ताजमहल के संरक्षण में कईयों का योगदान रहा है अब तक...........
ये तो सभी जानते हैं कि भारत की पहचान बन चुका आगरे का ताजमहल किसने बनवाया, क्यूं बनवाया, कैसे बनवाया, इत्यादि,इत्यादि। परन्तु इसके बनने के बाद इसकी साज-संभाल, देख-रेख कितनों ने की यह शायद सबको मालुम ना हो। इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि इसके बनने के कुछ ही सालों के बाद 1655 में ही इसमें कुछ दरारें उभर आयीं थीं। इसकी जानकारी उसी समय बादशाह औरंगजेब को दी गयी। वह इस तरह के खर्चों से दूर रहता था, झुंझलाने के बावजूद उसने ताज की मरम्मत करवाई।
इसके बाद 1812 में कैप्टन जोसेफ अलेक्जेंडर जो आगरा के एग्जेक्यूटिव इंजीनियर थे, ने इसका रख-रखाव करवाया। फिर दोबारा 1873-74 में ताज की नींव में गड़बड़ी पायी गयी और फिर बड़े पैमाने पर इसकी मरम्मत का काम करना पड़ा था।
फिर आता है 1984 का साल जब श्री महेश चंद्र मेहता ने इसको आस-पास के प्रदूषण से बचाने के लिये मुहिम छेड़ी। जिसके ही कारण 1996 में अदालत ने 292 कारखानों को वहां से हटाने का आदेश पारित कर ताज की उम्र में बढोतरी की। इसी जागरूकता के कारण श्री मेहता को 1997 में मेगसासे एवार्ड से नवाजा गया।
नौ अप्रैल 98 को युनेस्को और पुरातत्व विभाग ने मिल कर ताज के रख-रखाव के लिये एक प्रोजेक्ट तैयार किया।
13-05-1998 सरकार ने एक प्रस्ताव पास कर इसक चारों ओर किसी भी प्रकार के निर्माण पर पाबंदी लगा दी।
सन 2000 में ताज के 500 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के वाहन की पार्किंग या आवाजाही पर रोक लगा दी गयी।
22 जून 2002, ताज ग्रुप आफ होटल और पुरातत्व विभाग के द्वारा एक "नेशनल कल्चर फंड़" बनाया गया। जो इसकी देख-रेख और सुविधायें बढाने पर अपना ध्यान देता है।
दिसम्बर 2002 मायावती की सरकार का इसके चारों ओर ताज कारीडोर बनाने के घातक मंसूबे का पर्दाफाश हुआ। पर ऐसा होने के पहले करीब चालीस लाख क्यू. मीटर मिट्टी को जमुना में डाला जा चुका था। पर फिर भी ताज की रक्षा हो ही गयी।
ताजमहल भारत की ही नहीं विश्व की धरोहर बन चुका है। इसके संरक्षण और सुरक्षा की जिम्मेदारी को तो निभाना ही है। साथ-साथ इसका भी ध्यान रखना जरूरी है कि कुदरती प्रदूषण के साथ-साथ घिनौनी नियत वालों की काली नजरों से भी इसका बचाव होता रहे।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 5 दिसंबर 2009
गुरुवार, 3 दिसंबर 2009
लो, कर लो बात !! दुर्योधन का भी मन्दिर है भाई
हमारे देश में सबसे बड़ा खलनायक माने जाने वाले रावण के समर्थकों का एक अच्छा खासा वर्ग है। वाल्मिकि जी के अनुसार उसमें बहुत सारे गुणों का होना ही उसे कहीं-कहीं पूज्य बनाता है। पर दुर्योधन को तो सदा बुराईयों का पुतला ही माना गया है। पर आश्चर्य की बात है कि उसकी भी पूजा होती है और वह भी भगवान के रूप में।
महाराष्ट्र का अहमदनगर जिला। इसी जिले के एक छोटे से गांव, "दुरगांव", में दुर्योधन का मंदिर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि संपूर्ण भारत में यह इकलौता दुर्योधन का मंदिर है। जिसके प्रति यहां के लोगों में अटूट श्रद्धा है। उनका विश्वास है कि भगवान दुर्योधन उनकी विपत्ति में रक्षा तो करते ही हैं, उनकी मन्नतों को भी पूरा करते हैं।
