pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 27 जनवरी 2010

जज और अभियुक्त

जज ने चोर से पूछा कि तुमने इतनी चोरियां कीं, बिना किसी साथी के?
" साहब आप तो जानते ही हैं कि आजकल ईमानदार साथी मिलते ही कहां हैं," चोर ने जवाब दिया।

जज : क्या तुमने कभी जेल काटी है?
चोर : दो बार प्रयास कर चुका हूं, पर सलाखें बहुत मोटी थीं। काट नहीं पाया।

जज : जानते हो दो-दो शादियां करने की सजा क्या है?
अभियुक्त : जी श्रीमान, दो-दो सासों को झेलना पड़ता है।

जज : सजा सुनने के पहले क्या तुम अदालत के सामने कुछ पेश करना चाहते हो?
अभियुक्त : अब क्या पेश करूंगा सरकार, जो था वह तो पहले ही वकील साहब को भेंट कर चुका हूं।

जज : तुमने पति के सिर पर कुर्सी मारी और वह टूट गयी।
अभियुक्ता : पर सर, मेरा ऐसा इरादा नहीं था।
जज : क्या मतलब है तुम्हारा? क्या तुम्हारी नीयत हमला करने की नहीं थी?अभियुक्ता : नहीं, मेरी नीयत कुर्सी तोड़ने की नहीं थी।

जज : तो तुम्हारा कहना है कि तुमने यह कार नहीं चुराई है?
चोर : वकील साहब की हफ्ते भर की जिरह से तो मुझे भी अब ऐसा ही लगने लगा है।

सोमवार, 25 जनवरी 2010

रायपुर के ब्लॉगर भाईयों का सम्मेलन फूलों की खुशबू में संपन्न

यह संयोग था या शुभ संकेत आप ही बताईये......................

दिन रविवार, तारीख 24 जनवरी, समय 3.30 अपरान्ह, जगह रायपुर। यादगार क्षण, जब अनिल पुसदकर जी ने छत्तीसगढ में सक्रिय ब्लागर्स की मीटिंग को प्रेस क्लब में संबोधित कर कार्यक्रम की शुरुआत की।

मुझ समेत बहुत सारे सदस्य वहां पहुंचे थे, जो ब्लागर परिवार से तो हैं पर आपस में एक दूसरे को नाम से नहीं काम से पहचानते थे। इन “अनदेखे अपनों” का आपसी परिचय अपने आप में एक ऐसा अनुभव था जिसका आभास वहां उपस्थित रह कर ही पाया जा सकता था।

इसे संयोग कहेंगे या शुभ संकेत कि रायपुर में एक ही समय तरह-तरह के सुंदर और विभिन्न जातियों के फूलों की प्रदर्शिनी और छत्तीसगढ के विभिन्न स्थानों से आए ब्लागर भाईयों का मिलन एक साथ हो रहा था। आशा है जिस तरह सुंदर-सुंदर फूलों ने अपने देखने और चाहने वालों के दिलों को सदा की भांति हर्षाया होगा उसी तरह देश में दूर-दराज बैठे इस मिटिंग पर नजर रखे ब्लाग परिवार के “कजिंस” के दिलों को भी इस आयोजन की सफलता से खुशी महसूस हुई होगी। (कुछ को नहीं भी होती है भाई)

सभा में हर सदस्य को अपनी बात रखने का सुयोग प्राप्त था। बातें खुल कर रखी भी गयीं, सुझाव सामने आए, अड़चनों का जिक्र किया गया। जिसका सार यह निकला कि, * हिंदी ब्लागिंग के बढावे के लिये जो कुछ भी किया जा सके वह किया जाए। * इस सशक्त माध्यम से अपने प्रदेश छत्तीसगढ के बारे में देश के अन्य हिस्सों में रहने वालों के मन में जमी गलत भ्रान्तियों, भावनाओं तथा अनभिज्ञता को दूर किया जाय। * प्रदेश की सही तस्वीर लोगों के सामने लायी जाए। * दुष्प्रचार फैलाने वालों को सही मार्ग दिखाया जाए। * इस परिवार को राजनीति से दूर रखा जाए। क्योंकि समय के साथ-साथ सशक्त होते इस माध्यम का कोई अपने हित के लिये दुरप्रयोग ना कर सके। * मेरी तरह बहुतेरे साथियों की तकनीकी समझ को स्कूल के स्तर से कम से कम महाविद्यालय के स्तर तक ले जाने के लिये कार्यशालाओं का आयोजन नियमित अंतराल पर किया जाए। * और इस तरह के प्रयासों में जो भी “स्पीड ब्रेकर” आएं उनसे मिल-जुल कर पार पाया जाए। यह सारी बातें बहुत ही सौहार्द पूर्ण वातावरण के बीच बहुत शांति और धैर्य से सुनी और कही गयीं।

