pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

प्रेम प्रसंग, फिल्मी दुनिया के

आजकल फिल्मी दुनिया में इश्क भी एक जरिया या माध्यम हो गया है। अपनी सहूलियत, अपने मतलब, अपने फायदे के लिये इसका उपयोग होने लगा है। इश्क में से प्रेम की गहराई गायब हो गयी है। मौजूदा पीढी की वफादारी एक शुक्रवार से दूसरे शुक्रवार तक सीमित हो कर रह गयी है। सामाजिक या पारिवारिक मर्यादाओं का इस दुनिया में कोई स्थान नहीं रह गया है। हमारा लचर कानून भी इनके दरवाजे की दहलीज लांघने की हिम्मत नहीं कर पाता है। आज किसी विवाहित प्रेमी का बसा बसाया घर उजाड़ने में किसी अभिनेत्री को कोई परहेज, ड़र या गम नहीं होता। अब तो बात और भी आगे बढ गयी है "लीव इन रिलेशनशिप" तक।

ऐसा नहीं है कि प्रेम प्रसंग पहले नहीं होते थे। समझ लीजिए कि फिल्मों की शुरुआत के साथ-साथ ही इस रोग का भी जन्म हो गया था। पर उस समय यह मतलब पूरा करने का जरिया ना हो कर आपसी समझ थी, लगाव था, साथ-साथ रहने की ललक थी। बहुत पीछे ना जाते हुए आजादी के बाद के कुछ जाने-माने नामों का जिक्र करते हैं। जिनमें कुछ सफल रहे तो कुछ दुखांत।

जद्दन बाई और मोहन बाबू : जद्दन बाई सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिस की मां थीं। वह अपने समय की मशहूर गायिका थीं। मोहन बाबू पंजाब से थे। दुनिया, धर्म, परिवारवालों की इच्छा के विरुद्ध जा कर दोनों ने विवाह कर लिया था। जो सदा सुखमय रहा था।

किशोर शाहू तथा स्नेहप्रभा प्रधान : किशोर शाहू जाने माने अभिनेता (दम मारो दम, गाइड) तथा फिल्म निर्माता थे तथा स्नेहलता उनकी नायिका, दोनों ने प्रेम विवाह किया था जो सफल नहीं हो सका था। दोनों में तलाक हो गया था।

राज कपूर और नर्गिस : शादी-शुदा होने के बावजूद राज कपूर का नर्गिस के साथ लगाव जग जाहिर था। पर सामाजिक-पारिवारिक दवाब के कारण यह कोई और नाम धारण ना कर सका था।

शम्मी कपूर व गीता बाली : शम्मी कपूर शुरु से ही विद्रोही स्वभाव के रहे थे। हजार अड़चनों के बावजूद उन्होंने गीता बाली से विवाह रचा ड़ाला था। पर गीता बाली की कुछ समय बाद बिमारी से मृत्यु हो गयी थी।

देवानंद और सुरैया : शायद फिल्मी दुनिया की यह सबसे दुखद कहानी रही है। दोनों के लाख प्रयासों के बावजूद उनकी शादी नहीं हो सकी। देव ने तो बाद में शादी कर ली पर सुरैया जीवनपर्यंत कुवांरी ही रही।

दिलीप कुमार और मधुबाला : मधुबाला का प्रेम प्रसंग पहले प्रेमनाथ के साथ था। पर अपने दोस्त दिलीप कुमार के कारण प्रेम नाथ ने अपने पैर पीछे खींच लिए थे। पर फिर भी मधुबाला के घर वालों की वजह से दिलीप और उसका निकाह नहीं हो सका था।
नाम तो बहुत सारे हैं, रणधीर कपूर-बबीता, ऋषी कपूर-डिंपल, अमिताभ-रेखा, अक्षय-रविना, अभिषेक-करिश्मा, और और और, जो साथ साथ काम करते-करते एक दूसरे में अपना जीवन साथी खोजते रहे। जिसमे कुछ सफल रहे तो कुछ असफल । बहुतों ने लायक ना होते हुए भी अपनी प्रेमिकाओं के लिए ढेरों फिल्में गढ डालीं जैसे चेतन आनंद और प्रिया राजवंश या व्ही. शांताराम और संध्या। यह दुनिया ही अजूबा है जिसमें ऐसी बातें होती रही थीं, होती रही हैं और होती रहेंगी।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

