आओ हमारे देश में तुम्हारा स्वागत है। आप तो जानते ही हैं कि हम और हमारा देश मेहमानों को देवता स्वरूप समझते हैं। हम खायें ना खायें उन्हें भरपेट भोजन उपलब्ध करवाते हैं। खुद गीले-सुखे में जैसे-तैसे गुजारा कर अतिथी को शैया सुख प्रदान करते हैं। हमारी फितरत है कि आप हमें लतियाते, धकियाते, गलियाते रहें पर हम फिर भी आपको सिर पर बैठाये रखते हैं। हमें सिखाया गया है कि कोई एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर दो, कि ले भाई गुस्सा निकाल ले, यह दिल के लिये घातक होता है। पर यदि कहीं आप ज्यादा ही नाराज हो सौ-पचास लोगों का क्रिया करम भी कर देते हैं तो भी हमारे यहां डरने की जरूरत नहीं होती, यहां मानवाधिकारियों की फौज पुरजोर कोशीश करती है कि आप के सलीके से संवारे गये बालों में एक खम भी ना पड़े। जिनकी जान जाती है उनके आत्मियों को भी यह पता है कि यह आपकी करनी नहीं है आप तो सिर्फ माध्यम हो करने वाला तो भगवान है। आत्मा अमर होती है वह चोला बदलती रहती है, इत्यादि-इत्यादि और यह सब हमारी घुट्टी में है। इसलिये बेचारे कुछ दिन रो-गा कर चुप हो जाते हैं। वैसे आप लोग भी कफी समझदार हैं इसीलिए किसी संत्री-मंत्री पर हाथ नहीं डालते क्योंकि वैसे कुछ दिक्कत हो सकती है। आम आदमी की कीमत यहां किसी भुनगे-मकौडे से ज्यादा नहीं है। फिर भी खुदा न खास्ता यदि आप कभी हिरासत में ले भी लिये जाते हैं तो हम वहां भी आपकी खातिर-तवज्जो में कोई कमी नहीं आने देते। आपको बेहतरीन सुविधाओं के साथ-साथ लज़ीज भोजन का स्वाद दिलाया जाता है। आपकी दिनचर्या को खुशगवार बनाने में हम कोई कोर-कसर नहीं छोडते। यहां तक कि नहाने धोने के बाद आपकी पसंद का इत्र-फुलेल भी आपकी खिदमत में प्रस्तुत करने में हिचकिचाते नहीं हैं। आपकी हर फरमाईश को सिर माथे पर रखने के साथ-साथ ही हमारी कोशीश रहती है कि आप सादर और सुरक्षित हमसे विदा लें। फिर वापस आने की तैयारी कर के।
सो आईये, घूमिये-फिरिये, तफरीह करिये, शिकार का शौक फर्माईये और हमारी छती पर मूंग दलिये।
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दुनिया में शायद हमारा ही देश है, जहां खून-खराबा करने वाला भी रोज-रोज अपनी नयी-नयी मांगे मनवाने की जुर्रत कर सकता है। कसाब की हिम्मत देखिए कि जेल में अपनी मांगें ऐसे रख रहा है जैसे उसने हमारे लिए कोई बहादुरी का काम किया हो। बिना किसी शर्म, हया लज्जा के आज वह इत्र मांग रहा है, कल मुजरा देखने की भी फर्माइश कर सकता है। काश कोई तो ऐसा होता कि उसी समय उसके मुंह पर एक झापड़ रसीद करता। किस की शह पर उसमें इतनी हिम्मत आ गयी कि वह अपनी कारस्तानियों के कारण डरने की बजाय हमारे जख्मों पर ही नमक छिड़कने पर तुला हुआ है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 1 मई 2009
बुधवार, 29 अप्रैल 2009
बेनामी टिप्पणियों से टेंशन क्यों लेना
आज हर जगह आक्रोश, अराजकता, द्वेष, असंतोष का बोलबाला है। हर चौथा आदमी किसी न किसी से असहमत लगता है, और अपनी इस असहमती का इजहार बेतुकी हरकतों से कर रहा है। इन सब बातों का असर ब्लाग जगत पर भी साफ दिखाई दे रहा है। जबकी यह एक ऐसा मंच है जहां ब्लागर अपनी सोच को औरों के सामने रखता है। कोई जरूरी नहीं कि सब उससे सहमत हों, पर यदि असहमति है भी तो उसे शालीन शब्दों में जाहिर करना उचित होता है। छिप कर बारूद को तीली दिखा तमाशा देखना कैसी बात है सभी जानते हैं।
