बड़े-बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी सनकें। कोई सो कर लिखता था तो कोई खड़े हो कर। कोई सोने से पहले तो कोई जागने के बाद। कोई शराब पी कर तो कोई चाय। किसी को शोर-शराबा पसंद था तो किसी को संगीत, कोई अपने पालतू के बिना कुछ सोच भी नहीं सकता था तो किसी को किसी की भी उपस्थिति नागवार गुजरती थी। इसे सनक कहिए या उनका विश्वास कि यदि ऐसा नहीं होगा तो कुछ लिखा ही नहीं जाएगा और लिखा भी गया तो वह वैसा नहीं होगा। और फिर "मूड़", जिसके बिना लेखक अधुरा होता है। इसको बनाने के लिए भी लेखकों को कितनी कसरतें करनी पड़ती थीं। सो हरि कथा की भांति इनका संसार भी तरह-तरह के अजूबों से भरा पड़ा है। यही कहा जा सकता है कि, "लेखक अनन्त लेखक कथा अनन्ता।"
अब ताल्स्ताय की बात करें तो वे सुबह सबेरे ही लिखते थे। उनके अनुसार सुबह-सुबह उनका मन रूपी आलोचक हर लेख पर नजर रखता था जो कि रात को संभव नहीं हो पाता था।
एमिल जोला बिना थके लिखने की सोच भी नहीं सकते थे। इसके लिए वे घूमने निकल जाते थे और इसी दौरान रास्ते में पड़ने वाले लैम्प पोस्ट गिनते रहते थे, गिनती गलत होने पर दोबारा गिनना शुरु करते थे। इस काम में जब बेहद थक जाते थे तो लौट कर लिखना शुरु करते थे।
फ्रांसीसी उपन्यासकार बालजाक रात के सन्नाटे में अपना लेखन कार्य पूरा किया करते थे। लिखते समय उनके कमरे में सिर्फ उनके नौकर को जाने की ईजाजत थी जो थोड़ी-थोड़ी देर में उनके लिए काफी बना कर लाता रहता था।
अलेक्जेंड़र ड़यूमा का विश्वास था कि अच्छा उपन्यास नीले रंग के कागज पर, कविता पीले रंग के कागज पर तथा बाकी की रचनाएं गुलाबी रंग के कागज पर ही लिखी जानी चाहियें।
विक्टर ह्यूगो खड़े हो कर ही लिख पाते थे। इसके लिए उन्होंने अपने कंधे की ऊंचाई के बराबर मेज बनवा रखी थी। लिखते-लिखते वे लिखे हुए कागज जमीन पर बिखराते रहते थे।
मार्क ट्वेन पेट के बल लेट कर लिखते थे , बैठ कर लिखने पर उन्हें आलस्य घेर लेता था।
हमारे शरत बाबू आराम कुर्सी पर अधलेटी अवस्था में अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया करते थे।
प्रेमचंद जैसे खुद सीधे साधे थे वैसे ही उनका लिखने को लेकर कोई खास सनक भी नहीं थी। वे किसी भी समय, किसी भी जगह, किसी भी हालत में लिख लेते थे। उनके अनुसार लिखने के लिए साफ अनलिखा कागज तथा बिना रुके चलने वाली कलम का होना ही जरूरी होता है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 9 मई 2010
शुक्रवार, 7 मई 2010
गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर अभी जिंदा हैं, दैनिक भास्कर के अनुसार।
छोड़ो यार सब चलता है, क्या जरा सी बात का बतंगड़ बनाना, गल्तियां हो जाती हैं, जैसी नजर से देखें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है। पर यदि एक इतने बड़े अखबार को, जो अपने क्षेत्र में अग्रणी होने का दम भरता हो, मद्दे नजर रख देखें तो यह "ब्लंड़र" है।
