pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

पंचकेदार, जिनका स्मरण ही काफी है.

हिमालय की विस्तार स्थली का केन्द्र है "गढवाल मंड़ल"। भारतवर्ष का पवित्रतम स्थान। पुराणों के अनुसार एक बार शिव जी घूमते-घूमते यहां पहुंचे और यहां की सुंदरता से प्रभावित हो कर यहीं के हो कर रह गये। उन्हीं के नाम से यहां का नाम "केदार खंड" या "केदारभूमी" कहलाया।
शिवपुराण के अनुसार वर्षों बाद महाभारत युद्ध के बाद स्वजनों की हत्या के पाप से मुक्त हो मोक्ष की प्राप्ति के लिये पांडव शिव जी को खोजते-खोजते यहां भी पहुंच गये। उनसे बचने के लिए शिव जी महिष का रूप धर भूमि में समाने लगे। परन्तु महाबली भीम ने उन्हें देख कर पहचान लिया और महिष रूपी शिव की पूंछ पकड़ ली तथा सभी पांडवों ने उनकी पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। शिव जी ने पांडवों को उनके पापों से मुक्त कर दिया। उसी समय से शिव जी का पिछला भाग केदारनाथ में केदारलिंग के रूप में पूजित है।
महिषरूपी शिव जी के अन्य भाग कालांतर में गढवाल में ही रुद्रनाथ, तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर तथा कल्पेश्वर में प्रगट हुए और यह पांचों स्थान पंचकेदार के नाम से प्रसिद्ध हुए।
पंचकेदार के दर्शन अपने आप में सैंकडों तीर्थों की यात्रा का पुण्य प्रदान करते हैं।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

देवताओं ने किसी को भी नहीं बक्शा

भक्त प्रह्लाद। भगवान का परम भक्त । भक्ति भी ऐसी कि उसके पिता को अपनी जान गंवानी पड़ी। उसी का बेटा विरोचन और विरोचन का बेटा बलि। बलि यानि प्रह्लाद का पोता। उसके जैसा दानी, पराक्रमी, प्रजा पालक शयाद ना हुआ ना होगा। तीनों लोकों का विजेता। देवता फिर संशकित अपने प्रभुत्व को बचाने के लिये विष्णु जी की शरण में गये। भगवान ने वामन रूप धरा और दो पगों में धरती-आकाश नाप लिये तीसरे पग के लिये बलि ने अपनी पीठ नपवा दी। फिर एक बार छल की जीत हुई। बलि को पाताल भेज दिया गया और स्वर्ग फिर देवताओं को मिल गया।
यह नहीं देखा गया कि प्रह्लाद का क्या योगदान था या बलि का कसूर ही क्या था

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

सांदीपनी आश्रम, जहां श्री कृष्ण और सुदामा ने शिक्षा ग्रहण की

समयाभाव के कारण उज्जैन प्रवास के दौरान सांदीपनी आश्रम की जानकारी विस्तार से नहीं ले पाया था। फिर भी इसके बारे में कुछ खास बातें सामने रख रहा हूं। यह वही पावन जगह है जहां श्री कृष्ण जी ने अपने बड़े भाई बलराम जी और अपने मित्र सुदामा के साथ अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी। यह उज्जैन शहर से करीब तीन की.मी. की दूरी पर मंगलनाथ मंदिर के पहले स्थित है। आज भी शहरी कोलाहल से दूर हरे-भरे खेतों के बीच स्थित यह आश्रम मन को बहुत सकून पहुंचाता है।