एक चबूतरे पर बने इस मंदिर का निर्माण तेरहवीं शताब्दी का माना जाता है। इस ऊंचे शिखर वाले मंदिर में दो तल हैं। ऊपर वाले भाग में दुर्योधन की बैठी अवस्था वाली करीब दो फुट की मूर्ती है। नीचे गर्भ गृह में भगवान शिव के दो लिंग विद्यमान हैं। अपनी तरह के इस अनोखे मंदिर की अपनी अनोखी परंपरा भी है। यह मंदिर बरसात के चार महिनों में पूरी तरह बंद (सील बंद) कर दिया जाता है। जिसके पीछे यह धारणा है कि यदि दुर्योधन की दृष्टि बादलों पर पड़ जाएगी तो यहां पानी नहीं बरसेगा। क्योंकि महाभारत में अपनी पराजय के बाद जब दुर्योधन ने एक तालाब में छुपने की कोशिश की थी तो उसके जल ने श्री कृष्ण के ड़र से उसे आश्रय नहीं दिया था। दुर्योधन की वह नराजगी अभी भी बरकरार है। दुर्योधन की नजरें मेघों पर ना पड़ें इसलिये मंदिर को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इस मंदिर के इसी क्षेत्र में बनने की भी एक कथा प्रचलित है। बलराम जी अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे पर श्री कृष्ण ने उसका विवाह अर्जुन से करवा दिया था। इसलिये पांडवों से बदला लेने के लिये दुर्योधन ने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान प्राप्त किया था कि युद्ध में वह कभी भी अर्जुन से परास्त नहीं होगा ना ही अर्जुन उसका वध कर पायेगा। उसने वह तप इसी जगह किया था इसीलिये इस मंदिर का निर्माण यहां किया गया है।
यहां हर सात साल के बाद एक विशाल मेला लगता है, जिसमें आने वाले लोगों को लंगर के रूप में भोजन उपलब्ध करवाया जाता है।
महाराष्ट्र का अहमदनगर जिला। इसी जिले के एक छोटे से गांव, "दुरगांव", में दुर्योधन का मंदिर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि संपूर्ण भारत में यह इकलौता दुर्योधन का मंदिर है। जिसके प्रति यहां के लोगों में अटूट श्रद्धा है। उनका विश्वास है कि भगवान दुर्योधन उनकी विपत्ति में रक्षा तो करते ही हैं, उनकी मन्नतों को भी पूरा करते हैं।
एक चबूतरे पर बने इस मंदिर का निर्माण तेरहवीं शताब्दी का माना जाता है। इस ऊंचे शिखर वाले मंदिर में दो तल हैं। ऊपर वाले भाग में दुर्योधन की बैठी अवस्था वाली करीब दो फुट की मूर्ती है। नीचे गर्भ गृह में भगवान शिव के दो लिंग विद्यमान हैं। अपनी तरह के इस अनोखे मंदिर की अपनी अनोखी परंपरा भी है। यह मंदिर बरसात के चार महिनों में पूरी तरह बंद (सील बंद) कर दिया जाता है। जिसके पीछे यह धारणा है कि यदि दुर्योधन की दृष्टि बादलों पर पड़ जाएगी तो यहां पानी नहीं बरसेगा। क्योंकि महाभारत में अपनी पराजय के बाद जब दुर्योधन ने एक तालाब में छुपने की कोशिश की थी तो उसके जल ने श्री कृष्ण के ड़र से उसे आश्रय नहीं दिया था। दुर्योधन की वह नराजगी अभी भी बरकरार है। दुर्योधन की नजरें मेघों पर ना पड़ें इसलिये मंदिर को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इस मंदिर के इसी क्षेत्र में बनने की भी एक कथा प्रचलित है। बलराम जी अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे पर श्री कृष्ण ने उसका विवाह अर्जुन से करवा दिया था। इसलिये पांडवों से बदला लेने के लिये दुर्योधन ने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान प्राप्त किया था कि युद्ध में वह कभी भी अर्जुन से परास्त नहीं होगा ना ही अर्जुन उसका वध कर पायेगा। उसने वह तप इसी जगह किया था इसीलिये इस मंदिर का निर्माण यहां किया गया है।
यहां हर सात साल के बाद एक विशाल मेला लगता है, जिसमें आने वाले लोगों को लंगर के रूप में भोजन उपलब्ध करवाया जाता है।
बुधवार, 2 दिसंबर 2009
गरीब देश की गरीब पार्टी का गरीब नेता, होटल का बिल करोंड़ों का !!!!!
