प्रकृति की अनमोल सौगातों में से एक है पपीता। इसके पत्ते, बीज, फल, दूध सभी भागों का उपयोग लाभप्रद होता है। इसके कच्चे फल से निकला सफेद रंग का तरल द्रव्य जिसे "पपेन" के नाम से जाना जाता है, अपने आप में एक बेहतरीन औषध है।
इसके पत्तों को सुखा कर बनाया गया चूर्ण शहद के साथ लेने से पेट की वायु का शमन होता है। दिल की धड़कन काबू में रहती है।
कच्चे पपीते से निकले दूध जैसे द्रव्य को सुखा कर बनाया गया चुर्ण एक श्रेष्ठ पाचक होता है। खाने के साथ एक चौथाई चम्मच पानी के साथ लेने से तुरंत फायदा होता है। अजीर्ण रोग में, त्वचा रोगों में, यकृत के दोष में तथा पेट में कीड़े होने पर यह बहुत फायदेमंद रहता है।
कच्चे पपीते की सब्जी पेट के लिये बहुत मुफीद होती है। बुखार इत्यादि के दौरान इसका सेवन बहुत उपयोगी रहता है। वहीं पका पपीता पथरी, कृमि, अपच, कब्ज से मुक्ति दिलाता है। इसे खाने से मुंह के विकार दूर हो जाते हैं। मां के दुध में वृद्धिकारक होता है। पर यह अच्छी तरह से पका हुआ होना चाहिये।
पपीते का फल तो फल इसके बीज भी बहुत गुणकारी होते हैं। यह एक उत्तम कृमिनाशक है। बीजों को सुखा कर उनका चुर्ण बना कर एक छोटा चम्मच दो सप्ताह लेने से असर दिखाई देने लगता है।
देखा जाय तो बिमार पड़ने से पहले ही यदि अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए अपने बुजुर्गों के परिक्षित घरेलु नुस्खों को, जो उनके वर्षों के अनुभवों का निचोड़ होते हैं, हम आजमा लें तो फायदा ही होगा, नुक्सान का सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि ये सब घर में उपलब्ध खाद्य सामग्री या मसालों से ही बने होते हैं। जरूरत होती है सिर्फ उनके कहे पर विश्वास की।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
सोमवार, 6 जुलाई 2009
रविवार, 5 जुलाई 2009
सदियों के अनुभव का निचोड़ है ये कहावतें
"कलशे पानी गर्म हो, चिडी न्हावे जब धूल,
जब चींटी अंडा ले चढ़े , वर्षा होसी भरपूर। "
जब घडे में पानी ठंडा न हो, चिडिया धूल में लोटने लगे, चींटियाँ अपने अण्डों को ले ऊंची जगहों पर जाने लगें तो समझ लेना चाहिए कि पानी बरसने वाला है।
"उल्टे गिरगिट ऊंचे चढ़े, बरखा होई भुई जल बढे।"
यदि गिरगिट पेडों पर उलटा चढ़ता दिखे तो बस पानी बरसा ही समझो।
"आगे रवि पीछे मंगल, जो आषाढ़ बरसे , अनमोल हो धरती, उमगें बाढ़।"
आषाढ़ के माह में यदि पहले मंगलवार और बाद में रविवार पड़े तो अच्छी बारिश होती है।
"टोली मिल की कांवली , आय थलां बैठत, दिन चौथे के पांचवें, जल-थल एक करत।"
चीलें जब जमीन पर आकर बैठें तो चार-पाँच दिनों में पानी अवश्य बरसता है।
***************************
चलते-चलते :- बरसात के मौसम में एक आदमी की कार कीचड़ मे फंस गयी। तभी उधर से संता अपने बैल के साथ निकला। उस आदमी ने संता से गुजारिश की कि उसकी गाड़ी को निकलवाने मे मदद करे। संता तो सदा दूसरों की भलाई ही करता रहता है। वह तुरंत तैयार हो गया। उसने अपने बैल को गाड़ी के आगे बांधा और बोला, चल बेटा भोलू जोर लगा। चल मुन्ना जोर से खींच, चल मोहन शाब्बाश जोर लगा के, हां बेटा मोती पीछे ना रहना खींच ले।संता का मोती नाम लेना था कि बैल ने एक झटके से गाड़ी खींच कर बाहर निकाल दी। गाड़ीवाले ने अचंभित हो पूछा, भाई जब तुम्हारे बैल का नाम मोती है तो तुमने पहले इसका नाम ना ले और तीन नाम क्यों पुकारे। संता मुस्कुराया और आदमी को एक किनारे ले जा धीरे से बोला, जनाब मेरा बैल अंधा है। तीन और नाम लेने से उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है उसके साथ और भी बैल हैं सो वह काम में लग जाता है। यदि उसे पता चल जाये कि वह अकेला ही जुता हुआ है तो अड़ जाता है।
