pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

एक साक्षात्कार ऐसा भी

"नेट" पर एक साक्षात्कार में शामिल होने का अवसर मिला। आप भी आनंद लीजिए :

OFFICER : WHAT IS YOUR NAME ?
CANDIDATE : M P। SIR
OFFICER : TELL ME PROPERLY
CANDIDATE : MOHAN PAL SIR
OFFICER : YOUR FATHER'S NAME ?
CANDIDATE : M P। SIR
OFFICER : WHAT DOES THAT MEAN ?
CANDIDATE : MANMOHAN PAL SIR
OFFICER : YOUR NATIVE PLACE
CANDIDATE : M P। SIR


OFFICER : IS IT MADHYA PRADESH ?
CANDIDATE : NO, MUNNUR PAL SIR
OFFICER : WHAT IS YOUR QUALIFICATION?
CANDIDATE : M P। SIR
OFFICER : (ANGRILY) WHAT IS IT ?
CANDIDATE : METRIC PASS
OFFICER: WHY DO YOU NEED A JOB ?
CANDIDATE : M P। SIR

OFFICER: AND WHAT DOES THAT MEAN ?
CANDIDATE : MONEY PROBLEM SIR
OFFICER : DESCRIBE YOUR PERSONALITY
CANDIDATE : M P। SIR

OFFICER : EXPLAIN YOURSELF CLEARLY
CANDIDATE : MAGNANIMOUS PERSONALITY SIR
OFFICER : THIS DISCUSSION IS NOWHERE, YOU MAY GO NOW
CANDIDATE : M P। SIR

OFFICER : WHAT IS IT NOW
CANDIDATE : MY PERFORMANCE। ...?

OFFICER : MP !!!
CANDIDATE : WHAT IS THAT SIR॥?

OFFICER : MENTALLY PUNCTURE

@a gift of internet 😀


बुधवार, 21 अप्रैल 2010

भाग्य कैसा भी हो, छींका टूटना चाहिए

रेल यात्रा के दौरान मेरी यह कोशिश रहती है कि क्लास कोई भी हो, मौसम कैसा भी हो, यात्रा छोटी हो या बड़ी यदि अकेला हूं तो ऊपर की बर्थ होनी चाहिये। ऊपर वाले की कृपा से तीन-चौथाई यात्राएं ऊपर ही ऊपर की हैं। पर जब से सरकार मेहरबान हो गयी है तब से ऊपर की बर्थ परेशान करने लगी है। कम्प्यूटर भी निवेदन नहीं
मानता है, नीचे की ही जबर्दस्ती थोप देता है। सही भी है, दोनों हाथों में लड़्ड़ू होने से रहे, या तो पैसे कम करवा लो या ऊपर की बर्थ ले लो। पर छींका तो कैसे भी टूटना चाहिए। अभी पांच दिनों की एक त्री-रात्रीय यात्रा से लौटा हूं। वही "बातें तीन रातों की" आपस में बांटना चाहता हूं।  

यात्रा की पहली वाली रात बहुत आसान रही। एक भरी-पूरी फैमिली, छह सदस्यों की। उनके बीच मैं मूसरचंद। क्योंकि उनकी एक बर्थ साइड़ अपर थी। दांत सभी निपोर रहे थे पर उनके मन में कहीं न कहीं हूक थी कि काश छठवीं भी एक साथ होती। बीच बीच में हर सदस्य कनखियों से मुझे देख लेता था पर कुछ कह नहीं पा रहा था। इधर मैं माहौल को अपनी तरफ पा निश्चिंत था कि आज तकदीर पौ-बारह है। कुछ देर बाद जब खाना वगैरह निकलने लगा तो मैंने ही 'बर्फ तोड़ी' कहा, आपलोगों को परेशानी हो रही है तो मैं उधर की बर्थ ले लेता हूं। इतना सुनना था कि पूरे परिवार में जैसे हर्ष की लहर दौड़ गयी। सामने की बर्थ से फटाफट सामान हटाया गया सीट बाकायदा पोछी गयी, मेरे मना करने के बावजूद, जितना भी था, मेरा सामान वहां पहुंचा कर मुझसे विदा ले, पर्दा लगा एक कमरीय सुख को प्राप्त हो लिए।     

