सुदर्शन चक्र श्री कृष्ण जी का एक अभिन्न अंग है। पर इसका निर्माण और संचालन सदा एक गोपनीय विषय रहा है । इसी के बारे में प्रस्तुत है प्रख्यात तांत्रिक तथा विद्वान आचार्य प्रकाशानंद जी की एक विवेचना :-
हमारे पुराणों में जिन आयुधों का उल्लेख मिलता है उनमें चक्र भी एक है। विभिन्न देवताओं के पास अपने-अपने चक्र हुआ करते थे। जैसे शंकरजी के चक्र का नाम "भवरेंदु", विष्णुजी के चक्र का नाम "कांता चक्र" और देवी का चक्र "मृत्यु मंजरी" के नाम से जाना जाता था।
"सुदर्शन चक्र" का नाम श्रीकृष्णजी के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। अति आवश्यक होने पर ही इसका प्रयोग किया जाता रहा है। यह खुद जितना रहस्यमय है उतना ही इसका निर्माण और संचालन। यह गोपनीयता शायद इसलिये बरती गयी होगी कि इस अमोघ अस्त्र की जानकारी देवताओं को छोड़ दूसरों को ना लग जाये।
मान्यता है कि इसका निर्माण भगवान शंकरजी ने कर इसे विष्णुजी को सौंप दिया था। जरुरत पड़ने पर विष्णुजी ने इसे देवी को प्रदान कर दिया। इस आयुध की खासियत थी कि इसे तेजी से हाथ से घुमाने पर यह हवा के प्रवाह से मिल कर प्रचंड़ वेग से अग्नि प्रज्जवलित कर दुश्मन को भस्म कर देता था। यह अत्यंत सुंदर, तीव्र गामी, तुरंत संचालित होने वाला एक भयानक अस्त्र था। भगवान श्री कृष्ण के पास यह देवी की कृपा से आया। यह चांदी की शलाकाओं से निर्मित था। इसकी उपरी और निचली सतहों पर लौह शूल लगे हुए थे। इसके साथ ही इसमें अत्यंत विषैले किस्म के विष, जिसे द्विमुखी पैनी छुरियों मे रखा जाता था, का भी उपयोग किया गया था। इसके नाम से ही विपक्ष में मौत का भय छा जाता था।
यह कल्पना मात्र ही हो सकती है कि चक्रों को अंगुली के इशारे से चलाया जाता था। क्योंकि आज के वजनों से तुलना करें तो इनका वजन 30 से 35 की. से कम नहीं हो सकता था। हो सकता है कि यह धारणा चक्रधारी को अत्यंत बलशाली निरुपित करने के लिये बनायी गयी हो। पर चक्र को चलाने के लिये अत्यधिक बल की जरुरत होती थी। इनके वजन को साधने और गति देने के लिये दोनों हाथों की जरूरत पड़ती थी। इसे धारण करने वाले को महारथी या चक्रधारी कहा जाता था।