डान की बेटी शादी की दुसरी सुबह गुस्से से तमतमाई हुई अपने कमरे से बाहर निकली। उसकी मां ने उसे ऐसी हालत में देख उसे नार्मल करने को कहा, बेटी सब ठीक हो जायेगा। बेटी बोली वह तो ठीक है, पर अंदर पड़ी लाश का क्या करूं ?
*********************************************
एक मुर्गी ने बेकरी वाले के यहां जा दो अंडे मांगे। बेकरी वाले ने हैरान हो पूछा, अरे तुम्हें अंडों की क्या जरूरत है? मुर्गी ने शर्माते हुए कहा, मेरा मुर्गा कहता है कि दो रुपयों के लिये तुम अपनी फ़ीगर मत खराब करो।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
बुधवार, 9 सितंबर 2009
सोमवार, 7 सितंबर 2009
पानी की समस्या इतिहास बनने की कगार पर
चलो देर से ही सही नींद तो खुली। वैसे इसे देर भी नहीं कह सकते क्योंकी जब-जब, जो-जो, होना है। तब-तब सो-सो होता है। आखिर में सागर के अथाह जल की ओर ध्यान गया ही सरकार का। वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धी हासिल कर ही ली। रोज दिल दहलाती, जी जलाती, आग उगलती खबरों के बीच ठंड़ी हवा का झोंका बन कर आयी यह खबर कि समुद्री पानी को पीने योग्य बना लिया गया है।
ऐसा नहीं है कि इससे पहले सागर से पीने का पानी बनाने की बात नहीं सोची गयी पर उस पर खर्च इतना आता था कि उसका वहन सब के बस का नहीं था। और तब ना ही इतना प्रदुषण था ना ही बोतलबंद पानी का इतना चलन। अब जब पानी दूध से भी मंहगा होता जा रहा है, तो कोई उपाय तो खोजना ही था। फिलहाल लक्षद्वीप के कावारती द्वीप के रहने वालों को सबसे पहले इसका स्वाद चखने को मिल गया है। और यह संभव हो पाया है "राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान" के अथक प्रयासों के कारण। आशा है साल के खत्म होते-होते तीन संयत्र काम करना शुरु कर देंगे। एक लाख लीटर रोज की क्षमता वाले एक संयत्र ने तो 2005 से ही काम करना शुरु कर दिया है।
शुरु-शुरु में समुद्र तटीय इलाकों में इस पानी को पहुंचाने की योजना है। समुद्री पानी को पेयजल में बदलने के लिये निम्न ताप वाली "तापीय विलवणीकरण प्रणाली (L.T.T.D.) का उपयोग किया जाता है। यह प्रणाली सस्ती तथा पर्यावरण के अनुकूल है। इस योजना के सफल होने पर सरकार बड़े पैमाने पर बड़े संयत्रों को स्थापित करने की योजना बना रही है। अभी एक करोड़ लीटर रोज की क्षमता वाले संयत्र की रुपरेखा पर काम चल रहा है। सारे काम सुचारू रूप से चलते रहे तो दुनिया में कम से कम पानी की समस्या का तो स्थायी हल निकल आयेगा।
16 जून की अपनी एक पोस्ट में मुझे लगा था कि सागर की इतनी जल राशि के रहते पानी के लिये उतनी चिंता की आवश्यकता नहीं है जितनी की खोज की । सही भी है विज्ञान के इस युग में जब टायलेट का पानी साफ कर उपयोग में लाया जा सकता है तो फिर समुद्री पानी को क्यों नहीं । रही बात खर्चे की तो आज जो कीमत हम बोतलों में बंद पानी की दे रहे हैं, जिसके पूर्ण शुद्ध होने पर भी शक विद्यमान है, उससे तो सस्ता ही पड़ेगा सागर के पानी को साफ करना। आखिर अरबों लोगों, जीव-जंतुओं की प्यास का सवाल है।
