pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 12 जून 2009

क्या बात है !!! है न अजीबोगरीब (-:

हम दिन भर में करीब आधा लीटर पानी का वाष्पीकरण कर देते हैं, अपनी सांस लेने की क्रिया से। पानी बचाओ अभियान वाले कहीं यह न कहने लगें कि भाई सांसें कम लो। (-:

नीली व्हेल की एक साधारण फूंक से करीब 2000 गुब्बारे फुलाए जा सकते हैं।

ज्वालामुखी का लावा 50कीमी तक ऊपर उछल जाता है।

दुनिया के सारे ऊर्जा के स्रोत, कोयला, लकड़ी, तेल, गैस इत्यादि मिल कर भी कुछ दिनों तक ही सूर्य के बराबर ऊर्जा दे सकते हैं।

हमारी चमड़ी का वजन करीब सवा तीन केजी होता है।

पर हमारी आर्टरी, कैपिलरी और वेन को फैलाया जाए तो पूरी पृथ्वी को चार बार लपेटा जा सकता है।

हमारे शरीर की सबसे छोटी हड्डी कान के अंदर होती है जो बमुश्किल चावल के दाने जितनी होती है।

गुरुवार, 11 जून 2009

सहवाग और धोनी को लेकर मीडिया ने भ्रम फैलाया

आज कल मीड़िया में सहवाग और धोनी को लेकर तनातनी चल रही है। एक गुट दिल्ली के जाट के पक्ष में खड़ा है तो दूसरा झारखंड़ी ठाकुर के। खेल के गलियारे को भी जात-पात के अखाड़े में बदल कर रख दिया है मतलब परस्तों ने। पहला गुट सहवाग पर अवसरवादी होने का आरोप लगा बता रहा है कि उसने अपने कंधे की चोट, जो उसे पिछले आईपीएल में डेक्कन के खिलाफ खेलते हुए लगी थी, जान-बूझ कर छिपाई, क्योंकि उसके (सहवाग के) ख्याल में भारत के 20-20 के विश्व कप में जीतने की अच्छी संभावना है और उसमें मिलने वाली भारी-भरकम रकम का हिस्सा वह खोना नहीं चाहता। इसीलिये सिर्फ एक दो मैचों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के बाद वह अपनी चोट का हवाला दे बाहर बैठा रहना चाहता था। इसीलिये वह अपने परिवार को भी साथ ले आया था जिससे खाली समय में तफरीह की जा सके।
दूसरा खेमा धोनी को निशाना बना सहवाग का पक्ष ले लिखे जा रहा है। उसके अनुसार धोनी की निरंकुशता जग जाहिर है। वह अपने ऊपर किसी भी सीनियर को सहन नहीं कर पा रहा तथा एक-एक कर उसने सब से पार पा लिया है। अकेला बचा सहवाग (तेंदुलकर भी तकरीबन टेस्ट में ही सिमट कर रह गया है)जो भारत का अकेला त्रिशतकवीर है, अपने खेल के बूते पर धोनी के लिये खतरा बना हुआ है। उसका बल्ला जब बोलता है तो धोनी हाशीए पर चला जाता है और अपनी यह हेठी इस ठाकुर को पच नहीं पाती है। मीडिया के इस पक्ष के अनुसार दोनों के बीच कुछ भी ठीक नहीं है। इस बात को नकारने के लिये धोनी को मजबूरन प्रेस को बुलाना पड़ा पर वहां भी वह अपने अहं को छिपा नहीं पाया और आधी-अधूरी कांफ्रेंस को बीच में छोड़ उठ कर चला गया।
अब आप ही बतायें कि आप किसका कहा सच मानेंगें। इस बिकाऊ युग में।

मंगलवार, 9 जून 2009

आस पर दुनिया कायम है.