दूसरी वाली रात कुछ आड़ी टेढी रही पर मेरी रही। आठ बर्थ। मेरे सिवा दो परिवार, उनके चार से सात वर्षीय, पांच बच्चे वे भी बाप रे बाप। मार पीट, रोना धोना, धमा चौकड़ी, छीना झपटी, यानि बी पी बढाने का सारा सामान। मैं चुपचाप एक पत्रिका में सर घुसाए बैठा था कि सामने वाले ने कुछ पूछा मैं उनसे मुखातिब हुआ ही था कि बगल वाले सज्जन? ने मेरी गोद से पत्रिका झपट ली। होते हैं कुछ लोग जिन्हें किसी भी औपचारिकता पर विश्वास नहीं होता। बुरा लगा पर चुप रहा। कुछ देर बाद उन्होंने पत्रिका अपनी सहगामिनी की ओर बढा दी। पर जब वह वहां से बच्चों के हाथ चली गयी तो मुझसे नहीं रहा गया। मैंने कहा भाई साहब मैं किताब पढ रहा था आधा लेख पढा था पूरा पढ लूं फिर आप ले लिजीयेगा। मेरी बात शायद उन्हें खल गयी उन्होंने तेज आवाज में पत्रिका मंगाई और बोले लीजिए साहब। मैंने मन में सोचा, शर्मा जी आज की रात तो इसी माया जाल में काटनी होगी। पर ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था। कुछ देर में शांति की स्थापना हुई। बच्चे लुढकने लगे नींद में । कोई इधर, कोई उधर, कोई नीचे तो कोई ऊपर। इसी बीच ऊपर की बर्थ पर गहरी नींद में सोया एक बच्चा गाड़ी के हिचकोलों से नीचे टपकने को हुआ पर इसके पहले की बाल सीमा रेखा पार करती मैंने उसे बीच में ही दबोच लिया। फिर क्या था अपनी बल्ले-बल्ले हो गयी। बहनापा, भाएनापा जितने नापे होते हैं जुड़ने लगे। पर अपनी निगाह तो चिडिया की आंख जैसी ऊपरी बर्थ पर थी जो मिल गयी और मैं फिर एक बार दुनिया जहान के झंझटों से मुक्त नीचे की रेलम-पेल से अलग अपनी दुनिया में मग्न हो गया।

यात्रा की तीसरी रात अपेक्षाकृत सबसे आसान रही। मेरे सामने तीन बुजुर्ग, मेरे से भी बड़े, विराजमान थे। कुछ देर बाद उनमें से एक ने अपने टिकट निकाले, कुछ देखा और बोले, मैं चौहतर का। फिर अपने बगल वाले से पूछा तुम कितने साल के हो? उन्होंने कहा, बहत्तर का। फिर तीसरे से पूछा गया, तुम? उन्होंने जवाब दिया अड़सठ का। पहले वाले सज्जन बोले ठीक है तुम हम मे सब से छोटे हो, ऊपर वाली बर्थ पर तुम जाना। अढसठिया सज्जन बोले, नहीं साठ के बाद सब एक जैसे होते हैं, मैं नहीं जाऊंगा। जिसके नाम की सीट है वही जाएगा। हालांकि बातें हंसी मजाक में ही हो रही थीं पर विवशता साफ झलक रही थी। मौके की नजाकत को भांप मैंने कहा कि यदि आप चाहें तो मैं ऊपर की बर्थ ले लेता हूं आप मेरी नीचे वाली सीट ले लीजिए। सामने वाले को जैसे दो आंखें मिल गयी हों उन्होंने तुरंत पूछा, आपको ऊपर चलेगा? मैंने मन ही मन कहा, अजी चलेगा क्या उड़ेगा। पर सामने चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान ला गर्दन हिला दी।
तो  भाग्य अपने अपने, छींका फिर एक बार टूट चुका था।

रविवार, 18 अप्रैल 2010

"बैंक" जहां पैसे नहीं कपडे रखे जाते हैं.