आज शुक्रवार 7 तारीख के दैनिक भास्कर के पेज 8 पर अभिव्यक्ति शिर्षक के अंतर्गत स्व। श्री रवींद्रनाथ टैगोर का एक लेख छापा गया है जिसमें लेखक के परिचय में लिखा गया है :-
"लेखक नोबेल विजेता, भारतीय कवि, लेखक और चित्रकार हैं।"
भास्कर अपने जन्म से ही हमारे घर का सदस्य बन गया था। सारे परिवार को इसकी आदत पड़ गयी है। बहुतेरी बार तरह-तरह की स्कीमें ले कर और भी अखबारों ने दस्तकें दीं पर अपनी अच्छाईयों- बुराईयों, तिकड़मों, घोर व्यवसायिकता के रहते भी यह परिवार का अंग बना रहा है। पर कभी-कभी बहुत कोफ्त होती है जब लगता है कि इसे चलाने वालों का नजरिया सिर्फ लाभ और लाभ का है, लगता ही नहीं कि गल्तियों को सुधारने की कोशिश की जा रही है। वाक्यों में गल्तियां, व्याकरण में गल्तियां, कालम का कहीं भी आधी अधूरी बात कह खत्म हो जाना ( इसी अंक के खेल पृष्ठ में अंग्रेजों ने लांघी…...... देख लें), जबर्दस्ती ठूंसे गये अंग्रेजी शब्द चिड़चिड़ाहट तो पैदा कर देते हैं पर जैसे घर के बच्चे की उद्ड़ंता को नजरंदाज कर दिया जाता है वैसे ही आगे ठीक हो जाएगा सोच चुप बैठे रहते हैं।
पर रोज-रोज यदि ऐसा ही चलता रहा तो कभी ना कभी तो इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।
आज शुक्रवार 7 तारीख के दैनिक भास्कर के पेज 8 पर अभिव्यक्ति शिर्षक के अंतर्गत स्व। श्री रवींद्रनाथ टैगोर का एक लेख छापा गया है जिसमें लेखक के परिचय में लिखा गया है :-
"लेखक नोबेल विजेता, भारतीय कवि, लेखक और चित्रकार हैं।"
भास्कर अपने जन्म से ही हमारे घर का सदस्य बन गया था। सारे परिवार को इसकी आदत पड़ गयी है। बहुतेरी बार तरह-तरह की स्कीमें ले कर और भी अखबारों ने दस्तकें दीं पर अपनी अच्छाईयों- बुराईयों, तिकड़मों, घोर व्यवसायिकता के रहते भी यह परिवार का अंग बना रहा है। पर कभी-कभी बहुत कोफ्त होती है जब लगता है कि इसे चलाने वालों का नजरिया सिर्फ लाभ और लाभ का है, लगता ही नहीं कि गल्तियों को सुधारने की कोशिश की जा रही है। वाक्यों में गल्तियां, व्याकरण में गल्तियां, कालम का कहीं भी आधी अधूरी बात कह खत्म हो जाना ( इसी अंक के खेल पृष्ठ में अंग्रेजों ने लांघी…...... देख लें), जबर्दस्ती ठूंसे गये अंग्रेजी शब्द चिड़चिड़ाहट तो पैदा कर देते हैं पर जैसे घर के बच्चे की उद्ड़ंता को नजरंदाज कर दिया जाता है वैसे ही आगे ठीक हो जाएगा सोच चुप बैठे रहते हैं।
पर रोज-रोज यदि ऐसा ही चलता रहा तो कभी ना कभी तो इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा।
गुरुवार, 6 मई 2010
आखें, आप इन्हें पंद्रह मिनट दें ये आपका उम्र भर साथ देंगी.