नासिक के कुंभ के मेले में जो भगदड़ मची थी, उसी में अपनी इस कहानी के पात्र दो गधे दोस्त बिछड़ गये थे। उनमें से एक किसी गांव में पहुंच गया और वहां एक कुम्हार के पास रहने लगा। दूसरा भटकते-भटकते शहर चला गया। वहां एक नट ने उसे आश्रय दिया। वर्षों बीत गये ऐसे ही एक दिन गांव का गधा घूमते हुए बाई चांस शहर जा पहुंचा। वहां उसने एक नट को तमाशा दिखाते देखा तो वह भी भीड़ में घुस गया। तभी उसकी नज़र अपने बिछड़े दोस्त पर पड़ी जो सूख कर कांटा हो गया था। दोनों एक-दूसरे को पहचान कर गले मिले, फिर गांव वाले ने अपने दोस्त की हालत देख पूछा कि यह क्या हालत बना रखी है, कुछ लेते क्यों नहीं, यदि यहां खाना-वाना नहीं मिलता है तो मेरे साथ गांव चलो। मेरी ओर देखो तुमसे बड़ा ही होउंगा पर कितना स्मार्ट लगता हूं। तुम तो जैसे बुढा गये हो। यह सब सुन शहर वाला गधा बोला नहीं दोस्त मैं कहीं नहीं जाऊंगा यहां मेरी जिंदगी संवरने का चांस है। गांव वाले ने कहा, क्या खाक चांस है, जब जिंदगी ही नहीं रहेगी तो क्या संवारोगे? वैसे, बाइ द वे, क्या उम्मीद लगाये बैठे हो ? शहर वाले ने बतलाना शुरु किया कि वह देखो उन दो बल्लीयों पर तनी रस्सी पर जो कन्या चल रही है, वह इस नट की लड़की है। नट रोज खेल शुरु करने के पहले उससे कहता है कि खेल में गड़बड़ी नहीं होनी चाहिये। यदि तू रस्सी से गिर पड़ी, तो याद रख, मैं तेरी शादी इसी गधे से कर दूंगा।
और बस भाई ! मैं इसी आस में यहां पड़ा हूं कि कभी तो किसी दिन---------------

सोमवार, 8 जून 2009

जब मेरे ताऊजी और पिताजी निजाम की जेल गए. २सरा भाग :

वह दिन भी आ गया जब हमें रिहा कर दिया गया। हम सब ऐसे जोश में थे जैसे अंग्रेजों को हमने देश के बाहर खदेड़ दिया हो। लौटते समय हमारा जगह-जगह स्वागत-सत्कार होता रहा। हम भी अपने को किसी हीरो जैसा समझ रहे थे। हावड़ा स्टेशन पर पुलिस की सख्ती के बावजूद सैकड़ों लोग हमारी अगवानी के लिये मौजूद थे। हमें फूल-मालाओं से लाद दिया गया। पूरा स्टेशन नारों से गूंज रहा था और माँ हमें अपने गले से चिपटाए अनवरत आसूं बहाये जा रहीं थीं...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मेरे पिताजी का पिछले साल स्वर्गवास हो गया था। उन्हीं की बरसी में ताऊजी का रायपुर घर आना हुआ था। तभी उन्होंने मन में कहीं दबी-छुपी वर्षों पुरानी यादों को हम सबके सामने उजागर किया था। हालांकि ताऊजी अब बानवें साल में हैं फिर भी 70-75 साल पुरानी बातें ऐसे सुना रहे थे जैसे अभी कल ही घटी हों !   
उन्होंने बताया कि :- उस समय का माहौल ही कुछ अजीब होता था। अंग्रेजों के विरुद्ध देश के लिये कुछ भी करने को लोग तैयार बैठे रहते थे। ऐसे ही संस्कार बच्चों में भी ड़ाले जाते थे। जोर-जुल्म से कोई भी ड़रता नहीं था। उसी रौ में हम भी हैदराबाद चल दिए थे। लगता था, जाते ही निजाम को सबक सिखा देंगें ! शुभ (मेरे पिताजी का नाम) थोडा नाजुक और चुप रहने वाला लड़का था और मैं (खुद ताऊजी) जरा रफ-टफ तरह का। इसलिये मैं तो कहीं भी कैसे भी निभा लेता था, पर छोटे की चिंता हो जाती थी, जो सिर्फ मेरे कहने पर मेरे साथ चला आया था। पर उसने भी गजब का साहस दिखाया कभी किसी भी कठिनाई में उदास या परेशान नहीं हुआ। 

जेल के दूसरे दिन किसी तरह कुछ आटे का जुगाड़ कर "लोहार खाने" की भट्ठी पर मैने कुछ आड़ी-टेढ़ी रोटियां सेकीं, जिनसे बहुत राहत मिली। एक-दो दिन बाद तिकड़मी दिमाग ने एक राह सुझाई। जेल में व्रत-त्योहार आदि पर अलग से राशन देने का प्रावधान था। उस दिन एकादशी का दिन था। मैने व्रत का बहाना बनाया, जिससे जेल वालों ने मुझे  अलग राशन दे दिया और कहा अपना बनाओ और खाओ। 