ऐसा नहीं है कि इससे पहले सागर से पीने का पानी बनाने की बात नहीं सोची गयी पर उस पर खर्च इतना आता था कि उसका वहन सब के बस का नहीं था। और तब ना ही इतना प्रदुषण था ना ही बोतलबंद पानी का इतना चलन। अब जब पानी दूध से भी मंहगा होता जा रहा है, तो कोई उपाय तो खोजना ही था। फिलहाल लक्षद्वीप के कावारती द्वीप के रहने वालों को सबसे पहले इसका स्वाद चखने को मिल गया है। और यह संभव हो पाया है "राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान" के अथक प्रयासों के कारण। आशा है साल के खत्म होते-होते तीन संयत्र काम करना शुरु कर देंगे। एक लाख लीटर रोज की क्षमता वाले एक संयत्र ने तो 2005 से ही काम करना शुरु कर दिया है।
शुरु-शुरु में समुद्र तटीय इलाकों में इस पानी को पहुंचाने की योजना है। समुद्री पानी को पेयजल में बदलने के लिये निम्न ताप वाली "तापीय विलवणीकरण प्रणाली (L.T.T.D.) का उपयोग किया जाता है। यह प्रणाली सस्ती तथा पर्यावरण के अनुकूल है। इस योजना के सफल होने पर सरकार बड़े पैमाने पर बड़े संयत्रों को स्थापित करने की योजना बना रही है। अभी एक करोड़ लीटर रोज की क्षमता वाले संयत्र की रुपरेखा पर काम चल रहा है। सारे काम सुचारू रूप से चलते रहे तो दुनिया में कम से कम पानी की समस्या का तो स्थायी हल निकल आयेगा।
16 जून की अपनी एक पोस्ट में मुझे लगा था कि सागर की इतनी जल राशि के रहते पानी के लिये उतनी चिंता की आवश्यकता नहीं है जितनी की खोज की । सही भी है विज्ञान के इस युग में जब टायलेट का पानी साफ कर उपयोग में लाया जा सकता है तो फिर समुद्री पानी को क्यों नहीं । रही बात खर्चे की तो आज जो कीमत हम बोतलों में बंद पानी की दे रहे हैं, जिसके पूर्ण शुद्ध होने पर भी शक विद्यमान है, उससे तो सस्ता ही पड़ेगा सागर के पानी को साफ करना। आखिर अरबों लोगों, जीव-जंतुओं की प्यास का सवाल है।
रविवार, 6 सितंबर 2009
सीकरी, फर्श से अर्श और अर्श से फर्श तक
सूर्य की तेज गर्मी और तपते रेगिस्तान में एक व्यक्ति नंगे पैर एक दरागाह की तरफ बढा जा रहा था। दुनिया से बेखबर सिर्फ अपनी मंजिल को पाने के लिये बेताब। उसे तो अपने पैरों में पड़े छालों से रिसते खून से उत्पन्न वेदना का भी एहसास नहीं हो रहा था। यह व्यक्ति था सम्राट अकबर। दरागाह थी शेख सलीम चिश्ती साहब की और जगह थी सीकरी नामक एक गांव की।
दुनिया जानती है कि अपनी संतान ना होने के कारण सम्राट अकबर ने सलीम चिश्ती की दरागाह पर जा मन्नत मांगी थी और शेख साहब के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इससे अकबर की खुशी की सीमा ना रही। उसने अपने पुत्र का नाम भी शेख साहब के नाम पर सलीम रखा और उस गांव सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला कर लिया।
