ज्यादातर यही समझा जाता है कि बैंकों में पैसा या कीमती सामान ही रखा जाता है। पर झारखंड के जमशेदपुर मे एक बैंक ऐसा है जिसका पैसों से कोई लेना-देना नहीं है। इस अनोखे बैंक में इंसान की मूलभूत जरूरत कपड़े रखे जाते हैं तथा इसे कपड़ों के बैंक के नाम से जाना जाता है।
करीब एक दशक से ज्यादा पुराने इस बैंक "गूंज" का मुख्य उद्देश्य देश के उन लाखों गरीब तथा जरूरतमंद लोगों को कपड़े उपलब्ध करवाना है, जो उचित वस्त्रों के अभाव मे अपमान और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम का सामना करते हैं। पूरी दुनिया में अनगिनत लोगों को कपड़ों के अभाव में शारिरिक व मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। भारत के ही कुछ भागों में महिलाओं को उचित वस्त्रों के अभाव में अनेकों बार अप्रिय परिस्थियों से गुजरना पड़ता है। इसी तरह की परेशानियों से लोगों को रोज दो-चार होता देख, कुछ लोगों का मिल कर इसका हल निकालने की सोच ने जो रूप लिया वही है "गूंज"। इसी तरह यदी छोटी-छोटी धाराएं अस्तित्व में आती रहें तो गरीबी के रेगिस्तान में कहीं-कहीं तो नखलिस्तान उभर कर कुछ तो राहत प्रदान कर ही सकता है। सिर्फ मन में सर्वहारा क लिए सच्चा प्रेम तथा उनके लिए कुछ कर गुजरने की भावना होनी चाहिए।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 18 अप्रैल 2010
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
आने वाला समय एक नई तस्वीर दिखाएगा, दुनिया की
वर्तमान समय बदलाव का समय है, हर पांच दस सालों में नयी-नयी इजादें सामने आती चली जा रही हैं। आने वाले कुछ सालों में भी हमारी दुनिया की तस्वीर में कुछ नये बदलाव आने वाले हैं। जिनमें प्रमुख हैं --
1:- विज्ञापन आकाश में छा जाएंगे। जी हां आकाश में लेज़र के जरिए विज्ञापन दिखाने की तकनीक पर बाकायदा काम चल रहा है।
2:- कैंसर और एड्स का निदान संभव हो जाएगा।
3:- विमानों का रूप उडनतश्तरी की तरह हो जाएगा। इसके उपर भारतीय मूल के सुब्रत राय शोध कर रहे हैं। उन्होंने इस विमान को "वीव" नाम दिया है।
4:- आने वाले समय में कारें हाइड्रोजन गैस से चलेंगी। हाइड्रोजन इंजन काम करेंगे प्रोटोन एक्सचेंज में बने फ़्यूल सेल से। जमाना होगा छोटी कारों का। नयी तकनीक जीवन को सुविधाजनक और सुरक्षित बना देगी।
5:- जोखिम के काम रोबोट करने लग जाएंगे। खान, निर्माण, बिजली, नाभिकीय संयंत्रों, हथियारों के परीक्षण, सेना, ट्रैफ़िक पुलिस जैसे स्थानों में रोबोट्स छा जाएंगे। अफसोस की बात यह हो जाएगी कि इन पर किसी नेता या उनके चमचों की धौंस नहीं चलेगी। आपको यह जान कर हैरानी के साथ-साथ खुशी भी होगी कि बहुत सी भारतीय कंपनियां घरेलू रोबोट के विकास में जुटी हुई हैं।
6:- प्रदूषण रहित सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने लगेगा।
7:- बुढ़ापे को रोकना तो नहीं पर जवानी को देर तक कायम रखना संभव हो जाएगा। शरीर पर बढ़ती उम्र के असर को काफी हद तक कम करने में सफ़लता मिल जाएगी।
8:- हो सकता है कि किसी अंजान सभ्यता के रेडिओ संदेश पाने में हम सफ़ल रहें। यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी ने तीन ऐसे सौरमंडल खोज निकाले हैं, जिनमें दर्जनों विशाल ग्रह मौजूद हैं। इनमें से 45 प्रकाश वर्ष दूर तो एक सितारा ऐसा है, जिसकी पृथ्वी जैसे तीन ग्रह परिक्रमा कर रहे हैं। पृथ्वी जैसा एक ग्रह तो महज 15 प्रकाश वर्ष दूर मिला है। अभी दो-तीन दिन पहले कुछ ऐसी ही खबर मिली भी है कि कुछ रेडिओ संकेत जैसा प्राप्त हुआ है।
9:- कंप्युटर और भी शक्तीशाली हो जाएंगे। ऊर्जा की खपत काफी घट जाएगी। यह संभव हो पाएगा गैलियम नाईट्राइड से जो सिलिकन चिप का स्थान ले लेगा।
