pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

हिमाचल के मणिकर्ण का श्रीराम मंदिर

हिमाचल का मणिकर्ण वह दिव्य स्थान है जो भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय है। पुराणों के अनुसार शिवजी तथा माता पार्वती ने अपने विवाह के पश्चात 11000 वर्षों तक यहां रमण किया था। भोले भंडारी को तो यह अलौकिक स्थान इतना प्रिय रहा कि उन्होंने काशी में भी अपने स्थान का नाम "मणिकर्णिका" घाट रखा।

इसी मणिकर्ण में श्रीरामजी का एक प्राचीन और अद्भुत मंदिर है। जहां दूर-दूर से लोग आ अपनी मनोकामनायें पूर्ण करते हैं। इस मंदिर के निर्माण की भी एक रोचक कथा है।

सोलहवीं शताब्दी की बात है। हिमाचल के मणिकर्ण इलाके में एक गरीब ब्राह्मण रहा करता था। उस समय कुल्लू प्रदेश के राजा जगत सिंह के कान किसी ने उस ब्राह्मण के खिलाफ यह कह कर भर दिये कि उसके पास अनमोल मोती हैं, जो कि राजकोष में होने चाहिये। ब्राह्मण ने राजा को समझाने की लाख कोशिश की कि उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं है, पर राजा ने उसकी एक ना सुनी और तीन दिन के अंदर मोती पेश करने का हुक्म सुना दिया।
लाचार ब्राह्मण ने राजकोप से ड़र कर परिवार समेत आत्महत्या कर ली। तब राजा की आंख खुली। ब्रह्महत्या के कारण उसकी रातों की नींद हराम हो गयी। उसे अपने भोजन में कीड़े नजर आने लगे। यहां तक की वह असाध्य रोग का शिका हो गया। जब कोई हल नहीं निकला तब राजा एक महत्माजी की शरण में गया। उन्होंने उसे अयोध्या से श्रीरामजी की मुर्ती ला वहां स्थापित कर अपना सारा राज-पाट रघुनाथजी को अर्पण कर खुद उनका प्रतिनिधि बन राज करने को कहा। राजा ने वैसा ही किया और अपने जीवन के शेष दिन श्रीरामजी के चरणों में काट वहीं अपने प्राण त्यागे।

वह मंदिर आज भी मणिकर्ण में है। जहां दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। राजा जगत सिंह के वशंज अब भी अपनी परंपरा निभाते हुए रघुनाथजी की चाकर बन सेवा करते हैं। 1981 में एक मंदिर कमेटी का गठन किया गया जो दुनिया भर के श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का रख-रखाव तथा यहां आने वाले भक्तों के रहने, खाने की पूरी सुविधा प्रदान करती है।

कभी भी मणिकर्ण जाने का सौभाग्य मिले तो वहां श्रीराम मंदिर और वहीं स्थित गुरुद्वारे का लंगर खाना ना भूलें।

रविवार, 31 जनवरी 2010

इंसानियत की कोई जाति नहीं होती. एक सत्य घटना.

चाहे कोई बंगाली हो, पंजाबी हो, गुजराती हो। उसका प्रदेश चाहे छत्तीसगढ़ हो, उड़ीसा हो या आसाम हो। मानवता या इंसानियत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आपसी प्रेम के लिए यह कोई बंधन नहीं है।

शर्मा परिवार पर प्रभू की कृपा थी। दोनों बच्चे बड़े हो गये थे। घर की जिम्मेदारियां कुछ कम हुईं तो श्रीमति कदम शर्मा ने बचे समय के सदुपयोग के लिये घर के पास के ही एक स्कूल में शिक्षिका का पद ग्रहण कर लिया। छोटा सा स्कूल था। छोटी-छोटी तनख्वाह थी। पर घर के नजदीक था और कोई मजबूरी नहीं थी। अच्छा था लोगों से मिलना जुलना हो जाता था और प्रकृति प्रदत्त लियाकत का उपयोग भी हो जाता था। तब कहां किसी को पता था कि आने वाले समय के लिये भगवान ने एक द्वार खोल दिया है।