आश्रम के अंदर बहुत सारे प्राचीन दर्शनीय स्थल हैं। जैसे गुरु की पूजा स्थली, श्री कृष्ण-सुदामा विद्यास्थान, सर्वेश्वर महादेव मंदिर, वल्लभ निकुंज, कुण्ड़लेश्वर महादेव मंदिर, गोमती कुंड इत्यादि। श्री कृष्ण विद्या स्थली में श्री कृष्ण, बलराम जी और सुदामा जी की मुर्तियां इतनी सुंदर हैं कि उन्हें सिर्फ देख कर ही महसूस किया जा सकता है। एकदम जिवंत लगती हैं, जैसे अभी बोल उठेंगी। वहीं पास में गुरु पातंजली की भव्य प्रतिमा स्थापित है। पर सबसे दर्शनीय है कुण्डलेश्वर महादेव जी का प्राचीन मंदिर। यहां मैने दो बातें सबसे अनोखी और जीवन में पहली बार देखीं। एक तो स्वयंभू शिव लिंग पर लिपटे सर्प की प्राकृतिक आकृति जो लिंग के साथ ही बनी हुई है, अलग से नहीं लगाई गयी है। दूसरे द्वार पर स्थित नंदी महाराज की प्रतिमा जो खड़ी अवस्था में है। मैंने सभी शिवालयों में नंदी को बैठे हुए ही पाया था, यहां पहली बार उन्हें खडे हुए देखा। आश्रम के पिछवाड़े एक गहरी बावड़ी है फिलहाल उसमें भी जल की मात्रा बहुत कम दिखी।

मेरा जाना 26 जनवरी को हो पाया था। उस दिन सूर्य ग्रहण और मौनी अमावस्या होने के कारण सब जगह बड़ी भीड़ थी सो पूरी जानकारी हासिल करने में सफल नहीं हो पाया था, इसका अफसोस रहेगा। पर एक बार फिर जा कर इतिहास खगांलने का पक्का इरादा है।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

अपने देश को देखने के लिए भी कहीं-कहीं सरकारी अनुमती चाहिए.

जी हां, यदि आप पूरा भारत देखने निकले हैं तो कम से कम सात जगहों के लिये आप को सरकारी इजाजत लेने की जरूरत पड़ेगी।
1, लक्षद्वीप :- करीब 32 कि.मी. के इस केंद्र शासित प्रदेश में 36 द्वीपों का समूह समाया हुआ है। जिनमें सिर्फ 10 पर लोग रहते हैं। बाकी जगह पीने के पानी का अभाव है। इसकी राजधानी कावारति है। यहां के सूर्य तथा चंद्रोदय के दृश्य बहुत मनोहारी होते हैं। यहं जाने के लिये परमिट कोच्ची में लक्षद्वीप के प्रशासक के दफ्तर से लिया जा सकता है।
2, अरुणाचल प्रदेश :- भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित यह एक स्वर्गिक स्थान है। भारत की मुख्य भूमी पर सूर्य की किरणें सर्वप्रथम यहीं की धरती को चूमती हैं। इसकी राजधानी ईटानगर है। यह रेलमार्ग से तो नहीं पर वायू तथा सड़क मार्ग से शेष भारत से जुड़ा हुआ है। यहां जाने के लिये इनर लाईन परमिट लेना पड़ता है।
3, सिक्किम :- यहां की राजधानी गैगंटाक है। यहीं से घूमने के लिये पुलिस की अनुमति लेनी पड़ती है। यहां कैमरा ले जाना भी मना है।
4, मिजोरम :- इस जनजातीय प्रदेश में लुसाई भाषा बोली जाती है। जिसमें मिजोरम का अर्थ होता है ऊंची भूमी या देश में रहने वाले मनुष्य। इसकी राजधानी आईजोल है। यहां भी बस या विमान द्वारा ही जाया जा सकता है।
5, नागालैंड :- इसकी राजधानी कोहिमा है। यहां जाने के लिये इनर लाईन परमिट लेना पड़ता है। यह महाभारत में वर्णित अर्जुन की पत्नी उलूपी का देश है।
6, खुर्दग ला :- अठारह हजार सात सौ फुट की उंचाई पर स्थित यह जगह चीन की सीमा से लगी हुई है। यह लेह से करीब 46 कि.मी. दूर है। यहीं से यहां का परमिट मिलता है। पर विदेशियों का प्रवेश प्रतिबंधित है। यह अत्यंत दुर्गम स्थान है। यहां संसार की सबसे ऊंची सड़क तथा सबसे ऊंचा पुल है।
7, अंडमान निकोबार द्वीपसमूह :- बंगाल की खाड़ी में स्थित यह जगह अंग्रेजों के जमाने में काला पानी के नाम से जानी जाती थी। अंडमान जाने के लिये भारतियों को इजाजत नहीं लेनी पड़ती पर निकोबार के लिये वहां किसी रिश्तेदार या नौकरी का प्रमाण पत्र देना पड़ता है। ऐसा वहां की जनजातियों और सैनिक सुरक्षा के कारण किया जाता है। भारत में सबसे पहले सूर्योदय मुख्य भूमी के अरुणाचल से भी पहले यहां के काचाल द्वीप में होता है।
इन जगहों पर प्रतिबंध इस लिये है क्यों कि यह सारे क्षेत्र सीमावर्ती हैं और फिर जनजातियों के निवास स्थान हैं, जिनकी पहचान को बचाये रखना भी बहुत जरूरी है। इसके अलावा ज्यादा आवाजाही से प्रकृति से छेड़खानी का खतरा भी बढ जाता है।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