करीब तीन घण्टे चले इस कार्यक्रम के बाद अनिल जी का मेजबान रूप सामने आया जब उन्होंने बड़े अपनत्व से सभी को अपने फार्म हाउस पर रात्रि भोज के लिये आमंत्रित किया। भोजन तो एक बहाना साबित हुआ, हालांकि दूर-दराज से आए अनेक सदस्य समय की मजबूरी से वहां नहीं जा पाए, पर जो वहं पहुंचे वे तब तक अपनी शुरुआती झिझक से पूर्णतया उबर चुके थे जिसका फायदा यह रहा कि खाने के साथ-साथ एक दूसरे से परिचय और गाढा हुआ, प्रेस क्लब में पीछे छूटी वार्ता फिर जिवंत हो उठी, खुल कर चर्चाएं हुईं, अपने अनुभव बांट कर संबंधों में मजबूती लाते-लाते कब घड़ी की सुईयां ग्यारह बजाने लगीं पता ही नहीं चला। समय देख ना चाहते हुए भी सोमवार के बुखार को याद कर मुझे वहां से उठना पड़ा।
मैं तहे दिल से राजकुमार ग्वालानी जी शुक्रगुजार हूं जिन्होंने वहां से लौटते वक्त मेरा साथ दिया।
आशा है यह शुरुआत एक कारवां की शक्ल जरूर इख्तियार करेगी।

शनिवार, 23 जनवरी 2010

हमीं सो गए दास्ताँ कहते-कहते

कभी-कभी बातचीत के दौरान हम आधे-अधूरे शेर या मिसरे मसाले के रूप में जोड़ देते हैं। पर पूरा मिसरा या शेर याद नहीं होता या पता ही नहीं होता। ऐसी ही कुछ लोकप्रिय पंक्तियां हाज़िर हैं पर खेद है कि सब के रचनाकारों का नाम नहीं खोज पाया हूं।
जान है तो जहान है। यह मीर साहब की रचना इस प्रकार है :-
'मीर' अम्दन भी कोई मरता है,
"जान है तो जहान है प्यारे।"

चल साथ कि हसरत दिले-मरहूम से निकले,
"आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले"

गालिब साहब के तो ढेरों आधे-अधुरे मिसरे हमारी जबान पर वर्षों से चढे हुए हैं :-
इशरते कतरा है दरिया में फना हो जाना,
"दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।"

हमको मालुम है जन्नत की हकीकत लेकिन
"दिल के खुश रखने को ख्याल अच्छा है।"

गमे हस्ती का असद जुज मर्ग इलाज,
"शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक"

उनको देखने से आ जाती है मुंह पर रौनक,
"वो समझते हैं कि बिमार का हाल अच्छा है"

बुलबुल के कारोबार पे हैं खंदाहाए गुल,
कहते हैं जिसको इश्क खलल है दिमाग का।
ऐसे और भी हैं :-
"हजरते 'दाग' जहां बैठ गये बैठ गये"
और होंगे तेरी महफिल से उभरनेवाले।

मरीजे इश्क पे रहमत खुदा की।
"मर्ज बढता गया ज्यूं-ज्यूं दवा की"

हम तालिबे शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम,
"बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम ना होगा"

रिंदे खराब हाल को जाहिद ना छेड़ तू,
तुझको पराई क्या पड़ी अपनी निबेड़ तू।
और
अब इत्र भी मलो तो मुहब्बत की बू नहीं,
"वो दिन हवा हुए कि जब पसीना गुलाब था" :)

