राजकुमार द्रुपद और द्रोण गुरु भाई थे। शिक्षा समाप्त होने पर दोनों अपने-अपने नगर को चले गये। पर समय के साथ जहां एक तरफ द्रुपद राजा बने वहीं द्रोण का गरीबी ने पीछा नहीं छोड़ा। गरीबी भी कैसी कि परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया। बालक अश्वस्थामा, जो द्रोण को जान से भी प्यारा था, के पोषण के लाले पड़ गये। उसको दूध के लिये रोता देख मांग कर लाये गये आटे को घोल कर उसे पिलाते माँ-बाप का कलेजा मुंह को आ जाता था। ऐसी हालत में द्रोण अपनी पत्नि के कहने पर अपने बचपन के मित्र द्रुपद के पास कुछ झिझकते हुए सहायता की आशा में जा पहुंचे। पर वहां का रवैया ही कुछ और था। द्रुपद बचपन की मित्रता को भुला बैठे थे। बातों ही बातों में उन्होंने अपने गरीब मित्र का मजाक बना ड़ाला। उनकी बातों ने द्रोण का कलेजा चीर कर रख दिया। उन्होंने मन ही मन द्रुपद को सबक सिखाने का प्रण कर ड़ाला।
समय बीतता गया। द्रोण द्रोणाचार्य बन कुरु राजवंश के राजकुमारों के गुरु बन गये। युद्ध विद्या में पारांगत करने के बाद जब गुरु दक्षिणा की बारी आयी तो उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये द्रुपद का राज्य मांग लिया। पांडवों ने द्रुपद को बंदी बना अपने गुरु के चरणों में ला डाला। फिर भी द्रोणाचार्य ने द्रुपद का आधा राज्य यह कहते हुए वापस कर दिया कि गरीबी अभिशाप होती है सो तुम्हें मैं जीवन यापन के लिये आधा राज्य वापस करता हूं।
संतान विहीन द्रुपद इस अपमान को कभी भूल नहीं पाये। पर पांडव रक्षित द्रोण को हराना भी उनके वश में नहीं था। तब पुत्र प्राप्ति कि इच्छा से उन्होंने कपिल मुनि के द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। महाभारत कथा के अनुसार यज्ञ कुंड से दो बच्चों का जन्म हुआ, धृष्टद्युम्न और द्रोपदी का।
समय के साथ द्रोपदी महाभारत युद्ध का कारण बनी वहीं अपने पिता के अपमान का बदला लेने के लिये धृष्टद्युम्न ने जो द्रोणाचार्य के वध का संकल्प लिया था वह भी महासमर में पूरा किया गया।
फर्रूखाबाद जिले के एक गांव कम्पिल में वह प्राचीन हवन कुंड पुराविदों ने खोज निकाला है जिससे गुरु द्रोणाचार्य के काल के रूप में धृष्टद्युम्न ने जन्म लिया था। कभी पांचाल राज्य की राजधानी के रूप में विकसित कम्पिल आज एक नामालुम सा गांव भर रह गया है। पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि यहां खुदाई करने पर महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
बुधवार, 8 जुलाई 2009
सोमवार, 6 जुलाई 2009
पपीता खाएं, स्वस्थ रहें.