यह भी सच है कि कटु वचनों से दिलो-दिमाग तनावग्रस्त हो जाते हैं। ऐसी हरकतें समय-समय पर होती रहती हैं। कौन बच पाया है इनसे, सारे बड़े नामों को इस जद्दोजहद का सामना करना पड़ा है। समीर जी, भटिया जी, शास्त्री जी, द्विवेदी जी, किसको नहीं सहने पड़े ऐसे कटाक्ष। पर इन्होंने सारे प्रसंग को खेल भावना से लिया। ये सब तो स्थापित नाम हैं। मुझ जैसे नवागत को भी शुरु-शुरु में अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा था। वह भी एक "पलट टिप्पणी" के रूप में। एक बेनामी भाई को एक ब्लाग पर की गयी मेरी टिप्पणी नागवार गुजरी और वह घर के सारे बर्तन ले मुझ पर चढ बैठे थे। मन तो खराब हुआ कि लो भाई अच्छी जगह है, न मैं तुम्हें जानता हूं ना ही तुम मुझे तो मैंने तुम्हारी कौन सी बकरी चुरा ली जो पिल पड़े। दो-एक दिन दिमाग परेशान रहा फिर अचानक मन प्रफुल्लित हो गया वह कहावत याद कर के कि "विरोध उसीका होता है जो मशहूर होता है" तब से अपन भी अपनी गिनती खुद ही मशहूरों में करने लग पड़े।
मेरे ख्याल से तो ऐसी हरकतों को तूल ही नहीं देना चाहिये। पढिये, किनारे करिये। उस को लेकर यदि हो-हल्ला मचायेंगे तब तो उस भले/भली का मनसूबा ही पूरा करेंगे। उस ओर से चुप्पी साध लें तो वह अपने आप ही बाज आ जायेगा/जायेगी। रही टिप्पणी माडरेशन की बात, वैसे तो यह पूरी तरह ब्लागर के ऊपर निर्भर करता है, फिर भी इसे उपयोग में न लाना ही बेहतर नहीं है? एक तो इससे लगेगा कि उस अनजान प्राणी से हम भयग्रस्त हो गये। बाहर किसीके डर से कोई घर से निकलना तो बंद नहीं करता। दूसरा स्वस्थ आलोचनायें भी शायद इसकी भेंट चढ जायें। क्योंकि हमारी फितरत है कि हम आलोचना कम ही पसंद करते हैं। जो कि लेखन को सुधारने में मदद ही करती हैं।
इसलिए मेरा निवेदन है , मुम्बई टाईगर जी से कि यार दिल पर मत ले। टेंशन लेने का नहीं, देने का।
यह भी सच है कि कटु वचनों से दिलो-दिमाग तनावग्रस्त हो जाते हैं। ऐसी हरकतें समय-समय पर होती रहती हैं। कौन बच पाया है इनसे, सारे बड़े नामों को इस जद्दोजहद का सामना करना पड़ा है। समीर जी, भटिया जी, शास्त्री जी, द्विवेदी जी, किसको नहीं सहने पड़े ऐसे कटाक्ष। पर इन्होंने सारे प्रसंग को खेल भावना से लिया। ये सब तो स्थापित नाम हैं। मुझ जैसे नवागत को भी शुरु-शुरु में अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा था। वह भी एक "पलट टिप्पणी" के रूप में। एक बेनामी भाई को एक ब्लाग पर की गयी मेरी टिप्पणी नागवार गुजरी और वह घर के सारे बर्तन ले मुझ पर चढ बैठे थे। मन तो खराब हुआ कि लो भाई अच्छी जगह है, न मैं तुम्हें जानता हूं ना ही तुम मुझे तो मैंने तुम्हारी कौन सी बकरी चुरा ली जो पिल पड़े। दो-एक दिन दिमाग परेशान रहा फिर अचानक मन प्रफुल्लित हो गया वह कहावत याद कर के कि "विरोध उसीका होता है जो मशहूर होता है" तब से अपन भी अपनी गिनती खुद ही मशहूरों में करने लग पड़े।
मेरे ख्याल से तो ऐसी हरकतों को तूल ही नहीं देना चाहिये। पढिये, किनारे करिये। उस को लेकर यदि हो-हल्ला मचायेंगे तब तो उस भले/भली का मनसूबा ही पूरा करेंगे। उस ओर से चुप्पी साध लें तो वह अपने आप ही बाज आ जायेगा/जायेगी। रही टिप्पणी माडरेशन की बात, वैसे तो यह पूरी तरह ब्लागर के ऊपर निर्भर करता है, फिर भी इसे उपयोग में न लाना ही बेहतर नहीं है? एक तो इससे लगेगा कि उस अनजान प्राणी से हम भयग्रस्त हो गये। बाहर किसीके डर से कोई घर से निकलना तो बंद नहीं करता। दूसरा स्वस्थ आलोचनायें भी शायद इसकी भेंट चढ जायें। क्योंकि हमारी फितरत है कि हम आलोचना कम ही पसंद करते हैं। जो कि लेखन को सुधारने में मदद ही करती हैं।
इसलिए मेरा निवेदन है , मुम्बई टाईगर जी से कि यार दिल पर मत ले। टेंशन लेने का नहीं, देने का।
रविवार, 26 अप्रैल 2009
ताजमहल का नामोनिशान मिट गया होता अगर......