पर अच्छाइयों के साथ-साथ हमें कुछ बुराईयों का भी सामना करना पडेगा जैसे, पानी की कमी का सामना करना पड सकता है। आक्सीजन खरीदनी पड सकती है। कुछ नयी बिमारियां सामने आ सकती हैं। संतानोत्पति की क्षमता घटने का डर है। सार्स और बर्ड फ्लू के अलावा चेचक, प्लेग, मलेरिया और हैजा जैसी पुरानी बिमारियां नये रूप में धावा बोल सकती हैं। रोबोट के आने से घरेलू नौकरों की वजह से होने वाले अपराध तो कम हो जायेंगे पर किसी और जोखिम के बारे में तो अभी सिर्फ़ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। फिर भी हमें यही आशा रखनी है कि इंसान सारी मुसीबतों से पार पाने का रास्ता निकाल ही लेगा।
देखते हैं कब क्या होता है।
1:- विज्ञापन आकाश में छा जाएंगे। जी हां आकाश में लेज़र के जरिए विज्ञापन दिखाने की तकनीक पर बाकायदा काम चल रहा है।
2:- कैंसर और एड्स का निदान संभव हो जाएगा।
3:- विमानों का रूप उडनतश्तरी की तरह हो जाएगा। इसके उपर भारतीय मूल के सुब्रत राय शोध कर रहे हैं। उन्होंने इस विमान को "वीव" नाम दिया है।
4:- आने वाले समय में कारें हाइड्रोजन गैस से चलेंगी। हाइड्रोजन इंजन काम करेंगे प्रोटोन एक्सचेंज में बने फ़्यूल सेल से। जमाना होगा छोटी कारों का। नयी तकनीक जीवन को सुविधाजनक और सुरक्षित बना देगी।
5:- जोखिम के काम रोबोट करने लग जाएंगे। खान, निर्माण, बिजली, नाभिकीय संयंत्रों, हथियारों के परीक्षण, सेना, ट्रैफ़िक पुलिस जैसे स्थानों में रोबोट्स छा जाएंगे। अफसोस की बात यह हो जाएगी कि इन पर किसी नेता या उनके चमचों की धौंस नहीं चलेगी। आपको यह जान कर हैरानी के साथ-साथ खुशी भी होगी कि बहुत सी भारतीय कंपनियां घरेलू रोबोट के विकास में जुटी हुई हैं।
6:- प्रदूषण रहित सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने लगेगा।
7:- बुढ़ापे को रोकना तो नहीं पर जवानी को देर तक कायम रखना संभव हो जाएगा। शरीर पर बढ़ती उम्र के असर को काफी हद तक कम करने में सफ़लता मिल जाएगी।
8:- हो सकता है कि किसी अंजान सभ्यता के रेडिओ संदेश पाने में हम सफ़ल रहें। यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी ने तीन ऐसे सौरमंडल खोज निकाले हैं, जिनमें दर्जनों विशाल ग्रह मौजूद हैं। इनमें से 45 प्रकाश वर्ष दूर तो एक सितारा ऐसा है, जिसकी पृथ्वी जैसे तीन ग्रह परिक्रमा कर रहे हैं। पृथ्वी जैसा एक ग्रह तो महज 15 प्रकाश वर्ष दूर मिला है। अभी दो-तीन दिन पहले कुछ ऐसी ही खबर मिली भी है कि कुछ रेडिओ संकेत जैसा प्राप्त हुआ है।
9:- कंप्युटर और भी शक्तीशाली हो जाएंगे। ऊर्जा की खपत काफी घट जाएगी। यह संभव हो पाएगा गैलियम नाईट्राइड से जो सिलिकन चिप का स्थान ले लेगा।
पर अच्छाइयों के साथ-साथ हमें कुछ बुराईयों का भी सामना करना पडेगा जैसे, पानी की कमी का सामना करना पड सकता है। आक्सीजन खरीदनी पड सकती है। कुछ नयी बिमारियां सामने आ सकती हैं। संतानोत्पति की क्षमता घटने का डर है। सार्स और बर्ड फ्लू के अलावा चेचक, प्लेग, मलेरिया और हैजा जैसी पुरानी बिमारियां नये रूप में धावा बोल सकती हैं। रोबोट के आने से घरेलू नौकरों की वजह से होने वाले अपराध तो कम हो जायेंगे पर किसी और जोखिम के बारे में तो अभी सिर्फ़ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। फिर भी हमें यही आशा रखनी है कि इंसान सारी मुसीबतों से पार पाने का रास्ता निकाल ही लेगा।
देखते हैं कब क्या होता है।
शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010
एक चौंकाऊ खबर, पक्षियों में भी "गे" होने लगे
एक हैरतंगेज खबर आज ही पढने को मिली। विश्वास तो नहीं होता पर खबर तो खबर है, कुछ तो सच्चाई होगी।
बात है इंग्लैंड़ की। वहां डोरसेट की एबट्सबरी की हंसों की नर्सरी में एक नर हंसों का जोड़ा ऐसा है जिसे मादा साथियों में कोई दिलचस्पी नहीं है। नर्सरी के प्रवक्ता 'ड़ेव व्हिलर' बताते हैं कि 2002 से दोनों पक्षी अंड़ों से निकले हैं तभी से साथ-साथ रहते आये हैं। दोनों मार्च के महीने में मिल कर अपना घोंसला बनाते हैं। हसों के प्रजनन काल में आपस में आम पक्षियों की तरह सारी दिनचर्या पूरी करते हैं। यहां तक की अपने घोंसले में इस तरह बैठते हैं जैसे अंडे देने वाले हों।
नर्सरी के प्रबंधक जान ह्युस्टन हंसते हुए कहते हैं कि यहां के 1000-1200 पक्षियों में यह एक मात्र जोड़ा "गे" है। इनकी हरकतें देख कर बहुत मजा आता है। कभी-कभी ये दोनों लड़ भी पड़ते हैं।