प्रकृति की अनमोल सौगातों में से एक है पपीता। इसके पत्ते, बीज, फल, दूध सभी भागों का उपयोग लाभप्रद होता है। इसके कच्चे फल से निकला सफेद रंग का तरल द्रव्य जिसे "पपेन" के नाम से जाना जाता है, अपने आप में एक बेहतरीन औषध है।
इसके पत्तों को सुखा कर बनाया गया चूर्ण शहद के साथ लेने से पेट की वायु का शमन होता है। दिल की धड़कन काबू में रहती है।
कच्चे पपीते से निकले दूध जैसे द्रव्य को सुखा कर बनाया गया चुर्ण एक श्रेष्ठ पाचक होता है। खाने के साथ एक चौथाई चम्मच पानी के साथ लेने से तुरंत फायदा होता है। अजीर्ण रोग में, त्वचा रोगों में, यकृत के दोष में तथा पेट में कीड़े होने पर यह बहुत फायदेमंद रहता है।
कच्चे पपीते की सब्जी पेट के लिये बहुत मुफीद होती है। बुखार इत्यादि के दौरान इसका सेवन बहुत उपयोगी रहता है। वहीं पका पपीता पथरी, कृमि, अपच, कब्ज से मुक्ति दिलाता है। इसे खाने से मुंह के विकार दूर हो जाते हैं। मां के दुध में वृद्धिकारक होता है। पर यह अच्छी तरह से पका हुआ होना चाहिये।
पपीते का फल तो फल इसके बीज भी बहुत गुणकारी होते हैं। यह एक उत्तम कृमिनाशक है। बीजों को सुखा कर उनका चुर्ण बना कर एक छोटा चम्मच दो सप्ताह लेने से असर दिखाई देने लगता है।
देखा जाय तो बिमार पड़ने से पहले ही यदि अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए अपने बुजुर्गों के परिक्षित घरेलु नुस्खों को, जो उनके वर्षों के अनुभवों का निचोड़ होते हैं, हम आजमा लें तो फायदा ही होगा, नुक्सान का सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि ये सब घर में उपलब्ध खाद्य सामग्री या मसालों से ही बने होते हैं। जरूरत होती है सिर्फ उनके कहे पर विश्वास की।
इसके पत्तों को सुखा कर बनाया गया चूर्ण शहद के साथ लेने से पेट की वायु का शमन होता है। दिल की धड़कन काबू में रहती है।
कच्चे पपीते से निकले दूध जैसे द्रव्य को सुखा कर बनाया गया चुर्ण एक श्रेष्ठ पाचक होता है। खाने के साथ एक चौथाई चम्मच पानी के साथ लेने से तुरंत फायदा होता है। अजीर्ण रोग में, त्वचा रोगों में, यकृत के दोष में तथा पेट में कीड़े होने पर यह बहुत फायदेमंद रहता है।
कच्चे पपीते की सब्जी पेट के लिये बहुत मुफीद होती है। बुखार इत्यादि के दौरान इसका सेवन बहुत उपयोगी रहता है। वहीं पका पपीता पथरी, कृमि, अपच, कब्ज से मुक्ति दिलाता है। इसे खाने से मुंह के विकार दूर हो जाते हैं। मां के दुध में वृद्धिकारक होता है। पर यह अच्छी तरह से पका हुआ होना चाहिये।
पपीते का फल तो फल इसके बीज भी बहुत गुणकारी होते हैं। यह एक उत्तम कृमिनाशक है। बीजों को सुखा कर उनका चुर्ण बना कर एक छोटा चम्मच दो सप्ताह लेने से असर दिखाई देने लगता है।
देखा जाय तो बिमार पड़ने से पहले ही यदि अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए अपने बुजुर्गों के परिक्षित घरेलु नुस्खों को, जो उनके वर्षों के अनुभवों का निचोड़ होते हैं, हम आजमा लें तो फायदा ही होगा, नुक्सान का सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि ये सब घर में उपलब्ध खाद्य सामग्री या मसालों से ही बने होते हैं। जरूरत होती है सिर्फ उनके कहे पर विश्वास की।
रविवार, 5 जुलाई 2009
सदियों के अनुभव का निचोड़ है ये कहावतें
"कलशे पानी गर्म हो, चिडी न्हावे जब धूल,
जब चींटी अंडा ले चढ़े , वर्षा होसी भरपूर। "
जब घडे में पानी ठंडा न हो, चिडिया धूल में लोटने लगे, चींटियाँ अपने अण्डों को ले ऊंची जगहों पर जाने लगें तो समझ लेना चाहिए कि पानी बरसने वाला है।
"उल्टे गिरगिट ऊंचे चढ़े, बरखा होई भुई जल बढे।"
यदि गिरगिट पेडों पर उलटा चढ़ता दिखे तो बस पानी बरसा ही समझो।
"आगे रवि पीछे मंगल, जो आषाढ़ बरसे , अनमोल हो धरती, उमगें बाढ़।"
आषाढ़ के माह में यदि पहले मंगलवार और बाद में रविवार पड़े तो अच्छी बारिश होती है।