अंग्रेजों ने अपने शासन काल में मनमानी लूट-खसोट की। हमारी बहुमूल्य धरोहरों को अपने देश भेज दिया। हजारों छोटे-मोटे गोरों ने अपने घरों को सजा, सवांर, समृद्ध बना लिया, हमारे बल-बूते पर। पर उनमें कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने अपनी कर्तव्य परायणता के आड़े किसी भी चीज को नहीं आने दिया। ऐसा ही एक नाम है लार्ड कर्जन का। अगर वे नहीं होते तो शायद हमारे गौरवशाली अतीत का बखान करने वाले कयी स्मारक भी शायद न होते। बात कुछ अजीब सी है पर सही है।
समय था 1831 का, दिल्ली और आगरा पर ब्रिटिश फौज ने कब्जा जमा लिया था और शासन था, लार्ड विलियम बैंटिक का। इन शहरों की खूबसूरत इमारतें बैंटिक की आंख की किरकिरी बनी हुई थीं। खासकर ताजमहल। एक योजना के अंतर्गत यह तय किया गया कि दिल्ली के लाल किले और आगरे के ताजमहल को या तो गिरा दिया जाए या बेच दिया जाए। इस आशय की एक खबर बंगाल के एक अखबार 'जान बुल' में 26 जुलाई 1831 के अंक में छपी भी थी। इसमें बताया गया था कि ताज को सरकार की बेचने की मंशा है पर यदि सही कीमत नहीं मिलती तो इसे गिराया भी जा सकता है। इसके पहले आगरा के लाल किले में स्थित संगमरमर के बने नहाने के हौदों को बैंटिक ने निलाम करवाया था, पर उनको तोड़ने में जो खर्च आया था वह उसके मलबे से प्राप्त रकम से काफी ज्यादा था। यह भी एक कारण था ताज के टूटने में होने वाले विलंब का और शासन की झिझक का। इधर अवाम को भी इस सब की खबर लग चुकी थी जिसमें अंग्रेजों की इस तोड़-फोड़ की नीतियों से आक्रोश उभर रहा था। बैंटिक के अधिकारों पर भी सवाल उठने लग गये थे। ब्रिटिश हुकुमत भी सिर्फ ताज के संगमरमर के कारण उसे गिराने के कारण फैलने वाले असंतोष को लेकर सशंकित थी। इसलिए इस घाटे के सौदे से उसने अपना ध्यान धीरे-धीरे हटा लिया। और फिर लार्ड कर्जन के आने के बाद तो सारा परिदृश्य ही बदल गया। कर्जन एक कर्तव्यनिष्ठ शासक था। जनता के मनोभावों को समझते हुए उसने यहां की सभी गौरवशाली इमारतों के संरक्षण तथा रखरखाव का वादा किया और निभाया। उसके शासन काल में इन प्राचीन इमारतों तथा स्मारकों को संरक्षण तो मिला ही उनका उचित रख-रखाव और देख-रेख भी की जाती रही।
इन सब बातों का खुलासा 7 फरवरी 1900 को एशियाटिक सोसायटी आफ बेंगाल की सभा में खुद लार्ड कर्जन ने किया था।
समय था 1831 का, दिल्ली और आगरा पर ब्रिटिश फौज ने कब्जा जमा लिया था और शासन था, लार्ड विलियम बैंटिक का। इन शहरों की खूबसूरत इमारतें बैंटिक की आंख की किरकिरी बनी हुई थीं। खासकर ताजमहल। एक योजना के अंतर्गत यह तय किया गया कि दिल्ली के लाल किले और आगरे के ताजमहल को या तो गिरा दिया जाए या बेच दिया जाए। इस आशय की एक खबर बंगाल के एक अखबार 'जान बुल' में 26 जुलाई 1831 के अंक में छपी भी थी। इसमें बताया गया था कि ताज को सरकार की बेचने की मंशा है पर यदि सही कीमत नहीं मिलती तो इसे गिराया भी जा सकता है। इसके पहले आगरा के लाल किले में स्थित संगमरमर के बने नहाने के हौदों को बैंटिक ने निलाम