किताबें, कंप्यूटर, लैपटाप, सेलफोन, धूल-मिट्टी, तनाव और भी ना जाने क्या-क्या, यह सब धीरे-धीरे हमारी आंखों के दुश्मन बनते जा रहे हैं। पहले जरा से साफ पानी के छीटों से ही ये अपने आप को दुरुस्त रख लेती थीं। पर लगातार इनकी अनदेखी अब इन पर भारी पड़ने लगी है। काम में मशगूल हो, "जंक फूड़" खा, विपरीत परिस्थितियों में देर तक काम कर लोग अंधत्व को न्यौता देने लग गये हैं। लगातार कंप्यूटर आदि पर काम करने से आंखों के गोलकों पर भारी दवाब पड़ता है जिससे छोटी-छोटी नाजुक शिरायें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं इससे खून का दौरा बाधित हो नुक्सान पहुंचाता है और मजे की बात यह कि इतना सब घट रहा होता है पर पता नहीं चलता। डाक्टरों का कहना है कि लोग काम में ड़ूब कर पलकें झपकाना ही भूल जाते हैं जो की आंखों की बिमारी का एक बड़ा कारण है। उनकी सलाह है कि रोज कम से कम 15 मिनट का आंखों का व्यायाम और थोड़ी सी देख-भाल कर इन्हें स्वस्थ रखा जा सकता है।
देख-भाल :- कंप्यूटर पर काम करते समय 15-20 मिनटों के बाद कुछ देर के लिए विश्राम जरूर लें। शुगर की बिमारी हो तो बकायदाजा चेक-अप करवाना जरूरी है। इस बिमारी का आंखों से "ईंट कुत्ते" का बैर है।
आंखों की नियमित जांच करवाते रहना चाहिये।
व्यायाम :- रोज 15 मिनट का आंखों का व्यायाम काफी है इन्हें सुरक्षित रखने के लिए।एक बड़ी सी घड़ी की कल्पना करें। फिर आंखें बंद कर उसके हर अंक पर नजर ड़ालें, तीन सेकेंड़ रुकें फिर घड़ी के मध्य में आ जाएं। इस तरह सारा चक्कर पूरा कर आंखों पर बिना जरा सा भी दवाब ड़ाले हथेलियां रख पांच बार घड़ी की दिशा में और पांच बार विपरीत दिशा में आंखें घुमाएं। फिर हाथ हटा जल्दी-जल्दी बीस बार पलकें झपकाएं।
हाथ में एक पेंसिल ले बांह पूरी खोल लें, सांस खीचें पेंसिल पर नज़र जमा उसे धीरे-धीरे अपनी ओर ला नाक से छुआएं, सांस छोड़ते हुए फिर पेंसिल को दूर ले जाएं। ऐसा पांच बार करें।
आंखों के गढ्ढों के ऊपर सावधानी से उंगलियों से दवाब डालें, पांच सेकेंड रूकें फिर दवाब हटा लें ऐसा पांच मिनट तक करें।
जब भी बाहर से आएं या घर पर भी हों तो साफ पानी से दिन में चार-पांच बार आंखों पर छीटें मारें। ठंड़े पानी की पट्टी रखने से भी बहुत आराम मिलता है।
बुधवार, 5 मई 2010
ये महिलाएं हैं या कीड़े-मकोड़े
अब तो लगता है कि उल्टे-सीधे विज्ञापनों में बेतुके, अतिश्योक्तिपरक व अभद्रता लांघने वाले विषयों की आदत पड़ गयी है सबको। क्योंकि कहीं से भी विरोध का स्वर उठता या सुनाई नहीं देता। इसी से शह पा कर विज्ञापन देने और बनाने वालों में होड़ सी लग गयी है अश्लीलता परोसने की। और यह भी तब जब इस क्षेत्र को संभालने वाली सत्ता की बागडोर एक महिला के हाथ में है।
एक बानगी पेश है :-
1, क्रिकेट का मैदान, एक खिलाड़ी के कैच लेने की भंगिमा के अंतिम क्षणों में अजीबो गरीब कपड़े पहने महिलाओं का झुंड उसे घेर कर गिरा देता है। फिर………………।
ऐसा क्यूँ ? क्योंकि उसने एक खास किस्म की खुशबू लगा रखी थी।
2, फिर एक क्रिकेट का मैदान, बल्लेबाज, क्षेत्र-रक्षक, अंपायर सब तैयार। बालर बाल फेंकने के लिए दौड़ना शुरू करता है और दौड़ता ही चला जाता है मैदान की दूसरी ओर। क्योंकि उसके पीछे महिलाओं का हुजुम पड़ा हुआ था आधे-अधूरे वस्त्रों में। ।
कारण उसने भी एक खास कंपनी की सुगंध लगा रखी थी।
3, एक घर, शादी का माहौल है। मेहमान आए हुए हैं। उन्हीं में एक युवक एक खास परफ्यूम लगा एक शादी-शुदा महिला के पास से गुजरता है और वह “भद्र” महिला अपना “आपा” खो बैठती है।
4, एक युवक ऐसी ही कोई जादुई सुगंध लगा अपने कमरे की खिड़की खोलता है। उसकी सुगंध से सामने के घर में आई नवविवाहिता अपनी शर्म-लाज खो बैठती है।
ये तो कुछ ही उदाहरण हैं जो अपरिपक्व मष्तिष्कों को भटकाने की पुरजोर कोशिश में लगै हैं। क्या जताते हैं ये कि महिलाओं और उन कीड़े मकोड़ों में कोई फर्क नहीं है जो एक खास समय अपने साथी को आकर्षित करने के लिए एक खास गंध छोड़ते हैं।
अरे वे तो फिर भी संयमी होते हैं। उनका दिन-काल सब निश्चित होता है। पर यह विज्ञापनी महिलाएं क्या उनसे भी गयी बीती हैं? क्यों नहीं इस तरह की अश्लीलता पर अंकुश लगता। उन सब संस्थाओं के आँख कान क्यों बंद रहते हैं इन सब बेहूदा विषयों पर, जो महिला हितों की बातें करते दूसरों की नाक में दम किए रहते हैं, उनका ध्यान किस मजबूरी में इस ओर नहीं जाता ?