है मथुरा तीनों लोकों से न्यारी पर वृन्दावन की है बलिहारी

दिल्ली से करीब 150 कि. मी. की दूरी पर स्थित मथुरा भगवान श्रीकृष्ण की जन्म भूमि है। पर उनका कर्म स्थल वृंदावन है जो मथुरा से सिर्फ 10 कि.मी. उत्तर-पश्चिम में यमुना के किनारे बसा हुआ है। तुलसी के पौधों की भरमार होने के कारण इस जगह का नाम वृंदावन पड़ गया। यह ब्रज का ह्रदय स्थल है। भक्तगण यहां आकर आनंद सागर में ड़ुबकी लगा कर कृत्य-कृत्य हो जाते हैं। हर कृष्ण भक्त की इच्छा होती है जीवन में कम से कम एक बार यहां आकर धन्य होने की।
यही वह जगह है जहां प्रभू ने अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में अनगिनत लीलाएं कर जन जीवन को सुगम बनाया था। यहां आकर पता चलता है कि प्रेम और भक्ति का साम्राज्य किसे कहते हैं। दर्शनार्थियों के लिए यहां बहुत सारे नये और प्राचीन मंदिर हैं।

श्री गोविंद मंदिर : यह बहुत प्राचीन मंदिर है। इसे जयपुर के राजा मानसिंह ने बनवाया था।

श्री रंगजी का मंदिर : दक्षिणी स्थापत्य शैली पर बने इस अति सुंदर और विशाल मंदिर को बनने में करीब सात साल लगे थे। मंदिर प्रांगण में स्थित सोने का ध्वज स्तंभ देखने लायक है।

बांके बिहारीजी का मंदिर : स्वामी हरिदासजी द्वारा निर्मित यह एक और दर्शनीय मंदिर है। यहां स्थापित अति आकर्षक मूर्ति को चमत्कारी माना जाता है।

राधा गोविंदजी का मंदिर : इसे ग्वालियर के महाराज जीवाजी राव सिंधिया ने अपने गुरु के आदेश पर 1860 में बनवाया था। इसे ब्रह्मचारीजी का मंदिर भी कहते हैं।

युगल किशोर मंदिर : इस मंदिर की मूर्ति भी बहुत सुंदर और मनोहारी है।

लाला बाबू का मंदिर : बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जमींदार कृष्णचंद्र द्वारा निर्मित यह मंदिर भी देखने वालों को मोह लेता है। अपने निर्माता के उपनाम पर यह मंदिर प्रसिद्ध है।

श्रीकृष्ण-बलराम मंदिर : इसे कृष्ण भावना संघ समुदाय द्वारा बनवाया गया है। यहां अनेक विदेशी भक्त वैष्णव धर्म में दीक्षित होकर निवास करते हैं। इसीलिए इसे अंग्रेजों का मंदिर भी कहा जाता है।

इन प्रमुख मंदिरों के अलावा भी अनेकोंनेक मंदिर वृंदावन में देखने लायक हैं जैसे जयपुर वाला मंदिर, पगला बाबा का मंदिर, जानकी-वल्लभ मंदिर, शालिग्राम मंदिर, गोपेश्वर मंदिर, राधा रमण मंदिर तथा कांच का मंदिर आदि।
इसलिए जब भी जाएं समय हाथ में रख कर जाएं हड़बड़ी में बहुत कुछ देखने से छूट सकता है।

जय श्रीकृष्ण।
बोलो बांके बिहारी की जय।
सबको जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं।

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

"पीपली को लाइव" कर अनुष्का ने नाम और दाम दोनों का जुगाड़ बैठा लिया

पीपली लाइव देख ड़ाली। ना ही देखी जाती तो ठीक था। पर गल्तियां तो सभी से होती हैं। हो गयी हमसे भी। पर दाद देनी पड़ेगी अनुष्का की हिम्मत की । पहले तो आमिर को वश में किया फिर जैसे-तैसे जुगाड़ लगा बहुत सारे मंत्रियों व संत्रियों को भी फिल्म का डोज पिलवा कर नाम और दाम दोनों पा लिए। इसे कहते हैं "मार्केटिंग"।
आगे चलने से पहले दो बातें।