करवाया था, पर उनको तोड़ने में जो खर्च आया था वह उसके मलबे से प्राप्त रकम से काफी ज्यादा था। यह भी एक कारण था ताज के टूटने में होने वाले विलंब का और शासन की झिझक का। इधर अवाम को भी इस सब की खबर लग चुकी थी जिसमें अंग्रेजों की इस तोड़-फोड़ की नीतियों से आक्रोश उभर रहा था। बैंटिक के अधिकारों पर भी सवाल उठने लग गये थे। ब्रिटिश हुकुमत भी सिर्फ ताज के संगमरमर के कारण उसे गिराने के कारण फैलने वाले असंतोष को लेकर सशंकित थी। इसलिए इस घाटे के सौदे से उसने अपना ध्यान धीरे-धीरे हटा लिया। और फिर लार्ड कर्जन के आने के बाद तो सारा परिदृश्य ही बदल गया। कर्जन एक कर्तव्यनिष्ठ शासक था। जनता के मनोभावों को समझते हुए उसने यहां की सभी गौरवशाली इमारतों के संरक्षण तथा रखरखाव का वादा किया और निभाया। उसके शासन काल में इन प्राचीन इमारतों तथा स्मारकों को संरक्षण तो मिला ही उनका उचित रख-रखाव और देख-रेख भी की जाती रही।
इन सब बातों का खुलासा 7 फरवरी 1900 को एशियाटिक सोसायटी आफ बेंगाल की सभा में खुद लार्ड कर्जन ने किया था।
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी।
फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने की नाकाम कोशिश करते नज़र आने लगे हैं। अब यह जनता की दबी भड़ास का नतीजा हैं या प्रायोजित कार्यक्रम, यह खोज का विषय है। पर वर्षों पहले भी एक चप्पल चली थी, वह भी एक ऐसे इंसान के हाथों जो अपने समय के प्रबुद्ध और विद्वान पुरुष थे।
बात ब्रिटिश हुकुमत की है। बंगाल में नील की खेती करनेवाले अंग्रेजों जिन्हें, नील साहब या निलहे साहब भी कहा जाता था, के अत्याचार , जोर-जुल्म की हद पार कर गये थे। लोगों का जीवन नर्क बन गया था। इसी जुल्म के खिलाफ कहीं-कहीं आवाजें भी उठने लगी थीं। ऐसी ही एक आवाज को बुलंदी की ओर ले जाने की कोशीश में थे कलकत्ते के रंगमंच से जुड़े कुछ युवा। ये अपने नाटकों के द्वारा इन अंग्रेजों की बर्बरता का मंचन लोगों के बीच कर विरोध प्रदर्शित करते रहते थे । ऐसे ही एक मंचन के दौरान इन युवकों ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी को भी आमंत्रित किया। उनकी उपस्थिति में युवकों ने इतना सजीव अभिनय किया कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गये। खासकर निलहे साहब की भूमिका निभाने वाले युवक ने तो अपने चरित्र में प्राण डाल दिये थे। अभिनय इतना सजीव था कि विद्यासागर जी भी अपने पर काबू नहीं रख सके और उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाल कर उस अभिनेता पर दे मारी। सारा सदन भौचक्का रह गया। उस अभिनेता ने विद्यासागर जी के पांव पकड़ लिए और कहा कि मेरा जीवन धन्य हो गया। इस पुरस्कार ने मेरे अभिनय को सार्थक कर दिया। आपके इस प्रहार ने निलहों के साथ-साथ हमारी गुलामी पर भी प्रहार किया है। विद्यासागर जी ने उठ कर युवक को गले से लगा लिया। सारे सदन की आंखें अश्रुपूरित थीं।