क्या आपने ऐसे विज्ञापन देखे हैं?

कभी-कभी कुछ ऐसा देखने को मिल जाता है टी.वी. पर दिखाये जाने वाले विज्ञापनों में कि समझ नहीं आता कि हम बावले हैं या सामने वाला। दो-तीन नमूने पेश हैं -

1, एक जाने-माने शैंपू का विज्ञापन :- एक मां अपनी बच्ची को क्रिकेट सिखाने के लिये कोच के पास लेकर जाती है। बजाय इसके कि कोच साहब उसके खेल के बारे में पूछ-ताछ करें, उन्हें बालिका के बालों की चिंता होती है। कहते हैं इसके बाल खराब हो जायेंगे। मां जवाब देती है, आप तो इसके खेल पर ध्यान दें बालों की फिक्र मैं कर लूंगी।

2, एक कपड़े धोने के साबुन का विज्ञापन :- क्रिकेट खेलते बच्चों की बाल से एक महोदय की खिड़की का शीशा टूट जाता है। गुस्से में महोदय दंड़ देने लगते हैं तो बाल लेने आया लड़का गलती की माफी मांगने के बदले ढिठता से कहता है कि दूसरी बाल भी इधर ही आयेगी। जिनका शीशा टूटा था इस पर खुश हो उसकी उजली कमीज का कालर ठीक कर उसे शाबाशी दे विदा करते हैं और लड़का अकड़ता हुआ चल देता है।

3, एक कंस्ट्रक्श्न कंपनी का विज्ञापन :- एक बच्चा एक बच्ची को एक डैम के पास लाता है और बच्ची से कहता है इसे मैने बनाया। बच्ची आश्चर्य से पूछती है, इतना बड़ा !!
बच्चा डैम से पानी छोड़ने के समय को जानते हुए बच्ची को धोखे में रख कहता है कि यह मेरी बात सुनता है। उसी समय डैम से पानी आना शुरु हो जाता है। बच्ची अवाक रह जाती है और पीछे से आवाज आती है कि ऐसी बड़ी-बड़ी बातें हम आसानी से कर जाते हैं (या इन्हीं शब्दों के मिलते-जुलते अर्थ का वाक्य)
इसका अर्थ यह भी निकलता है कि हम ऐसे ही लोगों को बेवकूफ बनाते रहते हैं।

ऐसे विज्ञापनों को देख समझ नहीं आता कि हसें या रोयें।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