समय अपनी रफ्तार से चलता जा रहा था। बड़ा बेटा कर्मक्षेत्र में उतर चुका था। छोटे ने एम।बी.ए. की तैयारी कर ली थी। तभी परिवार को जबरदस्त आर्थिक नुक्सान ने आ घेरा। सारी जमा-पूंजी पूरक के रूप में निकल गयी। उसी समय पूना के एक संस्थान से छोटे पुत्र को कोर्स के लिये बुलावा आ गया। दौड़-धूप शुरु हो गयी। जिन बैंकों के लुभावने वादों पर विश्वास कर पैसों के लिये निश्चिंत थे, वे सारे खोखले साबित हुए। इस बात को वे लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं जिन्होंने कभी मजबूरी में इन बैंकों का रुख किया होगा।

दिन पर दिन निकलते जा रहे थे। कुछ इंतजाम नहीं हो पा रहा था। ठीक ही कहा गया है कि जब समय विपरीत होता है तो अपना खुद का साया भी साथ नहीं देता। किसी तरह सिर्फ आधी रकम का इंतजाम हो पाया था।

कदमजी अपने स्टाफ रूम में सर झुकाये बैठीं थीं। आंखें आसुंओं से भरी हुई थीं। कल फीस जमा करने का अंतिम दिन था। एक लायक बेटे का भविष्य जोखिम में पड़ता जा रहा था। कुछ भी सूझ नहीं रहा था। सदा हंसता मुस्कुराता हुआ चेहरा कुम्हलाया हुआ था। तभी एक सहकर्मी ने कक्ष में प्रवेश किया। इनकी हालत देख जैसे ही कारण पूछा वैसे ही इनके सब्र का बांध टूट गया। आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी। आनन-फानन में सारे साथियों में बात फैल गयी। बात का पता सबको था पर समस्या इतनी विकट होगी किसी को अंदाजा नहीं था।

फिर पता नहीं क्या हुआ। एक घंटे के अंदर कमरे की मेज पर ढाई लाख रुपये पड़े थे। नगद और चेक के रूप में। उस छोटे से स्कूल में काम करने वाले कोई धन्ना सेठ तो थे नहीं, पर दिलों में इंसानियत थी, सहयोग की भावना थी, आपसी प्यार का जज्बा था। सबने अपनी क्षमता के अनुसार जितना भी बन पड़ा सहयोग किया था। कदमजी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। मुंह से बोल नहीं निकल पा रहे थे।

फिर किसी तरह तटस्थ हो सारे जने हरकत में आए। दौड़-धूप कर ड्राफ्ट वगैरह बनवाया गया और दूसरे दिन पैसे भेज दिये गये। साथ ही कालेज के प्रिंसीपल साहब को फोन पर इसकी जानकारी दे दी गयी जिससे देर होने पर कोई और अड़चन ना खड़ी हो जाये। सब ठीक हो गया। दाखिला मिल गया।

समय चक्र चलता रहा, वर्षों बीत गये। आज बेटा अपने कर्म क्षेत्र में कार्यरत है। कदमजी के बड़े पुत्र का विवाह भी हो चुका है। सुख-शांति स्थापित है। पर उस समय की याद आते ही उनकी आंखें नम हो जाती हैं, विवशता से नहीं कृतज्ञता से।

मन तो मेरा भी भीग जाता है यह सब सुनाते लिखते, क्योंकि कदमजी मेरी पत्नि हैं।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

हँसी के मोती :) :) :) :)

बार में बंते के साथ बैठा संता उचाट सा था। बंता के बहुत पूछने पर बोला कि यार तेरी भाभी से तंग आ गया हूं, रोज-रोज के क्लेश से जीना मुश्किल हो गया है। जी तो करता है कि उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दूं।
तो फेंक दो ना, एक बार में झंझट खत्म होगा। दो पेग चढा चुके बंता ने सलाह दी।
अरे यार, फेंक तो दूं, पर मेरा फ्लैट ग्राउण्ड़ फ्लोर पर है, जब वह फेंकने के बाद अंदर आयेगी तो तुझे तो क्या मुझे भी नहीं पता मेरा क्या होगा।
संता ने सिहरते हुए खुलासा किया।