एक बानगी पेश है :-
1, क्रिकेट का मैदान, एक खिलाड़ी के कैच लेने की भंगिमा के अंतिम क्षणों में अजीबो गरीब कपड़े पहने महिलाओं का झुंड उसे घेर कर गिरा देता है। फिर………………।
ऐसा क्यूँ ? क्योंकि उसने एक खास किस्म की खुशबू लगा रखी थी।
2, फिर एक क्रिकेट का मैदान, बल्लेबाज, क्षेत्र-रक्षक, अंपायर सब तैयार। बालर बाल फेंकने के लिए दौड़ना शुरू करता है और दौड़ता ही चला जाता है मैदान की दूसरी ओर। क्योंकि उसके पीछे महिलाओं का हुजुम पड़ा हुआ था आधे-अधूरे वस्त्रों में। ।
कारण उसने भी एक खास कंपनी की सुगंध लगा रखी थी।
3, एक घर, शादी का माहौल है। मेहमान आए हुए हैं। उन्हीं में एक युवक एक खास परफ्यूम लगा एक शादी-शुदा महिला के पास से गुजरता है और वह “भद्र” महिला अपना “आपा” खो बैठती है।
4, एक युवक ऐसी ही कोई जादुई सुगंध लगा अपने कमरे की खिड़की खोलता है। उसकी सुगंध से सामने के घर में आई नवविवाहिता अपनी शर्म-लाज खो बैठती है।
ये तो कुछ ही उदाहरण हैं जो अपरिपक्व मष्तिष्कों को भटकाने की पुरजोर कोशिश में लगै हैं। क्या जताते हैं ये कि महिलाओं और उन कीड़े मकोड़ों में कोई फर्क नहीं है जो एक खास समय अपने साथी को आकर्षित करने के लिए एक खास गंध छोड़ते हैं।
अरे वे तो फिर भी संयमी होते हैं। उनका दिन-काल सब निश्चित होता है। पर यह विज्ञापनी महिलाएं क्या उनसे भी गयी बीती हैं? क्यों नहीं इस तरह की अश्लीलता पर अंकुश लगता। उन सब संस्थाओं के आँख कान क्यों बंद रहते हैं इन सब बेहूदा विषयों पर, जो महिला हितों की बातें करते दूसरों की नाक में दम किए रहते हैं, उनका ध्यान किस मजबूरी में इस ओर नहीं जाता ?