इसी बीच सबको सजा के दौरान काम तय कर दिया गया ! हम बच्चों को खेत में फसलों की देख-रेख का हल्का काम सौंपा गया। हमें मां की सीख याद थी कि अंग्रेजों की हर बात का विरोध करना है ! सो हमने फसल संभालने की जगह सारी खड़ी फसलें उखाड़ दीं। इसका दंड तो मिलना ही था, हमें अलग-अलग कोठरियों में बंद कर दिया गया। ज्यादा छोटा होने की वजह से शुभ को मेरे साथ ही रखा गया था। इस सबके बाद फिर हमें कुर्सी तथा गलीचा बुनाई में हाथ बटाने का काम दिया गया ! यहां भी हम बखिया उधेड़ने से बाज नहीं आए ! फिर उसी अकेली कोठरी में, जिसमें शायद जीरो वॉट की रोशनी ही होती थी, बंद कर दिए गए ! 

नाबालिग होने की वजह से हमें शारीरिक प्रताड़ना नहीं दी जाती थी पर डराया-धमकाया खूब जाता था। हम भी विरोध का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। खाना, जिसमें थोड़ा सुधार हो गया था, हमें जमीन पर बैठ कर ही खाना पड़ता था। एक दिन एक पहरेदार जूते पहन कर हमारी खाने की जगह में आ गया फिर क्या था, खाना बंद नारे शुरु ! किसी तरह हमें शांत कर भोजन करवाया गया। धीरे-धीरे समय निकलता चला गया। जेल वगैरह का कोई खौफ हमें नहीं था, उल्टे तरह-तरह की शरारतों में मजा आता था। ऐसे ही एक दिन कब्ज और पेट दुखने का नाटक किया तो हमे हास्पिटल में दाखिल कर दिया गया। हास्पिटल क्या था, तीन सीलन भरे कमरे थे। एक में एक टेबल-कुरसी तथा दो आल्मारियों में दवाऐं वगैरह होती थीं तथा दूसरे दोनों कमरों में दो–दो लोहे के पलंग जैसे कुछ थे। वहां कीड़े-मकौड़ों की भरमार थी। पर जगह बदलने से हम खुश थे। पर यह खुशी दिन की रोशनी तक ही सीमित रही। रात मे मेरे पैर पर कुछ रेंगने का आभास हुआ देखा तो बिच्छू था, फिर तो लालटेन जला कर रात भर बिच्छू ही मारते रहे !

ऐसे ही काम करते, शैतानी करते, सजा भुगतते कैसे 6 महीने बीत गए पता ही नहीं चला। वह तो संचार का उस समय कोई साधन नहीं था नहीं तो हम अपने और दोस्तों को भी बुला लेते। बचपन की समझ से इन्हीं सब चीजों में आनंन्द खोजते समय कट गया और वह दिन भी आ गया जब हमें रिहा कर दिया गया। हम सब ऐसे जोश में थे जैसे अंग्रेजों को हमने देश के बाहर खदेड़ दिया हो। लौटते समय हमारा जगह-जगह स्वागत-सत्कार होता रहा। हम भी अपने को किसी हीरो जैसा समझ रहे थे। हावड़ा स्टेशन पर पुलिस की सख्ती के बावजूद सैकड़ों लोग हमारी अगवानी के लिये मौजूद थे। हमें फूल-मालाओं से लाद दिया गया। पूरा स्टेशन नारों से गूंज रहा था और माँ हमें अपने गले से चिपटाए अनवरत आसूं बहाये जा रहीं थीं।"

ताऊजी पुरानी यादों में पूरी तरह से खो गए थे, लगता था जैसे माँ, हमारी दादीजी, अदृश्य रूप से वहां खड़ी हो उनके सर को सहला रही हों ! गहरी खामोशी पसरी हुई थी ! हम सब मौन साधे ताऊजी को देख रहे थे! जिनकी पलकों की कोर पर नमी आ गई थी और आज वर्षों बाद यह संस्मरण लिखते हुए मेरी आंखें भी बार-बार भीगती जा रही हैं, भीगती जा रही हैं..........!