अब यह तो शोध का विषय है कि ऐसा आचरण पहले मनुष्यों में आया या पशु पक्षी पहले से ही ऐसा व्यवहार करते थे। जिसका पता इंसान को अब तक नहीं लग पाया था। या यह "अप्राकृतिक" कृत्य मनुष्य की ही देन है जो यहां से वहां और ना जाने कहां तक फैलता जा रहा है।
बात है इंग्लैंड़ की। वहां डोरसेट की एबट्सबरी की हंसों की नर्सरी में एक नर हंसों का जोड़ा ऐसा है जिसे मादा साथियों में कोई दिलचस्पी नहीं है। नर्सरी के प्रवक्ता 'ड़ेव व्हिलर' बताते हैं कि 2002 से दोनों पक्षी अंड़ों से निकले हैं तभी से साथ-साथ रहते आये हैं। दोनों मार्च के महीने में मिल कर अपना घोंसला बनाते हैं। हसों के प्रजनन काल में आपस में आम पक्षियों की तरह सारी दिनचर्या पूरी करते हैं। यहां तक की अपने घोंसले में इस तरह बैठते हैं जैसे अंडे देने वाले हों।
नर्सरी के प्रबंधक जान ह्युस्टन हंसते हुए कहते हैं कि यहां के 1000-1200 पक्षियों में यह एक मात्र जोड़ा "गे" है। इनकी हरकतें देख कर बहुत मजा आता है। कभी-कभी ये दोनों लड़ भी पड़ते हैं।
अब यह तो शोध का विषय है कि ऐसा आचरण पहले मनुष्यों में आया या पशु पक्षी पहले से ही ऐसा व्यवहार करते थे। जिसका पता इंसान को अब तक नहीं लग पाया था। या यह "अप्राकृतिक" कृत्य मनुष्य की ही देन है जो यहां से वहां और ना जाने कहां तक फैलता जा रहा है।
गुरुवार, 15 अप्रैल 2010
जानी-मानी पत्रिकाओं की वादा खिलाफी
बहुत बार किसी खास मौके पर आप किसी पत्रिका या पत्रिकाओं ने कुछ आर्टिकल वगैरह भेज देते होंगे, वे छप भी जाते होंगें। मानदेय मिले या ना मिले इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। पर कुछ स्थापित पत्रिकाएं किसी खास विषय या विषयों पर रचनाएं आमंत्रित करती रहती हैं नियमित रूप से और नीचे बाकायदा कुछ ना कुछ प्रोत्साहित करने के लिये देने का वादा भी रहता है। पर इधर अच्छी खासी लब्धप्रतिष्ठ पत्रिकाएं भी वादा खिलाफी करने लग गयीं हैं। मैं तीन जानी-मानी पत्रिकाओं का जिक्र कर रहा हूं।
1, रीडर्स डाईजेस्ट : इस जगत प्रसिद्ध पत्रिका का मैं ग्राहक रहा हूं। इसकी कुछ अच्छी पुस्तकें भी मंगवाई हुई हैं मैंने। अभी पिछले दिनों साल भर का अग्रिम भुगतान कर देने के दो महिने बाद से ही इसकी ओर से पत्र आने शुरु हो गये अगले साल की बुकिंग के लिये। जब तीन-चार बार ऐसे पत्र आये तो मैने उन्हें लिखा कि भाई अभी दूसरा अंक आपने भेजा नहीं और भविष्य की चिंता शुरु हो गयी, ई का ठीक बात है? इसके कुछ दिनों बाद एक पार्सल आया और मेरी गैरहजिरी में घर में बच्चों द्वारा ले लिया गया। मैने उन्हें लिखा कि जब मैने इन किताबों को भेजने को नहीं कहा तो आपने क्यों भेजी। पर उधर से कोई जवाब नहीं आया। पर कुछ दिनों बाद बिल भेजने शुरू कर दिये। अंत में तंग आकर मैंने उन्हें पैसों के साथ एक पत्र भी ड़ाला जिसमें उनकी इस हरकत को गलत ठहराते हुए अपनी ग्राहकता खत्म करने को कह दिया।अभी कुछ दिनों पहले खबर थी कि योरोप में इस पत्रिका का कारोबार सिमटने की कगार पर है। इस तरह की हरकतों से तो ऐसा ही होगा।
2, दैनिक भास्कर की सहयोगी पत्रिका है "आहा जिंदगी" : इसमें तरह-तरह के लेखन पर तरह-तरह के उपहारों को देने की बात शुरु से ही लिखी जाती रही है। पर इसने मेरे छपे आर्टिकल पर कभी भी कुछ भेजने की जरुरत नही समझी।
3, तीसरी पत्रिका है "कादम्बिनी" : इसनें शुरु में एकाधिबार छपने पर अपना वादा निभाया। पर अभी पांच-छह महिने पहले कुछ छपने पर भी उन्होंने अपना लिखा वादा पूरा करने की आवश्यकता नहीं समझी। एक दो बार याद दिलाने पर उन्होंने भेजा तो कुछ नहीं, हां, वादे वाली लाईन ही हटा दी।
यह सब बातें इन की प्रतिष्ठा को ही ठेस पहुंचाती हैं। पर हो सकता है कि आजकल की गला काट स्पर्धा में इन पर भी खर्च की कटौती की समस्या हो। ठीक है ऐसा है हर कोई पैसा बचाना चाहता है तो भाई लिखो ही मत ना, जैसा "कादम्बिनी" ने किया। "आहा जिंदगी" सीख लेगी?