रविवार, 2 मई 2010
स्वामी विवेकानंदजी की प्रत्युत्पन्नमति
स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म को लेकर फैली भ्रातिंयों और भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिए योरोप यात्रा पर थे। वहां उन्हें बहुत बार विषम परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ता था। खासकर अंग्रेज उन्हें अपमानित करने के मौके खोजते रहते थे।
एक बार उन्हें एक गिरजा घर में भाषण देने के लिए बुलाया गया। जब वे वहां गये तो एक सिरफिरे अंग्रेज ने, कुटिल मुस्कान के साथ, ईसा मसीह के चित्र के नीचे रखे बहुत सारे धर्म ग्रंथों की ओर इशारा कर कहा, ए स्वामी देखो तुम्हारी गीता का क्या स्थान है।स्वामी विवेकानंद ने उस तरफ देखा, वहां सबसे उपर बाइबिल फिर उसके बाद और बहुत से धर्मग्रंथों के बाद सबसे नीचे "गीता" को रखा गया था। यह देखते ही बड़े सहज भाव से स्वामीजी ने तुरंत कहा, "गुड़ फाउंड़ेशन"।
यह सुनते ही उस अंग्रेज की बोलती बंद हो गयी।
एक बार उन्हें एक गिरजा घर में भाषण देने के लिए बुलाया गया। जब वे वहां गये तो एक सिरफिरे अंग्रेज ने, कुटिल मुस्कान के साथ, ईसा मसीह के चित्र के नीचे रखे बहुत सारे धर्म ग्रंथों की ओर इशारा कर कहा, ए स्वामी देखो तुम्हारी गीता का क्या स्थान है।स्वामी विवेकानंद ने उस तरफ देखा, वहां सबसे उपर बाइबिल फिर उसके बाद और बहुत से धर्मग्रंथों के बाद सबसे नीचे "गीता" को रखा गया था। यह देखते ही बड़े सहज भाव से स्वामीजी ने तुरंत कहा, "गुड़ फाउंड़ेशन"।
यह सुनते ही उस अंग्रेज की बोलती बंद हो गयी।
शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010
हेलो, मैं "मनाली" बोल रही हूँ.
यह पोस्ट है तो पुरानी, पर इस बार फिर जाना हो पा रहा है तो इस लालच में कि शायद कोई "अनदेखा अपना "वहाँ मिल ही जाए सो.................................
नाम तो आपने जरूर सुन रखा होगा, फिर भी अपना परिचय करवाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ। मैं मनाली हूं :-
मेरे परिवार हिमाचल में आपका स्वागत है। मेरे परिवार के सारे सदस्य बहुत सुंदर, शांत और आथित्य प्रेमी हैं। मेरे सबसे बड़े भाई शिमले को हिमाचल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। हम भाई बहन एक से बढ़ कर एक खूबियों के मालिक हैं। मैं और मेरा भाई कुल्लू दोनों जुड़वां हैं। एक राज की बात बताती हूं। कुल्लू थोड़े पूराने विचारों का है। इसीलिए उसकी सारी पूरानी बस्तियां, मंदिर, मोहल्ले वैसे के वैसे ही हैं। पर मेरे बार-बार टोकते रहने पर अब धीरे-धीरे बदलना शुरु कर रहा है। जिसके फलस्वरूप उसे एक फ्लाई-ओवर का पुरस्कार मिला है। इससे पीक सीजन में, अखाड़ा बाजार पर लगने वाले घंटों के जाम से यात्रियों को राहत भी मिल गयी है। उसकी बनिस्पत मैं आधुनिक विचारों की हूं। इसी कारण पर्यटक अब मेरे पास आना ज्यादा पसंद करते हैं। पर इस आधुनिकता का खामियाजा भी मुझे भुगतना पड़ा था, सालों पहले, जब हिप्पी समुदाय के लोगों ने मेरे यहां जमावड़ा डाल, चरस गांजे का अड़्ड़ा बना कर दुनिया भर में मुझे बदनाम कर दिया था। बड़ी मुश्किलों के बाद धीरे-धीरे फिर मैंने अपना गौरव प्राप्त कर लिया है।