रविवार, 7 जून 2009

जब मेरे पिताजी और ताऊजी निजाम की जेल गए

हमारे कपड़े उतरवा कर जेल की पोशाक पहनने को दी गई। हाजरी लगी। तब जाकर खाने की घंटी बजी।  पर खाना क्या था, बाजरे की मोटी रोटी जिसमें आटे से ज्यादा मिट्टी थी जो चबाते ही नहीं बन पा रही थी और वैसी ही पनीली दाल जो दाल कम नमकीन पानी ज्यादा थी। एक भी कौर निगला नहीं जा सका। जेल में ऐसा खाना मिलता है, यह सुना जरूर था, उस दिन प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिल गया। तब घर की बहुत याद आई थी............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

1934-35 का समय था। घर-घर में अंग्रेजों तथा उनके समर्थकों के विरुद्ध जनमानस में आक्रोश सुलगता रहता था। उन्हीं समर्थकों में एक था हैदराबाद का निजाम। उसकी देश विरोधी हरकतों के कारण आर्यसमाज ने उसके विरोध में आंदोलन चला रखा था, जिसके कारण देश भर से स्वयंसेवकों के जत्थे के जत्थे हैदराबाद विरोध प्रदर्शन के लिये जाते रहते थे।

मेरे दादाजी का कलकत्ते (अब का कोलकाता) में अपना व्यवसाय था। दादीजी वहां आर्यसमाज की एक प्रमुख कार्यकर्ता थीं। सरकार विरोधी कार्यक्रमों के कारण उनकी धर-पकड़ होती रहती थी। एक बार अलीपुर जेल में झंड़ोतोलन और वंदन के कारण उन्हें लंबी सजा भी मिली थी जिसके दौरान उनकी आंखों पर पड़े दुष्प्रभाव के कारण उन्हें अपनी नेत्र ज्योति से वंचित होना पड़ा था। इसी परिवार के साथ मेरे पिताजी के चचेरे भाई भी रहा करते थे। जो पिताजी से दो साल बड़े, करीब सोलह साल के थे, दोनों में खूब पटती थी। वह भी दादीजी को माँ ही कह कर पुकारा करते थे। पर दोनों बच्चों को तकरीबन रोज ही दादीजी के उलाहने सुनने को मिलते थे कि सारा देश आजादी की लड़ाई में जुटा हुआ है और तुम्हें अपने खेल-तमाशे से ही फुर्सत नहीं है, नालायक कहीं के। तो एक दिन बड़े भाई ने छोटे को उकसा, बहला, फुसला कर हैदराबाद 'घूमने' के लिये राजी कर माँ को अपना फैसला सुना दिया.....!

अब आगे की सारी बातें मेरे ताऊजी की जुबानी, ....
"मेरी बात सुन माँ बड़ी खुश हुईं, हालांकी बाबा कुछ चिंतित थे, पर फिर उन्होंने हमारी जिद देख अनमने मन से इजाजत दे दी। उस समय का माहौल ही अलग हुआ करता था। हम दोनों को नए कपड़े दिलाए गए और पार्टी के जिम्मेदार कार्यकर्ताओं के हवाले कर दिया गया। हावड़ा स्टेशन से मद्रास मेल में हम नारे लगाते हुए रवाना हो गए । दूसरे दिन विजयवाड़ा उतर खूब तेल वगैरह लगा कृष्णा नदी में नहा-धो कर, ब्रेड आदि खा, आगे चले, पर खम्मम में हम सब को गिरफ्तार कर एक मैदान में बंद कर दिया गया। किसी तरह रात काटी। दूसरे दिन हमें जज के सामने पेश किया गया, जिसने सबको वापस भेजने का हुक्म सुना दिया। पर हम वापस जाने के लिये तो गए नहीं थे, सो विरोध प्रदर्शन करते हुए वहीं सब लेट गए ! नारेबाजी होने लगी ! तमाम कोशिशों के बावजूद हमने हटने और वापस जाने से इंकार कर दिया। जज आग-बबूला हो गया, नाफर्मानदारी की सजा मिली, 6 महिने की कैद--बामुश्कत सजा सुन सारे कार्यकर्ता ऐसे खुश हो गए, जैसे कहीं का राज मिल गया हो। हमें वारांगल जेल भेजा जाना था, जो कुछ दूर थी। हम सब ने पैदल जाने से इंकार कर दिया। फिर वही खींचतान ! पर हार कर उन्हें सवारी का इंतजाम करना ही पड़ा। इसी में सारा दिन निकल गया। किसी तरह शाम को हम भूखे-प्यासे जेल पहुंचे। पर हम बच्चों को भी भूख-प्यास नहीं सता रही थी उल्टे लग रहा था जैसे कोई किला फतह करने निकले हों। वहां पहुंचते ही हमारे कपड़े उतरवा कर जेल की पोशाक पहनने को दी गई। हाजरी लगी। तब जाकर खाने की घंटी बजी।  पर खाना क्या था, बाजरे की मोटी रोटी जिसमें आटे से ज्यादा मिट्टी थी जो चबाते ही नहीं बन पा रही थी और वैसी ही पनीली दाल जो दाल कम नमकीन पानी ज्यादा थी। एक भी कौर निगला नहीं जा सका। जेल में ऐसा खाना मिलता है, यह सुना जरूर था, उस दिन प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिल गया। तब घर की बहुत याद आई थी...!!