"टोली मिल की कांवली , आय थलां बैठत, दिन चौथे के पांचवें, जल-थल एक करत।"
चीलें जब जमीन पर आकर बैठें तो चार-पाँच दिनों में पानी अवश्य बरसता है।
***************************
चलते-चलते :- बरसात के मौसम में एक आदमी की कार कीचड़ मे फंस गयी। तभी उधर से संता अपने बैल के साथ निकला। उस आदमी ने संता से गुजारिश की कि उसकी गाड़ी को निकलवाने मे मदद करे। संता तो सदा दूसरों की भलाई ही करता रहता है। वह तुरंत तैयार हो गया। उसने अपने बैल को गाड़ी के आगे बांधा और बोला, चल बेटा भोलू जोर लगा। चल मुन्ना जोर से खींच, चल मोहन शाब्बाश जोर लगा के, हां बेटा मोती पीछे ना रहना खींच ले।संता का मोती नाम लेना था कि बैल ने एक झटके से गाड़ी खींच कर बाहर निकाल दी। गाड़ीवाले ने अचंभित हो पूछा, भाई जब तुम्हारे बैल का नाम मोती है तो तुमने पहले इसका नाम ना ले और तीन नाम क्यों पुकारे। संता मुस्कुराया और आदमी को एक किनारे ले जा धीरे से बोला, जनाब मेरा बैल अंधा है। तीन और नाम लेने से उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है उसके साथ और भी बैल हैं सो वह काम में लग जाता है। यदि उसे पता चल जाये कि वह अकेला ही जुता हुआ है तो अड़ जाता है।
गाड़ी वाले भाई का मुंह खुले का खुला रह गया।
जब चींटी अंडा ले चढ़े , वर्षा होसी भरपूर। "
जब घडे में पानी ठंडा न हो, चिडिया धूल में लोटने लगे, चींटियाँ अपने अण्डों को ले ऊंची जगहों पर जाने लगें तो समझ लेना चाहिए कि पानी बरसने वाला है।
"उल्टे गिरगिट ऊंचे चढ़े, बरखा होई भुई जल बढे।"
यदि गिरगिट पेडों पर उलटा चढ़ता दिखे तो बस पानी बरसा ही समझो।
"आगे रवि पीछे मंगल, जो आषाढ़ बरसे , अनमोल हो धरती, उमगें बाढ़।"
आषाढ़ के माह में यदि पहले मंगलवार और बाद में रविवार पड़े तो अच्छी बारिश होती है।
"टोली मिल की कांवली , आय थलां बैठत, दिन चौथे के पांचवें, जल-थल एक करत।"
चीलें जब जमीन पर आकर बैठें तो चार-पाँच दिनों में पानी अवश्य बरसता है।
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चलते-चलते :- बरसात के मौसम में एक आदमी की कार कीचड़ मे फंस गयी। तभी उधर से संता अपने बैल के साथ निकला। उस आदमी ने संता से गुजारिश की कि उसकी गाड़ी को निकलवाने मे मदद करे। संता तो सदा दूसरों की भलाई ही करता रहता है। वह तुरंत तैयार हो गया। उसने अपने बैल को गाड़ी के आगे बांधा और बोला, चल बेटा भोलू जोर लगा। चल मुन्ना जोर से खींच, चल मोहन शाब्बाश जोर लगा के, हां बेटा मोती पीछे ना रहना खींच ले।संता का मोती नाम लेना था कि बैल ने एक झटके से गाड़ी खींच कर बाहर निकाल दी। गाड़ीवाले ने अचंभित हो पूछा, भाई जब तुम्हारे बैल का नाम मोती है तो तुमने पहले इसका नाम ना ले और तीन नाम क्यों पुकारे। संता मुस्कुराया और आदमी को एक किनारे ले जा धीरे से बोला, जनाब मेरा बैल अंधा है। तीन और नाम लेने से उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है उसके साथ और भी बैल हैं सो वह काम में लग जाता है। यदि उसे पता चल जाये कि वह अकेला ही जुता हुआ है तो अड़ जाता है।
गाड़ी वाले भाई का मुंह खुले का खुला रह गया।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2009
बरसात गर्मी से राहत के साथ और कुछ भी लाती है
इस बार गर्मी का मौसम कुछ ज्यादा ही लंबा खिंच गया था। आखिरकार इंद्र देवता की इजाजत से बरखा रानी ने धरती पर अपने कदम रखे। मौसम सुहाना होने लगा। पेड़-पौधों ने धुल कर राहत की सांस ली, किसानों की जान में जान आयी। कवियों को नयी कविताएं सुझने लगीं। हम जैसों को भी चाय के साथ पकौड़ियों की तलब लगने लगी। बस यहीं से शुरु हो गयी बेचारे शरीर की परेशानी। इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। सब अपने में मस्त थे पर शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप। सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेन्टरी, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या।
