pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 7 जुलाई 2010

भृंगराज, एक छोटा सा पक्षी जिससे बाघ परेशान रहता है.

भृंगराज और बाघ का जंगल में छत्तीस का आंकड़ा है। पता नहीं बाघ के शिकार पर इसे इतना एतराज क्यों होता है,  जिसके कारण  कई बार बाघ को अपनी भूख मिटाना  दुश्वार हो जाता है !  


कहां जंगल का अधिपति बाघ और कहां एक छोटा सा पक्षी। किसी भी तरह का कोई मेल नहीं। पर यह सच है कि जंगल में बाघ को एक चिड़िया सदा परेशान करती रहती है। इसका नाम है भृंगराज। इससे बाघ ही नहीं शेर, चीते, तेंदुए वगैरह मांसभक्षी जानवर बहुत परेशान रहते हैं। परेशानी की तो बात ही है जब भी ये भाईलोग अपने शिकार पर निकलते हैं तभी यह महाशय उनके साथ-साथ या आगे-आगे शोर मचाते चलने लगते हैं, जिससे हिरण, नीलगाय वगैरह समझ जाते हैं कि उनका शिकारी आसपास है और वे चौकन्ने हो जाते हैं। इसकी इसी खूबी के कारण देश के कई हिस्सों में इसे कोतवाल, यानि पहरेदार,  कह कर भी जाना जाता है। 


भृंगराज गहरे नीले-काले रंग का एक कलगी धारी सुंदर पक्षी है। इसकी आवाज भी बहुत मधुर होती है। पता नहीं इसे बाघ से इतनी चिढ क्यूं है।  बेचारा बाघ जब भी अपने भोजन की तलाश में शिकार करने निकलता है भृंगराज उसके आने की सूचना प्रसारित कर उसके शिकारों को भगा देता है, और बाघ जैसा शक्तिशाली जानवर भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता क्योंकि वह सदा सुरक्षित दूरी पर रह कर ही अपने काम को अंजाम देता है।

प्रकृति का अजब खेल है कि जंगल में जहां बहुतेरे पशू-पक्षी एक दूसरे पर निर्भर करते हैं या एक दूसरे के काम आते हैं वहीं बाघ और भृंगराज का आपस में छत्तीस का आंकड़ा है।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

यहाँ गाय मछली खाती है

राजधानी दिल्ली के पास तेजी से महानगर का रूप लेता हरियाणा का शहर गुड़गांव। उसके पास 15 की मी के करीब है सुंदर मनोहर सुल्तानपुर नेशनल पार्क। जहां वर्षों से देश-विदेश के पक्षी आ कर बसेरा बनाते रहे हैं। इसी पार्क के बीच है (थी) एक खूबसूरत झील जो कभी 195 एकड़ में फैली हुई थी और उसमें सदा 5-6 फिट पानी भरा रहता था। आज यह सरकारी कर्मचारियों की अदूरदर्शिता के कारण बिल्कुल सूख कर हजारों हजार मछलियों के कब्रिस्तान में बदल गयी है। यहां, वहां, जहां, तहां सब जगह मरी हुई मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो गर्मी के कारण सड़ कर चारों ओर दुर्गंध फैला रही हैं। नाक पर रुमाल रखे बिना दो मिनट खड़े रहना दूभर हो गया है।

अफसरों का कहना है कि इस बार जाड़े में पानी कम बरसने के कारण झील सूखी है। पर वे यह नहीं बताते कि पहले ऐसा क्यूं नहीं हुआ। जब हर साल गर्मियों में गुड़गांव नहर से इसमें पानी की आपूर्ती की जाती रही है तो इस बार ऐसा क्यूं नहीं किया गया?
सच्चाई तो यह है कि इस झील में पाई जाने वाली "मागुर" मछली, जिसे काली अफ्रिकी मछली के नाम से भी जाना जाता है, को खत्म करने के लिए इसमें जानबूझ कर पानी नहीं छोड़ा गया। तर्क है कि मागुर बाकि छोटी-छोटी मछलियों को खा जाती थी जिससे बाहर से आने वाले पक्षियों को उनकी खुराक नहीं मिल पाती थी। पर कोई उनसे पूछेगा कि मागुर के साथ और हजारों मछलियों, मेढकों, घोंघो तथा और पानी में रहने वाले सैंकड़ों जीवों की क्यूं अकारण हत्या की गयी। इतना ही नहीं झील पर आश्रित बहुतेरे चौपाए भी मौत की कगार पर पहुंच गये हैं। और फिर मागुर को पालते वक्त ये "बुद्धिमान" लोग कहां थे? क्या इन्हें इस मछली के स्वभाव का पता नहीं था?