बाऊजी बार से पूरी तरह टुन्न हो कर बाहर निकले तो गेटकीपर ने सलाम ठोका। बाऊजी ने खुश हो पूछा, आज तक तुम्हें सबसे ज्यादा कितनी टिप मिली है?
हुजुर, सौ रुपये।
अच्छा, यह लो दो सौ रुपये, खुश?
जी साहब। एक जोरदार सलाम के साथ गेटकीपर ने जवाब दिया।
तभी बाऊ जी को कुछ याद आया। उन्होंने पलट कर फिर पूछा, ये सौ रुपये तुम्हें किस कंजूस ने दिये थे?
आपने ही कल दिये थे हुजूर।

प्रवचन करने के बाद पंड़ितजी शराब की बुराईयां बताते हुए बोले कि यह ऐसी चीज है कि यदि पैर से भी छू जाए तो आदमी नरक में जाता है। इतना कह कर उन्होंने संता को इंगित कर पूछा कि हां भाई क्या समझे?
संता ने खड़े हो कर जवाब दिया, पंड़ितजी ऐसी चीज को कोई लात मारेगा तो वह नरक में ही तो जाएगा।

सबेरे-सबेरे पत्नि ने अखबार ला कर पति को दिखाया, लो देखो शराब की कितनी बुराईयां छपी हैं।
अच्छा! कल से बंद। पति ने कहा।
सचमुच शराब बंद? पत्नि ने खुश हो पूछा।
अरे शराब नहीं यह अखबार।
पति ने बुरा सा मुंह बना कर जवाब दिया।

गुरुवार, 28 जनवरी 2010

मुझे भी "पद्मश्री" मिल सकता है.

पिछले दिनों पद्म-पुरस्कारों की घोषणा हुई। उसमें कुछ "हस्तियां" ऐसी भी थीं जिनके चयन पर यह सारा आयोजन प्रश्नाकिंत हो जाता है। मुझे आशा थी कि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दिग्गज ब्लागरों की कलम से कुछ निकलेगा पर कहीं सुगबुगाहट हुई भी होगी तो मुझे पता नहीं चला।

अब तो ऐसा ही लगता है कि समय के साथ-साथ इन अलंकारों की गरिमा, साख, इज्जत, जो भी है, सब खत्म होता जा रहा है। एक समय था जब इन्हें पाने वाले को आदर की दृष्टि से देखा जाता था, पर अब तो लोग शायद इस ओर ध्यान ही नहीं देते। यह आयोजन भी महज खाना पूर्ती के लिये रह गया लगता है। बांटना है सो बंट रहा है। किसे देना है, यह पाने वाले की पहुंच या फूहड़ चैनलों में उसके मर्यादाहीन कार्यकलापों से लगातार दर्शकों में उपस्थिति उसकी लोकप्रियता का मापदंड़ बन गया है। बदनाम होंगे तो क्या नाम तो होगा कि तर्ज पर। ना किसी के अपने कार्यक्षेत्र में योगदान की कीमत रह गयी है नाही किसी की वरियता का कोई मोल बचा है।

सबसे ज्यादा मिट्टी पलीद हुई है "पद्मश्री" उपाधी की। किस बिना पर यह “बांटे” जाते हैं, इसका पैमाना किसी को भी नहीं पता, देने वालों को भी नहीं। बिना किसी का नाम लिये आप इस बार के “पद्मश्रीयों” की लिस्ट पर नज़र ड़ालें और उनके अपने क्षेत्रों में किये गये “एहसानों” का अवलोकन करें तो आप भी मेरी बात से सहमत हो जायेंगे।

पर इन सब क्रियाकलापों से एक जोरदार बात धीरे से झटका दे रही है कि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में कुछ "जुगाड़" वगैरह कर अपने नाम के आगे भी "पद्मश्री" जुड़वाया जा सकता है। पर साथ ही फिर दिल में यह ख्याल भी आता है कि कहीं लोग यह ना कहने लगे, हुंह लो एक और आ गया।