1, रीडर्स डाईजेस्ट : इस जगत प्रसिद्ध पत्रिका का मैं ग्राहक रहा हूं। इसकी कुछ अच्छी पुस्तकें भी मंगवाई हुई हैं मैंने। अभी पिछले दिनों साल भर का अग्रिम भुगतान कर देने के दो महिने बाद से ही इसकी ओर से पत्र आने शुरु हो गये अगले साल की बुकिंग के लिये। जब तीन-चार बार ऐसे पत्र आये तो मैने उन्हें लिखा कि भाई अभी दूसरा अंक आपने भेजा नहीं और भविष्य की चिंता शुरु हो गयी, ई का ठीक बात है? इसके कुछ दिनों बाद एक पार्सल आया और मेरी गैरहजिरी में घर में बच्चों द्वारा ले लिया गया। मैने उन्हें लिखा कि जब मैने इन किताबों को भेजने को नहीं कहा तो आपने क्यों भेजी। पर उधर से कोई जवाब नहीं आया। पर कुछ दिनों बाद बिल भेजने शुरू कर दिये। अंत में तंग आकर मैंने उन्हें पैसों के साथ एक पत्र भी ड़ाला जिसमें उनकी इस हरकत को गलत ठहराते हुए अपनी ग्राहकता खत्म करने को कह दिया।अभी कुछ दिनों पहले खबर थी कि योरोप में इस पत्रिका का कारोबार सिमटने की कगार पर है। इस तरह की हरकतों से तो ऐसा ही होगा।
2, दैनिक भास्कर की सहयोगी पत्रिका है "आहा जिंदगी" : इसमें तरह-तरह के लेखन पर तरह-तरह के उपहारों को देने की बात शुरु से ही लिखी जाती रही है। पर इसने मेरे छपे आर्टिकल पर कभी भी कुछ भेजने की जरुरत नही समझी।
3, तीसरी पत्रिका है "कादम्बिनी" : इसनें शुरु में एकाधिबार छपने पर अपना वादा निभाया। पर अभी पांच-छह महिने पहले कुछ छपने पर भी उन्होंने अपना लिखा वादा पूरा करने की आवश्यकता नहीं समझी। एक दो बार याद दिलाने पर उन्होंने भेजा तो कुछ नहीं, हां, वादे वाली लाईन ही हटा दी।
यह सब बातें इन की प्रतिष्ठा को ही ठेस पहुंचाती हैं। पर हो सकता है कि आजकल की गला काट स्पर्धा में इन पर भी खर्च की कटौती की समस्या हो। ठीक है ऐसा है हर कोई पैसा बचाना चाहता है तो भाई लिखो ही मत ना, जैसा "कादम्बिनी" ने किया। "आहा जिंदगी" सीख लेगी?
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
क्या ऐसे भी भुखमरी दूर होगी ?