इसी आवाज को हमें भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिये। क्योंकी बिमार होकर स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाये।
यहां कुछ हल्की-फुल्की हिदायतें लिख रहा हूं जिनके प्रयोग से भला ही हो सकता है बुराई कुछ भी नहीं है :-
इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा लेने से फायदा रहता है।
खांसी-जुकाम में एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से राहत मिलती है।
इस मौसम में दूध, दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग बिल्कुल कम कर दें।
नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर नहायें। इसमें झंझट लगता हो तो पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला कर नहायें।
आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। भंड़ारित किये हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ दें। पानी की गंदगी नीचे बैठ जायेगी।
तुलसी की पत्तियां भी जलजनित रोगों से लड़ने में सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है।
खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा पानी के साथ निगल लें। आधे घंटे के अंदर ही राहत मिल जायेगी।
बाहर के खाने खासकर चायनिज खाद्य पदार्थों से इन दिनों दूरी बनाये रखें। ज्यादा देर से कटे फल और सलाद का उपयोग ना करें।
इसी आवाज को हमें भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिये। क्योंकी बिमार होकर स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाये।
यहां कुछ हल्की-फुल्की हिदायतें लिख रहा हूं जिनके प्रयोग से भला ही हो सकता है बुराई कुछ भी नहीं है :-
इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा लेने से फायदा रहता है।
खांसी-जुकाम में एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से राहत मिलती है।
इस मौसम में दूध, दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग बिल्कुल कम कर दें।
नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर नहायें। इसमें झंझट लगता हो तो पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला कर नहायें।
आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। भंड़ारित किये हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ दें। पानी की गंदगी नीचे बैठ जायेगी।
तुलसी की पत्तियां भी जलजनित रोगों से लड़ने में सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है।
खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा पानी के साथ निगल लें। आधे घंटे के अंदर ही राहत मिल जायेगी।
बाहर के खाने खासकर चायनिज खाद्य पदार्थों से इन दिनों दूरी बनाये रखें। ज्यादा देर से कटे फल और सलाद का उपयोग ना करें।
गुरुवार, 2 जुलाई 2009
जगह-जगह लिखे निर्देशों या चेतावनियों पर ध्यान न दें, बिंदास रहें
हमारे देश में जगह-जगह तरह-तरह की सलाहें, चेतावनियां और निर्देश लिखे मिल जाते हैं। चतुर सुजान लोग उनपर ध्यान दिये बगैर अपना काम करते रहते हैं। हम जैसे उन सब से घबड़ा कर अपनी ऐसी की तैसी करवाते रह जाते हैं। समय के साथ कुछ सोचने समझने लायक हुए तो सोचा कि जनता जनार्दन भी हमारे तजुर्बे का फायदा उठा ले।
जब कभी आप कहीं घूमने जायें और किसी होटल में ठहरें तो वहां लिखे नाश्ते या लंच के समय पर बिल्कुल ध्यान ना दें। जैसा कि अक्सर लिखा रहता है कि सबेरे का नाश्ता 7 से 10.30 तक। दोपहर का खाना 11.30 से 3 बजे तक। शाम की चाय 4 से 6.30 तक और रात का खाना 7.30 से 10 बजे तक। आप तो इस समय के चक्कर वक्कर में ना पड़ें, नहीं तो घूमने कब जायेंगे मेरे भाई।