जमाना बड़े शौक से सुन रहा था,
हमीं सो गये दास्तां कहते-कहते।

खुदा हाफिज़

बुधवार, 20 जनवरी 2010

व्यक्तिगत अहम् के टकराव से धूमिल होता देश का गौरव

कुछ ज्यादा समय नहीं हुआ है जब हर देशवासी प्रत्येक ओलिम्पिकोत्सव पर निश्चिंत रहता था कम से कम एक स्वर्ण पदक की आवक को लेकर। फिर उसे नज़र लग गयी जमाने की। रही सही कसर पूरी कर दी एक इंसान के अक्खड़पन ने। कैसे क्या हुआ था उसे सभी जानते हैं।
लगता है इतिहास अपने को फिर दोहरवा रहा है। इस बार निशाने पर वह पात्र है जिसने अपने बल-बूते पर स्वर्ण पदक हासिल किया है। जैसी की खबरें निकल कर आ रहीं हैं कि अहमों के टकराव से फिर एक खेल को नुक्सान होने जा रहा है। इस बार निशानेबाजी के खेल पर बुरी नज़र का निशाना है।
हर बार की तरह बहती गंगा में हाथ धोने वाले लोगों की मंशाओं पर ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता बिंद्रा ने तब पानी फेर दिया जब अपने स्वागत समारोह में उसने नेशनल राइफल एसोसिएशन द्वारा क्रेडिट लेने की कोशिशों को यह कह कर नाकाम कर दिया कि इस सारी उपलब्धि का श्रेय सिर्फ उसके पिताजी को है जिनके द्वारा विदेशों में प्रशिक्षण पर करोंड़ों का खर्च किया गया। यह बात एसोसिएशन के अध्यक्ष और राजनेताओं को खल गयी। अखबारें बताती हैं कि बिंद्रा पर बहुत उल्टे-सीधे दवाब बनाने की कोशिश की गयी। इसी कारण दोनों पक्षों में कटुता बढती चली गयी। पर जब कुछ और ना हो सका तो अब मौका मिलते ही बिंद्रा को रास्ता दिखा दिया गया। अपने व्यक्तिगत अहम या टकराव पर देश के गौरव को क्यों दांव पर लगाया जाता है यह समझ के बाहर की चीज है।
यहां सवाल यह उठता है कि इस अहम के टकराव का फल किसे भुगतना पड़ेगा? क्यों नहीं उपर बैठे राजनेता देश हित में फैसला लेते? आज से नहीं वर्षों से खिलाड़ियों के साथ दुर्व्यवहार होता आया है। बहुतेरी बार सुना जाता रहा है कि खिलाड़ियों के साथ गये राजनयिक, जिनकी संख्या खिलाड़ियों से भी ज्यादा होती थी, अपना सामान साथ गये खिलाड़ियों से उठवाया करते थे। खिलाड़ियों का ध्यान या उनकी सुविधा को नकार अपने परिवार के साथ घूमने-फिरने में समय व्यतीत करते थे। पर आज तक नहीं सुना गया कि उन अधिकारियों से कोई सवाल जवाब किया गया हो, कोई सफाई मांगी गयी हो या दोषी पाये जाने पर उन पर कोई "एक्शन" लिया गया हो।
अब तो यही लगता है कि समय आ गया है कि जनता ही इस तरह के लोगों से जिनके कारण देश का नाम बदनाम होता हो, जिनके कारण समाज में तनाव पैदा होता हो, जिनके कारण घूसखोरों अपराधियों को संरक्षण मिलता हो, अपराध में पकड़े गये अपराधी को छुड़ाने की सिफारिश करने वाले ऐसे लोगों को कटघरे में खड़ा कर उनसे जवाब-तलब करे और उनकी असलियत समाज के सामने लाये और उनका दंड़ भी खुद ही निर्धारित करे।

सोमवार, 18 जनवरी 2010

पाक दामन, पर विवादों से घिरे ज्योति बसु

ज्योति बसु, एक ऐसा नाम जो बंगाल की राजनीति के कीचड़ में 23 साल तक सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद अपना दामन साफ रख सका। एक धनाढ्य घराने में जन्म लेने और हर तरह की सुख सुविधा वाली जिंदगी पा सकने के बावजूद जो वामपंथी विचारधारा से ऐसा जुड़ा कि जिंदगी भर उसी का हो कर रह गया। वाम पंथ और कम्युनिस्ट दल यही उसका घर-संसार था। पार्टी के प्रति उसका समर्पण ऐसा था कि पिता निशिकांतजी को यदि रुपया पैसा देना होता था तो वह अपनी पुत्रवधु को ही देते थे उन्हें लगता था कि ज्योति के पास पैसा गया तो वह पार्टी फंड में चला जायेगा। पर विड़म्बना को क्या कहें उसी पार्टी ने उससे प्रधान मंत्री बनने का सुयोग छीन लिया। पर ज्योति बाबू ने एक मिनट भी नहीं लगाया पार्टी के फैसले को मानने में। इसी समर्पण और आम जनता से जुड़ाव ही उन्हें सदा लोकप्रियता प्रदान करता रहा।क्या था ऐसा जिसने सम्पन्न पिता और सफल व्यवसायी पुत्र के बीच इन्हें सर्वहारा वर्ग से जोड़े रखा।
ऐसा नहीं था कि उनके साथ विवाद नहीं जुड़े थे। कभी-कभी तो ऐसा भी लगता था कि क्या देश से भी ज्यादा पार्टी की अहमियत उनके लिये ज्यादा तो नहीं। इस बात को तब बहुत हवा मिली जब 1962 में चीन के द्वारा धोखेबाजी से कड़वी तथा शर्मनाक हार पर सारा देश स्तब्ध, दुखी तथा शर्मसार था तब इनकी तरफ से चीन की अलोचना ना होने से पूरे बंगाल तथा देश में कड़वाहट फैल गयी थी। बातें तो बहुत सी हैं पर हमारी परम्परा रही है कि दिवंगत होने के बाद किसी की आलोचना नहीं करनी चाहिये। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

रविवार, 17 जनवरी 2010

यदि यह सच है तो .............................