वर्षों पहले श्री सत्यजीत रे ने एक फिल्म बनाई थी "गुपी गाईन बाघा बाईन"। जब पिक्चर रिलीज हुई तो उसके बारे में बड़े-बड़े दिग्गज समिक्षकों ने एक से बढ कर एक समीक्षा लिख मारी। सत्यजीत साहब की फिल्म एवंई तो हो नहीं सकती इसीलिए किसी को उसमें गहरी राजनीति नजर आई तो किसी को भ्रष्ट नेतागिरी किसी ने उसमें दार्शनिकता खोज डाली तो किसी ने अपने देश की उसमे दिखाए राज्य से तुलना कर डाली। हफ्ते भर बाद जब सत्यजीतजी से फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि "मैंने कोई गूढ बात इस फिल्म द्वारा नहीं कही है। यह विशुद्ध बच्चों की फिल्म है जिसकी कहानी वर्षों पहले मेरे नानाजी ने लिखी थी।"

एक थे ख्वाजा अहमद अब्बास। धुरंधर कहानीकार। उनकी कहानियों पर जब-जब राजकपूर ने फिल्में बनाईं वे सुपर हिट हुईं। पर जब-जब अब्बास साहब ने खुद अपने हाथ आजमाए तब-तब फिल्म कब आई कब उतरी किसी को पता भी नहीं चला।

आमिर का लगता है कि महिला पत्रकारों के लिए उनके दिल में कोई कोना सदा सुरक्षित रहता है। जहां जा कभी बरखा अपना हित साध लेती है तो कभी अनुष्का।
आमिर का नाम अपनी फिल्म से जोड़ कर इस चतुर महिला ने अपनी पहचान बनवा ली। पर देखा जाए तो एक अच्छे भले विषय की ऐसी की तैसी हो गयी है। कहानी कहना, सुनाना अलग बात है पर उसको फिल्माने के लिए दक्षता का होना बहुत जरूरी होता है। कैमरे की कलम से जब झरने की कलकल सी कहानी गढी जाती है तो उसका जादुई असर पड़ता है देखने वाले पर। इसी कहानी को यदि किसी निष्णात हस्ति ने या खुद आमिर ने फिल्माया होता तो इस व्यंग्य की धार इतनी पैनी होती कि देश में ऐसा माहौल बनाने वालों की बखिया उधड़ जाती। पर इसमें तो अभद्र और वाहियात संवादों और बेमतलब की गंदी गालियां ड़ाल अपने को बिंदास दिखा तुरंत मशहूर होने की फूहड़ कोशिश की गयी है वह भी एक महिला निर्देशक द्वारा।

इसके अलावा पता नहीं परफेक्टनिष्ट कहलाने वाले आमिर की नजर नत्थे की पत्नी के किरदार पर कैसे नहीं पड़ी। एक गरीब, फटेहाल, दाने-दाने को मोहताज किसान परिवार, जिसके पुरुषों के गंदे कपड़े, धूल भरे चेहरों पर बेतरतीब बढे बिना कंघियाए बाल और झाड़-झंखाड़ की तरह उगी दाढियां अपनी बदहाली का बखान करती नजर आती हैं वहीं नत्थे की बीवी की "भवें" अभी अभी तराशी गयीं लगती हैं। इतना ही नहीं उसके चेहरे का मेक-अप और सलवट रहित साड़ियां निर्देशक की कमजोरी की चुगली खाती नजर आती हैं। एक मरभुक्खे परिवार की महिला को क्या अपनी भवें तराशने या चेहरा पोतने की मोहलत मिल भी पाती है कभी?

सही बात है यदि कैमरे से कहानी में रंग भरना इतना ही आसान होता तो आज हर ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे का नाम आसिफ, राज कपूर, गुरुदत्त, बिमलराय या ऋषिकेश मुखर्जी के साथ लिखा नजर आता।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

तब फिल्मों में स्त्री पात्र का होना एक अजूबा था.