कुल्लू से मेरी दूरी 40 किमी की है। व्यास, जिसे नद होने का गौरव प्राप्त है, के दोनों किनारों पर बने सुंदर सड़क मार्ग यात्रियों को मुझ तक पहुंचाते हैं। व्यास के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं पर ठीक बीस किमी पर एक कस्बा पतली कुहल है, जो आस-पास के गांवों की जरूरतों को पूरा करता है। इसी के पास नग्गर नामक स्थान पर विश्व प्रसिद्ध रशियन चित्रकार ‘निकोलस रोरिक’ की आर्ट गैलरी है। रोरिक हिंदी फिल्म जगत की पहली सुपर-स्टार तथा पहले दादा साहब फाल्के पुरस्कार की विजेता देविका रानी के पति थे। पतली कुहल में सरकारी मछली पालन केन्द्र भी है। पर जैसे-जैसे लोगों की आवाजाही बढ़ रही है वैसे-वैसे मेरा प्राकृतिक सौंदर्य भी खतरे में पड़ता जा रहा है। मेरे माल रोड से पांच-सात किमी पहले से ही होटलों की कतारें शुरु हो जाती हैं। जिनकी सारी गंदगी व्यास को भी दुषित बना रही है। यह एक अलग विषय है। अभी आप अपना मूड और छुट्टियां खराब ना कर मेरी अच्छाईयों की तरफ ही ध्यान दें। जहां माल रोड खत्म होता है वहीं से एक सीधी चढ़ाई आप को हिडम्बा माता के मंदिर तक ले जाती है, घबड़ाने की बात नहीं है वहां तक आप अपनी गाड़ी से आराम से पहुंच सकते हैं। इस जगह पहले घना जंगल था पर उसे अब व्यवस्थित कर पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया है। इसकी विस्तृत चर्चा फिर कभी। नीचे मुख्य मार्ग, व्यास को पार कर दूसरे किनारे से आने वाले रास्ते से मिल लाहौल-स्पिति, जो एशिया का सबसे बड़ा बर्फिला रेगिस्तान है, की ओर बढ़ जाता है। इसी पर मेरे माल रोड से एक-ड़ेढ़ किमी की दूरी से एक सड़क उपर उठती चली जाती है महर्षि वशिष्ठ के आश्रम की ओर। यहां उनका प्राचीन मंदिर है। अब कुछ सालों पहले एक राम मंदिर का भी निर्माण हो गया है। यहां एक गर्म पानी का सोता भी है, जिसमें नहाने वालों के चर्म रोगों को मैंने ठीक होते देखा है। जो इस पानी में प्रचूर मात्रा में सल्फर की उपस्थिति से संभव है। पर यहां भी बढ़ती आबादी का दवाब साफ दिखाई पड़ने लगा है। यह सुंदर रमणीक स्थान अब दुकानों घरों से पट गया है। फिर भी प्रकृति ने अपना खजाना मुक्त हस्त से मुझ पर लुटाया है। अभी भी और जगहों की बनिस्पत आप मुझे निसर्ग के ज्यादा पास पाएंगें। बर्फीले पर्वत शिखर उनकी ढ़लानों पर सेवों के बागीचे, सीढ़ी नुमा खेत, खिलौने की तरह के घर और यहां के सीधे-साधे वाशिंदे आपको मोह ना लें तो कहिएगा। अभी भी यहां के हवा-पानी तथा लोगों के दिलों पर बाहरी सभ्यता की बुराईयां पूरी तरह से हावी नहीं हो पायी हैं। हम अपने नाम "देव भूमी" को अभी भी सार्थक करते हैं। अपने बारे में तो कोई भी कहने से नहीं थकता। हो सकता है कि पढ़ने से आप बोर भी हो जायें। पर यह मेरा दावा है कि एक बार यदि आप मेरे पास आयेंगें तो फिर मुझे भूल नहीं पायेंगें। अब तो मुझ तक पहुंचने के लिए हर तरह की सुविधा भी उपलब्ध है।
तो कब आ रहे हैं, मैं इंतजार में हूं।
नाम तो आपने जरूर सुन रखा होगा, फिर भी अपना परिचय करवाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ। मैं मनाली हूं :-
मेरे परिवार हिमाचल में आपका स्वागत है। मेरे परिवार के सारे सदस्य बहुत सुंदर, शांत और आथित्य प्रेमी हैं। मेरे सबसे बड़े भाई शिमले को हिमाचल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। हम भाई बहन एक से बढ़ कर एक खूबियों के मालिक हैं। मैं और मेरा भाई कुल्लू दोनों जुड़वां हैं। एक राज की बात बताती हूं। कुल्लू थोड़े पूराने विचारों का है। इसीलिए उसकी सारी पूरानी बस्तियां, मंदिर, मोहल्ले वैसे के वैसे ही हैं। पर मेरे बार-बार टोकते रहने पर अब धीरे-धीरे बदलना शुरु कर रहा है। जिसके फलस्वरूप उसे एक फ्लाई-ओवर का पुरस्कार मिला है। इससे पीक सीजन में, अखाड़ा बाजार पर लगने वाले घंटों के जाम से यात्रियों को राहत भी मिल गयी है। उसकी बनिस्पत मैं आधुनिक विचारों की हूं। इसी कारण पर्यटक अब मेरे पास आना ज्यादा पसंद करते हैं। पर इस आधुनिकता का खामियाजा भी मुझे भुगतना पड़ा था, सालों पहले, जब हिप्पी समुदाय के लोगों ने मेरे यहां जमावड़ा डाल, चरस गांजे का अड़्ड़ा बना कर दुनिया भर में मुझे बदनाम कर दिया था। बड़ी मुश्किलों के बाद धीरे-धीरे फिर मैंने अपना गौरव प्राप्त कर लिया है।