गाड़ी वाले भाई का मुंह खुले का खुला रह गया।
जब चींटी अंडा ले चढ़े , वर्षा होसी भरपूर। "
जब घडे में पानी ठंडा न हो, चिडिया धूल में लोटने लगे, चींटियाँ अपने अण्डों को ले ऊंची जगहों पर जाने लगें तो समझ लेना चाहिए कि पानी बरसने वाला है।
"उल्टे गिरगिट ऊंचे चढ़े, बरखा होई भुई जल बढे।"
यदि गिरगिट पेडों पर उलटा चढ़ता दिखे तो बस पानी बरसा ही समझो।
"आगे रवि पीछे मंगल, जो आषाढ़ बरसे , अनमोल हो धरती, उमगें बाढ़।"
आषाढ़ के माह में यदि पहले मंगलवार और बाद में रविवार पड़े तो अच्छी बारिश होती है।
"टोली मिल की कांवली , आय थलां बैठत, दिन चौथे के पांचवें, जल-थल एक करत।"
चीलें जब जमीन पर आकर बैठें तो चार-पाँच दिनों में पानी अवश्य बरसता है।
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चलते-चलते :- बरसात के मौसम में एक आदमी की कार कीचड़ मे फंस गयी। तभी उधर से संता अपने बैल के साथ निकला। उस आदमी ने संता से गुजारिश की कि उसकी गाड़ी को निकलवाने मे मदद करे। संता तो सदा दूसरों की भलाई ही करता रहता है। वह तुरंत तैयार हो गया। उसने अपने बैल को गाड़ी के आगे बांधा और बोला, चल बेटा भोलू जोर लगा। चल मुन्ना जोर से खींच, चल मोहन शाब्बाश जोर लगा के, हां बेटा मोती पीछे ना रहना खींच ले।संता का मोती नाम लेना था कि बैल ने एक झटके से गाड़ी खींच कर बाहर निकाल दी। गाड़ीवाले ने अचंभित हो पूछा, भाई जब तुम्हारे बैल का नाम मोती है तो तुमने पहले इसका नाम ना ले और तीन नाम क्यों पुकारे। संता मुस्कुराया और आदमी को एक किनारे ले जा धीरे से बोला, जनाब मेरा बैल अंधा है। तीन और नाम लेने से उसे लगता है कि वह अकेला नहीं है उसके साथ और भी बैल हैं सो वह काम में लग जाता है। यदि उसे पता चल जाये कि वह अकेला ही जुता हुआ है तो अड़ जाता है।
गाड़ी वाले भाई का मुंह खुले का खुला रह गया।
शुक्रवार, 3 जुलाई 2009
बरसात गर्मी से राहत के साथ और कुछ भी लाती है
इस बार गर्मी का मौसम कुछ ज्यादा ही लंबा खिंच गया था। आखिरकार इंद्र देवता की इजाजत से बरखा रानी ने धरती पर अपने कदम रखे। मौसम सुहाना होने लगा। पेड़-पौधों ने धुल कर राहत की सांस ली, किसानों की जान में जान आयी। कवियों को नयी कविताएं सुझने लगीं। हम जैसों को भी चाय के साथ पकौड़ियों की तलब लगने लगी। बस यहीं से शुरु हो गयी बेचारे शरीर की परेशानी। इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। सब अपने में मस्त थे पर शरीर साफ सुन पा रहा था बरसात के साथ आने वाली बिमारियों की पदचाप। सर्दी, खांसी, फ्लू, डायरिया, डिसेन्टरी, जोड़ों का दर्द और न जाने क्या-क्या।
इसी आवाज को हमें भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिये। क्योंकी बिमार होकर स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाये।