चिकने घड़े पर पानी ठहर भी जाये, किसी ढीठ को उसकी करतूतों का आईना दिखाने पर शर्म आ भी जाये, कुत्ते की पूंछ सीधी हो भी जाय पर हमारे देश में पायी जाने वाली एक खास प्रजाती की फितरत नहीं बदल सकती, चाहे साक्षात भगवान भी आ कर जोर लगा लें। इनके कारनामों पर टनों कागज़ काला हो चुका है पर मजाल है किसी के कान पर जूं भी रेंगी हो। अब तो इनके बारे में लिखना या कुछ बताना भी मुर्खता लगती है। फिर भी कभी-कभी कुछ ऐसी खबरें आती हैं कि लगता है कि उसे ज्यादा से ज्यादा लोग जाने और शायद धौंकनी की फूंक से लोहा भस्म हो ही जाये।
आज एक ऐसे जनता के सेवक की खबर है जो गरीबों की समझी जाने वाली पार्टी का सदस्य बन भारत के भाग्यविधाताओं की जमात में जा बैठा है। यह पार्टी अपने आप को सर्वहारा लोगों की तथा जमीन से जुड़े होने का दम भरती है। अभी कुछ दिनों पहले जब सरकार ने खर्च कम करने की बात की थी तो इस पार्टी की अगुआ ने व्यंग से कहा था कि हमें तो कहने की जरूरत नहीं है, हम तो सदा सादगी में विश्वास रखते हैं। उन के रहन-सहन से लगता भी है कि वह जैसा कहती हैं ,करती भी होंगी। पर कल ही उनके एक साथी को, जो केन्द्र में मंत्री भी बन गये हैं, एक नोटिस जारी किया गया है, पांच सितारा होटल का कमरा खाली करने के लिये, जहां वह पिछले छह माह से कुंड़ली मारे बैठे हैं। ये महाशय पहली बार सांसद बने हैं। इन्हें बंगला भी अलाट हो चुका है पर उसकी सजावट का काम पूरा नहीं हो पाने के कारण ये वहां रह नहीं पा रहे थे।
राजधानी में हर राज्य का अपना आलीशान ‘गेस्ट हाऊस’ होता है। जो किसी भी अच्छे होटल से किसी भी नजर से कम नहीं होता। वहां भी तो रहा जा सकता था। वहां रहने से इनकी इज्जत कम तो नहीं हो जाती उल्टे अपने राज्य में हो सकता है लोगों का विश्वास और बढ जाता। पर माले मुफ्त दिले बेरहम।
अब इन महाशय का होटल का बिल है “सिर्फ 36 करोड़” रुपये का। जिसे चुकाने का आदेश इनकी मुखिया ने इन्हें दिया है। इनका कहना है कि मुझे तो अभी तक कोई बिल मिला ही नहीं है। अब सोचने की बात है कि इतना छोटा-मोटा बिल क्या ये अपनी जेब से चुकायेंगे। और यदि चुकाते हैं तो वह पैसा कहां से आयेगा? क्या इन्होंने अपनी सम्पति का खुलासा किया है?
दूसरी बात अगला छह माह तक ऐश करता रहा तब इनकी मुखिया की नज़र इन पर क्यों नहीं पड़ी?