ज्यादातर यही समझा जाता है कि बैंकों में पैसा या कीमती सामान ही रखा जाता है। पर झारखंड के जमशेदपुर मे एक बैंक ऐसा है जिसका पैसों से कोई लेना-देना नहीं है। इस अनोखे बैंक में इंसान की मूलभूत जरूरत कपड़े रखे जाते हैं तथा इसे कपड़ों के बैंक के नाम से जाना जाता है।

करीब एक दशक से ज्यादा पुराने इस बैंक "गूंज" का मुख्य उद्देश्य देश के उन लाखों गरीब तथा जरूरतमंद लोगों को कपड़े उपलब्ध करवाना है, जो उचित वस्त्रों के अभाव मे अपमान और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम का सामना करते हैं। पूरी दुनिया में अनगिनत लोगों को कपड़ों के अभाव में शारिरिक व मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। भारत के ही कुछ भागों में महिलाओं को उचित वस्त्रों के अभाव में अनेकों बार अप्रिय परिस्थियों से गुजरना पड़ता है। इसी तरह की परेशानियों से लोगों को रोज दो-चार होता देख, कुछ लोगों का मिल कर इसका हल निकालने की सोच ने जो रूप लिया वही है "गूंज"। इसी तरह यदी छोटी-छोटी धाराएं अस्तित्व में आती रहें तो गरीबी के रेगिस्तान में कहीं-कहीं तो नखलिस्तान उभर कर कुछ तो राहत प्रदान कर ही सकता है। सिर्फ मन में सर्वहारा क लिए सच्चा प्रेम तथा उनके लिए कुछ कर गुजरने की भावना होनी चाहिए।

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

आने वाला समय एक नई तस्वीर दिखाएगा, दुनिया की

वर्तमान समय बदलाव का समय है, हर पांच दस सालों में नयी-नयी इजादें सामने आती चली जा रही हैं। आने वाले कुछ सालों में भी हमारी दुनिया की तस्वीर में कुछ नये बदलाव आने वाले हैं। जिनमें प्रमुख हैं --

1:- विज्ञापन आकाश में छा जाएंगे। जी हां आकाश में लेज़र के जरिए विज्ञापन दिखाने की तकनीक पर बाकायदा काम चल रहा है।

2:- कैंसर और एड्स का निदान संभव हो जाएगा।

3:- विमानों का रूप उडनतश्तरी की तरह हो जाएगा। इसके उपर भारतीय मूल के सुब्रत राय शोध कर रहे हैं। उन्होंने इस विमान को "वीव" नाम दिया है।

4:- आने वाले समय में कारें हाइड्रोजन गैस से चलेंगी। हाइड्रोजन इंजन काम करेंगे प्रोटोन एक्सचेंज में बने फ़्यूल सेल से। जमाना होगा छोटी कारों का। नयी तकनीक जीवन को सुविधाजनक और सुरक्षित बना देगी।

5:- जोखिम के काम रोबोट करने लग जाएंगे। खान, निर्माण, बिजली, नाभिकीय संयंत्रों, हथियारों के परीक्षण, सेना, ट्रैफ़िक पुलिस जैसे स्थानों में रोबोट्स छा जाएंगे। अफसोस की बात यह हो जाएगी कि इन पर किसी नेता या उनके चमचों की धौंस नहीं चलेगी। आपको यह जान कर हैरानी के साथ-साथ खुशी भी होगी कि बहुत सी भारतीय कंपनियां घरेलू रोबोट के विकास में जुटी हुई हैं।

6:- प्रदूषण रहित सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने लगेगा।

7:- बुढ़ापे को रोकना तो नहीं पर जवानी को देर तक कायम रखना संभव हो जाएगा। शरीर पर बढ़ती उम्र के असर को काफी हद तक कम करने में सफ़लता मिल जाएगी।

8:- हो सकता है कि किसी अंजान सभ्यता के रेडिओ संदेश पाने में हम सफ़ल रहें। यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी ने तीन ऐसे सौरमंडल खोज निकाले हैं, जिनमें दर्जनों विशाल ग्रह मौजूद हैं। इनमें से 45 प्रकाश वर्ष दूर तो एक सितारा ऐसा है, जिसकी पृथ्वी जैसे तीन ग्रह परिक्रमा कर रहे हैं। पृथ्वी जैसा एक ग्रह तो महज 15 प्रकाश वर्ष दूर मिला है। अभी दो-तीन दिन पहले कुछ ऐसी ही खबर मिली भी है कि कुछ रेडिओ संकेत जैसा प्राप्त हुआ है।

9:- कंप्युटर और भी शक्तीशाली हो जाएंगे। ऊर्जा की खपत काफी घट जाएगी। यह संभव हो पाएगा गैलियम नाईट्राइड से जो सिलिकन चिप का स्थान ले लेगा।

