pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

दादा जी, अब भाग लो (:

बहुत बार ऐसा हुआ है कि अकेले बैठे यादों की जुगाली करते अचानक कोई बात याद आ जाती है और बरबस हंसी फूट पड़ती है। ऐसा ही एक वाक्या है जो याद आते ही हंसी ला देता है चेहरे पर। सारा खेल उसमें भाषा का है, हिंदी और बंगला का घालमेल। बहुत बार इच्छा हुई उसे आपस में बांटने की पर उसका मजा थोड़ी बहुत बंगला जानने वाले ले सकते हैं नहीं तो भाषा अमर्यादित सी लगती है। इसी से संकोचवश निर्मल हास्य से वंचित रह जाना पड़ता है। आज भी पूरा लिख ड़ाला था पर फिर आने वाले दिनों पर टाल दिया। उसके बदले यह खानापूर्ती सही -


एक छोटा सा बच्चा एक घर के दरवाजे की घंटी बजाने की काफी देर से कोशिश कर रहा था, पर उसका हाथ घंटी तक नहीं पहुंच पा रहा था। एक बुजुर्ग उधर से निकले और यह सोच कि शायद उसे अंदर जाना है, उसकी सहयता करने के लिये उन्होंने घंटी बजा दी, और बच्चे की तरफ देख बोले, अब ठीक है?
बच्चा बोला, हां, पर अब भाग लो !

सोमवार, 16 नवंबर 2009

कौन था वह? लार्ड कर्जन को मारना चाहता था या बचाना ?

दो-तीन दिन पहले अवधिया जी तथा भाटिया जी की पोस्टों को देख कर वायसराय लार्ड कर्जन के जीवन में घटी कुछ अजीबोगरीब घटनाओं के बारे मे पढा हुआ याद आ गया।


सन 1899 मे लार्ड कर्जन वायसराय बन कर भारत आए तो बीकानेर के महाराजा के निमंत्रंण पर वे राजस्थान के दौरे पर बीकानेर पहुंच गये। उन्हें वैसे भी राजस्थान से कुछ ज्यादा ही लगाव था। उनके वहां पहुंचने पर महाराजा ने उनके सम्मान में एक भव्य भोज का इंतजाम किया था। भोज का कार्यक्रम देर रात तक चलता रहा। उसके बाद कर्जन सीधे सोने चले गये। उस दिन पूर्णमासी की रात थी। अचानक किसी अजीबोगरीब हलचल या आवाज से उनकी नींद टूट गयी। वे खिड़की पर जा खड़े हुए तो उन्हें बागीचे में कुछ लोग नजर आये, जो सफेद कपड़े पहने एक ओर चले जा रहे थे। उन सब के पीछे कुछ दूरी पर एक आदमी अपने सिर पर एक बड़ा सा संदूक उठाए चल रहा था। किसी का भी चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था। सब जने तो बाग से निकल गये पर वह संदूक वाला आदमी पीछे रह गया। जब खिड़की के पास से वह गुजरने लगा तो कर्जन ने देखा कि उसके सर पर संदूक ना हो कर एक ताबूत था। आश्चर्यचकित हो उन्होंने आवाज लगाई कि ठहरो, कौन हो तुम ? इतना सुनते ही वह आदमी रुका और धीरे से अपने चेहरे से ताबूत को थोड़ा सा हटा ऊपर देखने लगा। पूरे चांद की रोशनी में सब कुछ साफ नजर आ रहा था। वायसराय ने जो देखा उससे उनका खून जम सा गया। उन्होंने अपनी जिंदगी में इतना खौफनाक चेहरा कभी नहीं देखा था। तभी उस आदमी के चेहरे पर एक अजीब सी डरावनी वीभत्स हंसी उभर आयी और वह हंसता हुआ एक कोने में जा गायब हो गया। कर्जन ने तुरंत द्वारपालों को दौड़ाया पर कहीं भी किसी के होने का कोई निशान नहीं था। महाराजा को भी इसकी खबर दी गयी। उस पूरी रात और दूसरे दिन सारे बीकानेर का चप्पा-चप्पा छान मारा गया, आस-पास के सभी इलाकों में भी वैसे चेहरे वाले की खोज की गयी पर सब बेकार।