छोटे बड़े शहरों में दिवारों पर आप को यह लिखा मिल जायेगा "यहां ..... मना है"। अब सोचिये सरकार प्रकृति की पुकार के निवारण के लिये प्रयाप्त सुविधायें तो मुहैया करवाती नहीं, ऊपर से ऐसे निर्देश। अब आप निवृत होने के लिये बैचैन हैं, तो क्या करेंगे? सीधी सी बात है भाई उस लिखावट वाली जगह के दस बारह फुट दायें-बायें तो कोई रुकावट नहीं होती ना !! लगे हाथ इसी के साथ एक बिल्कुल सच्ची घटना आप को बताता हूं। कलकत्ते में कालेज के जमाने की बात है। उन दिनों सड़क किनारे निवृत होने पर पुलिस पकड़ कर जुर्माना वगैरह कर देती थी। पर प्रकृति की पुकार को कोई कहां रोक पाता है। सो कालेज का एक लड़का दिवार की तरफ मुंह कर शुरु हो गया। तभी उसके पीछे से एक पुलिस वाला अपना ड़ंडा फटकारते हुए दौड़ा। मामला संगीन था पर लड़के की त्वरित बुद्धी ने उसे बचा ही नहीं लिया पुलिस वाले की भी ऐसी की तैसी करवा दी। हुआ यह कि लड़के ने निवृत होते होते ही अपनी जगह बदल ली। जब पुलिस वाले ने उसे डांटा तो लड़के ने कहा तुम भी तो यहीं कर रहे थे। अभी भी दिवाल पर निशान हैं। बेचारा पुलिस वाला हतप्रभ रह गया उपर से कालेज का इलाका उसने भागने में ही भलाई समझी।
अस्पतालों में लिखा रहता है कि महिलाओं को देखने का समय सुबह 8 से 11 तक। अब यदि कोई शाम को जा कर घूरे तो कोई क्या कर लेगा।
एक डाक्टर ने अपनी क्लिनिक नीचे से हटा पहले माले पर खोल ली और नीचे अपने मरीजों की सुविधा के लिये लिखवा दिया उपर जाने का रास्ता। लो इस पर तो उसके मरीज ही आने बंद हो गये। उन्हें कौन समझाता कि भाई उसने अपने पास आने का रास्ता बताया है ना कि एकदम उपर जाने का!!
यह तो सिर्फ एक बानगी है। ऐसी बहुत सी उल्टी सीधी नसीहतें दी रहती हैं जिन पर ध्यान न ही दें तो बेहतरी है।
जब कभी आप कहीं घूमने जायें और किसी होटल में ठहरें तो वहां लिखे नाश्ते या लंच के समय पर बिल्कुल ध्यान ना दें। जैसा कि अक्सर लिखा रहता है कि सबेरे का नाश्ता 7 से 10.30 तक। दोपहर का खाना 11.30 से 3 बजे तक। शाम की चाय 4 से 6.30 तक और रात का खाना 7.30 से 10 बजे तक। आप तो इस समय के चक्कर वक्कर में ना पड़ें, नहीं तो घूमने कब जायेंगे मेरे भाई।
छोटे बड़े शहरों में दिवारों पर आप को यह लिखा मिल जायेगा "यहां ..... मना है"। अब सोचिये सरकार प्रकृति की पुकार के निवारण के लिये प्रयाप्त सुविधायें तो मुहैया करवाती नहीं, ऊपर से ऐसे निर्देश। अब आप निवृत होने के लिये बैचैन हैं, तो क्या करेंगे? सीधी सी बात है भाई उस लिखावट वाली जगह के दस बारह फुट दायें-बायें तो कोई रुकावट नहीं होती ना !! लगे हाथ इसी के साथ एक बिल्कुल सच्ची घटना आप को बताता हूं। कलकत्ते में कालेज के जमाने की बात है। उन दिनों सड़क किनारे निवृत होने पर पुलिस पकड़ कर जुर्माना वगैरह कर देती थी। पर प्रकृति की पुकार को कोई कहां रोक पाता है। सो कालेज का एक लड़का दिवार की तरफ मुंह कर शुरु हो गया। तभी उसके पीछे से एक पुलिस वाला अपना ड़ंडा फटकारते हुए दौड़ा। मामला संगीन था पर लड़के की त्वरित बुद्धी ने उसे बचा ही नहीं लिया पुलिस वाले की भी ऐसी की तैसी करवा दी। हुआ यह कि लड़के ने निवृत होते होते ही अपनी जगह बदल ली। जब पुलिस वाले ने उसे डांटा तो लड़के ने कहा तुम भी तो यहीं कर रहे थे। अभी भी दिवाल पर निशान हैं। बेचारा पुलिस वाला हतप्रभ रह गया उपर से कालेज का इलाका उसने भागने में ही भलाई समझी।
अस्पतालों में लिखा रहता है कि महिलाओं को देखने का समय सुबह 8 से 11 तक। अब यदि कोई शाम को जा कर घूरे तो कोई क्या कर लेगा।
एक डाक्टर ने अपनी क्लिनिक नीचे से हटा पहले माले पर खोल ली और नीचे अपने मरीजों की सुविधा के लिये लिखवा दिया उपर जाने का रास्ता। लो इस पर तो उसके मरीज ही आने बंद हो गये। उन्हें कौन समझाता कि भाई उसने अपने पास आने का रास्ता बताया है ना कि एकदम उपर जाने का!!