बात ब्रिटिश हुकुमत की है। बंगाल में नील की खेती करनेवाले अंग्रेजों जिन्हें, नील साहब या निलहे साहब भी कहा जाता था, के अत्याचार , जोर-जुल्म की हद पार कर गये थे। लोगों का जीवन नर्क बन गया था। इसी जुल्म के खिलाफ कहीं-कहीं आवाजें भी उठने लगी थीं। ऐसी ही एक आवाज को बुलंदी की ओर ले जाने की कोशीश में थे कलकत्ते के रंगमंच से जुड़े कुछ युवा। ये अपने नाटकों के द्वारा इन अंग्रेजों की बर्बरता का मंचन लोगों के बीच कर विरोध प्रदर्शित करते रहते थे । ऐसे ही एक मंचन के दौरान इन युवकों ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी को भी आमंत्रित किया। उनकी उपस्थिति में युवकों ने इतना सजीव अभिनय किया कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गये। खासकर निलहे साहब की भूमिका निभाने वाले युवक ने तो अपने चरित्र में प्राण डाल दिये थे। अभिनय इतना सजीव था कि विद्यासागर जी भी अपने पर काबू नहीं रख सके और उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाल कर उस अभिनेता पर दे मारी। सारा सदन भौचक्का रह गया। उस अभिनेता ने विद्यासागर जी के पांव पकड़ लिए और कहा कि मेरा जीवन धन्य हो गया। इस पुरस्कार ने मेरे अभिनय को सार्थक कर दिया। आपके इस प्रहार ने निलहों के साथ-साथ हमारी गुलामी पर भी प्रहार किया है। विद्यासागर जी ने उठ कर युवक को गले से लगा लिया। सारे सदन की आंखें अश्रुपूरित थीं।
रविवार, 19 अप्रैल 2009
क्या पांडव स्त्री दुर्बलता के शिकार थे ?
यदि निष्पक्षता से देखा जाय, पुस्तकों में वर्णित सिर्फ उनकी अच्छाईयों को ही ना देखा जाए तो उत्तर 'हां' में आता है। शुरु करते हैं द्रोपदी स्वयंवर से। अर्जुन ने अपने कौशल से द्रोपदी को वरा था। पर जब पांडव उसे लेकर कुंती के पास आए तो युधिष्ठिर, जिन्हें धर्म का अवतार कहा जाता है, जिनके बारे में प्रचलित है कि वह कभी झूठ नहीं बोलते थे, तो उन्होंने भले ही मां को चकित करने के लिए ही कहा हो, पर यह क्यों कहा कि हम भिक्षा लाए हैं। जिसे सुन कुंती ने बिना देखे ही अंदर से कह दिया कि आपस में बांट लो। पर जब कुंती को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उसने कहा कि यह तो राजकन्या है और राजकन्याएं बंटा नहीं करतीं। यह सुन कर युधिष्ठिर ने मां की बात काटी कि हे माते तुम्हारे कहे वचन झूठ नहीं हो सकते तुम्हारी आज्ञा हमारा धर्म है। कोई ना कोई रास्ता निकालना पड़ेगा। बाकि भाई भी चुप रहे। क्या द्रोपदी के अप्रतिम सौंदर्य से सारे भाईयों के मन विचलित हो दुर्बल नहीं हो गये थे? क्या सभी भाई उसे पाना नहीं चाहते थे? जो अवसर अर्जुन ने उन्हें अनायास उपलब्ध करवा दिया था, उसे खोना क्या उनके लिए संभव था? जबकि मां की दूसरी बात भी उनके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए थी। उस समय किसी ने द्रोपदी के मन की हालत क्यूं नहीं जाननी चाही, जब कि स्वयंवर कन्या कि इच्छा पर आधारित होता था। उससे किसी ने पूछा, कि अपने से छोटे देवरों को वह कैसे पति मानेगी? परिवार की रक्षा करने वाले भीम को अपना भक्षक कैसे बनने देगी? उसकी देह को तो यंत्र बना दिया गया पर उसका मन ?