पर अच्छाइयों के साथ-साथ हमें कुछ बुराईयों का भी सामना करना पडेगा जैसे, पानी की कमी का सामना करना पड सकता है। आक्सीजन खरीदनी पड सकती है। कुछ नयी बिमारियां सामने आ सकती हैं। संतानोत्पति की क्षमता घटने का डर है। सार्स और बर्ड फ्लू के अलावा चेचक, प्लेग, मलेरिया और हैजा जैसी पुरानी बिमारियां नये रूप में धावा बोल सकती हैं। रोबोट के आने से घरेलू नौकरों की वजह से होने वाले अपराध तो कम हो जायेंगे पर किसी और जोखिम के बारे में तो अभी सिर्फ़ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। फिर भी हमें यही आशा रखनी है कि इंसान सारी मुसीबतों से पार पाने का रास्ता निकाल ही लेगा।

देखते हैं कब क्या होता है।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

एक चौंकाऊ खबर, पक्षियों में भी "गे" होने लगे

एक हैरतंगेज खबर आज ही पढने को मिली। विश्वास तो नहीं होता पर खबर तो खबर है, कुछ तो सच्चाई होगी।

बात है इंग्लैंड़ की। वहां डोरसेट की एबट्सबरी की हंसों की नर्सरी में एक नर हंसों का जोड़ा ऐसा है जिसे मादा साथियों में कोई दिलचस्पी नहीं है। नर्सरी के प्रवक्ता 'ड़ेव व्हिलर' बताते हैं कि 2002 से दोनों पक्षी अंड़ों से निकले हैं तभी से साथ-साथ रहते आये हैं। दोनों मार्च के महीने में मिल कर अपना घोंसला बनाते हैं। हसों के प्रजनन काल में आपस में आम पक्षियों की तरह सारी दिनचर्या पूरी करते हैं। यहां तक की अपने घोंसले में इस तरह बैठते हैं जैसे अंडे देने वाले हों।

नर्सरी के प्रबंधक जान ह्युस्टन हंसते हुए कहते हैं कि यहां के 1000-1200 पक्षियों में यह एक मात्र जोड़ा "गे" है। इनकी हरकतें देख कर बहुत मजा आता है। कभी-कभी ये दोनों लड़ भी पड़ते हैं।

अब यह तो शोध का विषय है कि ऐसा आचरण पहले मनुष्यों में आया या पशु पक्षी पहले से ही ऐसा व्यवहार करते थे। जिसका पता इंसान को अब तक नहीं लग पाया था। या यह "अप्राकृतिक" कृत्य मनुष्य की ही देन है जो यहां से वहां और ना जाने कहां तक फैलता जा रहा है।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

जानी-मानी पत्रिकाओं की वादा खिलाफी

बहुत बार किसी खास मौके पर आप किसी पत्रिका या पत्रिकाओं ने कुछ आर्टिकल वगैरह भेज देते होंगे, वे छप भी जाते होंगें। मानदेय मिले या ना मिले इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। पर कुछ स्थापित पत्रिकाएं किसी खास विषय या विषयों पर रचनाएं आमंत्रित करती रहती हैं नियमित रूप से और नीचे बाकायदा कुछ ना कुछ प्रोत्साहित करने के लिये देने का वादा भी रहता है। पर इधर अच्छी खासी लब्धप्रतिष्ठ पत्रिकाएं भी वादा खिलाफी करने लग गयीं हैं। मैं तीन जानी-मानी पत्रिकाओं का जिक्र कर रहा हूं।

1, रीडर्स डाईजेस्ट : इस जगत प्रसिद्ध पत्रिका का मैं ग्राहक रहा हूं। इसकी कुछ अच्छी पुस्तकें भी मंगवाई हुई हैं मैंने। अभी पिछले दिनों साल भर का अग्रिम भुगतान कर देने के दो महिने बाद से ही इसकी ओर से पत्र आने शुरु हो गये अगले साल की बुकिंग के लिये। जब तीन-चार बार ऐसे पत्र आये तो मैने उन्हें लिखा कि भाई अभी दूसरा अंक आपने भेजा नहीं और भविष्य की चिंता शुरु हो गयी, ई का ठीक बात है? इसके कुछ दिनों बाद एक पार्सल आया और मेरी गैरहजिरी में घर में बच्चों द्वारा ले लिया गया। मैने उन्हें लिखा कि जब मैने इन किताबों को भेजने को नहीं कहा तो आपने क्यों भेजी। पर उधर से कोई जवाब नहीं आया। पर कुछ दिनों बाद बिल भेजने शुरू कर दिये। अंत में तंग आकर मैंने उन्हें पैसों के साथ एक पत्र भी ड़ाला जिसमें उनकी इस हरकत को गलत ठहराते हुए अपनी ग्राहकता खत्म करने को कह दिया।अभी कुछ दिनों पहले खबर थी कि योरोप में इस पत्रिका का कारोबार सिमटने की कगार पर है। इस तरह की हरकतों से तो ऐसा ही होगा।