अब नाम में क्या रखा है।वैसे जिसने यह बात कही है वह भी इस उक्ति के बाद अपना नाम लिखने का लोभ छोड़ ना सका था। :)
आज एक ऐसे जनता के सेवक की खबर है जो गरीबों की समझी जाने वाली पार्टी का सदस्य बन भारत के भाग्यविधाताओं की जमात में जा बैठा है। यह पार्टी अपने आप को सर्वहारा लोगों की तथा जमीन से जुड़े होने का दम भरती है। अभी कुछ दिनों पहले जब सरकार ने खर्च कम करने की बात की थी तो इस पार्टी की अगुआ ने व्यंग से कहा था कि हमें तो कहने की जरूरत नहीं है, हम तो सदा सादगी में विश्वास रखते हैं। उन के रहन-सहन से लगता भी है कि वह जैसा कहती हैं ,करती भी होंगी। पर कल ही उनके एक साथी को, जो केन्द्र में मंत्री भी बन गये हैं, एक नोटिस जारी किया गया है, पांच सितारा होटल का कमरा खाली करने के लिये, जहां वह पिछले छह माह से कुंड़ली मारे बैठे हैं। ये महाशय पहली बार सांसद बने हैं। इन्हें बंगला भी अलाट हो चुका है पर उसकी सजावट का काम पूरा नहीं हो पाने के कारण ये वहां रह नहीं पा रहे थे।
राजधानी में हर राज्य का अपना आलीशान ‘गेस्ट हाऊस’ होता है। जो किसी भी अच्छे होटल से किसी भी नजर से कम नहीं होता। वहां भी तो रहा जा सकता था। वहां रहने से इनकी इज्जत कम तो नहीं हो जाती उल्टे अपने राज्य में हो सकता है लोगों का विश्वास और बढ जाता। पर माले मुफ्त दिले बेरहम।
अब इन महाशय का होटल का बिल है “सिर्फ 36 करोड़” रुपये का। जिसे चुकाने का आदेश इनकी मुखिया ने इन्हें दिया है। इनका कहना है कि मुझे तो अभी तक कोई बिल मिला ही नहीं है। अब सोचने की बात है कि इतना छोटा-मोटा बिल क्या ये अपनी जेब से चुकायेंगे। और यदि चुकाते हैं तो वह पैसा कहां से आयेगा? क्या इन्होंने अपनी सम्पति का खुलासा किया है?
दूसरी बात अगला छह माह तक ऐश करता रहा तब इनकी मुखिया की नज़र इन पर क्यों नहीं पड़ी?
अब नाम में क्या रखा है।वैसे जिसने यह बात कही है वह भी इस उक्ति के बाद अपना नाम लिखने का लोभ छोड़ ना सका था। :)
मंगलवार, 1 दिसंबर 2009
क्या सचमुच जरुरी है आयोडीनयुक्त नमक ?
ज़रा सोचिये कहीं आप उस आयोडीन की कीमत तो नहीं चुका रहे जो गर्म होते ही वाष्प में बदल जाता है..........
वर्षों से साधारण नमक खाते-खिलाते अचानक हमारी सरकार को एक दिन विदेशी विशेषज्ञों के चेताने से यह ख्याल आया कि अरे! हमारे देश के नागरिक आयोडीन का अंश तो लेते ही नहीं । हड़कंप मच गया रातोंरात हर आम आदमी तक पहुंचने वाले माध्यम से उसे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का काम शुरू कर दिया गया। डरा-डरा कर समझाया गया कि “अब” यदि आयोडीन नामक रोग बचाऊ दवा नहीं लोगे तो ऐसे रोग का शिकार हो जाओगे जिसका इलाज बहुत मुश्किल है। डरना हमारी फितरत है, कोई भी आ कर डरा जाता है, हम डर गये और शुरु हो गया करोंड़ों अरबों का खेल।
इसके लिये नमक को चुना गया जिसे हर आमोखास इंसान अपने काम में लाता ही है। और दौड़ पड़ीं अरबों खरबों का "टर्न ओवर" करने वाली कंपनियां, इस रुपये में दो किलो बिकने वाले नमक को "हेल्थ प्रोडक्ट" बनाने के लिये। विदेशी भी इसी ताक में थे वे भी आ जुटे अपना ताम-झाम लेकर उस गरीब की “सहायता” करने जो नमक के साथ ही सूखी रोटी खा भगवान को दुआ देने लग जाता था।