संता का दृष्टिकोण

बात कुछ पुरानी है पर इतनी भी नहीं कि हम सब भूल चुके हों। कहानी एक गांव की है। उस गांव में एक अनाथ लड़का रहता था। वह बड़ा ही हुड़दंगी था। दिन भर अवारागर्दी करना लोगों को तंग करना ही उसका शगल था। उसके कारण सारे गांव के नाक में दम रहता था। एक बार बड़े-बुढों ने उसे समझा बुझा कर गांव के दुधारु पशुओं को चराने का काम सौंप दिया। अब वह दिन भर ढोरों के साथ जंगल में घुमता रहता। इससे गांव वालों को भी राहत मिली और उसे भी खाने पीने का आराम हो गया। पर कहते हैं ना कि बंदर कैसा भी हो गुलाटी मारना नहीं भूलता, सो एक दिन ऐसे ही उस लड़के के दिमाग में फिर गांव वालों को तंग करने की सूझी। बस फिर क्या था, वह एक पेड़ पर चढ गया और लगा जोर-जोर से चिल्लाने कि शेर आया, शेर आया। उसकी आवाज सुन पास के खेतों में काम करते लोग लाठी बल्लम ले दौड़े आए। उन्हें देख लड़का ढीठाई से हंसने लगा। गांव वाले उसे गरियाते हुए वापस चले गये। लड़के को एक नया खेल मिल गया। तीन चार दिन बाद उसने फिर वैसी ही गुहार फिर लगाई। भोले-भाले गांव वाले कुछ अनिष्ट ना हो जाए यह सोच फिर उसकी सहायता को चले आए पर फिर उन्हें बेवकूफ बनना पड़ा। एक दो बार फिर ऐसा ही हुआ और गांव वासियों को बेवकूफ बना वह लड़का मजा लेता रहा। एक दिन सचमुच राह भटक कर एक शेर उधर आ निकला। शेर को सामने देख लड़के के देवता कूच कर गये। किसी तरह दौड़ कर पेड़ पर चढ कर उसने अपनी जान बचा ली। वहां से उसने पचासों आवाजें लगाईं पर गांव वाले इसे उसकी शरारत समझ उस ओर नहीं आए और शेर एक बछड़े को उठा जंगल में गुम हो गया।
यह कहानी मैने संता को सुनाई और पूछा कि संते इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है। संता ने झट से जवाब दिया,सर जी, झूठे का सब विश्वास करते हैं सच को कोई घास नहीं ड़ालता।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

मंगलनाथ, जहाँ मंगल ग्रह का जन्म हुआ था.

स्कन्द पुराण के अनुसार किसी जमाने में अवंतिका पुरी ( उज्जैन ) पर अंधक नामक दैत्य राज किया करता था। उसने घोर तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया था कि अगर मेरे रक्त की बूदें जमीन पर गिरें तो उससे अनेकों दैत्य उत्पन् हो जायें। इस वरदान के मिलने पर अधंकासुर ने चारों ओर आतंक मचाना शुरु कर दिया। सब तरफ त्राही-त्राही मच गयी। तब सभी लोग त्रस्त हो कर भगवान शिव की शरण में गये और उनसे इस विपत्ती से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना करने लगे। प्रभू ने सबको सांत्वना देते हुए अधंकासुर को ललकारा। घमासान युद्ध के पश्चात अधंकासुर का नाश हुआ। युद्ध के दौरान भगवान शिव के मस्तक से पसीने की बुंद धरती पर गिरी जिसके संयोग से पृथ्वी के गर्भ से मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई उसी समय उसी स्थान पर ब्रह्मा जी द्वारा उन्हें शिव पिण्ड़ के रूप में स्थापित कर दिया गया। देवताओं और ब्राह्मणों द्वारा पूजित यह स्थान वर्तमान में मंगलनाथ के नाम से सारे भारत में प्रसिद्ध है। उज्जैन शहर से चार-पांच की.मी. की दूरी पर क्षिप्रा नदी के किनारे हरे-भरे स्थान पर स्थित यह मंदिर अद्भुत शांति और सकून प्रदान करता है।

भानू परिवार का यहां हर मंगलवार को जाना होता है। सो उसी के सौजन्य से हमें भी इस अनोखी जगह के दर्शनों का लाभ प्राप्त हो गया। जब क्षिप्रा अपने पूरे सौंदर्य के साथ मंदिर के पिछवाड़े से कल-कल ध्वनी कर गुजरती होगी तो आने वाले भक्तों, पर्यटकों को स्वर्गिक आनंद की प्राप्ति होती होगी। आज इस पवीत्र नदी के ठहरे गंदे काले रंग के पानी जिसमें जहां-तहां जलकुम्भीयां उगी हुए हैं, को देख मन ग्लानी से भर उठता है, क्योंकि उसको इस रूप में पहुंचाने के हम सभी जिम्मेवार हैं। फिर भी कभी उज्जैन यात्रा पर आयें तो मगलनाथ के भी दर्शन जरूर करें।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...