यूं सीकरी के भाग्य ने पलटा खाया। एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित यह छोटा सा गांव देखते-देखते पूरे देश की राजधानी बन गया। अपनी गुजरात विजय को अविस्मरणीय बनाने के लिये अकबर ने इसका नाम फतेहपुर सीकरी रख दिया। इसे ऊंची-ऊंची दिवारों से घेर कर अनेकों सुंदर भवनों, मस्जिदों बाग-बगीचों का निर्माण कर सजा दिया गया। दिवारों में भी आवागमन के लिये सात दरवाजे बनाये गये जिनका नाम, दिल्ली दरवाजा, आगरा दरवाजा, ग्वालियर दरवाजा, अजमेरी दरवाजा, मथुरा दरवाजा, बीरबल दरवाजा और चंद्रफूल दरवाजा रखा गया। यहां के भवन ज्यादातर लाल पत्थरों से बनाये गये हैं। यहीं शेख साहब तथा उनके परिवार वालों की कब्रें भी हैं जिन्होंने समय के साथ-साथ तीर्थ स्थल की जगह ले ली है। यहां हर साल भव्य तरीके से उर्स मनाया जाता है जहां दुनिया भर से लाखों लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने आते हैं।
पर काल के गाल में सबको समाना पड़ता है। उसकी मजबूत दाढों से आज तक कोई नहीं बच पाया है। वही सीकरी जिसकी तूती सारे देश में गूंजती थी, राजधानी दिल्ली चले जाने के बाद, अपना महत्व धीरे-धीरे खोती चली गयी। आज हालत यह है कि सारे भवनों, स्मारकों, बावड़ियों का अस्तित्व खतरे में है। हर जगह विराने का साम्राज्य है। पर्यटक आते जरूर हैं पर बुलंद दरवाजे जैसी कुछ जगहों को देख लौट जाते हैं। रह जाता है पूरा शहर अपने गौरवमयी इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने को आतुर।
दुनिया जानती है कि अपनी संतान ना होने के कारण सम्राट अकबर ने सलीम चिश्ती की दरागाह पर जा मन्नत मांगी थी और शेख साहब के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इससे अकबर की खुशी की सीमा ना रही। उसने अपने पुत्र का नाम भी शेख साहब के नाम पर सलीम रखा और उस गांव सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला कर लिया।
यूं सीकरी के भाग्य ने पलटा खाया। एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित यह छोटा सा गांव देखते-देखते पूरे देश की राजधानी बन गया। अपनी गुजरात विजय को अविस्मरणीय बनाने के लिये अकबर ने इसका नाम फतेहपुर सीकरी रख दिया। इसे ऊंची-ऊंची दिवारों से घेर कर अनेकों सुंदर भवनों, मस्जिदों बाग-बगीचों का निर्माण कर सजा दिया गया। दिवारों में भी आवागमन के लिये सात दरवाजे बनाये गये जिनका नाम, दिल्ली दरवाजा, आगरा दरवाजा, ग्वालियर दरवाजा, अजमेरी दरवाजा, मथुरा दरवाजा, बीरबल दरवाजा और चंद्रफूल दरवाजा रखा गया। यहां के भवन ज्यादातर लाल पत्थरों से बनाये गये हैं। यहीं शेख साहब तथा उनके परिवार वालों की कब्रें भी हैं जिन्होंने समय के साथ-साथ तीर्थ स्थल की जगह ले ली है। यहां हर साल भव्य तरीके से उर्स मनाया जाता है जहां दुनिया भर से लाखों लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने आते हैं।
पर काल के गाल में सबको समाना पड़ता है। उसकी मजबूत दाढों से आज तक कोई नहीं बच पाया है। वही सीकरी जिसकी तूती सारे देश में गूंजती थी, राजधानी दिल्ली चले जाने के बाद, अपना महत्व धीरे-धीरे खोती चली गयी। आज हालत यह है कि सारे भवनों, स्मारकों, बावड़ियों का अस्तित्व खतरे में है। हर जगह विराने का साम्राज्य है। पर्यटक आते जरूर हैं पर बुलंद दरवाजे जैसी कुछ जगहों को देख लौट जाते हैं। रह जाता है पूरा शहर अपने गौरवमयी इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने को आतुर।
शनिवार, 5 सितंबर 2009
हिंदी लिखने के लिये hindikalam.com आजमा कर देखें।