वर्षों से अपनी सेहत से लापरवह हमें सेहतमंद बनाने की सुध भी उन्हीं अंग्रंजों को ही आयी जिन्होंने सालों हम पर राज कर हमारी “तकलीफों" को करीब से जाना। इतिहासकार “पट्टाभि सीतारमैया जी” के अनुसार, अंग्रेजों के जहाज यहां से माल भर इंग्लैंड जाते थे तो लौटते समय जहाजों का भार बनाए रखने के लिये उनमें रेत भर-भर कर लाई जाती थी। फिर बाद में रेत की जगह नमक लाना शुरु हो गया। अब जब उसके ढेरों के ढेर जमा होने लगे तो उन्होंने यहां के नमक पर पाबंदी लगानी शुरु कर दी। पर इसके विरोध में जन-जन उठ खड़ा हुआ। नमक सत्याग्रह कर दिया गया। अंग्रजों को झुकना पड़ा। पर वह इस सोना उगलने वाली खान को भूल नहीं पाये।
प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला नमक किसी भी तरह सेहत के लिये ठीक नहीं है ऐसा कोई दावा नहीं होने के बावजूद अंततोगत्वा रास्ता निकाल ही लिया गया नमक को आमदनी का जरिया बनाने का। क्योंकि यही एक ऐसा खाद्य पदार्थ था जिसे हर घर की रसोई में स्थान प्राप्त था। हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब की जरूरत था। किसी भी दूसरी चीज के मुकाबले इसकी खपत कहीं ज्यादा थी। सो नमक में आयोडीन मिला लोगों की सेहत की हिफाजत की तथाकथित मुहिम शुरु कर दी गयी। जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार आयोडीन गर्मी पाते ही वाष्प में बदल जाता है। भारत में जहां खाना बनाने की विधी में ज्यादातर तलने, भूनने, सेंकने तथा फिर भोजन में तरह-तरह के मसालों का उपयोग होता हो वहां बेचारा आयोडीन कब तक अपना अस्तित्व बचा कर रख सकता है। अब सोचिये आप उस आयोडीन की कीमत अदा करते हैं जो गर्म होते ही भोजन का साथ छोड़ देता है।
दूसरी बात शोधकर्ता बताते हैं कि हमारे द्वारा उपयोग में लाई जाने वाले फल, सब्जियों और आमिष खाद्यों में भी पर्याप्त मात्रा में आयोडीन होता है। और फिर एक स्वस्थ इंसान को कितना आयोडीन चाहिये, सिर्फ 100-125 माइक्रोग्राम। इसके अलावा बार-बार दुनिया भर से ये जानकारियां सामने आती रही हैं कि आजकल रक्त चाप जैसे रोगों की बढोतरी में इसी आयोडीन मिश्रित नमक का हाथ है। जिसके कारण बहुतेरे देशों में इसकी जरुरत को खारिज भी कर दिया गया है।
जनता के स्वास्थ्य को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हमारे भाग्यविधाता यह भी भूल गये कि उनके इन सब तमाशों से साधारण नमक की दसियों गुना बढी कीमतों का उन हजारों-लाखों गरीब परिवारों पर क्या असर पड़ेगा जो आज भी नमक और प्याज (उसे भी कहां रहने दिया गया है किसी की हद में) के साथ दो रोटी खा कर अपनी जिंदगी काट रहें हैं। पर उस गरीब की पहले कब फिक्र की गयी थी जो अब की जाती।
अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं जब इसी तरह का खेल सरसों के तेल को ले कर शुरु करने की कोशिश की गयी थी, सिर्फ इसलिये कि "उनके" यहां के सड़ते हुए तेल को यहां खपाया जा सके।
पता नहीं कब चंद लोग अपनी बदनीयति से बाज आ देश की नीयति के बारे में सोचेंगे।
वर्षों से साधारण नमक खाते-खिलाते अचानक हमारी सरकार को एक दिन विदेशी विशेषज्ञों के चेताने से यह ख्याल आया कि अरे! हमारे देश के नागरिक आयोडीन का अंश तो लेते ही नहीं । हड़कंप मच गया रातोंरात हर आम आदमी तक पहुंचने वाले माध्यम से उसे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का काम शुरू कर दिया गया। डरा-डरा कर समझाया गया कि “अब” यदि आयोडीन नामक रोग बचाऊ दवा नहीं लोगे तो ऐसे रोग का शिकार हो जाओगे जिसका इलाज बहुत मुश्किल है। डरना हमारी फितरत है, कोई भी आ कर डरा जाता है, हम डर गये और शुरु हो गया करोंड़ों अरबों का खेल।