यह तो सिर्फ एक बानगी है। ऐसी बहुत सी उल्टी सीधी नसीहतें दी रहती हैं जिन पर ध्यान न ही दें तो बेहतरी है।
बुधवार, 1 जुलाई 2009
समय के साथ बदलती माँ की नेक सलाहें
हर मां अपने बेटे के विवाह योग्य होने पर यही चाहती है कि उसकी भी एक सर्वगुण सम्पन्न बहू आ जाये। इसके लिये वह अपने पुत्र को तरह-तरह की हिदायतें भी देती रहती आयी है। समय के साथ-साथ ये हिदायतें भी बदलती रही हैं। जरा गौर फर्माइए :-
1960 - के दशक में मां की इच्छा होती थी कि लड़के की शादी अपनी जात बिरादरी में ही हो। ताकि अपने तीज त्योहारों का लड़की को भी पता हो।
1970 - में इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा कि लड़की अपने ही धर्म को मानने वाली हो। यही वह अपने बेटे से भी कहती रहती थी।
1980 - आते-आते पुरानी बातों को तकरीबन नजरंदाज कर दिया गया। अब माएं बेटों को यह सलाह देने लगीं कि और कुछ ना सही पर लड़की अपनी हैसियत वाले परिवार से होनी चाहिये।
1990 - समय बीतता गया। आगे बढने की होड़ में युवकों का विदेश गमन कोई नयी बात नहीं रह गयी। तब माओं का भी सुर बदला और वे चाहने लगीं कि उनका बेटा अपने देश की कन्या से ही विवाह करे।
2000 - समय के साथ-साथ युवाओं की सोच से माएं चिंताग्रस्त रहने लगी थीं। लड़के अपने कैरियर के लिये अपनी उम्र की परवाह छोड़ने लगे थे। वे पहले अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहते थे। इसलिये विवाह की उम्र निकलती जाती थी। तब माएं यही चाहती और सलाह देती थीं कि समय रहते अपनी उम्र की लड़की से शादी कर ले।
2009 - देखते-देखते वर्तमान भी आ पहुंचा। विचार बदल गये। सोचें बदल गयीं। रहन-सहन के तौर-तरीके बदल गये। जाहिर है मांओं की सोच और सलाहों में भी बदलाव आया होगा। तो मां अब अपने बेटे से यही कहती है कि बेटा शादी कर ले। किसी से भी, "पर वह लड़की होनी चाहिये"।
1960 - के दशक में मां की इच्छा होती थी कि लड़के की शादी अपनी जात बिरादरी में ही हो। ताकि अपने तीज त्योहारों का लड़की को भी पता हो।
1970 - में इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा कि लड़की अपने ही धर्म को मानने वाली हो। यही वह अपने बेटे से भी कहती रहती थी।
1980 - आते-आते पुरानी बातों को तकरीबन नजरंदाज कर दिया गया। अब माएं बेटों को यह सलाह देने लगीं कि और कुछ ना सही पर लड़की अपनी हैसियत वाले परिवार से होनी चाहिये।
1990 - समय बीतता गया। आगे बढने की होड़ में युवकों का विदेश गमन कोई नयी बात नहीं रह गयी। तब माओं का भी सुर बदला और वे चाहने लगीं कि उनका बेटा अपने देश की कन्या से ही विवाह करे।
2000 - समय के साथ-साथ युवाओं की सोच से माएं चिंताग्रस्त रहने लगी थीं। लड़के अपने कैरियर के लिये अपनी उम्र की परवाह छोड़ने लगे थे। वे पहले अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहते थे। इसलिये विवाह की उम्र निकलती जाती थी। तब माएं यही चाहती और सलाह देती थीं कि समय रहते अपनी उम्र की लड़की से शादी कर ले।
2009 - देखते-देखते वर्तमान भी आ पहुंचा। विचार बदल गये। सोचें बदल गयीं। रहन-सहन के तौर-तरीके बदल गये। जाहिर है मांओं की सोच और सलाहों में भी बदलाव आया होगा। तो मां अब अपने बेटे से यही कहती है कि बेटा शादी कर ले। किसी से भी, "पर वह लड़की होनी चाहिये"।
मंगलवार, 30 जून 2009
ये महिलाएं ( - :