बहुत बार देखा है कि किसी-किसी पोस्ट पर अनेक वर्तनी की गल्तियां होती हैं। जो लिखने वाले वाले से नहीं लिखवाए जाने वाले माध्यम की सिमितताओं का नतीजा होती हैं। आज पाबला जी की पोस्ट पर अच्छी जानकारी थी। पर hindikalam.com का जिक्र मैंने कहीं नहीं पाया। मैं इसी माध्यम का उपयोग करता हूं, और मुझे लगता है कि इस पर लिखने से हिंदी के एक-दो शब्दों को छोड़ सारे कलिष्ट शब्द भी लिखे जा सकते हैं। । साथ ही यह है भी बहुत आसान। एक बार तो आजमाया ही जा सकता है।
हाँ, कापी-पेस्ट की जहमत तो उठानी पड़ेगी। शुक्रवार, 4 सितंबर 2009
जमजम का पानी, रेगिस्तान में कुदरत का करिश्मा
प्रकृति के अनगिनत चमत्कारों में से एक है सऊदी अरब के शहर मक्का का एक कुआं। यह पवित्र धर्मस्थल काबा के पास स्थित है। जैसे हर हिंदु की अभिलाषा रहती है कि उसके घर में सदा गंगाजल रहे वैसे ही हर मुसलमान की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि इस कुएं का पानी उसके घर में हो।
इस कुएं का नाम है जमजम। घोर आश्चर्य की बात है कि मीलों फैले रेगिस्तान में जहां सिर्फ रेत ही रेत है वहीं यह कुआं लाखों लोगों की पानी की जरुरतों को पूरा करता है। मक्का और मदीना के लोग तो इसका पानी लेते ही हैं, हज के समय हर वर्ष वहां लाखों की तादाद में जाने वाले यात्रियों की जल की आवश्यकता को भी यही कुआं पूरा करता है। इसके अलावा लौटते वक्त भी सभी हाजियों की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि वे अपने साथ इस कुएं का ज्यादा से ज्यादा पानी ले जा सकें। जिससे इसको अपने सगे-संबंधियों और मित्रों में बांटा जा सके। इसके वितरण से पुण्य का लाभ मिलता है। ऐसी धारणा है।
इस 14x18x6 फिट के आकार वाले कुएं के पानी की खासियत है कि वह कभी खराब नहीं होता। और यह कुदरत का चमत्कार ही है कि इसमें से चाहे कितना भी पानी निकल जाये पर यह ना तो सूखता है नाही खाली होता है। मरुस्थल में यह कुआं इंसानों के लिये एक वरदान ही तो है।
इस कुएं का नाम है जमजम। घोर आश्चर्य की बात है कि मीलों फैले रेगिस्तान में जहां सिर्फ रेत ही रेत है वहीं यह कुआं लाखों लोगों की पानी की जरुरतों को पूरा करता है। मक्का और मदीना के लोग तो इसका पानी लेते ही हैं, हज के समय हर वर्ष वहां लाखों की तादाद में जाने वाले यात्रियों की जल की आवश्यकता को भी यही कुआं पूरा करता है। इसके अलावा लौटते वक्त भी सभी हाजियों की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि वे अपने साथ इस कुएं का ज्यादा से ज्यादा पानी ले जा सकें। जिससे इसको अपने सगे-संबंधियों और मित्रों में बांटा जा सके। इसके वितरण से पुण्य का लाभ मिलता है। ऐसी धारणा है।
इस 14x18x6 फिट के आकार वाले कुएं के पानी की खासियत है कि वह कभी खराब नहीं होता। और यह कुदरत का चमत्कार ही है कि इसमें से चाहे कितना भी पानी निकल जाये पर यह ना तो सूखता है नाही खाली होता है। मरुस्थल में यह कुआं इंसानों के लिये एक वरदान ही तो है।
बुधवार, 2 सितंबर 2009
संगीतकार नौशाद को अपनी शादी दर्जी बन कर करनी पडी थी