यहां कुछ हल्की-फुल्की हिदायतें लिख रहा हूं जिनके प्रयोग से भला ही हो सकता है बुराई कुछ भी नहीं है :-
इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा लेने से फायदा रहता है।
खांसी-जुकाम में एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से राहत मिलती है।
इस मौसम में दूध, दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग बिल्कुल कम कर दें।
नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर नहायें। इसमें झंझट लगता हो तो पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला कर नहायें।
आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। भंड़ारित किये हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ दें। पानी की गंदगी नीचे बैठ जायेगी।
तुलसी की पत्तियां भी जलजनित रोगों से लड़ने में सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है।
खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा पानी के साथ निगल लें। आधे घंटे के अंदर ही राहत मिल जायेगी।
बाहर के खाने खासकर चायनिज खाद्य पदार्थों से इन दिनों दूरी बनाये रखें। ज्यादा देर से कटे फल और सलाद का उपयोग ना करें।
इसी आवाज को हमें भी सुन स्वस्थ रहते हुए स्वस्थ रहने की प्रकृया शुरु कर देनी चाहिये। क्योंकी बिमार होकर स्वस्थ होने से अच्छा है कि बिमारी से बचने का पहले ही इंतजाम कर लिया जाये।
यहां कुछ हल्की-फुल्की हिदायतें लिख रहा हूं जिनके प्रयोग से भला ही हो सकता है बुराई कुछ भी नहीं है :-
इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा लेने से फायदा रहता है।
खांसी-जुकाम में एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से राहत मिलती है।
इस मौसम में दूध, दही, फलों के रस, हरी पत्तियों वाली सब्जियों का प्रयोग बिल्कुल कम कर दें।
नीम की पत्तियों को उबाल कर उस पानी को अपने नहाने के पानी में मिला कर नहायें। इसमें झंझट लगता हो तो पानी में डेटाल जैसा कोई एंटीसेप्टिक मिला कर नहायें।
आज कल तो हर घर में पानी के फिल्टर का प्रयोग होता है। पर वह ज्यादातर पीने के पानी को साफ करने के काम में ही लिया जाता है। भंड़ारित किये हुए पानी को वैसे ही प्रयोग में ले आया जाता है। ऐसे पानी में एक फिटकरी के टुकड़े को कुछ देर घुमा कर छोड़ दें। पानी की गंदगी नीचे बैठ जायेगी।
तुलसी की पत्तियां भी जलजनित रोगों से लड़ने में सहायक होती हैं। इसकी 8-10 पत्तियां रोज चबा लेने से बहुत सी बिमारियों से बचा जा सकता है।
खाने के बाद यदि पेट में भारीपन का एहसास हो तो एक चम्मच जीरा पानी के साथ निगल लें। आधे घंटे के अंदर ही राहत मिल जायेगी।
बाहर के खाने खासकर चायनिज खाद्य पदार्थों से इन दिनों दूरी बनाये रखें। ज्यादा देर से कटे फल और सलाद का उपयोग ना करें।
गुरुवार, 2 जुलाई 2009
जगह-जगह लिखे निर्देशों या चेतावनियों पर ध्यान न दें, बिंदास रहें
हमारे देश में जगह-जगह तरह-तरह की सलाहें, चेतावनियां और निर्देश लिखे मिल जाते हैं। चतुर सुजान लोग उनपर ध्यान दिये बगैर अपना काम करते रहते हैं। हम जैसे उन सब से घबड़ा कर अपनी ऐसी की तैसी करवाते रह जाते हैं। समय के साथ कुछ सोचने समझने लायक हुए तो सोचा कि जनता जनार्दन भी हमारे तजुर्बे का फायदा उठा ले।