मां, बेटा और बहू तीन जनों का छोटा सा परिवार। पर सास बहू में रोज जूतम पैजार। दोनों यही समझतीं कि लड़का उसे ही ज्यादा चाहता है। एक दिन शाम को लड़का घर आया तो दोनो सास बहू उसके सामने आ खड़ी हुईं। मां ने बेटे से पूछा कि आज एक बात साफ कर दे, तू किसकी ज्यादा फिकर करता है ? मेरी या अपनी बीवी की ? मान ले हम दोनों नदी में ड़ूबने लगें तो तू किसे पहले बचायेगा?लड़का बेचारा पेशोपेश में। एक तरफ कूंआ दूसरी तरफ खाई। समझ नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दे। उसके उतरे चेहरे को देख उसकी बीवी को दया आगयी। वह बोली, तुम तो अपनी मां को बचा लेना। मुझे बचाने वाले बहुत मिल जायेंगे।
*****************************************
शादी के 25-30 साल बाद। करवा चौथ की सुबह रसोई की खट-पट से पति की नींद में बाधा पड़ी तो वह चिल्लाया, मुंह अंधेरे यह क्या कर रही हो ?बीवी वहीं से गुर्राई, तेरा स्यापा ही करने में लगी हूं।
*******************************************
एक बूढी माई ने एक सोने का कंगन बनवा कर अपनी वर्षों की हसरत पूरी की। अब उसकी इच्छा थी कि उस जेवर की लोग प्रशंसा करें। वह दिन भर इधर उधर घूमती रही। लोगों को आकर्षित करने के उसने सारे उपाय कर लिये पर दैवयोग से किसी का भी ध्यान कंगन की ओर नहीं गया। वह रुआंसी तो हो ही गयी साथ ही साथ गुस्से से भी भर गयी। गुस्से में उसने अपनी झोंपड़ी में आग लगा दी। और हाथ उठा जोर-जोर से चिल्लाने लगी, लोगो दौड़ो, बचाओ। इसी बीच एक लड़के की नज़र उसके चमकते कंगन पर पड़ी। उसने पूछा, क्यों नानी नया गहना बनवाया है क्या ?वृद्धा यह सुनते ही फट पड़ी, अरे नासपीटे सबेरे ही इसे देख लेता तो मेरा घर तो बच जाता।
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शादी के 25-30 साल बाद। करवा चौथ की सुबह रसोई की खट-पट से पति की नींद में बाधा पड़ी तो वह चिल्लाया, मुंह अंधेरे यह क्या कर रही हो ?बीवी वहीं से गुर्राई, तेरा स्यापा ही करने में लगी हूं।
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एक बूढी माई ने एक सोने का कंगन बनवा कर अपनी वर्षों की हसरत पूरी की। अब उसकी इच्छा थी कि उस जेवर की लोग प्रशंसा करें। वह दिन भर इधर उधर घूमती रही। लोगों को आकर्षित करने के उसने सारे उपाय कर लिये पर दैवयोग से किसी का भी ध्यान कंगन की ओर नहीं गया। वह रुआंसी तो हो ही गयी साथ ही साथ गुस्से से भी भर गयी। गुस्से में उसने अपनी झोंपड़ी में आग लगा दी। और हाथ उठा जोर-जोर से चिल्लाने लगी, लोगो दौड़ो, बचाओ। इसी बीच एक लड़के की नज़र उसके चमकते कंगन पर पड़ी। उसने पूछा, क्यों नानी नया गहना बनवाया है क्या ?वृद्धा यह सुनते ही फट पड़ी, अरे नासपीटे सबेरे ही इसे देख लेता तो मेरा घर तो बच जाता।
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इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...
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कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
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शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
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आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
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चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...