हांलाकि कर्जन इस बात को धीरे-धीरे भूल गये थे। पर बात यहीं खत्म नहीं हुए थी। होनी अभी भी अपना खेल दिखाने को तैयार बैठी थी। कुछ सालों के बाद सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें पेरिस में आयोजित एक समारोह में भाग लेने जाना पड़ा था। “प्लेस ला दूर्त” में उस दिन बहुत ज्यादा गहमा-गहमी थी। महलों जैसे उस भवन की चौथी मंजिल पर सम्मेलन का आयोजन किया गया था। सरी लिफ्टों में लंबी-लंबी लाईनें लगी हुए थीं। खास लोगों की लिफ्ट के पस जब कर्जन पहुंचे तो वहां मौजूद लोगों ने सौजन्यवश उनसे आग्रह किया कि वह पहले जा कर सम्मेलन में शरीक हो जायें। कर्जन ने उनलोगों को धन्यवाद देते हुए लिफ्ट की ओर कदम बढये ही थे कि उन्हें अंदर सिर झुकाए कोई बैठा नजर आया। इनके पास पहुंचते ही उसने अपना सिर धीरे से उठाया तो कर्जन को तुरंत वह चेहरा याद आ गया जो सालों पहले उन्होंने बीकानेर के महल के उद्यान में ताबूत उठाये देखा था। यकीनन ही यही था वह इंसान, पर हज़ारों मील दूर यहां कैसे? उनके सारे शरीर में ठंडी लहर की झुनझुनी दौड़ गयी। तभी उस आदमी के चेहरे पर फिर वैसी ही एक शैतानी हंसी उभर आयी। कर्जन तुरंत वापस बाहर आ गये। लोगों के कारण पूछने पर उन्होंने जरूरी कागजात भुल आने की बात कही। वहां से वह तुरंत सुरक्षा अधिकारियों के पास गये और उस भयानक चेहरे वाले के बारे में पूछ-ताछ की। अधिकारियों ने ऐसे किसी भी आदमी के बारे में जानकारी होने से इंकार किया।

तभी इमारत में एक जोरदार धमाका हुआ। सभी लोग उस ओर दौड़ पड़े। वहां दिल दहला देने वाला दृष्य सामने था। लिफ्ट को संभालने वाले लोहे की रस्सियों के टूट जाने की वजह से लिफ्ट नीचे आ गिरी थी। बहुत से व्यक्ति काल के गाल में समा गये थे। पर उस भयानक चेहरे वाले इंसान का कहीं भी कोई अता-पता नहीं था।

कौन था वह, इंसान या कोई और? वह कर्जन को मारना चाहता था या बचाना? इसका जवाब ना तो कभी दुनिया को मिल पाया और नही लार्ड कर्जन को।

रविवार, 15 नवंबर 2009

Aisee kyaa bhuul hui ki gaayab mujhko kiyaa?


पता नहीं ऐसी कौन सी खता हो गयी कि ब्लागवानी ने मेरी "पोस्ट" लेने से इंकार कर दिया। रोज नहाता हूं , पूजा-पाठ से भी गुरेज नहीं करता, सभी के लिये दोस्ताना, आदर का भाव रखता हूं फिर कौन सी बिल्ली छींक गयी कि ऐसा-वैसा-जैसा भी समझ में आता है बिना द्वेष भाव रखे लिखे हुए में ऐसे कौन से एलर्जी के जीवाणुं आ गये जो उसे बहिष्कृत कर दिया गया। हां अपनी फोटो जरूर बदलने की जुर्रत की थी। दो दिन से लग रहा था कि कुछ तो गड़बड़ है पर ध्यान नहीं दिया। वैसे भी इस ससुरे कमप्यूटर के बारे में इतनी ही जानकारी है जितनी सूट पहनने की। कपड़ा कैसा है या दर्जी कैसे सिलता है उस बारे में शून्य बटे सन्नाटा ही रहता है। परसों ऐसे ही ब्लागवाणी के नये ब्लागों पर नजर गयी तो वहां "अलग सा" टंगा दिखा। घंटियां बजने लगीं। क्लिक किया तो बकलम खुद को पाया। पर पिछले सारे आंकड़े गायब थे। उसी को फिर ले हुजूर के दरबार में दस्कत दी तो मेहरबानी से पिछली सीट पर जगह तो मिल गायी। पर ऐसा क्यूं हुआ समझ नहीं पा रहा हूं सो आप सब के सामने दुखड़ा ले कर हाजिर हूं।

