच कुछ देकर भी खुश होने वाले लोग हैं। जिनसे आप रोज कुछ पाते हैं पर ध्यान नहीं देते। बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं जिससे आपको संबल मिलता है, मनोबल बना रहता है। पत्नी मुस्कान देती है, आपका हाथ बटाती है, घर-घर लगता है। भाई-बहन स्नेह देते हैं। बच्चे प्यार देते हैं। आपका जीवन सुखमय बना रहता है।
इतना सब मनन-चिंतन कर मैंने सोचा कि देखूं तो मैंने क्या दिया है दूसरों को? कुछ समझ नहीं आया, फिर थोड़ा ध्यान लगाया, याद किया सुबह से अपनी गतिविधियों को तो पाया कि सुबह से मैं भी बहुत कुछ देता आ रहा हूँ सभी को।
सबेरे मां पापा को बिना मिले, बताए निकल आया था, चिंता सौंप आया अब दिन भर फिक्र करेंगे कि गुमसुम सा गया है सब ठीक-ठाक हो।
महीने का अंत है, पर्स कहता है मुझे हाथ मत लगाओ, पत्नी परेशान थी कुछ जरूरी खरीदारी करनी थी, ड़पट दे कर आया था।
बच्चे तना चेहरा देख दुबके रहे भारीपन महसूसते तो होंगे ही।
दफ्तर आ कर दो-चार को हड़कान दी बेवजह तनाव बनाया।
काम जरूरी था। बास सोच रहा था शर्मा आएगा तो हो जाएगा। उसे भी टेंशन थमा दिया कि आज तो पूरा नहीं ही हो पाएगा।

लगा मुझे यह कैसा है मेरा देना? जो चारों ओर तनावयुक्त माहौल बनाता है। सभी को तो कुछ ना कुछ तो दिया ही पर कोई भी खुश नजर नही आता। यहां तक कि मैं खुद अजीब सा महसूस कर रहा हूं। सिर भारी हो गया है। धड़कनें तेज हो रही हैं। रक्त-चाप बढा हुआ लग रहा है। थकान हावी है। यह कैसा सुख है देने का?
सोचीए ध्यान से कहीं आप भी तो मेरी तरह ऐसा ही कुछ तो नहीं दे रहे दूसरों को ?

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