खबर कुछ पुरानी है फिर भी ध्यान देने लायक है कि भुखमरी से निजात पाने का रास्ता बिहार सरकार ने ढ़ूंढ़ निकाला है। अब लोगों को चूहे का मांस खाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। जल्दी ही सड़क छाप ढाबों पर चूहे के मांस से बनने वाले उत्पाद, जैसे रैट टेल पास्ता, रैट कीमा, रैट बर्गर इत्यादी मिलना शुरु हो जायेंगे।
बिहार में मुसहर नाम की जाति है, जो चूहों का भक्षण करती है। यह शायद दुनिया की सबसे पिछडी जातियों मे से एक है। बिहार सरकार के अनुसार चूहे के मांस को खाद्य रूप में बढ़ावा देने से मुसहरों के उत्थान का रास्ता खुल जाएगा {पता नहीं कैसे}। बिहार के समाज कल्याण विभाग ने दावा किया है कि सरकार के इस कदम से मुसहर समुदाय आगे बढ़ेगा और अमीर हो जायेगा {लगता है चुनाव नजदीक हैं}। चूहे जो देश का पचास प्रतिशत अनाज चट कर जाते हैं उसकी बचत होगी। सभी को भरपूर प्रोटीन मिल पाएगा। उनके अनुसार यदी इसे सही तरीके से प्रचारित किया जाए तो देश की खाद्य समस्या का हल निकल जायेगा। इसके लिए फ़ूड फ़ेस्टिवल का आयोजन करने की योजना बनाई जा रही है। विदेशों के चूहामार होटलों से संपर्क किया जा रहा है इस जीव के मांस को स्वादिष्ट बनाने के तरीकों को जानने के लिए। रसूख वाले लोगों ने अपने लगे-बंदों द्वारा संचालित एन जी ओ से करोड़ों रुपये खर्च कर चूहा गणना करवाई जिससे पता चला कि देश में आठ अरब चूहे हैं और उनकी प्रजनन क्षमता अद्भुत है {लो भाई ऐश हो गयी। हां पैसे का हिसाब मत मांगियेगा} सो सप्लाई की कोई कमी नहीं रहेगी।
तो अब गाय, बकरी, भेड, कुत्ता, बिल्ली, चिडीयां, तोते, मछली, केंकडे और ना जाने क्या-क्या के साथ चूहों का नाम जुडने जा रहा है।इसके बाद शायद तिलचट्टों का नंबर होना चाहिए, क्योंकी वे तो खरबों की सख्या में मौजूद हैं।
क्या ख्याल है आप का?
बिहार में मुसहर नाम की जाति है, जो चूहों का भक्षण करती है। यह शायद दुनिया की सबसे पिछडी जातियों मे से एक है। बिहार सरकार के अनुसार चूहे के मांस को खाद्य रूप में बढ़ावा देने से मुसहरों के उत्थान का रास्ता खुल जाएगा {पता नहीं कैसे}। बिहार के समाज कल्याण विभाग ने दावा किया है कि सरकार के इस कदम से मुसहर समुदाय आगे बढ़ेगा और अमीर हो जायेगा {लगता है चुनाव नजदीक हैं}। चूहे जो देश का पचास प्रतिशत अनाज चट कर जाते हैं उसकी बचत होगी। सभी को भरपूर प्रोटीन मिल पाएगा। उनके अनुसार यदी इसे सही तरीके से प्रचारित किया जाए तो देश की खाद्य समस्या का हल निकल जायेगा। इसके लिए फ़ूड फ़ेस्टिवल का आयोजन करने की योजना बनाई जा रही है। विदेशों के चूहामार होटलों से संपर्क किया जा रहा है इस जीव के मांस को स्वादिष्ट बनाने के तरीकों को जानने के लिए। रसूख वाले लोगों ने अपने लगे-बंदों द्वारा संचालित एन जी ओ से करोड़ों रुपये खर्च कर चूहा गणना करवाई जिससे पता चला कि देश में आठ अरब चूहे हैं और उनकी प्रजनन क्षमता अद्भुत है {लो भाई ऐश हो गयी। हां पैसे का हिसाब मत मांगियेगा} सो सप्लाई की कोई कमी नहीं रहेगी।
तो अब गाय, बकरी, भेड, कुत्ता, बिल्ली, चिडीयां, तोते, मछली, केंकडे और ना जाने क्या-क्या के साथ चूहों का नाम जुडने जा रहा है।इसके बाद शायद तिलचट्टों का नंबर होना चाहिए, क्योंकी वे तो खरबों की सख्या में मौजूद हैं।
क्या ख्याल है आप का?
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
विश्वास करें तो पूरा करें :-)
विश्वास करें तो पूरा करें, नहीं तो न करें :-)
दो दोस्त जंगल में ट्रैकिंग के लिये गये। अचानक एक बेहोश हो कर गिर पड़ा और मर गया, दूसरे ने घबड़ा कर मोबाईल से हेल्प लाईन पर फोन कर मदद मांगी कि मेरा दोस्त घने जंगल में मर गया है मुझे सहायता की जरूरत है। उधर से पूछा गया कि क्या तुम्हे विश्वास है कि वह मर गया है। फोन पर एक पल की चुप्पी के बाद गोली चलने की आवाज आई,
फिर जवाब आया, हां।
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तीन दोस्तों को जंगल में घूमते-घूमते रात हो गयी और वे रास्ता भूल गये। पहले ने प्रार्थना की कि हे प्रभू किसी भी तरह मुझे घर पहुंचा दो, घर पर सब चिंता कर रहे होंगे। प्रभू ने उसकी बात सुनी और वह वहां से गायब हो घर पहुंच गया। दूसरे ने भी अपने भगवान को याद कर इस मुसीबत से छुटकारा मांगा, वह भी गायब हो अपने घर पहुंच गया। अब तीसरा डर के मारे रोने लगा। उसको रोता देख आकाशवाणी हुई कि बच्चे क्यों रो रहा है, बोल मैं तेरी क्या सहायता करूं। ये बोला प्रभू बहुत डर लग रहा है मेरे दोस्तों को मेरे पास भेज दो। अगले पल ही उसकी इच्छा पूरी हो गयी।
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एक भला आदमी रात में दुर्घटना ग्रस्त हो खाई में गिर पडा। गिरते हुए किसी तरह उसके हाथ में एक पेड़ की डाल आ गयी जिसे पकड़ कर वह लटक गया और चिल्लाने लगा कि कोई है मुझे बचाओ। उसे इस हालत में देख भगवान को दया आ गयी और आकाशवाणी हुई कि बच्चे जिस डाल को पकड रक्खा है उसे छोड दे तेरे नीचे जगह है बचने की। उस भले आदमी ने आवाज सुनी, फिर दूसरी तरफ़ मुंह कर चिल्लाया,
अरे कोई है, मुझे बचाओ!!!