ठीक है सबने माँ की आज्ञा शिरोधार्य की पर इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिये थी कि उसे सिर्फ कहने भर को पत्नि मानते। मां ने यह तो नहीं कहा था कि उससे संतान प्राप्त करो। पर द्रोपदी से हरेक भाई ने पुत्र प्राप्त किया। जबकि ग्रन्थों में छोटे भाई की पत्नि को बेटी तथा बड़े भाई की पत्नि को मां का स्थान प्राप्त है। जाहिर है कि द्रोपदी के अप्सरा जैसे सौंदर्य ने पांडवों की नैतिकता को भुला दिया था। अब इस बंटवारे की गुत्थी को सुलझाने के लिए नारद मुनि की सहायता ली गयी। उनके कथनानुसार द्रोपदी का एक-एक भाई के पास एक साल तक रहना निश्चित किया गया जैसे वह इंसान ना हो कोई जींस हो। उस दौरान यदि कोई और भाई उसके कक्ष में आ जाता है तो उसे बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वनगमन करना होगा। इस नियम का परिस्थितिवश शिकार बना अर्जुन। पर अपने वनवास के दौरान इस नियम का पालन नहीं कर सका।
तीर्थाटन के दौरान हरिद्वार में नाग कन्या ऊलूपी उस पर आसक्त हो गयी, अर्जुन ने अपने नियम की मजबूरी बताई पर ऊलूपी के तर्कों से पराजित हो उसने उससे विवाह कर लिया। दो वर्षों तक नागलोक में रह कर पतित्व का निर्वाह करते हुए उसने ऊलूपी को मातृत्व का सुख प्रदान किया। उसके पश्चात घूमते-घूमते वह मणीपुर पहुंचा। वहां के राजा चित्रवाहन की कन्या, चित्रांगदा, गुणी और अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी थी। उसे देख अर्जुन का मन बेकाबू हो गया। उसने अपना परिचय दे चित्रवाहन से उसकी कन्या का हाथ मांगा। राजा ने उसकी बात मान ली पर एक शर्त रखी कि उनसे होने वाले पुत्र को उसे गोद दे दिया जाएगा। अर्जुन को इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी। उसने शर्त स्वीकार कर चित्रांगदा से विवाह कर लिया। यहां वह तीन साल तक रहा। फिर उसे नियम की याद आई और उसने मणीपुर छोड़ आगे की यात्रा शुरु की। चलते-चलते वह अपने सखा के यहां द्वारका जा पहुंचा। और इस बार उसकी दृष्टि का शिकार बनी अपने ही सखा की बहन सुभद्रा। पर यहां एक समस्या भी थी। श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम, सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे, जो राजनीतिक रूप से भी पांडवों के अनुकूल नहीं था। कृष्ण पांडवों के हितैषी थे उन्हीं की सलाह पर अर्जुन ने सुभद्रा का अपहरण कर लिया।
इस तरह क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अर्जुन ने वनगमन जरूर किया था, पर शर्तों के अनुसार ना वह ब्रह्मचर्य का पालन कर सका ना एक पत्निनिष्ठ रह सका। स्त्री-दुर्बलता के कारण उसन विवाहेतर संबंध बनाए। उसकी कमजोरी को ढकने के लिये कहा जा सकता है कि समय के साथ वह संबंध राजनीतिक शक्ति ही साबित हुए पर जिसको भगवान का वरदहस्त प्राप्त था, साक्षात प्रभू जिसके हितैषी थे, उसको ऐसे संबंधों की क्या जरूरत थी ?