जब कभी आप कहीं घूमने जायें और किसी होटल में ठहरें तो वहां लिखे नाश्ते या लंच के समय पर बिल्कुल ध्यान ना दें। जैसा कि अक्सर लिखा रहता है कि सबेरे का नाश्ता 7 से 10.30 तक। दोपहर का खाना 11.30 से 3 बजे तक। शाम की चाय 4 से 6.30 तक और रात का खाना 7.30 से 10 बजे तक। आप तो इस समय के चक्कर वक्कर में ना पड़ें, नहीं तो घूमने कब जायेंगे मेरे भाई।
छोटे बड़े शहरों में दिवारों पर आप को यह लिखा मिल जायेगा "यहां ..... मना है"। अब सोचिये सरकार प्रकृति की पुकार के निवारण के लिये प्रयाप्त सुविधायें तो मुहैया करवाती नहीं, ऊपर से ऐसे निर्देश। अब आप निवृत होने के लिये बैचैन हैं, तो क्या करेंगे? सीधी सी बात है भाई उस लिखावट वाली जगह के दस बारह फुट दायें-बायें तो कोई रुकावट नहीं होती ना !! लगे हाथ इसी के साथ एक बिल्कुल सच्ची घटना आप को बताता हूं। कलकत्ते में कालेज के जमाने की बात है। उन दिनों सड़क किनारे निवृत होने पर पुलिस पकड़ कर जुर्माना वगैरह कर देती थी। पर प्रकृति की पुकार को कोई कहां रोक पाता है। सो कालेज का एक लड़का दिवार की तरफ मुंह कर शुरु हो गया। तभी उसके पीछे से एक पुलिस वाला अपना ड़ंडा फटकारते हुए दौड़ा। मामला संगीन था पर लड़के की त्वरित बुद्धी ने उसे बचा ही नहीं लिया पुलिस वाले की भी ऐसी की तैसी करवा दी। हुआ यह कि लड़के ने निवृत होते होते ही अपनी जगह बदल ली। जब पुलिस वाले ने उसे डांटा तो लड़के ने कहा तुम भी तो यहीं कर रहे थे। अभी भी दिवाल पर निशान हैं। बेचारा पुलिस वाला हतप्रभ रह गया उपर से कालेज का इलाका उसने भागने में ही भलाई समझी।
अस्पतालों में लिखा रहता है कि महिलाओं को देखने का समय सुबह 8 से 11 तक। अब यदि कोई शाम को जा कर घूरे तो कोई क्या कर लेगा।
एक डाक्टर ने अपनी क्लिनिक नीचे से हटा पहले माले पर खोल ली और नीचे अपने मरीजों की सुविधा के लिये लिखवा दिया उपर जाने का रास्ता। लो इस पर तो उसके मरीज ही आने बंद हो गये। उन्हें कौन समझाता कि भाई उसने अपने पास आने का रास्ता बताया है ना कि एकदम उपर जाने का!!
यह तो सिर्फ एक बानगी है। ऐसी बहुत सी उल्टी सीधी नसीहतें दी रहती हैं जिन पर ध्यान न ही दें तो बेहतरी है।
जब कभी आप कहीं घूमने जायें और किसी होटल में ठहरें तो वहां लिखे नाश्ते या लंच के समय पर बिल्कुल ध्यान ना दें। जैसा कि अक्सर लिखा रहता है कि सबेरे का नाश्ता 7 से 10.30 तक। दोपहर का खाना 11.30 से 3 बजे तक। शाम की चाय 4 से 6.30 तक और रात का खाना 7.30 से 10 बजे तक। आप तो इस समय के चक्कर वक्कर में ना पड़ें, नहीं तो घूमने कब जायेंगे मेरे भाई।
छोटे बड़े शहरों में दिवारों पर आप को यह लिखा मिल जायेगा "यहां ..... मना है"। अब सोचिये सरकार प्रकृति की पुकार के निवारण के लिये प्रयाप्त सुविधायें तो मुहैया करवाती नहीं, ऊपर से ऐसे निर्देश। अब आप निवृत होने के लिये बैचैन हैं, तो क्या करेंगे? सीधी सी बात है भाई उस लिखावट वाली जगह के दस बारह फुट दायें-बायें तो कोई रुकावट नहीं होती ना !! लगे हाथ इसी के साथ एक बिल्कुल सच्ची घटना आप को बताता हूं। कलकत्ते में कालेज के जमाने की बात है। उन दिनों सड़क किनारे निवृत होने पर पुलिस पकड़ कर जुर्माना वगैरह कर देती थी। पर प्रकृति की पुकार को कोई कहां रोक पाता है। सो कालेज