शनिवार, 6 जून 2009

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नहीं-नहीं, जैसा आप समझ रहे हैं वैसा कुछ नहीं है।
यह तो पिन-कोड नम्बर है, गुजरात के एक छोटे से कस्बे का।
जिसका नाम है "शारादाग्राम" ।
है न भारत की एक 'मेंटेद फिगार्ड जगह'।

गुरुवार, 4 जून 2009

सिरफिरों की सिरफिरी हरकत यानी खाली दिमाग ब्लडी मारी का घर

अपने देश में सालों से लोग ऐसे ही संदेश पोस्ट कार्डों पर लिख-लिख कर अपने डर तथा अंध विश्वास को दूसरों पर थोप कर राहत महसूस किया करते थे। कौन कहता है की हमारे देश में ही ऐसी बातें पनपती हैं। आज यह पोस्ट मिली, कहीं बाहर से आयी है। मजे के लिए ही लिखी गयी हो सकती है पर मजे-मजे में ही या फिर #### लोग आगे नहीं धकेलेंगे।। आपके विचानार्थ सामने रख रहा हूँ। पढें और मजा लें। हाँ, ई-मेल मत करने लग जाईयेगा।

THIS EMAIL HAS BEEN CURSED ONCE OPENED YOU MUST SEND IT
You are now cursed. You must
send this on or you will be killedtonight at 12:00pm, by Bloody Mary. This is no joke.
So don't think you can quickly get out of it and delete it now because you can't. Bloody Mary will come to you if you do not send this on.
She will slit your throat and your wrists and pull your eyeballs out with fork.
And then hang your dead corpse in your bedroom cupboard or put you under your bed. What's your parents going to do when they find you dead?
Won't be funny then, will it? Don't think this is a fake and it's all put on to scare
you because your wrong, so very wrong.Want to hear of some of the sad, sad people who lost their lives or havebeen seriously hurt by this email?
CASE ONE - Annalise Richmond She got this emial. Rubbish she thought. Shedeleted it. And now, Annalise is dead.
CASE TWO- LouiseWhitefield She sent this to only 4 people and when she wokeup in the morning her wrists had deep lacerations on each. Luckily there was no pain felt, though she is scarred for life.
CASE THREE - Thomas Crowley He sent this to 5 people. Big mistake,The night
Thomas was lying in his bed watching T.V not watching the clock.
'12:01pm'
The TV misteriously flickered off and Thomas's bedroom lamp flashed on and off several times.
It went pitch black, Thomas looked to the left of him and
there she was, Bloody Mary standing in white rags. Blood everywhere with a knife in herhand then dissapeared, That night Thomas will always remember as it was the biggest fright ofhis life.
Warning... NEVER look in a mirror and repeat 'Bloody Mary.Bloody Mary Bloody Mary.... I KILLED YOUR SON' Is it the end for you tonight!
YOU ARE NOW CURSED We strongly advise you to send this email on.
It isseriously NO JOKE. We don't want to see another life wasted.
ITS YOUR CHOICE... WANNA DIE TONIGHT? If you send this email to...NO PEOPLE - Your going to die.
1-5 PEOPLE - Your going to either get hurt or get the biggest fright ofyourlife.
5-15 PEOPLE - You will bring your family bad luck and someone close to youwill die.15 - 25 OR MORE PEOPLE - You are safe from Bloody Mary

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