कुल्लू से मेरी दूरी 40 किमी की है। व्यास, जिसे नद होने का गौरव प्राप्त है, के दोनों किनारों पर बने सुंदर सड़क मार्ग यात्रियों को मुझ तक पहुंचाते हैं। व्यास के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं पर ठीक बीस किमी पर एक कस्बा पतली कुहल है, जो आस-पास के गांवों की जरूरतों को पूरा करता है। इसी के पास नग्गर नामक स्थान पर विश्व प्रसिद्ध रशियन चित्रकार ‘निकोलस रोरिक’ की आर्ट गैलरी है। रोरिक हिंदी फिल्म जगत की पहली सुपर-स्टार तथा पहले दादा साहब फाल्के पुरस्कार की विजेता देविका रानी के पति थे। पतली कुहल में सरकारी मछली पालन केन्द्र भी है। पर जैसे-जैसे लोगों की आवाजाही बढ़ रही है वैसे-वैसे मेरा प्राकृतिक सौंदर्य भी खतरे में पड़ता जा रहा है। मेरे माल रोड से पांच-सात किमी पहले से ही होटलों की कतारें शुरु हो जाती हैं। जिनकी सारी गंदगी व्यास को भी दुषित बना रही है। यह एक अलग विषय है। अभी आप अपना मूड और छुट्टियां खराब ना कर मेरी अच्छाईयों की तरफ ही ध्यान दें। जहां माल रोड खत्म होता है वहीं से एक सीधी चढ़ाई आप को हिडम्बा माता के मंदिर तक ले जाती है, घबड़ाने की बात नहीं है वहां तक आप अपनी गाड़ी से आराम से पहुंच सकते हैं। इस जगह पहले घना जंगल था पर उसे अब व्यवस्थित कर पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया है। इसकी विस्तृत चर्चा फिर कभी। नीचे मुख्य मार्ग, व्यास को पार कर दूसरे किनारे से आने वाले रास्ते से मिल लाहौल-स्पिति, जो एशिया का सबसे बड़ा बर्फिला रेगिस्तान है, की ओर बढ़ जाता है। इसी पर मेरे माल रोड से एक-ड़ेढ़ किमी की दूरी से एक सड़क उपर उठती चली जाती है महर्षि वशिष्ठ के आश्रम की ओर। यहां उनका प्राचीन मंदिर है। अब कुछ सालों पहले एक राम मंदिर का भी निर्माण हो गया है। यहां एक गर्म पानी का सोता भी है, जिसमें नहाने वालों के चर्म रोगों को मैंने ठीक होते देखा है। जो इस पानी में प्रचूर मात्रा में सल्फर की उपस्थिति से संभव है। पर यहां भी बढ़ती आबादी का दवाब साफ दिखाई पड़ने लगा है। यह सुंदर रमणीक स्थान अब दुकानों घरों से पट गया है। फिर भी प्रकृति ने अपना खजाना मुक्त हस्त से मुझ पर लुटाया है। अभी भी और जगहों की बनिस्पत आप मुझे निसर्ग के ज्यादा पास पाएंगें। बर्फीले पर्वत शिखर उनकी ढ़लानों पर सेवों के बागीचे, सीढ़ी नुमा खेत, खिलौने की तरह के घर और यहां के सीधे-साधे वाशिंदे आपको मोह ना लें तो कहिएगा। अभी भी यहां के हवा-पानी तथा लोगों के दिलों पर बाहरी सभ्यता की बुराईयां पूरी तरह से हावी नहीं हो पायी हैं। हम अपने नाम "देव भूमी" को अभी भी सार्थक करते हैं। अपने बारे में तो कोई भी कहने से नहीं थकता। हो सकता है कि पढ़ने से आप बोर भी हो जायें। पर यह मेरा दावा है कि एक बार यदि आप मेरे पास आयेंगें तो फिर मुझे भूल नहीं पायेंगें। अब तो मुझ तक पहुंचने के लिए हर तरह की सुविधा भी उपलब्ध है।
तो कब आ रहे हैं, मैं इंतजार में हूं।
गुरुवार, 29 अप्रैल 2010
दूर का अमेरिका सुहाना लगता है...