बुधवार, 27 जनवरी 2010

जज और अभियुक्त

जज ने चोर से पूछा कि तुमने इतनी चोरियां कीं, बिना किसी साथी के?
" साहब आप तो जानते ही हैं कि आजकल ईमानदार साथी मिलते ही कहां हैं," चोर ने जवाब दिया।

जज : क्या तुमने कभी जेल काटी है?
चोर : दो बार प्रयास कर चुका हूं, पर सलाखें बहुत मोटी थीं। काट नहीं पाया।

जज : जानते हो दो-दो शादियां करने की सजा क्या है?
अभियुक्त : जी श्रीमान, दो-दो सासों को झेलना पड़ता है।

जज : सजा सुनने के पहले क्या तुम अदालत के सामने कुछ पेश करना चाहते हो?
अभियुक्त : अब क्या पेश करूंगा सरकार, जो था वह तो पहले ही वकील साहब को भेंट कर चुका हूं।

जज : तुमने पति के सिर पर कुर्सी मारी और वह टूट गयी।
अभियुक्ता : पर सर, मेरा ऐसा इरादा नहीं था।
जज : क्या मतलब है तुम्हारा? क्या तुम्हारी नीयत हमला करने की नहीं थी?अभियुक्ता : नहीं, मेरी नीयत कुर्सी तोड़ने की नहीं थी।

जज : तो तुम्हारा कहना है कि तुमने यह कार नहीं चुराई है?
चोर : वकील साहब की हफ्ते भर की जिरह से तो मुझे भी अब ऐसा ही लगने लगा है।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

रायपुर के ब्लॉगर भाईयों का सम्मेलन फूलों की खुशबू में संपन्न

यह संयोग था या शुभ संकेत आप ही बताईये......................

दिन रविवार, तारीख 24 जनवरी, समय 3.30 अपरान्ह, जगह रायपुर। यादगार क्षण, जब अनिल पुसदकर जी ने छत्तीसगढ में सक्रिय ब्लागर्स की मीटिंग को प्रेस क्लब में संबोधित कर कार्यक्रम की शुरुआत की।

मुझ समेत बहुत सारे सदस्य वहां पहुंचे थे, जो ब्लागर परिवार से तो हैं पर आपस में एक दूसरे को नाम से नहीं काम से पहचानते थे। इन “अनदेखे अपनों” का आपसी परिचय अपने आप में एक ऐसा अनुभव था जिसका आभास वहां उपस्थित रह कर ही पाया जा सकता था।

इसे संयोग कहेंगे या शुभ संकेत कि रायपुर में एक ही समय तरह-तरह के सुंदर और विभिन्न जातियों के फूलों की प्रदर्शिनी और छत्तीसगढ के विभिन्न स्थानों से आए ब्लागर भाईयों का मिलन एक साथ हो रहा था। आशा है जिस तरह सुंदर-सुंदर फूलों ने अपने देखने और चाहने वालों के दिलों को सदा की भांति हर्षाया होगा उसी तरह देश में दूर-दराज बैठे इस मिटिंग पर नजर रखे ब्लाग परिवार के “कजिंस” के दिलों को भी इस आयोजन की सफलता से खुशी महसूस हुई होगी। (कुछ को नहीं भी होती है भाई)

सभा में हर सदस्य को अपनी बात रखने का सुयोग प्राप्त था। बातें खुल कर रखी भी गयीं, सुझाव सामने आए, अड़चनों का जिक्र किया गया। जिसका सार यह निकला कि, * हिंदी ब्लागिंग के बढावे के लिये जो कुछ भी किया जा सके वह किया जाए। * इस सशक्त माध्यम से अपने प्रदेश छत्तीसगढ के बारे में देश के अन्य हिस्सों में रहने वालों के मन में जमी गलत भ्रान्तियों, भावनाओं तथा अनभिज्ञता को दूर किया जाय। * प्रदेश की सही तस्वीर लोगों के सामने लायी जाए। * दुष्प्रचार फैलाने वालों को सही मार्ग दिखाया जाए। * इस परिवार को राजनीति से दूर रखा जाए। क्योंकि समय के साथ-साथ सशक्त होते इस माध्यम का कोई अपने हित के लिये दुरप्रयोग ना कर सके। * मेरी तरह बहुतेरे साथियों की तकनीकी समझ को स्कूल के स्तर से कम से कम महाविद्यालय के स्तर तक ले जाने के लिये कार्यशालाओं का आयोजन नियमित अंतराल पर किया जाए। * और इस तरह के प्रयासों में जो भी “स्पीड ब्रेकर” आएं उनसे मिल-जुल कर पार पाया जाए। यह सारी बातें बहुत ही सौहार्द पूर्ण वातावरण के बीच बहुत शांति और धैर्य से सुनी और कही गयीं।