2, दैनिक भास्कर की सहयोगी पत्रिका है "आहा जिंदगी" : इसमें तरह-तरह के लेखन पर तरह-तरह के उपहारों को देने की बात शुरु से ही लिखी जाती रही है। पर इसने मेरे छपे आर्टिकल पर कभी भी कुछ भेजने की जरुरत नही समझी।

3, तीसरी पत्रिका है "कादम्बिनी" : इसनें शुरु में एकाधिबार छपने पर अपना वादा निभाया। पर अभी पांच-छह महिने पहले कुछ छपने पर भी उन्होंने अपना लिखा वादा पूरा करने की आवश्यकता नहीं समझी। एक दो बार याद दिलाने पर उन्होंने भेजा तो कुछ नहीं, हां, वादे वाली लाईन ही हटा दी।

यह सब बातें इन की प्रतिष्ठा को ही ठेस पहुंचाती हैं। पर हो सकता है कि आजकल की गला काट स्पर्धा में इन पर भी खर्च की कटौती की समस्या हो। ठीक है ऐसा है हर कोई पैसा बचाना चाहता है तो भाई लिखो ही मत ना, जैसा "कादम्बिनी" ने किया। "आहा जिंदगी" सीख लेगी?

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

क्या ऐसे भी भुखमरी दूर होगी ?

खबर कुछ पुरानी है फिर भी ध्यान देने लायक है कि भुखमरी से निजात पाने का रास्ता बिहार सरकार ने ढ़ूंढ़ निकाला है। अब लोगों को चूहे का मांस खाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। जल्दी ही सड़क छाप ढाबों पर चूहे के मांस से बनने वाले उत्पाद, जैसे रैट टेल पास्ता, रैट कीमा, रैट बर्गर इत्यादी मिलना शुरु हो जायेंगे।

बिहार में मुसहर नाम की जाति है, जो चूहों का भक्षण करती है। यह शायद दुनिया की सबसे पिछडी जातियों मे से एक है। बिहार सरकार के अनुसार चूहे के मांस को खाद्य रूप में बढ़ावा देने से मुसहरों के उत्थान का रास्ता खुल जाएगा {पता नहीं कैसे}। बिहार के समाज कल्याण विभाग ने दावा किया है कि सरकार के इस कदम से मुसहर समुदाय आगे बढ़ेगा और अमीर हो जायेगा {लगता है चुनाव नजदीक हैं}। चूहे जो देश का पचास प्रतिशत अनाज चट कर जाते हैं उसकी बचत होगी। सभी को भरपूर प्रोटीन मिल पाएगा। उनके अनुसार यदी इसे सही तरीके से प्रचारित किया जाए तो देश की खाद्य समस्या का हल निकल जायेगा। इसके लिए फ़ूड फ़ेस्टिवल का आयोजन करने की योजना बनाई जा रही है। विदेशों के चूहामार होटलों से संपर्क किया जा रहा है इस जीव के मांस को स्वादिष्ट बनाने के तरीकों को जानने के लिए। रसूख वाले लोगों ने अपने लगे-बंदों द्वारा संचालित एन जी ओ से करोड़ों रुपये खर्च कर चूहा गणना करवाई जिससे पता चला कि देश में आठ अरब चूहे हैं और उनकी प्रजनन क्षमता अद्भुत है {लो भाई ऐश हो गयी। हां पैसे का हिसाब मत मांगियेगा} सो सप्लाई की कोई कमी नहीं रहेगी।

तो अब गाय, बकरी, भेड, कुत्ता, बिल्ली, चिडीयां, तोते, मछली, केंकडे और ना जाने क्या-क्या के साथ चूहों का नाम जुडने जा रहा है।इसके बाद शायद तिलचट्टों का नंबर होना चाहिए, क्योंकी वे तो खरबों की सख्या में मौजूद हैं।

क्या ख्याल है आप का?

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इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...