 
यह सब इतना तुका-बेतुका इस लिये सफेद पर काला किया है कि आप की सहायता मिल सके, गलती समझने  में
 

शनिवार, 14 नवंबर 2009

अपने चारों ओर रहस्य का आवरण लपेटे "बिल्ली"

दुनिया के सैकड़ों-हजारों जीव- जंतुओं मे दो ऐसे प्राणी हैं जो अपने इर्द-गिर्द सदा रहस्य और ड़र का कोहरा लपेटे रहते हैं। पहला है बिल्ली और दूसरा सांप। वैसे इस मामले में बिल्ली सांप से कहीं आगे है। इसी की जाति के शेर, बाघ, तेंदुए आदि जानवर ड़र जरूर पैदा करते हैं पर रहस्यात्मक वातावरण नहीं बनाते। पर अफ्रीकी मूल के इस प्राणी, "बिल्ली" को लेकर विश्व भर के देशों में अनेकों किस्से, कहानियां और अंधविश्वास प्रचलित हैं। जहां जापान मे इसे सम्मान दिया जाता है क्योंकि किसी समय इसने वहां चूहों के आतंक को खत्म कर खाद्यान संकट का निवारण किया था। वहीं दूसरी ओर इसाई धर्म में इसे बुरी आत्माओं का साथी समझ नफ़रत की जाती रही है। फ्रांस मे तो इसे कभी जादूगरनी तक मान लिया गया था। हमारे यहां भी इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। एक ओर तो इसके रोने की आवाज को अशुभ माना जाता है। आज के युग मे भी यदि यह रास्ता काट जाए तो अच्छे-अच्छे पढे-लिखे लोगों को ठिठकते देखा जा सकता है। रात के अंधेरे में आग के शोलों कि तरह दिप-दिप करती आंखों के साथ यदि काली बिल्ली मिल जाए तो देवता भी कूच करने मे देर नहीं लगाते। संयोग वश यदि किसी के हाथों इसकी मौत हो जाए तो सोने की बिल्ली बना दान करने से ही पाप मुक्ति मानी जाती है। दूसरी ओर दिवाली के दिन इसका घर में दिखाई देना शुभ माना जाता है।दुनिया भर की ड़रावनी फिल्मों मे रहस्य और ड़र के कोहरे को घना करने मे सदा इसकी सहायता ली जाती रही है।
यह हर तरह के खाद्य को खाने वाली है पर इसका चूहे और दूध के प्रति लगाव अप्रतिम है। इसे पालतू तो बनाया जा सकता है पर वफादारी की गारंटी शायद नहीं ली जा सकती।
सांपों को लेकर भी तरह-तरह की भ्रान्तियां मौकापरस्तों द्वारा फैलाई जाती रही हैं। जैसे इच्छाधारी नाग-नागिन की विचित्र कथाएं। जिन पर फिल्में बना-बना कर निर्माता अपनी इच्छायें पूरी कर चुके हैं। एक और विश्वास बहुत प्रचलित है, नाग की आंखों मे कैमरा होना, जिससे वह अपना अहित करने वाले को खोज कर बदला लेता है। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने मे हो। सपेरों और तांत्रिकों द्वारा एक और बात फैलाई हुई है कि सांप आवश्यक अनुष्ठान करने पर अपने द्वारा काटे गये इंसान के पास आ अपना विष वापस चूस लेता है।
पर सच्चाई तो यह है कि दूध ना पीने वाला यह जीव दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी, इंसान, से ड़रता है। चोट करने या गलती से छेड़-छाड़ हो जाने पर ही यह पलट कर वार करता है। उल्टे यह चूहे जैसे जीव-जंतुओं को खा कर खेती की रक्षा ही करता है। जिससे इसे किसान मित्र भी कहा जाता है।
दुनिया के दूसरे प्रणियों की तरह ये भी प्रकृति की देन हैं। जरूरत है उल्टी सीधी अफवाहों से लोगों को अवगत करा अंधविश्वासों की दुनिया से बाहर लाने की।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