दो दोस्त जंगल में ट्रैकिंग के लिये गये। अचानक एक बेहोश हो कर गिर पड़ा और मर गया, दूसरे ने घबड़ा कर मोबाईल से हेल्प लाईन पर फोन कर मदद मांगी कि मेरा दोस्त घने जंगल में मर गया है मुझे सहायता की जरूरत है। उधर से पूछा गया कि क्या तुम्हे विश्वास है कि वह मर गया है। फोन पर एक पल की चुप्पी के बाद गोली चलने की आवाज आई,
फिर जवाब आया, हां।
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तीन दोस्तों को जंगल में घूमते-घूमते रात हो गयी और वे रास्ता भूल गये। पहले ने प्रार्थना की कि हे प्रभू किसी भी तरह मुझे घर पहुंचा दो, घर पर सब चिंता कर रहे होंगे। प्रभू ने उसकी बात सुनी और वह वहां से गायब हो घर पहुंच गया। दूसरे ने भी अपने भगवान को याद कर इस मुसीबत से छुटकारा मांगा, वह भी गायब हो अपने घर पहुंच गया। अब तीसरा डर के मारे रोने लगा। उसको रोता देख आकाशवाणी हुई कि बच्चे क्यों रो रहा है, बोल मैं तेरी क्या सहायता करूं। ये बोला प्रभू बहुत डर लग रहा है मेरे दोस्तों को मेरे पास भेज दो। अगले पल ही उसकी इच्छा पूरी हो गयी।
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एक भला आदमी रात में दुर्घटना ग्रस्त हो खाई में गिर पडा। गिरते हुए किसी तरह उसके हाथ में एक पेड़ की डाल आ गयी जिसे पकड़ कर वह लटक गया और चिल्लाने लगा कि कोई है मुझे बचाओ। उसे इस हालत में देख भगवान को दया आ गयी और आकाशवाणी हुई कि बच्चे जिस डाल को पकड रक्खा है उसे छोड दे तेरे नीचे जगह है बचने की। उस भले आदमी ने आवाज सुनी, फिर दूसरी तरफ़ मुंह कर चिल्लाया,
अरे कोई है, मुझे बचाओ!!!
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
कुत्तों ने "शोले" देखी. पर क्या देखी !!!
तकरीबन 35 साल पहले फिल्म “शोले" ने जो तहलका मचाया था उसकी तपिश, उसका सरूर अभी तक लोग भुले नहीं हैं। इंसान तो इंसान जानवरों पर भी उसका जादू सर चढ कर बोला था।
कलकत्ता के सामने हुगली नदी के पार “बांधाघाट” का इलाका। उस कस्बाई इलाके के एक साधारण से सिनेमाघर “अशोक” में कई दिनों से शोले बदस्तूर चल रही थी। सिनेमाघर बहुत साधारण सा था। सड़क के किनारे बने उस हाल की एक छोटी सी लाबी थी। उसी में टिकट घर, उसी में प्रतिक्षालय, उसी में उपर जाने की सीढियां। वहीं अंदर जाने के लिये दो दरवाजे थे। जिसमें एक हाल के अंदर की पिछली कतारों के लिये था तथा दूसरा पर्दे के स्टेज के पास ले जाता था। उन पर मोटे काले रंग के पर्दे टंगे रहते थे। गर्मी से बचने के लिये अंदर सिर्फ पंखों का ही सहारा था। शाम को अंधेरा घिरने पर हाल के दरवाजे खुले छोड़ दिये जाते थे जिससे दिन भर बंद हाल में शाम को बाहर की ठंड़ी हवा से कुछ राहत मिल सके।
दोपहर में गर्मी से बचने के लिये दो-चार “रोड़ेशियन" कुत्ते लाबी में आ कर सीढियों के निचे दुबके रहते थे। लोगों के आने-जाने से, शाम को दरवाजे खुले होने से वे भी गानों इत्यादि को सुनने के आदी हो गये थे। पर दैवयोग से उन्होंने अपने से सम्बंधित संवाद नहीं सुना था।