का एक लड़का दिवार की तरफ मुंह कर शुरु हो गया। तभी उसके पीछे से एक पुलिस वाला अपना ड़ंडा फटकारते हुए दौड़ा। मामला संगीन था पर लड़के की त्वरित बुद्धी ने उसे बचा ही नहीं लिया पुलिस वाले की भी ऐसी की तैसी करवा दी। हुआ यह कि लड़के ने निवृत होते होते ही अपनी जगह बदल ली। जब पुलिस वाले ने उसे डांटा तो लड़के ने कहा तुम भी तो यहीं कर रहे थे। अभी भी दिवाल पर निशान हैं। बेचारा पुलिस वाला हतप्रभ रह गया उपर से कालेज का इलाका उसने भागने में ही भलाई समझी।
अस्पतालों में लिखा रहता है कि महिलाओं को देखने का समय सुबह 8 से 11 तक। अब यदि कोई शाम को जा कर घूरे तो कोई क्या कर लेगा।
एक डाक्टर ने अपनी क्लिनिक नीचे से हटा पहले माले पर खोल ली और नीचे अपने मरीजों की सुविधा के लिये लिखवा दिया उपर जाने का रास्ता। लो इस पर तो उसके मरीज ही आने बंद हो गये। उन्हें कौन समझाता कि भाई उसने अपने पास आने का रास्ता बताया है ना कि एकदम उपर जाने का!!
यह तो सिर्फ एक बानगी है। ऐसी बहुत सी उल्टी सीधी नसीहतें दी रहती हैं जिन पर ध्यान न ही दें तो बेहतरी है।
बुधवार, 1 जुलाई 2009
समय के साथ बदलती माँ की नेक सलाहें
हर मां अपने बेटे के विवाह योग्य होने पर यही चाहती है कि उसकी भी एक सर्वगुण सम्पन्न बहू आ जाये। इसके लिये वह अपने पुत्र को तरह-तरह की हिदायतें भी देती रहती आयी है। समय के साथ-साथ ये हिदायतें भी बदलती रही हैं। जरा गौर फर्माइए :-
1960 - के दशक में मां की इच्छा होती थी कि लड़के की शादी अपनी जात बिरादरी में ही हो। ताकि अपने तीज त्योहारों का लड़की को भी पता हो।
1970 - में इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा कि लड़की अपने ही धर्म को मानने वाली हो। यही वह अपने बेटे से भी कहती रहती थी।
1980 - आते-आते पुरानी बातों को तकरीबन नजरंदाज कर दिया गया। अब माएं बेटों को यह सलाह देने लगीं कि और कुछ ना सही पर लड़की अपनी हैसियत वाले परिवार से होनी चाहिये।
1990 - समय बीतता गया। आगे बढने की होड़ में युवकों का विदेश गमन कोई नयी बात नहीं रह गयी। तब माओं का भी सुर बदला और वे चाहने लगीं कि उनका बेटा अपने देश की कन्या से ही विवाह करे।
2000 - समय के साथ-साथ युवाओं की सोच से माएं चिंताग्रस्त रहने लगी थीं। लड़के अपने कैरियर के लिये अपनी उम्र की परवाह छोड़ने लगे थे। वे पहले अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहते थे। इसलिये विवाह की उम्र निकलती जाती थी। तब माएं यही चाहती और सलाह देती थीं कि समय रहते अपनी उम्र की लड़की से शादी कर ले।
2009 - देखते-देखते वर्तमान भी आ पहुंचा। विचार बदल गये। सोचें बदल गयीं। रहन-सहन के तौर-तरीके बदल गये। जाहिर है मांओं की सोच और सलाहों में भी बदलाव आया होगा। तो मां अब अपने बेटे से यही कहती है कि बेटा शादी कर ले। किसी से भी, "पर वह लड़की होनी चाहिये"।
1960 - के दशक में मां की इच्छा होती थी कि लड़के की शादी अपनी जात बिरादरी में ही हो। ताकि अपने तीज त्योहारों का लड़की को भी पता हो।
1970 - में इस बात पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा कि लड़की अपने ही धर्म को मानने वाली हो। यही वह अपने बेटे से भी कहती रहती थी।