क्रिस्टोफर मारलो, अपने जमाने का एक विख्यात नाटककार। लोग दिवाने थे उसकी रचनाओं के। उसके लिखे कथानकों में भेद करना मुश्किल था कि वे सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं या काल्पनिक कथाएं हैं।
1593 में उसकी एक सराय में रहस्यमय स्थितियों में हत्या कर दी गयी। शक की उंगली शेक्सपियर की ओर भी उठी क्योंकि बाद में मारलो के सारे नाटक शेक्सपियर के नाम से छपे थे।
अब इसमें कितनी सच्चाई है नहीं कहा जा सकता। क्या ऐसा सचमुच हुआ था या यह सिर्फ बदनाम करने की साजिश है।
आप में से किसी को इस बारे में और जानकारी हो तो अवश्य बतायें।

शनिवार, 16 जनवरी 2010

यह कैसे ज्योतिषी हैं

15 जनवरी, सूर्य ग्रहण का दिन। स्टार प्लस ने अपने सारे भविष्य वक्ताओं को इकट्ठा किया हुआ था। वैसे इस चैनल पर अवतरित होने वाले ऐसे पुरुष या महिलाओं के लटके-झटकों को देख आपको भविष्य नहीं फिल्म जगत की याद आने लगती है।
पता नहीं क्या सोच कर वहीं ज्योतिष की सार्थकता को सिद्ध करने का खेल शुरु हो गया। इस चैनल के एक प्रिय ज्योतिषी हैं, जिनको अपनी नुमाइश का बहुत शौक है। वह पर्दे पर किसी को राह दिखाने की बजाय अपनी असहनीय मुद्राओं और हाव भाव को प्रदर्शित करने में ही अपना सारा ध्यान लगाये रहते हैं। उन्होंने उनके सामने पेश किये गये पात्र के बारे में अपना लेखा जोखा पेश कर दिया। सच्चाई जानने के लिये पात्र की पत्नि को फोन द्वारा बात कर जब महाराज के "प्रिडिक्शन" के बारे में बता उनका जवाब जानना चाहा गया तो उस महिला ने सब कुछ सिरे से नकार दिया। हालांकि ज्योतिषि महाराज ने अपनी तरफ से काफी कोशिश की, महिला का उत्तर बदलवाने की पर उसका जवाब नकारात्मक ही रहा। महाराज का चेहरा अपनी हार कबूल ना कर पा रहा था। कुछ देर बाद शायद उन्हें कुछ सूझा और भारतीय नारी, संस्कृति और संस्कारों का सहारा ले बोले कि कोई भी महिला सरेआम अपने पति के साथ अपने अच्छे-बुरे रिश्तों का खूलासा नहीं करना चाहेगी इसीलिये वह मेरी बातों को गलत बता रहीं हैं, वैसे मेरी सारी बातें सही हैं। पर उनका चेहरा कुछ और ही ब्यान कर रहा था।
इसी बीच एक अन्य ज्योतिषि महाराज उस पात्र को उसके अगले महिने होने वाले हाथ, पैर आंखों, लीवर इत्यादि पर आने वाले खतरों का ब्यौरा देने में जुट गये, जैसे ड़रा धमका कर अपनी बात मनवाना चाहते हों।
फिर उसी चैनल की एक चहेती महिला भविष्य वक्ता उठीं और पात्र के अन्य स्त्री से संबंधों का विवरण देने लगीं।
कुल मिला कर ऐसी नौटंकी देख कर मन दुखी होता रहा जहां एक विद्या को सरे आम अपने अहम का विषय बना कर उसका मजाक बनाया जा रहा था। मुझे तो यह सब सोची समझी साजिश का हिस्सा नजर आता है।स्टार जैसे चैनल कहने को ही भारतीय हैं पर इनकी हिंदी भाषा, वह भी कैसी है बतलाने की आवश्यकता नहीं है, को छोड़ कुछ भी ऐसा नहीं है जो हमारी संस्कृति या हमारी परम्पराओं के अनुरूप कुछ कर रहा हो। उल्टे उनका मजाक बनाना या उन्हें गलत सिद्ध करना ही इनका मुख्य उद्देश्य लगता है। जिसका उदाहरण समय-समय पर मिलता व दिखता रहता है।

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