फिल्मी पर्दे को छोड़ दें, वह तो बहुत बड़ी बात है, टीवी के छोटे पर्दे पर भी अपना चेहरा दिखाने और खुद अवतरित होने के लिए आज की कन्याएं कुछ भी करने को आतुर और लालायित रहती हैं। पर क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है कि जब भारत में फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के को अपनी पहली फिल्म, वह भी धार्मिक, के लिए महिला कलाकार की जरूरत पड़ी तो उन्हें दांतों तले पसीना आ गया था। कोई भी महिला या उसका परिवार अपने घर की युवती को इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। थक-हार कर उन्होंने अपनी बेटी से ही वह भूमिका करवाने की सोची पर वह उस भूमिका के लिए काफी छोटी थी। आखिर मजबूर हो उन्हें इस भूमिका के लिए एक होटल में रसोइये का काम करने वाले सालुंके नामक युवक को राजी करना पड़ा था। वैसे उस समय रंगमंच पर स्त्री पात्रों का काम भी पुरुष पात्र निभाया करते थे। क्योंकि उस समय भले और सभ्रांत घर की बहू-बेटियों के लिए ऐसे काम करना अलिखित रूप से वर्जित माना जाता था।
इसी कारण जब दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म "लंका दहन" बनाई तो उसमें भी पुरुष और महिला किरदारों को सालुंके ने ही निभाया था।

पता नहीं यह स्थिति कब तक बनी रहती यदि उस समय बंबई में दफ्तरों इत्यादि में कार्यरत एंग्लो-इंड़ियन युवतियां फिल्मों में दिलचस्पी लेना शुरु ना कर देतीं।

आज तो यह सुन-पढ कर भी आश्चर्य होगा वर्तमान पीढी को।

शनिवार, 28 अगस्त 2010

बिना शीर्षक के

कल एक खबरिया चैनल बता रहा था कि तिरुपति में बालाजी के मंदिर में चढावे के सोने के गहनों को नकली जेवरों से बदल दिया गया। सोने के लाखों रुपये के सिक्कों में हेराफेरी हुई है।

वर्षों पहले कलकत्ते में, शक्ति के रूपों में भी सबसे भयंकर, मां काली की सोने की जीभ चुरा ली गयी थी।

मंदिरों, पूजास्थलों या म्यूजिमों से देवी-देवताओं की मूर्तियां अक्सर चोरी हो ऊंचे दामोँ में बिकती रहती हैं।

पूजास्थलों में एक ही चढावा घूम-फिर कर बार-बार चढता रहता है।

क्या आस्था, ड़र, विश्वास सब तिरोहित होता जा रहा है? स्वर्ग, नर्क, अगला जन्म, यह सब छोड़ आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

रानी लक्ष्मी बाई की सखी झलकारी, इतिहास मौन है जिसके बारे में

"झलकारी", महारानी लक्ष्मीबाई का दाहिना हाथ, समर्पण और वफादारी का दूसरा नाम। अपने देश और सहेली के लिए जिसने अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। पर इतिहास ने उसे उतनी तवज्जो नहीं दी जितने की वह हकदार थी............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
झांसी की रानी की सेना के एक सिपहसालार पूरन कोली की पत्नी थी झलकारी। शादी के बाद जब दोनों अपनी रानी का आशिर्वाद लेने महल में गये तभी उसे देख वहां उपस्थित सारे लोग दंग रह गये थे। एकदम लक्ष्मी बाई का प्रतिरूप थी वह। वैसे ही नैन-नक्श, वैसा ही कद , वैसी ही रंगत, वैसी ही कद-काठी। रानी भी उसे देख हैरान हो गयी थी। उसी दिन से उसे रानी ने अपनी सहेली बना लिया था। तब ही से शुरु हो गया था झलकारी का प्रशिक्षण। उसे घुड़सवारी, सैन्य संचालन, अस्त्र-शस्त्र चलाने की विधिवत शिक्षा रानी ने अपनी देख-रेख में दिलवानी आरम्भ करवा दी थी। दोनों जब साथ-साथ निकलती थीं तो पहचानना मुश्किल हो जाता था कि कौन, कौन है?