1980 - आते-आते पुरानी बातों को तकरीबन नजरंदाज कर दिया गया। अब माएं बेटों को यह सलाह देने लगीं कि और कुछ ना सही पर लड़की अपनी हैसियत वाले परिवार से होनी चाहिये।
1990 - समय बीतता गया। आगे बढने की होड़ में युवकों का विदेश गमन कोई नयी बात नहीं रह गयी। तब माओं का भी सुर बदला और वे चाहने लगीं कि उनका बेटा अपने देश की कन्या से ही विवाह करे।
2000 - समय के साथ-साथ युवाओं की सोच से माएं चिंताग्रस्त रहने लगी थीं। लड़के अपने कैरियर के लिये अपनी उम्र की परवाह छोड़ने लगे थे। वे पहले अपने भविष्य को सुरक्षित करना चाहते थे। इसलिये विवाह की उम्र निकलती जाती थी। तब माएं यही चाहती और सलाह देती थीं कि समय रहते अपनी उम्र की लड़की से शादी कर ले।
2009 - देखते-देखते वर्तमान भी आ पहुंचा। विचार बदल गये। सोचें बदल गयीं। रहन-सहन के तौर-तरीके बदल गये। जाहिर है मांओं की सोच और सलाहों में भी बदलाव आया होगा। तो मां अब अपने बेटे से यही कहती है कि बेटा शादी कर ले। किसी से भी, "पर वह लड़की होनी चाहिये"।
मंगलवार, 30 जून 2009
ये महिलाएं ( - :
मां, बेटा और बहू तीन जनों का छोटा सा परिवार। पर सास बहू में रोज जूतम पैजार। दोनों यही समझतीं कि लड़का उसे ही ज्यादा चाहता है। एक दिन शाम को लड़का घर आया तो दोनो सास बहू उसके सामने आ खड़ी हुईं। मां ने बेटे से पूछा कि आज एक बात साफ कर दे, तू किसकी ज्यादा फिकर करता है ? मेरी या अपनी बीवी की ? मान ले हम दोनों नदी में ड़ूबने लगें तो तू किसे पहले बचायेगा?लड़का बेचारा पेशोपेश में। एक तरफ कूंआ दूसरी तरफ खाई। समझ नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दे। उसके उतरे चेहरे को देख उसकी बीवी को दया आगयी। वह बोली, तुम तो अपनी मां को बचा लेना। मुझे बचाने वाले बहुत मिल जायेंगे।
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शादी के 25-30 साल बाद। करवा चौथ की सुबह रसोई की खट-पट से पति की नींद में बाधा पड़ी तो वह चिल्लाया, मुंह अंधेरे यह क्या कर रही हो ?बीवी वहीं से गुर्राई, तेरा स्यापा ही करने में लगी हूं।
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एक बूढी माई ने एक सोने का कंगन बनवा कर अपनी वर्षों की हसरत पूरी की। अब उसकी इच्छा थी कि उस जेवर की लोग प्रशंसा करें। वह दिन भर इधर उधर घूमती रही। लोगों को आकर्षित करने के उसने सारे उपाय कर लिये पर दैवयोग से किसी का भी ध्यान कंगन की ओर नहीं गया। वह रुआंसी तो हो ही गयी साथ ही साथ गुस्से से भी भर गयी। गुस्से में उसने अपनी झोंपड़ी में आग लगा दी। और हाथ उठा जोर-जोर से चिल्लाने लगी, लोगो दौड़ो, बचाओ। इसी बीच एक लड़के की नज़र उसके चमकते कंगन पर पड़ी। उसने पूछा, क्यों नानी नया गहना बनवाया है क्या ?वृद्धा यह सुनते ही फट पड़ी, अरे नासपीटे सबेरे ही इसे देख लेता तो मेरा घर तो बच जाता।
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शादी के 25-30 साल बाद। करवा चौथ की सुबह रसोई की खट-पट से पति की नींद में बाधा पड़ी तो वह चिल्लाया, मुंह अंधेरे यह क्या कर रही हो ?बीवी वहीं से गुर्राई, तेरा स्यापा ही करने में लगी हूं।