उस इलाके में कोई भी फिल्म एक दो हफ्ते से ज्यादा नहीं चलती थी क्योंकि अधिकांश लोग शहर जा सुविधायुक्त हाल की ठंड़क में फिल्म का मजा लेते थे। पर जब महीने भर यहां से शोले नहीं उतरी तो हमारे इन “रोड़ेशियन” को भी आश्चर्य हुआ क्योंकि वे भी कुछ दिनों बाद नये पोस्टर देखने के आदी हो गये थे। फिर दूसरी बात यह कि उन्हें अंदर से आती फिल्म की आवाजों को कई लोगों को दोहराते सुना तो उन्होंने भी एक एतिहासिक फैसला लिया कि हम भी अंदर जा यह फिल्म देखेंगे कि इसमें ऐसा क्या है जो लोग इसे बार-बार देख रहे हैं। पर अंदर जाना और उतनी देर छिप कर बैठे रहना बहुत मुश्किल काम था। किसी ने देख लिया तो लाबी की दोपहर की नींद से भी हाथ धोना पड़ सकता था। सो यह फैसला किया गया कि सब जने नहीं जायेंगें एक जना टुकड़े-टुकड़े मे पिक्चर देखेगा और रात को सब को उसके बारे में बताएगा।
तो एक दिन हमारा शेरदिल कालू रात के शो में छिपता-छिपाता अंदर चला ही गया। पर आधे घंटे के बाद ही बाहर आ खड़ा हुआ। सबने आश्चर्य से पूछा कि क्या हो गया? उसने कहा कि बस मार खाने से बच कर आ रहा हूं। सब फिर बोले अरे हुआ क्या था बताओ तो सही। तब कालू ने जवाब दिया कि मैं अंदर मुंह उठाए देख रहा था, तभी वहां एक गंदा सा आदमी आया, उसके हाथ में लंबा मोटा सा कुछ हंटर जैसा कुछ था। उसके सामने खंबे से एक आदमी बंधा हुआ था। वहीं एक सुंदर सी लड़की भी खडी थी। गंदे से आदमी ने उस लड़की से कहा, छमिया नाच के दिखा। तो खंबे से बंधा हट्टा-कट्टा आदमी बोला, नहीं बासंती, इस कुत्ते के सामने मत नाचना। अब बोलो अंदर हाल में इतने लोग नाच देखने को इकट्ठे हुए थे। उधर वह गंदा सा आदमी और बहुत से लोग बंदुके लिये खड़े थे अब मेरे कारण नाच नहीं हो पाता तो सबने मिल कर मुझे मारना ही था सो मैं भाग आया।
सब चुप हो गये समय की नजाकत को देख। पर वह जादू ही क्या जो सर पर ना चढ जाए। कुछ दिनों बाद फिर एक श्वान पुत्र के खून ने जोश मारा। उसने एलान किया कि जो भी हो वह आज रात फिल्म देख कर ही रहेगा। रात का शो शुरु होने के कुछ देर बाद वह अगले दरवाजे से अंदर दाखिल हो गया। पर दस मिनट बाद ही ड़र से कांपता हुआ अपनी पूंछ को पिछले पैरों में दबाये बाहर निकला और भागता ही चला गया। उसके साथी हैरान-परेशान उसके पीछे-पीछे भागे और एक सुनसान गली में उसे जा घेरा। वह अभी भी ड़र से कांप रहा था। सबने उससे कारण पूछा पर उसके मुंह से बोल ही नहीं फूट रहे थे। कुछ देर बाद उसने कहना शुरू किया कि मैं छिप कर ही अंदर गया था पर पता नहीं कैसे उस हट्टे-कट्टे आदमी ने मुझे देख लिया और मेरी तरफ ऊंगली उठा कर बोला, कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा। वह शायद समझा होगा कि मैं ही हूं जिसके कारण पिछली बार नाच ना हो पा रहा था सो इस बार तो वह मुझे मार देने पर ही उतारू हो गया था। वह तो मुझे मार ही देता यदि मैं भाग ना आया होता।
इसके बाद उन शेरदिल श्वान पुत्रों की "अशोक हाल" तक जाने की तब तक हिम्मत नहीं पड़ी जब तक कि शोले वहां से उतर ना गयी।
कलकत्ता के सामने हुगली नदी के पार “बांधाघाट” का इलाका। उस कस्बाई इलाके के एक साधारण से सिनेमाघर “अशोक” में कई दिनों से शोले बदस्तूर चल रही थी। सिनेमाघर बहुत साधारण सा था। सड़क के किनारे बने उस हाल की एक छोटी सी लाबी थी। उसी में टिकट घर, उसी में प्रतिक्षालय, उसी में उपर जाने की सीढियां। वहीं अंदर जाने के लिये दो दरवाजे थे। जिसमें एक हाल के अंदर की पिछली कतारों के लिये था तथा दूसरा पर्दे के स्टेज के पास ले जाता था। उन पर मोटे काले रंग के पर्दे टंगे रहते थे। गर्मी से बचने के लिये अंदर सिर्फ पंखों का ही सहारा था। शाम को अंधेरा घिरने पर हाल के दरवाजे खुले छोड़ दिये जाते थे जिससे दिन भर बंद हाल में शाम को बाहर की ठंड़ी हवा से कुछ राहत मिल सके।