इसके लिये नमक को चुना गया जिसे हर आमोखास इंसान अपने काम में लाता ही है। और दौड़ पड़ीं अरबों खरबों का "टर्न ओवर" करने वाली कंपनियां, इस रुपये में दो किलो बिकने वाले नमक को "हेल्थ प्रोडक्ट" बनाने के लिये। विदेशी भी इसी ताक में थे वे भी आ जुटे अपना ताम-झाम लेकर उस गरीब की “सहायता” करने जो नमक के साथ ही सूखी रोटी खा भगवान को दुआ देने लग जाता था।
वर्षों से अपनी सेहत से लापरवह हमें सेहतमंद बनाने की सुध भी उन्हीं अंग्रंजों को ही आयी जिन्होंने सालों हम पर राज कर हमारी “तकलीफों" को करीब से जाना। इतिहासकार “पट्टाभि सीतारमैया जी” के अनुसार, अंग्रेजों के जहाज यहां से माल भर इंग्लैंड जाते थे तो लौटते समय जहाजों का भार बनाए रखने के लिये उनमें रेत भर-भर कर लाई जाती थी। फिर बाद में रेत की जगह नमक लाना शुरु हो गया। अब जब उसके ढेरों के ढेर जमा होने लगे तो उन्होंने यहां के नमक पर पाबंदी लगानी शुरु कर दी। पर इसके विरोध में जन-जन उठ खड़ा हुआ। नमक सत्याग्रह कर दिया गया। अंग्रजों को झुकना पड़ा। पर वह इस सोना उगलने वाली खान को भूल नहीं पाये।
प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला नमक किसी भी तरह सेहत के लिये ठीक नहीं है ऐसा कोई दावा नहीं होने के बावजूद अंततोगत्वा रास्ता निकाल ही लिया गया नमक को आमदनी का जरिया बनाने का। क्योंकि यही एक ऐसा खाद्य पदार्थ था जिसे हर घर की रसोई में स्थान प्राप्त था। हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब की जरूरत था। किसी भी दूसरी चीज के मुकाबले इसकी खपत कहीं ज्यादा थी। सो नमक में आयोडीन मिला लोगों की सेहत की हिफाजत की तथाकथित मुहिम शुरु कर दी गयी। जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार आयोडीन गर्मी पाते ही वाष्प में बदल जाता है। भारत में जहां खाना बनाने की विधी में ज्यादातर तलने, भूनने, सेंकने तथा फिर भोजन में तरह-तरह के मसालों का उपयोग होता हो वहां बेचारा आयोडीन कब तक अपना अस्तित्व बचा कर रख सकता है। अब सोचिये आप उस आयोडीन की कीमत अदा करते हैं जो गर्म होते ही भोजन का साथ छोड़ देता है।
दूसरी बात शोधकर्ता बताते हैं कि हमारे द्वारा उपयोग में लाई जाने वाले फल, सब्जियों और आमिष खाद्यों में भी पर्याप्त मात्रा में आयोडीन होता है। और फिर एक स्वस्थ इंसान को कितना आयोडीन चाहिये, सिर्फ 100-125 माइक्रोग्राम। इसके अलावा बार-बार दुनिया भर से ये जानकारियां सामने आती रही हैं कि आजकल रक्त चाप जैसे रोगों की बढोतरी में इसी आयोडीन मिश्रित नमक का हाथ है। जिसके कारण बहुतेरे देशों में इसकी जरुरत को खारिज भी कर दिया गया है।
जनता के स्वास्थ्य को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हमारे भाग्यविधाता यह भी भूल गये कि उनके इन सब तमाशों से साधारण नमक की दसियों गुना बढी कीमतों का उन हजारों-लाखों गरीब परिवारों पर क्या असर पड़ेगा जो आज भी नमक और प्याज (उसे भी कहां रहने दिया गया है किसी की हद में) के साथ दो रोटी खा कर अपनी जिंदगी काट रहें हैं। पर उस गरीब की पहले कब फिक्र की गयी थी जो अब की जाती।
अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं जब इसी तरह का खेल सरसों के तेल को ले कर शुरु करने की कोशिश की गयी थी, सिर्फ इसलिये कि "उनके" यहां के सड़ते हुए तेल को यहां खपाया जा सके।
पता नहीं कब चंद लोग अपनी बदनीयति से बाज आ देश की नीयति के बारे में सोचेंगे।
सोमवार, 30 नवंबर 2009
आयोडीन नमक जरूरी है क्या ?
सवाल बहुत देर से उठ रहा है। पर है सोचने लायक। सदियों से साधारण नमक खाते-खाते, क्या सचमुच ही हमें अब आयोडीन की जरूरत आन पड़ी थी?