कल्पना कीजिए की जिसने अपने संगीत से सारे भारत में धूम मचा रखी थी , उसे ही अपनी शादी दर्जी बन कर करनी पड़ रही थी।


आज के समय में गीत-संगीत, नाच-गाना प्रतिभा की पहचान के रूप में देखे जाते हैं। किसी का भी बच्चा जरा ठुमक कर क्या चल लिया या किसी फिल्मी गाने की नकल कर भर ली तो उसके मां-बाप उसे किसी मंच पर पहुंचाने के लिये आतुर हो उठते हैं। फिर चाहे बच्चे को सरगम का 'सा' या नाच का 'ना' का पता भी ना हो। पर कुछ ही सालों पहले की बात है जब इन कलाओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। मां-बाप इन विधाओं के सख्त खिलाफ हुआ करते थे। इसी सब के चलते संगीतकार नौशाद को कैसी-कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, सुनिये उन्हीं की जुबानी :-
"मां ने मेरी शादी पक्की कर लखनऊ बुलवा लिया। तैयारियों के बीच एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा, बेटा ससुराल में किसी को पता नहीं चलना चाहिये कि तुम गाने बजाने का काम करते हो। मैं आश्चर्य में पड़ गया और पूछा, ऐसा क्यों अम्मी? तो अम्मी ने कहा कि मैंने सब को कह रखा है कि मेरा बेटा बंबई में दर्जी का काम करता है। अगर मैं बता देती कि तू गाने बजाने का काम करता है तो तेरी शादी ही तय नहीं होनी थी। तेरी ससुराल वाले सूफी किस्म के लोग हैं। मैं मां की बात मानने को मजबूर था। पर मन में एक प्रश्न घुमड़ रहा था कि क्या संगीत का काम इतना घटिया है कि एक दर्जी उस पर भारी पड़ रहा है। फिर उसके बाद जो हुआ उसका आप अंदाज लगा मेरी हालत समझ सकते हैं।
उन्हीं दिनों फिल्म "रतन" रिलीज हुई थी और उसके मेरे द्वारा निर्देशित गाने सारे हिंदुस्तान में धूम मचा रहे थे। तो जब मेरी बारात चली तो बैंड वालों ने उसी फिल्म के गाने बजाने शुरु कर दिये। लड़की वालों के यहां भी शहनाई पर "रतन" के गानों की बहार थी और मैं दर्जी बना निकाह की रस्में पूरी कर रहा था।"
बाद में जब नौशाद साहब की श्रीमतीजी बंबई आयीं तो उन्हें पता चला कि उनके शौहर मशहूर संगीतकार हैं।मंगलवार, 1 सितंबर 2009
बाप रे !!! इतना झगडालू चिडिया परिवार
इनकी करतूतों से सभी भर पाए हैं और इनके जाने का इंतजार कर रहे हैं। जिससे फिर साफ-सफाई कर इस नर्सिंग होम को बंद किया जा सके। पर इस सबसे एक बात तो साफ हो गयी कि चिड़ियों में भी इंसानों जैसी आदतें होती हैं। कोई शांत स्वभाव का होता है, कोई सफाई पसंद और कोई गुस्सैल, चिड़चिड़ा और झगड़ालू............!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
मेरे कार्यालय में बीम और मीटर बाक्स के कारण बनी एक संकरी सी जगह में चिड़ियों के घोंसले के लिये बेहतरीन जगह बन गयी है। इसी कारण पिछले तीन साल से वहां कयी परिवार पलते आ रहे हैं। बना बनाया नीड़ है, नर्सिंग होम की तरह जोड़े आते हैं, शिशु पलते हैं और फिर उड़न छू।