अमेरिका भी अब पहले जैसा नहीं रह गया है। दुनिया भर से सपने संजोये लोगों की आमद, बढ़ती जनसंख्या, दुनिया भर में फैली मंदी ने वहाँ भी अराजकता फैलाने में कोई कसार नहीं छोडी है....................................................
अमेरिका, दुनिया का सबसे शक्तिशाली, अपने आप को संसार का मुखिया मानने वाला, पर हरेक के फटे में टांग अड़ाने वाला, धन कुबेरों का देश कहलाता है इसकी हर क्षेत्र में चाहे कृषि हो, विज्ञान हो, व्यवसाय हो, सुरक्षा हो सब जगह तरक्की का कोई सानी नहीं है।
इसीलिए हमारे जैसे अनेकों पिछड़े या अर्द्ध विकसित या विकासशील देशों के युवाओं के लिए वह धरती के स्वर्ग के समान है। ऐसी सोच है कि वहां जाते ही जाने वाले की हरेक इच्छा पूरी हो जाती है।
पर सिक्के के दो पहलुओं की तरह इसका भी एक अंधेरा पक्ष है।
यहां की आबादी का एक अच्छा खासा हिस्सा या तो अनपढ है या बहुत कम पढा लिखा है। यह बात वहीं की अखबारों की खोज का नतीजा है। करीब 26 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जिनके पति-पत्नि के संबंधों में दरार के कारण परिवार का जिम्मा या तो माँ के ऊपर है या फिर पिता के ऊपर। हजारों ऐसे लोग हैं जिनके सौतेले माँ या बाप हैं। एक तरह से व्यभिचार को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। यहां तक कि पादरी भी विवाहेतर संबंधों को स्वीकृति देने लगे गये हैं। बेरोजगारी का ग्राफ दिनों दिन बढता ही जा रहा है जिससे समाज में अराजकता के पैर जमने लगे हैं। अरबपतियों की बात न करें तो करोड़पतियों की संख्या आबादी के लिहाज से बहुत कम है।
यह तो सिर्फ एक बानगी है।
अमेरिका, दुनिया का सबसे शक्तिशाली, अपने आप को संसार का मुखिया मानने वाला, पर हरेक के फटे में टांग अड़ाने वाला, धन कुबेरों का देश कहलाता है इसकी हर क्षेत्र में चाहे कृषि हो, विज्ञान हो, व्यवसाय हो, सुरक्षा हो सब जगह तरक्की का कोई सानी नहीं है।
इसीलिए हमारे जैसे अनेकों पिछड़े या अर्द्ध विकसित या विकासशील देशों के युवाओं के लिए वह धरती के स्वर्ग के समान है। ऐसी सोच है कि वहां जाते ही जाने वाले की हरेक इच्छा पूरी हो जाती है।
पर सिक्के के दो पहलुओं की तरह इसका भी एक अंधेरा पक्ष है।
यहां की आबादी का एक अच्छा खासा हिस्सा या तो अनपढ है या बहुत कम पढा लिखा है। यह बात वहीं की अखबारों की खोज का नतीजा है। करीब 26 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जिनके पति-पत्नि के संबंधों में दरार के कारण परिवार का जिम्मा या तो माँ के ऊपर है या फिर पिता के ऊपर। हजारों ऐसे लोग हैं जिनके सौतेले माँ या बाप हैं। एक तरह से व्यभिचार को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। यहां तक कि पादरी भी विवाहेतर संबंधों को स्वीकृति देने लगे गये हैं। बेरोजगारी का ग्राफ दिनों दिन बढता ही जा रहा है जिससे समाज में अराजकता के पैर जमने लगे हैं। अरबपतियों की बात न करें तो करोड़पतियों की संख्या आबादी के लिहाज से बहुत कम है।
यह तो सिर्फ एक बानगी है।
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विशिष्ट पोस्ट
यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर
ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...
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कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
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शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
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आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
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चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...