वैसे भी झलकारी बचपन से ही निड़र और बहादुर थी। एक बार किशोरावस्था में ही उसने अपनी सहेलियों की रक्षा एक दुर्दांत बाघ को सिर्फ कुल्हाड़ी से मार कर की थी। पूरन कोली ने भी उसकी ख्याति सुन और उसकी बहादुरी से प्रभावित हो कर उससे शादी की थी।

सन सत्तावन का युद्ध शुरु हो चुका था। झलकारी रानी के कंधे से कंधा मिला कर युद्ध में भाग ले रही थी। एक दिन रणभूमि में रानी अंग्रेजों से बुरी तरह घिर गयीं। वह अपने दोनों हाथों में तलवार लिए अंग्रेज सैनिकों को गाजर मूली की तरह काटे जा रही थीं। पीठ पर दतक पुत्र दामोदर बंधा हुआ था। उनकी तलवार जिधर घूम जाती उधर ही नर मुंड़ भूलुंठित हो जाते थे। पर अंग्रेजों का घेरा धीरे-धीरे कसता जा रहा था। इतने में झलकारी की नजर मुसीबत में घिरी अपनी सखी पर पड़ी। तुरंत उसने उधर का रूख कर घेरा तोड़ा और रानी के पास जा पहुंची। भयंकर मार-काट मच गयी पर धीरे-धीरे संकट गहराने लगा था। मौके की नजाकत को देख झलकारी ने रानी को निकल जाने के लिए कहा। पर रानी कहां मानने वाली थीं। पर सारे ऊंच-नीच समझा कर, दामोदर की दुहाई दे कर किसी तरह उन्हें मना लिया गया। रानी ने अपना चेहरा कपड़े से ढक लिया और झलकारी ने अपना चेहरा उघाड़ लिया। अंग्रेजों को धोखा दे रानी अपने कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ रणभूमि से निकल गयीं, फिर तैयारी कर अंग्रजों से लोहा लेने के लिए। इधर झलकारी ने साक्षात रणचंडी का रूप धारण कर लिया। पर अंग्रेज भी ऐसा मौका चूकना नहीं चाहते थे, रानी को जीवित गिरफ्तार करने का। आखिरकार झलकारी बंदी बना ली गयी। अंग्रेज अपनी इस सफलता पर फूले नहीं समा रहे थे। उसे सेनाध्यक्ष रोज के सामने ले जाया गया। पर कुछ हिंदोस्तानी सैनिकों ने झलकारी को पहचान कर असलियत बता दी। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पहले तो झलकारी को मृत्यु दंड़ दिया गया पर बाद में उसे आजीवन कैद की सजा सुनाई गयी। जहां जेल में अमानुषिक यातनाओं से उसकी इहलीला समाप्त हो गयी।

हालांकि झलकारी अंग्रेजों की दुश्मन थी, फिर भी अंग्रेज अधिकारी उसकी वीरता, साहस, रणकुशलता और शौर्य की प्रशंसा किए बगैर नहीं रह सके। अपने उच्चाधिकारियों को भेजी गयी सूचना में उसकी खुल कर प्रशंसा की गयी थी।

पर अपना इतिहास पता नहीं क्यों मौन साधे है उस विरांगना के प्रति ?

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

यह सलाह नहीं चेतावनी है

जैसा देश वैसा भेष यह कहावत तो आपने जरुर सुनी होगी पर एक बात की और गाठं बांध लें, जहां भी रहते हैं वहां की भाषा जरूर सीख लें और कोशिश करें कि स्थानीय लोगों से उनकी ही भाषा में बात कर सकें। पता नहीं आप की किस बात का क्या अर्थ निकाल कर क्या अनर्थ कर दिया जाए। मजाक नहीं है खुद ही देख लें :-

अमेरिका में रह रहे एक हिंदुस्तानी भाई को सड़क पर ही दिल का दौरा पड़ गया। उन्हें तुरंत अम्बुलेंस सेवा मुहैय्या करवाई गयी। अपने यह सज्जन धार्मिक प्रवृति के थे सो वह लगातार "हरि ओम, हरि ओम" का जाप कर रहे थे। अम्बुलेंस वाले उन्हें ले उनके घर पहुंच गये। स्वाभाविक ही था कि उनकी पत्नि उन्हें इस हालात में देख चीख पड़ीं कि आप लोग इन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय यहां घर क्यों ले आए ?

"मैडम, इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। सर लगातार "हरी होम, हरी होम" बोले जा रहे थे। हमें लगा कि यह पहले घर जाना चाहते हैं। सो................

विशिष्ट पोस्ट

व्यक्ति पूजा

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन  उस दिन उन महाशय के आक्षेप के बाद,  मैं जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर ग...