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एक बूढी माई ने एक सोने का कंगन बनवा कर अपनी वर्षों की हसरत पूरी की। अब उसकी इच्छा थी कि उस जेवर की लोग प्रशंसा करें। वह दिन भर इधर उधर घूमती रही। लोगों को आकर्षित करने के उसने सारे उपाय कर लिये पर दैवयोग से किसी का भी ध्यान कंगन की ओर नहीं गया। वह रुआंसी तो हो ही गयी साथ ही साथ गुस्से से भी भर गयी। गुस्से में उसने अपनी झोंपड़ी में आग लगा दी। और हाथ उठा जोर-जोर से चिल्लाने लगी, लोगो दौड़ो, बचाओ। इसी बीच एक लड़के की नज़र उसके चमकते कंगन पर पड़ी। उसने पूछा, क्यों नानी नया गहना बनवाया है क्या ?वृद्धा यह सुनते ही फट पड़ी, अरे नासपीटे सबेरे ही इसे देख लेता तो मेरा घर तो बच जाता।
रविवार, 28 जून 2009
उनके लिए जो शादी शुदा हैं या शादी करने जा रहे हैं.
हमारी छोटी सी जिंदगी में अपने जीवन साथी के प्रति जुड़ाव, एक दूसरे की खुशियों की हिफाजत, एक दूसरे का ख्याल, समर्पण ही जीवन को सुगम व सुखमय बनाता है ! जीवन में बड़ा घर, गाड़ी या भारी-भरकम बैंक बैंलेंस भी वह खुशी प्रदान नहीं कर सकते जो एक दूसरे को देखते ही चेहरे पर आई मुस्कान कर सकती है ! जीवन में कितनी भी व्यस्तता हो, कुछ ना कुछ समय अपने साथी के लिये जरूर निकालें, अपने सुखी, दीर्घ व संतुष्ट विवाहित जीवन के लिये...........!
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
नरेश और सीमा पति-पत्नी। दस साल हो गए थे शादी को। एक आठ साल का बच्चा विवेक। बस यही छोटा सा परिवार। नरेश का अच्छा खासा, जमा-जमाया व्यवसाय था। हर सुख-सुविधा उपलब्ध थी। घर-बार, गाड़ी, समर्पित पत्नी, सुंदर सा मेधावी बच्चा। पर उसका मन कहीं और सकून की तलाश में भटकता रहता था। इसी भटकन को थाम लिया था रंजना ने। यह संबंध इतने प्रगाढ़ हो गए थे कि उनकी मदहोशी में नरेश ने छोटे बच्चे के भविष्य को भी दरकिनार कर अपने बसे-बसाए परिवार को छिन्न-भिन्न करने का निर्णय ले लिया था !
एक शाम घर लौटने के बाद खाने की टेबल पर बिना किसी लाग लपेट के उसने सीमा से कह दिया कि उसे तलाक चाहिये। उसे लगा था कि उसकी इस बात पर सीमा आसमान सर पर उठा लेगी, रोएगी, चिल्लाएगी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ उल्टे उसने नम्रता से सिर्फ इतना पूछा, क्यूं ? इसका कोई जवाब ना देकर नरेश अपने कमरे में चला गया। वह रात दोनों पर भारी गुजरी सीमा की रोते हुए और नरेश की तनाव में।
दूसरे दिन शाम को जान बूझ कर नरेश देर से घर आया और सीमा के सामने तलाक नामा रख अपने कमरे में चला गया। कागज़ में घर, गाड़ी तथा व्यवसाय में तीस प्रतिशत का हिस्सा सीमा के नाम करने की बात लिखी गयी थी। सीमा ने कागज़ पढ़ा और उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। अगली सुबह नरेश दफ्तर जाने लगा तभी कमरे में सीमा आयी उसके हाथ में एक लिफाफा था जो उसने नरेश को थमा दिया। उसमें लिखा था कि उसको नरेश की धन संपत्ति कुछ नहीं चाहिये। पर तलाक के लिये उसकी दो शर्तें हैं, पहली कि यह तलाक विवेक के आसन्न इम्तिहानों को देखते हुए एक महिने बाद लिया जाय। इस बीच उनका व्यवहार बिल्कुल सामान्य रहेगा। दुसरे नरेश रोज उसे उसी तरह कमरे में ले जाएगा जैसे उसे पहली रात ले कर गया था।
नरेश को इसमें कोई आपत्ती नहीं थी। उसने जब यह दोनों शर्तें रंजना को बताईं तो वह जोर से हंस पड़ी और बोली, वह बेवकूफ औरत समझती है कि क्या वह ऐसे अपनी शादी बचा लेगी ?