ठीक है सबने माँ की आज्ञा शिरोधार्य की पर इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिये थी कि उसे सिर्फ कहने भर को पत्नि मानते। मां ने यह तो नहीं कहा था कि उससे संतान प्राप्त करो। पर द्रोपदी से हरेक भाई ने पुत्र प्राप्त किया। जबकि ग्रन्थों में छोटे भाई की पत्नि को बेटी तथा बड़े भाई की पत्नि को मां का स्थान प्राप्त है। जाहिर है कि द्रोपदी के अप्सरा जैसे सौंदर्य ने पांडवों की नैतिकता को भुला दिया था। अब इस बंटवारे की गुत्थी को सुलझाने के लिए नारद मुनि की सहायता ली गयी। उनके कथनानुसार द्रोपदी का एक-एक भाई के पास एक साल तक रहना निश्चित किया गया जैसे वह इंसान ना हो कोई जींस हो। उस दौरान यदि कोई और भाई उसके कक्ष में आ जाता है तो उसे बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वनगमन करना होगा। इस नियम का परिस्थितिवश शिकार बना अर्जुन। पर अपने वनवास के दौरान इस नियम का पालन नहीं कर सका।
तीर्थाटन के दौरान हरिद्वार में नाग कन्या ऊलूपी उस पर आसक्त हो गयी, अर्जुन ने अपने नियम की मजबूरी बताई पर ऊलूपी के तर्कों से पराजित हो उसने उससे विवाह कर लिया। दो वर्षों तक नागलोक में रह कर पतित्व का निर्वाह करते हुए उसने ऊलूपी को मातृत्व का सुख प्रदान किया। उसके पश्चात घूमते-घूमते वह मणीपुर पहुंचा। वहां के राजा चित्रवाहन की कन्या, चित्रांगदा, गुणी और अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी थी। उसे देख अर्जुन का मन बेकाबू हो गया। उसने अपना परिचय दे चित्रवाहन से उसकी कन्या का हाथ मांगा। राजा ने उसकी बात मान ली पर एक शर्त रखी कि उनसे होने वाले पुत्र को उसे गोद दे दिया जाएगा। अर्जुन को इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी। उसने शर्त स्वीकार कर चित्रांगदा से विवाह कर लिया। यहां वह तीन साल तक रहा। फिर उसे नियम की याद आई और उसने मणीपुर छोड़ आगे की यात्रा शुरु की। चलते-चलते वह अपने सखा के यहां द्वारका जा पहुंचा। और इस बार उसकी दृष्टि का शिकार बनी अपने ही सखा की बहन सुभद्रा। पर यहां एक समस्या भी थी। श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम, सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे, जो राजनीतिक रूप से भी पांडवों के अनुकूल नहीं था। कृष्ण पांडवों के हितैषी थे उन्हीं की सलाह पर अर्जुन ने सुभद्रा का अपहरण कर लिया।
इस तरह क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए अर्जुन ने वनगमन जरूर किया था, पर शर्तों के अनुसार ना वह ब्रह्मचर्य का पालन कर सका ना एक पत्निनिष्ठ रह सका। स्त्री-दुर्बलता के कारण उसन विवाहेतर संबंध बनाए। उसकी कमजोरी को ढकने के लिये कहा जा सकता है कि समय के साथ वह संबंध राजनीतिक शक्ति ही साबित हुए पर जिसको भगवान का वरदहस्त प्राप्त था, साक्षात प्रभू जिसके हितैषी थे, उसको ऐसे संबंधों की क्या जरूरत थी ?
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
कैसी रही
पाकिस्तान में अनाज की भारी कमी हो जाने से सरकार ने फरमान निकाला कि अनाज की बर्बादी रोकी जाए। जिनके पास जानवर हैं वे भी उन्हें खिलाने में एहतियात बरतें। नियम का पालन करवाने के लिए सैनिकों की टुकड़ियां घूम-घूम कर जायजा लेने लग गयीं। ऐसे में सैनिकों का दस्ता एक गांव से गुजरा, उन्होंने देखा कि एक आदमी अपने घोड़े को चने खिला रहा है। सैनिक अदालत ने उस पर भारी जुर्माना कर दिया। कुछ दिनों बाद फिर सैनिक उधर से गुजरे उन्होंने फिर गांव वाले को अपने घोड़े को कुछ खिलाते देख पूछा, अब क्या खिला रहे हो? घोड़े वाले ने कहा घास। उस पर फिर जुर्माना ठोक दिया गया। कुछ दिनों बाद फिर सैनिकों ने उसी गांव का मुआयना किया और उस गांव वाले से पूछा आजकल घोड़े को क्या खिलाते हो? गांव वाला बोला हुजूर अब तो घोड़े को मैं पैसे दे देता हूं। उसकी जो इच्छा होती है बाजार जा खुद ही खा आता है।
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
लिंकन ने गीता तो नहीं पढी होगी, पर
अब्राहम लिंकन ने गीता तो नहीं पढी होगी पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा, अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।
अब्राहम लिंकन 28-30 सालों तक लगातार असफल होते रहे, जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला, दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में। उनकी असफलताओं पर नज़र डालें तो हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा। 20-22 साल की आयु में घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता हाथ आयी। 26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया, पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा। 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा। 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी। 46 वर्षीय लिंकन ने हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी। अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा। अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर खड़ी मुस्काती रही। पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती। दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते थे। वहां भी उनकी आलोचना होती थी। पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है। तो यह तो लिंकन थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके, पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है? शायद हां। इसी 'हां' को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस 'हां' से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।
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