दोपहर में गर्मी से बचने के लिये दो-चार “रोड़ेशियन" कुत्ते लाबी में आ कर सीढियों के निचे दुबके रहते थे। लोगों के आने-जाने से, शाम को दरवाजे खुले होने से वे भी गानों इत्यादि को सुनने के आदी हो गये थे। पर दैवयोग से उन्होंने अपने से सम्बंधित संवाद नहीं सुना था।
उस इलाके में कोई भी फिल्म एक दो हफ्ते से ज्यादा नहीं चलती थी क्योंकि अधिकांश लोग शहर जा सुविधायुक्त हाल की ठंड़क में फिल्म का मजा लेते थे। पर जब महीने भर यहां से शोले नहीं उतरी तो हमारे इन “रोड़ेशियन” को भी आश्चर्य हुआ क्योंकि वे भी कुछ दिनों बाद नये पोस्टर देखने के आदी हो गये थे। फिर दूसरी बात यह कि उन्हें अंदर से आती फिल्म की आवाजों को कई लोगों को दोहराते सुना तो उन्होंने भी एक एतिहासिक फैसला लिया कि हम भी अंदर जा यह फिल्म देखेंगे कि इसमें ऐसा क्या है जो लोग इसे बार-बार देख रहे हैं। पर अंदर जाना और उतनी देर छिप कर बैठे रहना बहुत मुश्किल काम था। किसी ने देख लिया तो लाबी की दोपहर की नींद से भी हाथ धोना पड़ सकता था। सो यह फैसला किया गया कि सब जने नहीं जायेंगें एक जना टुकड़े-टुकड़े मे पिक्चर देखेगा और रात को सब को उसके बारे में बताएगा।
तो एक दिन हमारा शेरदिल कालू रात के शो में छिपता-छिपाता अंदर चला ही गया। पर आधे घंटे के बाद ही बाहर आ खड़ा हुआ। सबने आश्चर्य से पूछा कि क्या हो गया? उसने कहा कि बस मार खाने से बच कर आ रहा हूं। सब फिर बोले अरे हुआ क्या था बताओ तो सही। तब कालू ने जवाब दिया कि मैं अंदर मुंह उठाए देख रहा था, तभी वहां एक गंदा सा आदमी आया, उसके हाथ में लंबा मोटा सा कुछ हंटर जैसा कुछ था। उसके सामने खंबे से एक आदमी बंधा हुआ था। वहीं एक सुंदर सी लड़की भी खडी थी। गंदे से आदमी ने उस लड़की से कहा, छमिया नाच के दिखा। तो खंबे से बंधा हट्टा-कट्टा आदमी बोला, नहीं बासंती, इस कुत्ते के सामने मत नाचना। अब बोलो अंदर हाल में इतने लोग नाच देखने को इकट्ठे हुए थे। उधर वह गंदा सा आदमी और बहुत से लोग बंदुके लिये खड़े थे अब मेरे कारण नाच नहीं हो पाता तो सबने मिल कर मुझे मारना ही था सो मैं भाग आया।
सब चुप हो गये समय की नजाकत को देख। पर वह जादू ही क्या जो सर पर ना चढ जाए। कुछ दिनों बाद फिर एक श्वान पुत्र के खून ने जोश मारा। उसने एलान किया कि जो भी हो वह आज रात फिल्म देख कर ही रहेगा। रात का शो शुरु होने के कुछ देर बाद वह अगले दरवाजे से अंदर दाखिल हो गया। पर दस मिनट बाद ही ड़र से कांपता हुआ अपनी पूंछ को पिछले पैरों में दबाये बाहर निकला और भागता ही चला गया। उसके साथी हैरान-परेशान उसके पीछे-पीछे भागे और एक सुनसान गली में उसे जा घेरा। वह अभी भी ड़र से कांप रहा था। सबने उससे कारण पूछा पर उसके मुंह से बोल ही नहीं फूट रहे थे। कुछ देर बाद उसने कहना शुरू किया कि मैं छिप कर ही अंदर गया था पर पता नहीं कैसे उस हट्टे-कट्टे आदमी ने मुझे देख लिया और मेरी तरफ ऊंगली उठा कर बोला, कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा। वह शायद समझा होगा कि मैं ही हूं जिसके कारण पिछली बार नाच ना हो पा रहा था सो इस बार तो वह मुझे मार देने पर ही उतारू हो गया था। वह तो मुझे मार ही देता यदि मैं भाग ना आया होता।
इसके बाद उन शेरदिल श्वान पुत्रों की "अशोक हाल" तक जाने की तब तक हिम्मत नहीं पड़ी जब तक कि शोले वहां से उतर ना गयी।
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