या यह सब एक सोची समझी साजिश के तहत ही हुआ था और रुपये का दो किलो मिलने वाला नमक आज दस रुपये किलो में लोग लेने को मजबूर कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले आप सब को याद होगा, ऐसा ही एक षड्यंत्र सरसों के तेल को लेकर भी रचा गया था। उसी सरसों के तेल को जिसका उपयोग हमारे यहाँ पता नहीं कब से होता आया है और बहुत से परिवारों में तो बना इस तेल के भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मनुष्य के शरीर को आयोडीन चाहिए, पर कितना? आप सब के विचार जानना चाहता हूँ। असलियत कल।
या यह सब एक सोची समझी साजिश के तहत ही हुआ था और रुपये का दो किलो मिलने वाला नमक आज दस रुपये किलो में लोग लेने को मजबूर कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले आप सब को याद होगा, ऐसा ही एक षड्यंत्र सरसों के तेल को लेकर भी रचा गया था। उसी सरसों के तेल को जिसका उपयोग हमारे यहाँ पता नहीं कब से होता आया है और बहुत से परिवारों में तो बना इस तेल के भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मनुष्य के शरीर को आयोडीन चाहिए, पर कितना? आप सब के विचार जानना चाहता हूँ। असलियत कल।
रविवार, 29 नवंबर 2009
पढ़ कर देखिए आनन्द आयेगा
एक धर्मोपदेशक घूम-घूम कर लोगों को उपदेश दिया करते थे। ऐसे ही एक दिन वह एक गांव में जा पहुंचे। सारे गांव वाले अपने-अपने खेतों पर काम करने जा चुके थे। सिर्फ एक जना उनको मिला जो उन्हें गांव के पंचायत भवन में ले गया। उन्हें वहां ठहरा कर उस गांव वाले ने उनका परिचय और आने का कारण जाना। संत महोदय कुछ उलझन में थे, वह वहां ज्यादा रुक भी नहीं सकते थे और बिना उपदेश दिये आगे जाना भी उन्हें गवारा नहीं था। उन्हें सोच में पड़ा देख गांव वाले ने उनकी परेशानी का कारण जानना चाहा तो संतजी ने बताया कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप यहां अकेले हो तो मुझे प्रवचन देना चाहिये या नहीं। यह सुन गांव वाला बोला, महाराज मैं तो निपट गंवार आदमी हूं फिर भी इतना जानता हूं कि यदि मैं अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां सिर्फ एक जानवर के सिवा सारे पशु भाग गये हैं तो भी मैं उस जानवर को चारा जरूर दूंगा? संतजी की दुविधा दूर हो गयी और वे पूरे तीन घंटे तक अपना उपदेश देते रहे। फिर अपनी बात खत्म कर उन्होंने अपने एक मात्र श्रोता से पूछा, हां भाई कैसा रहा आज का प्रवचन?
गांव वाले ने तुरंत जवाब दिया, महाराज मैने तो पहले ही आप से कहा था कि मैं तो निपट गंवार इंसान हूं इतनी ज्ञान की बातें मुझे कहां पता। फिर भी इतना तो मुझे पता है कि अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां एक को छोड़ सारे जानवर भाग गये हैं तो उसे मैं उसी का चारा दूंगा, सारे जानवरों की घास उसी अकेले को ही नहीं खिला दूंगा।
गांव वाले ने तुरंत जवाब दिया, महाराज मैने तो पहले ही आप से कहा था कि मैं तो निपट गंवार इंसान हूं इतनी ज्ञान की बातें मुझे कहां पता। फिर भी इतना तो मुझे पता है कि अपने तबेले में जा कर देखूं कि वहां एक को छोड़ सारे जानवर भाग गये हैं तो उसे मैं उसी का चारा दूंगा, सारे जानवरों की घास उसी अकेले को ही नहीं खिला दूंगा।
शनिवार, 28 नवंबर 2009
सुमधुर ध्वनि बिखेरती अद्भुत चट्टाने
राजस्थान की सुप्रसिद्ध पर्वत माला अरावली।
बांसवाड़ा जिले से करीब बीस कि.मी. की दूरी पर इसी पर्वतमाला के उपर स्थित है माता नन्दिनी देवी का मंदिर। इसी मंदिर की पिछली तरफ हैं चार चट्टानें। जो प्रकृति का एक अद्भुत करिश्मा हैं।