पहली बार जो जोड़ा आया उसने जगह देखी-भाली और तिनका-तिनका जोड़ अपना ठौर बना लिया। सफाई कर्मचारी बनते हुए घर को साफ कर देते पर यह "Encroachment" दो दिनों की छुट्टियों के बीच हुआ था, जिसे हटाने की किसी की इच्छा नहीं हुई। उस पहले जोड़े ने आम चिड़ियों की तरह अपना परिवार बढाया और चले गये। उनके रहने के दौरान एक बार उनका नवजात नीचे गिर गया था जिसे बहुत संभाल कर वापस उसके मां-बाप के पास रख दिया गया था। वैसे रोज कुछ तिनके बिखरते थे पर उनसे किसी को कोई तकलीफ नहीं थी साफ-सफाई हो जाती थी। दूसरी बार तो पता ही नहीं चला कि कार्यालय में मनुष्यों के अलावा भी किसी का अस्तित्व है। लगता था वह परिवार बेहद सफाई पसंद है, न कोई गंदगी, ना शोर-शराबा। सिर्फ बच्चे की चीं-चीं तथा उसके अभिभावकों की हल्की सी चहल-पहल। कब आये कब चले गये पता ही नहीं चला। तीसरा जोड़ा नार्मल था। मां-बाप दिन भर अपने बच्चे की मांगपूर्ती करते रहते। तिनके वगैरह जरूर बिखरते थे पर इन छोटी-छोटी बातों पर हमारा ध्यान नहीं जाता था। पर एक आश्चर्य की बात थी कि और किसी तरह की गंदगी उन्होंने नहीं फैलाई। शायद उन्हें एहसास था कि वैसा होने से उसका प्रतिफल बुरा हो सकता है।
पर अब पिछले दिनों जो परिवार आया है, जिसके कारण ये पोस्ट अस्तित्व में आई, वह तो अति विचित्र है। सबेरे कार्यालय खुलते ही ऐसे चिल्लाते हैं जैसे हम उनके घर में अनाधिकार प्रवेश कर रहे हों। आवाज भी इतनी तीखी कि कानों में चुभती हुई सी प्रतीत होती है। बार-बार काम करते लोगों के सर पर चक्कर लगा-लगा कर चीखते रहते हैं दोनो मियां बीवी। इतना ही नहीं कयी बार उड़ते-उड़ते निवृत हो स्टाफ के सिरों और कागजों पर अपने हस्ताक्षर कर जाते हैं। उनके घोंसले के ठीक नीचे फोटो-कापियर और टाइप मशीनें पड़ी हैं। जिन्हें रोज गंदगी से दो-चार होना पड़ता है। अब जैसा जोड़ा है वैसा ही उनका नौनीहाल या नौनीहालिनी जो भी है। साहबजादे/दी रोज ही घूमने निकले होते हैं। दो दिन पहले टाइप मशीन में फंसे बैठे थे, किसी तरह हटा कर उपर रखा। कल पता नहीं कैसे फोटो-कापियर में घुस गये, वह तो अच्छा हुआ कि चलाने वाले ने गंदगी साफ करते उनकी झलक पा ली, नहीं तो वहीं 'बोलो हरि' हो गयी होती। बड़ी मुश्किल से आधे घंटे में उन्हें बाहर निकाला जा सका।
इनकी करतूतों से सभी भर पाए हैं और इनके जाने का इंतजार कर रहे हैं। जिससे फिर साफ-सफाई कर इस नर्सिंग होम को बंद किया जा सके। पर इस सबसे एक बात तो साफ हो गयी कि चिड़ियों में भी इंसानों जैसी आदतें होती हैं। कोई शांत स्वभाव का होता है, कोई सफाई पसंद और कोई गुस्सैल, चिड़चिड़ा और झगड़ालू।
आपका क्या एक्सपीरीयेंस है ? (-:
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
नकारों को नकारते नवयुवा
हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! अभी कुछ दि...
-
कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
-
शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
-
आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
-
चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
-
युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
-
कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
-
हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
-
"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
-
अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...