करीब तीन घण्टे चले इस कार्यक्रम के बाद अनिल जी का मेजबान रूप सामने आया जब उन्होंने बड़े अपनत्व से सभी को अपने फार्म हाउस पर रात्रि भोज के लिये आमंत्रित किया। भोजन तो एक बहाना साबित हुआ, हालांकि दूर-दराज से आए अनेक सदस्य समय की मजबूरी से वहां नहीं जा पाए, पर जो वहं पहुंचे वे तब तक अपनी शुरुआती झिझक से पूर्णतया उबर चुके थे जिसका फायदा यह रहा कि खाने के साथ-साथ एक दूसरे से परिचय और गाढा हुआ, प्रेस क्लब में पीछे छूटी वार्ता फिर जिवंत हो उठी, खुल कर चर्चाएं हुईं, अपने अनुभव बांट कर संबंधों में मजबूती लाते-लाते कब घड़ी की सुईयां ग्यारह बजाने लगीं पता ही नहीं चला। समय देख ना चाहते हुए भी सोमवार के बुखार को याद कर मुझे वहां से उठना पड़ा।
मैं तहे दिल से राजकुमार ग्वालानी जी शुक्रगुजार हूं जिन्होंने वहां से लौटते वक्त मेरा साथ दिया।
आशा है यह शुरुआत एक कारवां की शक्ल जरूर इख्तियार करेगी।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

हमीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते

कभी-कभी बातचीत के दौरान हम आधे-अधूरे शेर या मिसरे मसाले के रूप में जोड़ देते हैं। पर पूरा मिसरा या शेर याद नहीं होता या पता ही नहीं होता। ऐसी ही कुछ लोकप्रिय पंक्तियां हाज़िर हैं पर खेद है कि सब के रचनाकारों का नाम नहीं खोज पाया हूं।
जान है तो जहान है। यह मीर साहब की रचना इस प्रकार है :-
'मीर' अम्दन भी कोई मरता है,
"जान है तो जहान है प्यारे।"

चल साथ कि हसरत दिले-मरहूम से निकले,
"आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले"

गालिब साहब के तो ढेरों आधे-अधुरे मिसरे हमारी जबान पर वर्षों से चढे हुए हैं :-
इशरते कतरा है दरिया में फना हो जाना,
"दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।"

हमको मालुम है जन्नत की हकीकत लेकिन
"दिल के खुश रखने को ख्याल अच्छा है।"

गमे हस्ती का असद जुज मर्ग इलाज,
"शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक"

उनको देखने से आ जाती है मुंह पर रौनक,
"वो समझते हैं कि बिमार का हाल अच्छा है"

बुलबुल के कारोबार पे हैं खंदाहाए गुल,
कहते हैं जिसको इश्क खलल है दिमाग का।
ऐसे और भी हैं :-
"हजरते 'दाग' जहां बैठ गये बैठ गये"
और होंगे तेरी महफिल से उभरनेवाले।

मरीजे इश्क पे रहमत खुदा की।
"मर्ज बढता गया ज्यूं-ज्यूं दवा की"

हम तालिबे शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम,
"बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम ना होगा"

रिंदे खराब हाल को जाहिद ना छेड़ तू,
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू।
और
अब इत्र भी मलो तो मुहब्बत की बू नहीं,
"वो दिन हवा हुए कि जब पसीना गुलाब था" :)

जमाना बड़े शौक से सुन रहा था,
हमीं सो गये दास्तां कहते-कहते।

खुदा हाफिज़

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हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...