पर्वत शिखर पर च्ट्टानें तो बहुत सारी बिखरी पड़ी हैं। पर यह चार शिलाखंड़ अपने आप में अद्भुत विलक्षणता समेटे हैं। इसे प्रकृति का अनोखा करिश्मा समझें या कुछ और क्योंकि ये चट्टाने अपने आस-पास की चट्टानों से बिल्कुल अलग हैं। इनकी खासियत है कि यदि इन पर किसी चीज से प्रहार किया जाय तो इनमें से अलग-अलग तरह की खनकने की ध्वनि निकलती है। ऐसा लगता है जैसे किसी धातु के बने पिंड़ पर चोट की जा रही हो। एक तरफ जहां इनमें से एक चट्टान के स्वरुप ने वर्षों से तरह-तरह के मौसमों के कारण एक गोलाकार शिवलिंग का आकार ले लिया है, जिस पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं ने इसको दैविय प्रतीक मान पूजा-अर्चना करनी शुरु कर दी है, तो वहीं दूसरी तरफ यहां आने वाले लोगों को घंटों इन चट्टनों को वाद्य यंत्रों की तरह प्रयोग कर भजन, गीत गाते देखा सुना जा सकता है। इन चट्टानों को लेकर तरह-तरह के मत हैं। कुछ कहते हैं कि इनमें किसी धातु की अत्यधिक मात्रा मिली हुई है जिस कारण यह खनक भरी ध्वनि उत्पन्न करती हैं तो किसी की राय में इनका खोखला होना इस तरह की मधुर ध्वनि उत्पन्न करने का कारण है। कुछ इन्हें उल्का पिंड़ मानते हैं क्योंकि सिर्फ यह चार चट्टानों से ही मधुर ध्वनि नकलती है आसपास की बाकि चट्टानें आम शिलापिंडों जैसी ही हैं।
प्रकृति की इस अद्भुत देन के अनबूझे रहस्य से फिलहाल तो पर्दा नहीं उठा है पर प्रयास जारी हैं।
बांसवाड़ा जिले से करीब बीस कि.मी. की दूरी पर इसी पर्वतमाला के उपर स्थित है माता नन्दिनी देवी का मंदिर। इसी मंदिर की पिछली तरफ हैं चार चट्टानें। जो प्रकृति का एक अद्भुत करिश्मा हैं।
पर्वत शिखर पर च्ट्टानें तो बहुत सारी बिखरी पड़ी हैं। पर यह चार शिलाखंड़ अपने आप में अद्भुत विलक्षणता समेटे हैं। इसे प्रकृति का अनोखा करिश्मा समझें या कुछ और क्योंकि ये चट्टाने अपने आस-पास की चट्टानों से बिल्कुल अलग हैं। इनकी खासियत है कि यदि इन पर किसी चीज से प्रहार किया जाय तो इनमें से अलग-अलग तरह की खनकने की ध्वनि निकलती है। ऐसा लगता है जैसे किसी धातु के बने पिंड़ पर चोट की जा रही हो। एक तरफ जहां इनमें से एक चट्टान के स्वरुप ने वर्षों से तरह-तरह के मौसमों के कारण एक गोलाकार शिवलिंग का आकार ले लिया है, जिस पर यहां आने वाले श्रद्धालुओं ने इसको दैविय प्रतीक मान पूजा-अर्चना करनी शुरु कर दी है, तो वहीं दूसरी तरफ यहां आने वाले लोगों को घंटों इन चट्टनों को वाद्य यंत्रों की तरह प्रयोग कर भजन, गीत गाते देखा सुना जा सकता है। इन चट्टानों को लेकर तरह-तरह के मत हैं। कुछ कहते हैं कि इनमें किसी धातु की अत्यधिक मात्रा मिली हुई है जिस कारण यह खनक भरी ध्वनि उत्पन्न करती हैं तो किसी की राय में इनका खोखला होना इस तरह की मधुर ध्वनि उत्पन्न करने का कारण है। कुछ इन्हें उल्का पिंड़ मानते हैं क्योंकि सिर्फ यह चार चट्टानों से ही मधुर ध्वनि नकलती है आसपास की बाकि चट्टानें आम शिलापिंडों जैसी ही हैं।
प्रकृति की इस अद्भुत देन के अनबूझे रहस्य से फिलहाल तो पर्दा नहीं उठा है पर प्रयास जारी हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
नकारों को नकारते नवयुवा
हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! अभी कुछ दि...
-
कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
-
शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
-
आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
-
चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
-
युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
-
कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
-
हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
-
"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
-
अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...