अब सुनिये इस जबरदस्त मानवी भूल का सबसे हौलनाक मंजर जिसे कहते बताते रौंगटे खड़े हो जाते हैं।
पूरे नेशनल पार्क में जगह-जगह मरी मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो धूप में सूख-सूख कर पत्तों जैसी हो गयी हैं। जिनको वहां घूमती गायों ने चारा समझ कर खाना शुरु कर दिया है।
मेरे पास फोटो नहीं है पर दिल्ली के टाइम्स आफ इंडिया पेपर में मछली खाती गाय का चित्र छपा है।

क्या उल्टे-सीधे निर्णय लेने वाले सफेदपोशों की आत्मा उन्हें धिक्कारेगी कभी ?

सोमवार, 5 जुलाई 2010

शाकाहारी, सब पर भारी

शाकाहार या मांसाहार, क्या ठीक है क्या नहीं इस बहस में पड़े बिना यदि ऐसी धारणा है कि मांसाहार से ताकत, बल या शरीर सौष्ठव बढता है तो क्या इस सत्य को नकारा जा सकता है -

1, हाथी :- स्थल का सबसे भारी जीव।
वजन करीब 6 टन।
ऊंचाई 15-16 फुट।
आहार - घास, पत्तीयां, फल इत्यादि।

2, गैंड़ा :- स्थल का सबसे ताकतवर जानवर। जिससे भिड़ने में शेर भी घबड़ाता है। जिसकी चमड़ी को बबदूक की गोली भी नहीं भेद सकती।
वजन करीब तीन टन।
आहार - पत्तीयां और हरी घास।

3, घोड़ा :- सबसे फुर्तीले जानवरों में से एक। वजन करीब 800 से 1000 किलो। मेहनती, ताकतवर आकर्षक।
आहार - घास, अनाज वगैरह।

4, जिराफ :- स्थल का सबसे ऊंचा जानवर।वजन करीब 1000 किलो। आहार - घास, पत्तियां और फल।

शनिवार, 3 जुलाई 2010

तलाक है कि मजाक है :-)

बैंकाक में एक किसान ने अदालत में अपनी बीवी को तलाक देने के लिए अर्जी दी। जानते हैं कब, अपनी शादी की 73वीं सालगिरह पर। और कारण बताया कि हम दोनों का स्वभाव मेल नहीं खाता।

जापान के एक पति महोदय अपनी पत्नी से तलाक लेकर इतने खुश थे कि इस दिन को हर साल मुक्ति दिवस के रूप में मनाया करते थे। वर्षों बाद ऐसे ही एक मुक्ति दिवस समारोह में उनकी मुलाकात अपनी उसी भूतपूर्व पत्नी से हो गयी।
फिर? फिर क्या, वे दोनो फिर पति-पत्नी बन गये।

सुप्रसिद्ध हालिवुड़ अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर और अभिनेता रिचर्ड़ बर्टन एक दूसरे से तीन-तीन बार तलाक लेने के बाद फिर-फिर आपस में शादी के बंधन में बंधते रहे थे।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

कुल्लू-मनाली जाएं तो "मलाणा" का चक्कर भी लगाएं

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अनोखे लोग, अनोखे रीति-रिवाज, अनोखे स्थल। ऐसी ही एक अनोखी जगह है, हिमाचल की पार्वती घाटी या रूपी घाटी मे 2770मी की ऊंचाई पर बसा गावं "मलाणा"।

विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तीक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो जरी नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा गांव तक पहुंचने में चारेक घंटे लग जाते हैं।

हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसे इस गांव, जिसका सर्दियों में देश के बाकि हिस्सों से नाता कटा रहता है, के ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं।

कुछ साल पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है। लोगों की आवाजाही बढ़ी है। पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। इनके मंदिर के प्रांगण में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है।

यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कोर्ट कचहरी का नाम भी नहीं सुना है।
वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है। भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है। वैसे नाम मात्र को चावल, गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा-क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

यह ब्लागवाणी को क्या हो गया है भाई ?

यह ब्लागवाणी को क्या हो गया है?
बीस-पच्चीस दिन दूर रहने के बाद अब जब भी इसे खोलता हूं तो वही 14जून का ही प्रवचन सुनने (देखने) को मिल रहा है। वहीं पर अटकी हुई मिलती है। कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है या कोई और कारण है समझ नहीं आ रहा है?
कृपया बताएंगे क्या?