विश्वास तो करना ही पडेगा

कुछ ऐसे तथ्य जो अजीब तो हैं पर सच हैं :-
१, १८७३ में जब "कोलगेट" ने दांतों के लिए पेस्ट बनाया तो उसे जार में बाजार में पेश किया गया था।

२, टाइम पत्रिका ने १९८२ में "मैन आफ द ईयर " के लिए कंप्यूटर को चुना था। ऐसा पहली बार हुआ था की किसी वस्तु को यह खिताब दिया गया हो।

३, दुनिया में पहाडों की १०९ सबसे ऊंची चोटियां एशिया में हैं, जिनमे से ९६ हिमालय की हैं।

४, यदि सेव, आलू और प्याज को नाक बंद कर खाया जाय तो उनका स्वाद एक जैसा ही लगता है। आजमा कर देखिएगा। (:

५, एक छींक की गति 'सौ मील' घंटे की होती है।

६, 'शाप लिफ्टिंग' में सबसे पहला नाम बाईबिल का है।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

प्रेम या स्नेह सिर्फ़ इंसान की ही बपौती नहीं है.

इटली का केंप्गलिया रेलवे स्टेशन। सुबह का समय, गाड़ियों की आने-जाने की आवाजों, यात्रियों की अफरा-तफरी के बीच "एल्वियो बारलेतानी" सर झुकाए अपने काम में मशगूल था। तभी उसे अपने पैरों के पास किसी चीज का एहसास हुआ। उसने चौंक कर नीचे देखा तो एक मरियल सा कुत्ता, जिसके शरीर तथा पंजों में जगह-जगह घाव हो गये थे, उसके पैरों में लोटने की कोशिश कर रहा था। तभी एल्वियो ने उसे पहचान लिया और वैसे ही उसे अपनी गोद में उठा लिया। उसके आंसू थम नहीं रहे थे। उसकी यह हालत देख उसके सहयोगी भी उसके इर्द-गिर्द इकट्ठा हो गये। फिर तो पूरा स्टेशन ही "लैंपो वापस आ गया" की आवाजों से गूंज उठा।

यह सत्य कथा है एक कुत्ते "लैंपो" की वफादारी और प्रेम की जो बत्तीस दिनों के बाद पूरे बारह सौ कि.मी. की यात्रा, पता नहीं कैसे, पूरी कर वापस अपने मालिक के पास आ पहुंचा था।

एल्वियो के बच्चे एक दिन कहीं से एक पिल्ला घर ले आये, जिसे घर में रखने की इजाजत उन्हें अपने अभिभावकों से भी मिल गयी। उसका नाम रखा गया "लैंपो"। अब बारलेतानी परिवार में एक और सदस्य की बढोतरी हो गयी थी। समय के साथ-साथ वह घर के बाहर भी सबका दुलारा बनता गया। एल्वियो को अपने कार्यालय आने के लिये अपने घर से ट्रेन पकड़नी पड़ती थी। एक दिन जब एल्वियो अपने बच्चों को स्कूल छोड़ स्टेशन आया तो लैंपो साथ ही था। ट्रेन के आते ही वह पहले ही अंदर जा एक सीट पर बैठ गया। अचभे से भरे एल्वियो को उसका भी टिकट लेना पड़ा। फिर तो यह रोजमर्रा की बात हो गयी। लैंपो रोज एल्वियो के साथ स्टेशन पर ट्रेन में चढ कर आने-जाने लगा। यहां भी अपनी खूबसूरती, चपलता और बुद्धीमानी के कारण एल्वियो के सहयोगियों की आंखों का तारा बन बैठा था।
पर एल्वियो के बास को यह सब पसंद नहीं था। उसे कुत्तों से चिढ थी। एक दिन उसने साफ-साफ कह दिया कि यदि लैंपो का स्टेशन आना नहीं रोका गया तो वह उसे म्युन्सपैलिटी के हवाले कर देगा। अधिकारी को मनाने की तथा लैंपो घर में ही रखने की बहुत कोशिशें की गयीं पर दोनों ही जैसे मानने को तैयार नहीं थे। दोनों ही अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे। तो एक दिन यह फैसला किया गया कि लैंपो को किसी दूर की गाड़ी में चढा दिया जाए, जिससे यह रोज-रोज की तकरार खत्म हो सके। । और एक दिन इटली की सबसे दूरगामी गाड़ी में लैंपो को भीगी आंखों और दुखी मन से चढा दिया गया। उस दिन एल्वियो के घर ना खाना बना ना किसी ने कुछ खाया। धीरे-धीरे दिन बीतते गये और लैंपो की याद धुंधली पड़ती गयी। एल्विनो परिवार भी आहिस्ता-आहिस्ता उसकी याद भुलाने की कोशिश में अपने काम से लग गया था कि अचानक लैंपो फिर उनकी जिंदगी में लौट आया और इस बार सुपर हीरो बन कर।
और अब तो वह बॉस का भी दुलारा था।