पहली रात जब नरेश सीमा को अपनी बाहों में उठा कमरे की ओर बढा तो नन्हा विवेक उनके पीछे तालियां बजा-बजा कर खुश हो बोलने लगा कि देखो पापा ने कैसे मेरी तरह मम्मी को उठाया हुआ है। सीमा आंखें बंद किये सिर्फ इतना बोली कि इसे हमारे अलगाव का पता नहीं लगना चाहिए। नरेश ने अपना सर सहमति में हिला दिया। इसी बीच उसका ध्यान सीमा के चेहरे की तरफ गया जहां उम्र ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था बालों में भी चांदी के तार नजर आने लगे थे।
इसी तरह एक दिन सीमा को उठा कर ले जाते हुए उसे लगा कि जिस औरत ने उसकी सुख-सुविधा के लिये अपने दिन रात एक कर दिये थे उसकी ओर उसने कभी रत्ती भर भी ध्यान नहीं दिया है। सीमा के प्रति उसे फिर जुड़ाव सा महसूस होने लगा। यह बात उसने रंजना को नहीं बताई !
महीना खत्म होने में कुछ ही दिन रह गए थे। नरेश को सीमा की हर बात अब बारीकी से नजर आने लगी थी। आज रात को जब वह सीमा को उठाए कमरे की ओर बढ़ रहा था तो उसके ध्यान में आया कि उसके कपड़े नाप के ना हो कर ढीले से हैं। गौर करने पर उसे सीमा काफी दुबली नजर आई ! नरेश को लगा कि इस औरत को वह पिछले सालों की बनिस्पत अब ज्यादा समझने लगा है।
उसे ग्यारह सालों के अपने दुख-सुख के लम्हे याद आने लगे। वह कठिन परिस्थितियां जब वह हार कर हताश हो जाता था तब इसी औरत के संबल, साहस, हौसले से वह उबर पाया था ! इसी औरत की सहनशीलता, समझदारी से आज यह मुकाम हासिल हुआ है। इस बीच कभी भी उसका ध्यान दिन प्रति दिन क्षीण होती उसकी काया की तरफ नहीं गया था। अपने लिये समर्पित उस औरत का एक पल भी वह ध्यान नहीं रख पाया था। उसकी बाहों में सिमटी उस औरत ने कभी भी कोई शिकायत नहीं की थी उससे ! आज की रात अंतिम रात थी जब वह सीमा को उठाए कमरे की ओर जा रहा था। रोज की तरह सीमा अपनी आंखें बंद किए उसकी बाहों में निश्चल पड़ी थी।
सबेरा होते ही इसके पहले कि मन बदल जाए नरेश घर से निकल गया। सीधा रंजना के पास जा बोला कि मैं सीमा को तलाक नहीं दे सकता। जिसने मेरे लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया हो मैं उसे धोखा नहीं दे सकता। इतना सुनते ही रंजना आपे से बाहर हो गयी उसने नरेश को एक जोर का धक्का दे कर कहा कि क्या तुम पागल हो गये हो ? नरेश ने कहा हां ! और वहां से निकल गया। दूसरे दिन सीमा के सिरहाने एक कागज पड़ा था जिस पर लिखा था, मैं अपनी मृत्यु प्रयंत तुम्हें संभाले रहुंगा।
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