कैटल क्लास और लगेज क्लास हमारी नियति

जब भी कभी हवाई यात्रा करनी हो तो मनाएं कि "पैसेज" की तरफ की सीट मिले। रेल यात्रा में चाहे ए सी 3टियर हो या स्लीपर भूल कर भी साईड वाली दो बर्थों का ना सोचें। ऐसा ना हो कि सफर, Suffer बन कर रह जाए।

शशि थुरूर की राजनीति से विदाई उनकी धूमकेतु रूपी चमक से संगी-साथियों की ईर्ष्या के कारण हुई या अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण यह बहस का विषय हो सकता है। पर वह इंसान ऐसा कड़वा सच बोलने पर क्यों मजबूर हुआ उस पर भी ध्यान देना उचित होगा। जिस-जिस ने आज की ललचाती दरों पर हवाई यात्रा की होगी वे भुग्तभोगी जानते ही होंगे कि घरेलू यात्रा के दौरान दो-तीन घंटे किस परिस्थिति में कटते हैं। बंधा हुआ सा बैठा रहता है यात्री। हिलने, ड़ुलने, यात्रा के दौरान एक बार उठने में भी हिचकिचाता हुआ चाहे प्रकृति की पुकार कितनी भी तीव्र हो।

बहुत पहले दूरदर्शन पर एक धारावाहिक आता था "राग दरबारी" उसमें एक बार एक सरकारी आदमी लोगों से परिवार को दो या तीन बच्चों तक सीमित रखने की पैरवी करता है। कथा का नायक उससे पूछता है कि इससे क्या होगा? तो पैरवी करने वाला उसे समझाता है कि मान लो तुमने घर में खीर बनाई, ज्यादा बच्चे होंगे तो खीर की कम मात्रा हिस्से मे आएगी, यदि कम बच्चे होंगे तो वे भरपेट खा सकेंगे। तो नायक पलट कर पूछता है कि खीर ज्यादा बनाने की जुगत क्यों नहीं करते? बच्चों के पीछे क्यों लट्ठ लिए पड़े हो?

अब एक उदाहरण ट्रेन का। पिछले दिनों अपने कार्यकाल मे श्रीमान लालूजी ने स्लीपर और वातानुकूलित डिब्बों में किनारे वाली शायिकाओं की संख्या बढवा कर दो से तीन करवा दी थीं। ना करवाने वाले ने उसमे कभी बैठना था ना करने वालों ने। अपने बेवकूफी भरे निर्णय पर कोई झांकने भी नहीं गया होगा। झूठी प्रशंसा पाने के चक्कर में जो गलत कदम उठाया गया था उस पर विरोध प्रगट करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई थी। कोई यह ना समझा सका था उस भले आदमी को कि ऐसा करने पर यात्रा करने वाले को कितना "सफर" करना पड़ेगा। उस बेढंगे बदलाव के बाद वहां सिर्फ इतनी सी जगह बनती है कि आप अपना बड़ा अटैची रख सकें, ऊंचाई के हिसाब से। खुद तो वहां बैठना तो दूर आप ढंग से लेट कर करवट भी नहीं बदल सकते। भला हो भारत के दक्षिण में रहने वाले लोगों का जिन्होंने सबसे पहले इस फैसले के विरुद्ध आवाज उठाई थी। विरोध का फायदा सिर्फ इतना हुआ कि तीन के बीच से एक शायिका हटवा दी गयी। पर ऊपर वाली अपनी जगह पर कायम है, जिस पर चढने उतरने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। बुजुर्गों और महिलाओं के तो बिल्कुल भी वश की बात नहीं है कि उस पर चढने की सोचें भी। उस शायिका को अपनी जगह ना लाने का कारण उस पर जरूरत से ज्यादा होने वाला खर्च बता रेलवे ने पल्ला झाड़ लिया है। उसका कहना है कि यह "सिस्टम" जिनमें ऐसी शायिकाएं बची हैं उन डिब्बों के कबाड़ होने पर अपने आप खत्म हो जाएगा।

धन्य है हमारी सहनशीलता। पैसा खर्च करने के बाद भी हम जैसे तैसे यात्रा पूरी कर संतुष्ट हो जाते हैं। यह तो गनीमत है कि थरूर ने रेल में यात्रा नहीं की नहीं तो इन डिब्बों में आने-जाने वालों को "लगेज क्लास" कहलाने में देर नहीं लगती।

विशिष्ट पोस्ट

व्यक्ति पूजा

मैं अमित जी के ब्लॉग को फॉलो नहीं करता, पर उस दिन  उस दिन उन महाशय के आक्षेप के बाद,  मैं जिज्ञासावश उनके ''बिग-अड्डे'' पर ग...