रविवार, 8 नवंबर 2009

रामदेव जी, सारी सृष्टि का जन्म ही "वैसी" जगह से होता है तो?

वैसे ऐसे लोगों के खिलाफ़ कुछ कहना नहीं चाहिए जो लोगों की भलाई में जुटे हुए हों। पर कभी-कभी कुछ ऐसी बात हो जाती है कि मजबूर हो कर कहना ही पड़ता है।
दो-एक दिन पहले श्रीमति जी, अपने हद से ज्यादा पसंदिदा चैनलों को छोड़ सर्च के चक्कर में पड़ी हुईं थीं (बहुत ज्यादा संभावाना थी कि उनके वालों पर विज्ञापन फेंके जा रहे हों) कि अचानक रामदेव बाबा सामने आ गये, और मेरे कानों में कुछ अंडे जैसे शब्द पड़े। सर्चिंग रोकी गयी।
रामदेव जी अंडे की बुराईयों को तरह-तरह के उदाहरण दे कर समझा रहे थे। इतना तो ठीक था पर अचानक उन्होंने उसे और बदतर दिखाने के लिये कहा कि जो चीज (क्षमा चाहता हूं इसमें एक शब्द भी मेरा नहीं है) पैखाने के रास्ते बाहर आती है वह कैसे अच्छी हो सकती है। इस बात को उन्होंने दो-तीन बार दोहराया। बोले कि उसकी सिर्फ पैकिंग ही अच्छी है बाकी उसमेँ ऐसा कुछ नहीं होता कि उसे खाया जाय। "ऐसी जगह से निकलने वाली कोई भी चीज अच्छी हो ही नहीं सकती। वह त्याज्य होती है।" यह बात ठीक है कि वे अपनी रौ में बोलते चले गये और उनका आशय लोगों को मांस भक्षण से दूर करना था, पर अतिरेक में उनका तर्क कुतर्क में बदल गया। इतने विद्वान आदमी के मुच से ऐसी बातें कुछ शोभा नहीं देतीं। आगे उन्होंने कुछ गंद खाने वाले पशुओं का भी जिक्र किया। वह अलग विषय है।
मैं और मेरा पूरा परिवार पुर्णतया शाकाहारी हैं। रामदेव जी की और उनके अभियान के भी हम सब प्रसंशक हैं। पर जो बात उन्होंने अंडे के उद्गम को ले कर कही वही खलने वाली है। उन्हें भी पता ही होगा कि सारी सृष्टि का सुत्रपात ही जन्नेद्रिंयों से होता है। बड़-बड़े ऋषि-मुनि, विद्वान, प्रभू भक्त, यहां तक कि हमारे आराध्यों को भी मां की कोख से ही जन्म लेना पड़ा है। तो ऐसे रास्ते से आने पर वह सब त्याज्य तो नहीं हो गये। मैं खाने-खिलाने की बात नहीं कर रहा हूं, सिर्फ उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि कुछ कर्मकांडों में गो-मुत्र पान करने का विधान है। ऐसी भी कथाएं मिलती हैं कि ऋषियों ने गाय के गोबर में अनपचे अन्न को ग्रहण किया था। फिर धरती का अमृत कहे जाने वाले शहद को क्या कहेंगे जो मक्खी के पेट से बाहर आया उसका लार रूपी भोजन होता है।
हर चीज का आज व्यवसायी करण होता जा रहा है। रामदेव जी भी उससे बच नहीं पा रहे हैं। बाज़ार में खुद को टिका पाना किसी के लिये भी टेढी खीर होता जा रहा है। पर जो भी हो अतिरेक से बचना भी बहुत जरूरी है।

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राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...